NCERTCh 5निःशुल्क

Chapter 5

🎓 Class 12📖 Shaswati📖 9 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~14 मिनट
Chapter 4अध्याय 5 / 11Chapter 6

Chapter 5अध्ययन नोट्स

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शुकनासोपदेशः - परिचयः

व्याख्या

शुकनासोपदेशः - परिचयः

शुकनासोपदेशः संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण गद्यांश है, जो महाकवि बाणभट्ट की प्रसिद्ध कादम्बरी से लिया गया है। बाणभट्ट संस्कृत के सर्वाधिक प्रतिभाशाली गद्यकारों में से एक हैं, जिन्होंने कान्यकुब्ज (कन्नौज) के राजा हर्षवर्धन के जीवन पर 'हर्षचरित' नामक आख्यायिका तथा 'कादम्बरी' नामक गद्यकाव्य की रचना की। हर्षवर्धन का राज्यकाल 606 ई. से 648 ई. तक माना जाता है, अतः बाणभट्ट का भी यही कालखंड माना जाता है। कादम्बरी संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट गद्य काव्य है, जो कथा श्रेणी का काव्य है। इसकी कथा जटिल होते हुए भी मनोरम है। इसमें राजा शूद्रक के यहाँ चाण्डालकन्या वैशम्पायन नामक शुक (तोता) आता है और सभा में आत्म-वृत्तान्त सुनाता है। इस ग्रन्थ में तीन-तीन जन्मों की घटनाएँ सम्मिलित हैं। प्रस्तुत पाठ 'शुकनासोपदेशः' कादम्बरी के इसी अंश से लिया गया है। इसका नायक राजकुमार चन्द्रापीड है, जो सत्व, शौर्य और आर्जव भावों से युक्त है। शुकनास अनुभवी मन्त्री हैं जो चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व युवावस्था के दोषों के विषय में उपदेश देते हैं। यह उपदेश युवावस्था में प्रवेश कर रहे युवकों के लिए एक दीक्षान्त भाषण के समान है, जिसमें यौवन के दोषों से बचने के उपाय बताए गए हैं।

  • शुकनासोपदेशः कादम्बरी से लिया गया एक महत्वपूर्ण गद्यांश है।
  • बाणभट्ट संस्कृत के प्रमुख गद्यकार और कवि थे।
  • कादम्बरी गद्यकाव्य है जिसमें जटिल किंतु मनोरम कथा है।
  • राजकुमार चन्द्रापीड को शुकनास द्वारा युवावस्था के दोषों का उपदेश दिया गया है।
  • यह उपदेश युवकों के लिए दीक्षान्त भाषण के समान है।
  • 📌 बाणभट्ट: संस्कृत के प्रसिद्ध गद्यकार और कवि, हर्षवर्धन के दरबारी।
  • 📌 कादम्बरी: संस्कृत का उत्कृष्ट गद्यकाव्य, कथा श्रेणी का।
  • 📌 शुकनास: अनुभवी मन्त्री जो चन्द्रापीड को उपदेश देते हैं।

शुकनासोपदेशः - श्लोकानां व्याख्या

व्याख्या

शुकनासोपदेशः - श्लोकानां व्याख्या

इस खंड में शुकनास के द्वारा राजकुमार चन्द्रापीड को दिए गए उपदेश के श्लोकों का विस्तारपूर्वक अर्थ और व्याख्या की गई है। शुकनास युवावस्था में उत्पन्न होने वाले दोषों जैसे कि अहंकार, लक्ष्मीमद, अनर्थपरम्परा, और बुद्धि के कलुषित होने की बात करते हैं। वे बताते हैं कि यौवन में जन्मजात रूप, शक्ति और प्रभुता के साथ-साथ अनेक दोष भी उत्पन्न होते हैं जो राज्य और जीवन के लिए हानिकारक होते हैं। शुकनास कहते हैं कि यौवन का प्रकाश अत्यंत गहरा और जटिल है। यह केवल स्वाभाविक नहीं, अपितु अनेक प्रकार के दोषों का कारण भी है। यौवन में बुद्धि का कलुषित होना, विषयों में अत्यधिक आसक्ति, और राज्य के सुखों का नाश होना आम बात है। इसलिए युवाओं को सावधानीपूर्वक अपने आचरण और विचारों पर नियंत्रण रखना चाहिए। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि उपदेश तभी प्रभावी होता है जब वह मन में शुद्ध और दोषरहित हो। यदि मन में मल (दोष) रह जाता है तो उपदेश का प्रभाव नहीं होता। इसलिए शुकनास राजकुमार को बताते हैं कि उसे अपने मन को शुद्ध रखना चाहिए और गुरु के उपदेशों का पालन करना चाहिए।

  • यौवन में जन्मजात दोष और अहंकार उत्पन्न होते हैं।
  • यौवन का प्रकाश गहरा और जटिल होता है।
  • बुद्धि का कलुषित होना और विषयों में आसक्ति हानिकारक है।
  • शुद्ध मन से ही उपदेश प्रभावी होता है।
  • युवाओं को अपने आचरण पर नियंत्रण रखना आवश्यक है।
  • 📌 लक्ष्मीमद: धन और ऐश्वर्य से उत्पन्न अहंकार।
  • 📌 अपरिणामोपशम: वृद्धावस्था में भी न शांत होने वाला दोष।
  • 📌 गुरूपदेशः: गुरु द्वारा दिया गया उपदेश।

विशेषणम् तथा विशेष्यम्

अवधारणा

विशेषणम् तथा विशेष्यम्

इस खंड में संस्कृत व्याकरण के दो महत्वपूर्ण विषय विशेषणम् और विशेष्यम् का अध्ययन किया गया है। विशेषणम् वह शब्द होता है जो किसी संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताता है, जैसे 'सुंदर', 'बलवान' आदि। विशेष्यम् वह शब्द होता है जिसका विशेषण किया जाता है, अर्थ

अभ्यास प्रश्नChapter 5

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् । (क) लक्ष्मीमद: कीटूश:? (ख) चन्द्रापीडं क: उपदिशति? (ग) अनर्थपरम्पराया: किं कारणम्? (घ) कीटूशो मनसि उपदेशगुणा: प्रविशन्ति? (ङ) लक्ष्मापि दु:खेन का परिपाल्यते? (च) केषाम् उपदेष्टार: विरला: सन्ति? (छ) लक्ष्म्या परिगृहीता: राजान: कीटूश: भवन्ति? (ज) वृद्धोपदेशं ते राजान: किमिति पश्यन्ति?

उत्तर:

1. संस्कृत में उत्तर: (क) लक्ष्मीमद: कीटूश: - लक्ष्मीमद: वे कीटूश: हैं जो ऐश्वर्य, यौवन, सौन्दर्य, शक्तिः आदि वस्तुओं के प्रति आसक्त होते हैं। (ख) चन्द्रापीडं क: उपदिशति - शुकनासः चन्द्रापीडं उपदिशति। (ग) अनर्थपरम्पराया: किं कारणम् - अनर्थपरम्पराया: कारणं अस्मिन जीवने ऐश्वर्यादिषु आसक्तिः तथा विवेकहीनता। (घ) कीटूशो मनसि उपदेशगुणा: प्रविशन्ति - कीटूशो मनसि उपदेशगुणा: विनय, धैर्य, विवेकादीनि प्रविशन्ति। (ङ) लक्ष्मापि दु:खेन का परिपाल्यते - लक्ष्मा दु:खेन संयमेन, धैर्येण च परिपाल्यते। (च) केषाम् उपदेष्टार: विरला: सन्ति - उपदेष्टार: विरला: ते विद्वान्, विवेकी, विनीताः च सन्ति। (छ) लक्ष्म्या परिगृहीता: राजान: कीटूश: भवन्ति - लक्ष्म्या परिगृहीताः राजान: कीटूश: भवन्ति यतः ते ऐश्वर्यादिषु आसक्ताः सन्ति। (ज) वृद्धोपदेशं ते राजान: किमिति पश्यन्ति - ते वृद्धोपदेशं हितकरं, जीवनोपयोगी च पश्यन्ति।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का संस्कृत में स्पष्ट उत्तर दिया गया है जो पाठ के अनुसार उपदेश और अर्थ को स्पष्ट करता है।

MediumNCERT
Q2.2. विशेषणानि विशेष्यै: सह योजयत । | विशेषणम् | विशेष्यम् | | --- | --- | | (क) समतिक्रामत्सु | ते | | (ख) अधीतशास्त्रस्य | विद्वांसम् | | (ग) दारुणो | दिवसेषु | (घ) गहनं तम: दोषजातम् (ङ) अतिमलिनम् लक्ष्मीमद: (च) सचेतसम् यौवनप्रभवम्

उत्तर:

2. विशेषणानि विशेष्यै: सह योजयत: (क) समतिक्रामत्सु ते (ख) अधीतशास्त्रस्य विद्वांसम् (ग) दारुणो दिवसेषु (घ) गहनं तम: दोषजातम् (ङ) अतिमलिनम् लक्ष्मीमद: (च) सचेतसम् यौवनप्रभवम्

व्याख्या:

प्रत्येक विशेषण को उसके विशेष्य के साथ संस्कृत में यथावत् जोड़ा गया है।

EasyNCERT
Q3.3. अधोलिखितपदानि स्वरचित-संस्कृत-वाक्येषु प्रयुङ्ध्वम् । सङ्ग्रहार्थम्, समुपस्थितम्, विनयम्, परिणमयति, शृण्वन्ति, स्पृशति।

उत्तर:

3. संस्कृत वाक्यों में निम्नलिखित पदों का प्रयोग: - सङ्ग्रहार्थम्: वाक्य - 'सर्वे सङ्ग्रहार्थम् समागता भवन्ति।' - समुपस्थितम्: वाक्य - 'शिक्षकः कक्ष्याम् समुपस्थितः अस्ति।' - विनयम्: वाक्य - 'विद्यार्थी विनयेन गुरुम् अभिवादयति।' - परिणमयति: वाक्य - 'सः कर्म परिणमयति।' - शृण्वन्ति: वाक्य - 'छात्राः उपदेशं शृण्वन्ति।' - स्पृशति: वाक्य - 'सः पुष्पं स्पृशति।'

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द का अर्थ समझकर संस्कृत में उचित वाक्य रचना की गई है।

MediumNCERT
Q4.4. अधोलिखितानां पदानां सन्धि-विच्छेदं कुरुत । (क) एवातिगहनम् ... + ... (ख) गर्भश्वरत्वम् ... + ... (ग) गुरूपदेशः ... + ... (घ) ह्वेवम् ... + ... (ङ) नाभिजनम् ... + ... (च) नोपसर्पिति ... + ...

उत्तर:

4. सन्धि-विच्छेद: (क) एवातिगहनम् = एव + अतिगहनम् (ख) गर्भश्वरत्वम् = गर्भ + स्वरत्वम् (ग) गुरूपदेशः = गुरु + उपदेशः (घ) ह्वेवम् = हि + एवम् (ङ) नाभिजनम् = न + अभिजनम् (च) नोपसर्पिति = न + उपसर्पिति

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द को उसके मूल पदों में विभक्त किया गया है जो सन्धि-विच्छेद कहलाता है।

MediumNCERT
Q5.5. प्रकृति-प्रत्ययविभागः क्रियताम् । शब्दः प्रकृतिः प्रत्ययः (क) चिकीर्षुः ... ... (ख) उपदेष्टव्यम् ... ... (ग) ईश्वते ... ... (घ) बुध्यते ... ... (ङ) निन्द्यसे ... ... (च) उपशाशाम ... ...

उत्तर:

5. प्रकृति-प्रत्ययविभाग: (क) चिकीर्षुः = चि + कीर्षुः (चि=प्रकृति, कीर्षुः=प्रत्यय) (ख) उपदेष्टव्यम् = उप + देष्ट + व्यम् (ग) ईश्वते = ईश् + वते (घ) बुध्यते = बुध् + यते (ङ) निन्द्यसे = निन्द् + यसे (च) उपशाशाम = उप + शाशाम

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द को उसकी प्रकृति और प्रत्यय में विभाजित किया गया है।

HardNCERT
Q6.6. समासविग्रहं कुरुत । (क) अमानुषशक्तित्वम् - ... (ख) अत्यासङ्गः - ... (ग) अनार्यां - ... (घ) स्वार्थनिष्पादनपरै: - ...

उत्तर:

6. समासविग्रह: (क) अमानुषशक्तित्वम् = अमानुष + शक्तित्वम् (ख) अत्यासङ्गः = अति + आसङ्गः (ग) अनार्यां = अन् + आर्यां (घ) स्वार्थनिष्पादनपरै: = स्वार्थ + निष्पादन + परै: (बहुव्रीहि समास)

व्याख्या:

प्रत्येक समास को उसके घटकों में विभाजित कर अर्थ स्पष्ट किया गया है।

HardNCERT
Q7.महाकवि बाणभट्ट के जीवनकाल का अनुमान किस राजा के शासनकाल के आधार पर लगाया जाता है?
A.A) राजा हर्षवर्धन के शासनकाल 606 ई. से 648 ई.
B.B) राजा अशोक के शासनकाल 268 ई.पू. से 232 ई.पू.
C.C) राजा चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल 321 ई. से 297 ई.
D.D) राजा पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल 1178 ई. से 1192 ई.

उत्तर:

राजा हर्षवर्धन के शासनकाल 606 ई. से 648 ई.

व्याख्या:

महाकवि बाणभट्ट का जीवनकाल राजा हर्षवर्धन के शासनकाल 606 ई. से 648 ई. तक माना जाता है क्योंकि वे हर्षवर्धन के दरबारी कवि थे और उनकी रचना 'हर्षचरित' इसी कालखंड में लिखी गई।

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Q8.शुकनासोपदेशः किस ग्रन्थ से लिया गया है और इसका नायक कौन है?
A.A) कादम्बरी से, नायक राजकुमार चन्द्रापीड
B.B) हर्षचरित से, नायक राजा हर्षवर्धन
C.C) महाभारत से, नायक विदुर
D.D) पञ्चतन्त्र से, नायक शुक
E.correct_answer

उत्तर:

कादम्बरी से, नायक राजकुमार चन्द्रापीड

व्याख्या:

शुकनासोपदेशः संस्कृत साहित्य के महाकवि बाणभट्ट की प्रसिद्ध कादम्बरी से लिया गया गद्यांश है जिसमें मुख्य नायक राजकुमार चन्द्रापीड है।

Easy