Chapter 9
Chapter 9 — अध्ययन नोट्स
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दीनबन्धुः श्रीनायारः चरित्रपरिचयः
व्याख्यादीनबन्धुः श्रीनायारः चरित्रपरिचयः
इस खंड में दीनबन्धुः श्रीनायारः के चरित्र का परिचय प्रस्तुत किया गया है। श्रीनायारः का पालन-पोषण एक अनाथाश्रम में हुआ था, जहाँ से उन्होंने अपने जीवन की नींव रखी। वे एक धार्मिक, कर्मठ और दयालु व्यक्ति थे, जिनका जीवन त्याग, सेवा और करुणा से भरा था। श्रीनायारः ने अपनी कर्मदक्षता और सेवाभाव से समाज में एक आदर्श स्थापित किया। वे ओडिशा सरकार के अधीन लगभग तीन वर्षों तक कार्यरत रहे, जहाँ उन्होंने अपने कार्यों से विभाग की कार्यकुशलता को दस गुना बढ़ा दिया। उनकी सादगी, स्वल्पभाषिता और संतुलित वार्तालाप की शैली उन्हें विशेष बनाती थी। श्रीनायारः अपने वेतन का आधा से अधिक हिस्सा केरल में स्थापित अनाथाश्रम को भेजते थे, जिससे उनकी सेवा भावना का पता चलता है। वे समाज के दीन-दुखियों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते थे और शिक्षा तथा संस्कार प्रदान करने में भी अग्रणी थे। उनकी संवेदनशीलता और कर्मनिष्ठा ने उन्हें समाज में एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया।
- श्रीनायारः का पालन-पोषण एक अनाथाश्रम में हुआ।
- वे ओडिशा सरकार के अधीन तीन वर्षों तक कार्यरत रहे।
- उनके कार्यों से विभाग की कार्यकुशलता दस गुना बढ़ी।
- वे स्वल्पभाषी और संतुलित वार्तालाप करने वाले व्यक्ति थे।
- प्रत्येक माह वे अपने वेतन का आधा से अधिक हिस्सा अनाथाश्रम को भेजते थे।
- उनका जीवन त्याग, सेवा और करुणा से भरा था।
- 📌 दीनबन्धुः - दीनों का मित्र, जो दीन-दुखियों की सहायता करता है।
- 📌 कर्मनैपुण्यम् - कर्मों में निपुणता।
- 📌 स्वल्पभाषी - कम बोलने वाला।
श्रीनायारः के कार्य और समाज सेवा
व्याख्याश्रीनायारः के कार्य और समाज सेवा
इस खंड में श्रीनायारः द्वारा किए गए समाज सेवा के कार्यों का विस्तृत वर्णन है। श्रीनायारः न केवल अपने विभागीय कर्तव्यों का पालन करते थे, बल्कि वे समाज के दीन-दुखियों की सहायता में भी सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने अपने वेतन का आधा से अधिक भाग केरल में स्थापित अनाथाश्रम को भेजा, जहाँ अनाथ बच्चों का पालन-पोषण होता था। श्रीनायारः की कर्मनैपुण्यम् और सेवाभाव ने विभाग की कार्यकुशलता को दस गुना बढ़ा दिया। उन्होंने खाद्य विभाग में मिलावट को कम किया और उपभोक्ताओं की शिकायतों को समाप्त किया। उनके कार्यों के कारण विभाग में कोई भी विरोधाभास या शिकायत नहीं थी, और मंत्रियों के बीच उनकी अच्छी ख्याति थी। श्रीनायारः ने अपने दायित्व ग्रहण के एक माह के भीतर कई स्थगित समस्याओं का समाधान किया। वे अपने सहकर्मियों के प्रति भी अत्यंत सहयोगी और उदार थे। उनकी सेवा भावना और कर्मनिष्ठा से समाज में एक सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
- श्रीनायारः ने खाद्य विभाग में मिलावट को कम किया।
- उनके कार्यों से विभाग की कार्यकुशलता दस गुना बढ़ी।
- वे अपने वेतन का आधा से अधिक हिस्सा अनाथाश्रम को भेजते थे।
- उनके कार्यकाल में विभाग के खिलाफ कोई शिकायत नहीं थी।
- उन्होंने कई स्थगित समस्याओं का समाधान किया।
- उनकी सेवा भावना से समाज में सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
- 📌 अपमिश्रणम् - मिलावट।
- 📌 समस्या समाधान - विभिन्न समस्याओं का निवारण।
- 📌 सेवाभाव - सेवा की भावना।
श्रीनायारः का मनोविज्ञान और भावनात्मक पक्ष
व्याख्याश्रीनायारः का मनोविज्ञान और भावनात्मक पक्ष
इस भाग में श्रीनायारः के मनोविज्ञान और भावनात्मक पक्ष का विश्लेषण किया गया है। श्रीनायारः स्वल्पभाषी थे, अतः उनकी मनोव्यथा और मनोवृत्तियाँ सहजतया समझी नहीं जाती थीं। परंतु उनके कर्मनैपुण्यम् और मनोनिवेशः (दत्तचित्त होना) से स्पष्ट होता है कि वे अपने
अभ्यास प्रश्न — Chapter 9
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. संस्कृतभाष्या उत्तराणि लिखत । (क) श्रीनायार: कुत्र गमनाय इच्छां न प्रकटितवान्? (ख) विभागस्य विपक्षे केषाम् अभियोगो नास्ति? (ग) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अधाधिक भागं कुत्र प्रेषयति स्म? (घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा किम् अकरोत्? (ङ) बहुदिनेभ्य: स्थगितानां समस्यानां समाधानं कदा जातम्? (च) श्रीनायारस्य पाश्वै पत्रं कया प्रेषितम्? (छ) आश्रमे के लालिता: पालिताश्च भवन्ति? (ज) पत्रलेखिका कस्य हस्तयो: अनाथाश्रमं सम्पर्य सौप्रस्थानिकीमिच्छति?
उत्तर:
उत्तराः: (क) श्रीनायार: गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् विभागस्य विपक्षे। (ख) विभागस्य विपक्षे उपभोक्ताणां अभियोगो नास्ति। (ग) श्रीनायार: स्ववेतनस्य अधाधिकं भागं अनाथाश्रमाय प्रेषयति स्म। (घ) श्रीनायारस्य नेत्रतीराद् विगलिता अश्रुधारा पत्रस्य अधाधिकं भागं आर्द्रिकरोति स्म। (ङ) बहुदिनेभ्य: स्थगितानां समस्यानां समाधानं वर्षत्रयस्य आकलनात् जातम्। (च) श्रीनायारस्य पाश्वै पत्रं श्रीदासः प्रेषितवान्। (छ) आश्रमे लालिताः पालिताश्च शिशवः भवन्ति। (ज) पत्रलेखिका कस्य हस्तयो: अनाथाश्रमं सम्पर्य सौप्रस्थानिकीं इच्छति, तस्य नाम श्रीदासः।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्नानुसार पाठ्यांशे वर्णित घटनानुसार उत्तराणि दत्तानि। उदाहरणार्थ, श्रीनायार: गमनाय इच्छां न प्रकटितवान् विभागस्य विपक्षे, तथा अन्येषु प्रश्नेषु पाठ्यसंदर्भानुसार उत्तराणि सुस्पष्टानि।
Q2.2. समस्त्रं हिन्दीभाष्या व्याख्यां कुरुत । (क) उपभोक्ताण्मिपि अभियोगो नास्ति विभागस्य विपक्षे (ख) सर्वे अश्रुलहृदयै: सौप्रस्थानिकीं ज्ञापितवन्त: (ग) त्वया निर्मितोऽयं श्वद्रोऽनाथाश्रमोऽधुना महाद्रुमेण परिणत:।
उत्तर:
उत्तराः: (क) विभाग के विपक्ष में उपभोक्ताओं की कोई शिकायत नहीं है, अर्थात् विभाग का कार्य निष्पक्ष और संतोषजनक है। (ख) सभी अश्रुधारा बहाने वाले लोगों ने सौप्रस्थानिकी (विदाई पत्र) को ज्ञापित किया, अर्थात् वे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर चुके हैं। (ग) तुम्हारे द्वारा निर्मित यह श्वद्र (कुत्ता) अनाथाश्रम अब महाद्रुम (बड़े पेड़) के समान विकसित हो गया है, अर्थात् यह आश्रम अब बहुत बड़ा और समृद्ध हो गया है।
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्यांश का हिन्दी में अर्थ स्पष्ट करते हुए व्याख्या दी गई है, जिससे पाठक को मूल वाक्य का भाव और संदर्भ समझ में आए।
Q3.3. अध: समस्तपदानां विग्रहाः दत्ताः, तानाश्रित्य समस्तपदानि रचयत समासनामापि लिखत । (क) कालस्य खण्डः तस्मिन् = ... (ख) कर्मसु नैपुण्यम् = ... (ग) द्वि च त्रि च अनयोः समाहारः, तेषाम् = ... (घ) दीर्घः अवकाशः, तम् = ... (ङ) धनाय आदेशः, तेन = ... (च) जीवनस्य प्रदीपः = ...
उत्तर:
उत्तराः: (क) कालस्य खण्डः तस्मिन् = तस्मिन् कालखण्डे (ख) कर्मसु नैपुण्यम् = कर्मनैपुण्यम् (ग) द्वि च त्रि च अनयोः समाहारः, तेषाम् = द्वित्रिचयानयोः समाहारः (घ) दीर्घः अवकाशः, तम् = दीर्घावकाशं तम् (ङ) धनाय आदेशः, तेन = तेन धनादेशः (च) जीवनस्य प्रदीपः = जीवनप्रदीपः समासनाम् (समास) लिखितम्: (क) कालखण्डः (ख) कर्मनैपुण्यम् (ग) द्वित्रिचयानयः (घ) दीर्घावकाशः (ङ) धनादेशः (च) जीवनप्रदीपः
व्याख्या:
प्रत्येक पदस्य विग्रहं (शब्दविभाजनं) कृत्वा तत् समासरूपेण संयोजितम्। उदाहरणार्थ, 'कालस्य खण्डः तस्मिन्' इति विग्रहः 'तस्मिन् कालखण्डे' इति समासरूपेण लिखितः।
Q4.4. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत । (क) श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्। (ख) वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्। (ग) तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति। (घ) पत्रस्य अधाधिकं भागं अश्रुधारा आर्द्रिकरोति स्म। (ङ) श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्। (च) भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु।
उत्तर:
उत्तराः: (क) प्रश्नः - श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्। उत्तरः - श्रीनायारः स्वल्पभाषी आसीत्, अतः सः कम् अपि अधिकं न उक्तवान्। (ख) प्रश्नः - वर्षत्रयस्य आकलनात् ज्ञायते यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणैः वर्धितम्। उत्तरः - वर्षत्रयस्य आकलनात् स्पष्टं भवति यत् विभागस्य कार्यनैपुण्यं दशगुणं वर्धितम्। (ग) प्रश्नः - तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति। उत्तरः - तस्य राज्येन सह कश्चित् सम्पर्कः नास्ति, अतः सः एकाकी आसीत्। (घ) प्रश्नः - पत्रस्य अधाधिकं भागं अश्रुधारा आर्द्रिकरोति स्म। उत्तरः - पत्रस्य अधाधिकं भागं अश्रुधारा आर्द्रिकरोति स्म, यत् तस्य भावनात्मकता सूचयति। (ङ) प्रश्नः - श्रीदासः तत्पत्रमुद्घाटितवान्। उत्तरः - श्रीदासः तत्पत्रं उद्घाटितवान्, यत् पत्रलेखिकाया: विचाराणि ज्ञातुम्। (च) प्रश्नः - भगवान् त्वां दीर्घजीवनं कारयतु। उत्तरः - एषः आशीर्वादः दीर्घजीवनाय प्रार्थना अस्ति।
व्याख्या:
प्रत्येक रेखाङ्कितपदस्य आधारं कृत्वा प्रश्ननिर्माणं कृतम्, तत् पाठ्यसंदर्भानुसार उत्तरैः सह।
Q5.5. विपरीतार्थकपदानि मेलयत । (क) आगत्य (क) विस्मृतः (ख) इच्छाम् (ख) गत्वा (ग) स्वल्पभाषी (ग) न्यूनीभूतम् (घ) प्रारभ्य (घ) पक्षे (ङ) अधिकीभूतम् (ङ) बहुभाषी (च) विपक्षे (च) समाप्य (छ) स्मृतः (छ) लघुजीवनम् (ज) दीर्घजीवनम् (ज) अनिच्छाम्
उत्तर:
उत्तरम्: (क) आगत्य — गत्वा (ख) इच्छाम् — अनिच्छाम् (ग) स्वल्पभाषी — बहुभाषी (घ) प्रारभ्य — समाप्य (ङ) अधिकीभूतम् — न्यूनीभूतम् (च) विपक्षे — पक्षे (छ) स्मृतः — विस्मृतः (ज) दीर्घजीवनम् — लघुजीवनम्
व्याख्या:
प्रत्येक पदस्य विपरीतार्थकं मेलयित्वा यथावत् युग्मं निर्मितम्। उदाहरणार्थ, 'आगत्य' विपरीतार्थकं 'गत्वा' इति।
Q6.6. अधोलिखितानां विशेष्यपदानां विशेषणपदानि पाठात् चित्वा लिखत । वार्तालापः, वर्षत्रयस्य, अश्रुधारा, समस्यानाम्, व्यवहारः, पत्रम्, शिशवः।
उत्तर:
उत्तरम्: विशेष्यपदानि (संज्ञा): वार्तालापः, वर्षत्रयस्य, अश्रुधारा, समस्यानाम्, व्यवहारः, पत्रम्, शिशवः विशेषणपदानि (विशेषण): - वर्षत्रयस्य (वर्षत्रयस्य विशेषणम्) - समस्यानाम् (समस्याः विशेषणम्) अर्थात्, 'वर्षत्रयस्य' तथा 'समस्यानाम्' विशेषणपदानि, अन्यानि विशेष्यपदानि।
व्याख्या:
प्रत्येक पदं पाठात् निरीक्ष्य तस्य प्रकृतिः (विशेष्य वा विशेषण) निर्दिष्टा। उदाहरणार्थ, 'वर्षत्रयस्य' विशेषणपदं यत् 'वर्षत्रय' इति विशेष्यं सूचयति।
Q7.7. अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत । समाप्य, जातम्, त्यक्त्वा, धृत्वा, पठन्, संपोष्य।
उत्तर:
उत्तरम्: प्रत्येक पदस्य प्रकृतिप्रत्ययविभागः निम्नवत्: - समाप्य : क्रियापदप्रत्ययः (कृदन्त) - जातम् : क्रियापदप्रत्ययः (कृदन्त) - त्यक्त्वा : क्रियापदप्रत्ययः (कृदन्त) - धृत्वा : क्रियापदप्रत्ययः (कृदन्त) - पठन् : वर्तमानकालीन क्रियापदः (प्रत्ययः) - संपोष्य : कृदन्तप्रत्ययः अर्थात्, समस्ते पदे कृदन्तप्रत्ययवर्गे सन्ति, यथा कर्म, कर्ता, क्रिया इत्यादि सूचयन्ति।
व्याख्या:
प्रत्येक पदं संस्कृतव्याकरणानुसार प्रकृतिप्रत्ययविभागे वर्गीकृतम्। उदाहरणार्थ, 'समाप्य' कृदन्तप्रत्यययुक्तम्, यत् क्रियापदस्य विशेषणरूपं सूचयति।
Q8.दीनबन्धुः श्रीनायारः का पालन-पोषण कहाँ हुआ था?
उत्तर:
एक अनाथाश्रम में
व्याख्या:
दीनबन्धुः श्रीनायारः का पालन-पोषण एक अनाथाश्रम में हुआ था, जहाँ से उन्होंने अपने जीवन की नींव रखी।