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Chapter 5

🎓 Class 11📖 Bhautiki-I📖 12 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~18 मिनट
Chapter 4अध्याय 5 / 7Chapter 6

Chapter 5अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 12 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

5.1 भूमिका

व्याख्या

5.1 भूमिका

हम दैनिक जीवन में 'कार्य', 'ऊर्जा' और 'शक्ति' शब्दों का सामान्य प्रयोग करते हैं, जैसे किसान खेत जोतना, मिस्त्री ईंट ढोना, छात्र पढ़ाई करना आदि। परंतु भौतिकी में इन शब्दों की परिभाषा बहुत अधिक परिशुद्ध होती है। ऊर्जा को कार्य करने की क्षमता के रूप में समझा जाता है, और शक्ति को कार्य करने की दर के रूप में। इस अध्याय में हम इन तीनों भौतिक राशियों की परिभाषा, गणितीय व्याख्या और उनके बीच के सम्बन्ध को समझेंगे। इसके लिए सबसे पहले हमें दो सदिशों के अदिश गुणनफल (डॉट उत्पाद) की गणितीय भाषा को समझना आवश्यक है।

  • कार्य, ऊर्जा और शक्ति के दैनिक और भौतिकी में प्रयुक्त अर्थों में भिन्नता होती है।
  • ऊर्जा कार्य करने की क्षमता है, जबकि शक्ति कार्य करने की दर है।
  • कार्य की गणना के लिए सदिशों के अदिश गुणनफल की समझ आवश्यक है।
  • इस अध्याय में कार्य, ऊर्जा और शक्ति की परिभाषा तथा उनके बीच सम्बन्ध का अध्ययन किया जाएगा।
  • 📌 कार्य: बल द्वारा वस्तु के विस्थापन के अनुदिश किया गया बल का घटक और विस्थापन के गुणनफल।
  • 📌 ऊर्जा: कार्य करने की क्षमता।
  • 📌 शक्ति: कार्य करने की दर।

5.1.1 अदिश गुणनफल

व्याख्या

5.1.1 अदिश गुणनफल

दो सदिशों A और B के अदिश गुणनफल (डॉट उत्पाद) को A·B से दर्शाते हैं और इसे इस प्रकार परिभाषित करते हैं: A·B = A × B × cosθ, जहाँ θ दोनों सदिशों के बीच का कोण है। यह परिणाम एक अदिश राशि होती है, जिसका कोई दिशा नहीं होती। यह गुणनफल क्रम-विनिमेय होता है, अर्थात् A·B = B·A। इसके अलावा, यह वितरण नियम का पालन करता है: A·(B + C) = A·B + A·C और λ(A·B) = (λA)·B जहाँ λ एक वास्तविक संख्या है। एकांक सदिशों î, ĵ, k̂ के अदिश गुणनफल के लिए, î·î = ĵ·ĵ = k̂·k̂ = 1 और î·ĵ = ĵ·k̂ = k̂·î = 0 होता है। दो सदिश A = A_x î + A_y ĵ + A_z k̂ और B = B_x î + B_y ĵ + B_z k̂ के अदिश गुणनफल का सूत्र है: A·B = A_x B_x + A_y B_y + A_z B_z।

  • अदिश गुणनफल दो सदिशों के बीच का गुणनफल है जिसका परिणाम एक अदिश राशि होती है।
  • A·B = A × B × cosθ, जहाँ θ दोनों सदिशों के बीच का कोण है।
  • अदिश गुणनफल क्रम-विनिमेय और वितरण नियम का पालन करता है।
  • एकांक सदिशों के अदिश गुणनफल के लिए î·î = 1, î·ĵ = 0 आदि होते हैं।
  • दो सदिशों के घटकों के योग के रूप में अदिश गुणनफल की गणना की जाती है।
  • 📌 अदिश गुणनफल (डॉट उत्पाद): दो सदिशों का ऐसा गुणनफल जिसका परिणाम एक अदिश राशि होता है।
  • 📌 कोण θ: दो सदिशों के बीच का कोण।
  • 📌 एकांक सदिश: î, ĵ, k̂ जो त्रिविमीय निर्देशांक अक्षों के लिए मानक सदिश हैं।

5.2 कार्य और गतिज ऊर्जा की धारणा : कार्य–ऊर्जा प्रमेय

व्याख्या

5.2 कार्य और गतिज ऊर्जा की धारणा : कार्य–ऊर्जा प्रमेय

नियत त्वरण α के अंतर्गत सरल रेखीय गति के लिए समीकरण v² - u² = 2as है। इसे m/2 से गुणा करने पर (1/2)mv² - (1/2)mu² = mas = Fs प्राप्त होता है, जहाँ F बल है। इसे सदिश रूप में लिखा जाए तो v² - u² = 2 a·d और (1/2)mv² - (1/2)mu² = m a·d = F·d होता है। यहा

अभ्यास प्रश्नChapter 5

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.5.1 किसी वस्तु पर किसी बल द्वारा किए गए कार्य का चिह्न समझना महत्वपूर्ण है। सावधानीपूर्वक बताइए कि निम्नलिखित राशियाँ धनात्मक हैं या ऋणात्मक : (a) किसी व्यक्ति द्वारा किसी कुएँ में से रस्सी से बँधी बाल्टी को रस्सी द्वारा बाहर निकालने में किया गया कार्य। (b) उपर्युक्त स्थिति में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य। (c) किसी आनत तल पर फिसलती हुई किसी वस्तु पर घर्षण द्वारा किया गया कार्य। (d) किसी खुरदरे क्षैतिज तल पर एकसमान वेग से गतिमान किसी वस्तु पर लगाए गए बल द्वारा किया गया कार्य। (e) किसी दोलायमान लोलक को विरामावस्था में लाने के लिए वायु के प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य।

उत्तर:

उत्तर: (a) व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य धनात्मक होगा क्योंकि वह बाल्टी को ऊपर की ओर खींच रहा है, बल और विस्थापन की दिशा समान है। (b) गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा क्योंकि गुरुत्वीय बल बाल्टी को नीचे की ओर खींचता है जबकि विस्थापन ऊपर की ओर है। (c) घर्षण बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा क्योंकि घर्षण बल गति के विपरीत दिशा में कार्य करता है। (d) यदि वस्तु एकसमान वेग से चल रही है, तो बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होगा क्योंकि विस्थापन और बल की दिशा समान होने पर भी वस्तु की गति अपरिवर्तित है, अतः बल द्वारा किया गया कार्य गतिज ऊर्जा में परिवर्तन नहीं करता। (e) वायु के प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा क्योंकि यह बल लोलक की गति को कम करता है।

व्याख्या:

कार्य का चिह्न बल और विस्थापन की दिशा पर निर्भर करता है। यदि बल और विस्थापन समान दिशा में हैं तो कार्य धनात्मक होता है, यदि विपरीत दिशा में हैं तो ऋणात्मक होता है। घर्षण और प्रतिरोधी बल हमेशा गति के विपरीत दिशा में कार्य करते हैं, अतः उनका कार्य ऋणात्मक होता है।

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Q2.5.2 2 kg द्रव्यमान की कोई वस्तु जो आरंभ में विरामावस्था में है, 7 N के किसी क्षैतिज बल के प्रभाव से एक मेज पर गति करती है। मेज का गतिज-घर्षण गुणांक 0.1 है। निम्नलिखित का परिकलन कीजिए और अपने परिणामों की व्याख्या कीजिए। (a) लगाए गए बल द्वारा 10 s में किया गया कार्य। (b) घर्षण द्वारा 10 s में किया गया कार्य। (c) वस्तु पर कुल बल द्वारा 10 s में किया गया कार्य। (d) वस्तु की गतिज ऊर्जा में 10 s में परिवर्तन।

उत्तर:

दिया गया: म = 2 kg, F = 7 N, μ = 0.1, t = 10 s, g = 9.8 m/s² पहले घर्षण बल निकालते हैं: F_friction = μ * m * g = 0.1 * 2 * 9.8 = 1.96 N शुद्ध बल: F_net = F - F_friction = 7 - 1.96 = 5.04 N त्वरण: a = F_net / m = 5.04 / 2 = 2.52 m/s² गति 10 s में: v = u + at = 0 + 2.52 * 10 = 25.2 m/s विस्थापन: s = ut + 0.5 * a * t² = 0 + 0.5 * 2.52 * 100 = 126 m (a) लगाए गए बल द्वारा किया गया कार्य: W_F = F * s = 7 * 126 = 882 J (b) घर्षण द्वारा किया गया कार्य: W_friction = - F_friction * s = -1.96 * 126 = -246.96 J (ऋणात्मक क्योंकि घर्षण बल विस्थापन के विपरीत है) (c) वस्तु पर कुल बल द्वारा किया गया कार्य: W_net = F_net * s = 5.04 * 126 = 635.04 J (d) गतिज ऊर्जा में परिवर्तन: ΔKE = W_net = 635.04 J या सीधे: KE_final = 0.5 * m * v² = 0.5 * 2 * (25.2)² = 635.04 J व्याख्या: लगाए गए बल द्वारा किया गया कार्य वस्तु को गति देता है, घर्षण बल इसका कुछ हिस्सा ऊर्जा के रूप में खो देता है। कुल कार्य गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है।

व्याख्या:

कार्य = बल × विस्थापन घर्षण बल गति के विपरीत दिशा में कार्य करता है, इसलिए उसका कार्य ऋणात्मक है। कुल कार्य गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है।

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Q3.5.3 चित्र 5.11 में कुछ एकविमीय स्थितिज ऊर्जा-फलनों के उदाहरण दिए गए हैं। कण की कुल ऊर्जा कोटि-अक्ष पर क्रॉस द्वारा निर्देशित की गई है। प्रत्येक स्थिति में, कोई ऐसे क्षेत्र बताइए, यदि कोई हैं तो, जिनमें दी गई ऊर्जा के लिए, कण को नहीं पाया जा सकता। इसके अतिरिक्त, कण की कुल न्यूनतम ऊर्जा भी निर्देशित कीजिए। कुछ ऐसे भौतिक संदर्भों के विषय में सोचिए जिनके लिए ये स्थितिज ऊर्जा आकृतियाँ प्रासंगिक हों।

उत्तर:

उत्तर: (यह प्रश्न चित्र 5.11 के संदर्भ में है, अतः उत्तर में प्रत्येक स्थितिज ऊर्जा फलन के लिए निम्नलिखित होगा): - कण को उन क्षेत्रों में नहीं पाया जा सकता जहाँ उसकी कुल ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा से कम हो, क्योंकि गतिज ऊर्जा ऋणात्मक नहीं हो सकती। - कुल न्यूनतम ऊर्जा वह ऊर्जा है जो कण के सबसे निचले ऊर्जा स्तर को दर्शाती है। - उदाहरण के लिए, यदि स्थितिज ऊर्जा एक कुएँ जैसा है, तो कण उस कुएँ के बाहर नहीं जा सकता यदि उसकी कुल ऊर्जा कुएँ की ऊँचाई से कम हो। - भौतिक संदर्भ: ये स्थितिज ऊर्जा फलन परमाणु, आणविक, या यांत्रिक दोलकों के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं जहाँ ऊर्जा स्तरों का अध्ययन किया जाता है।

व्याख्या:

कण की कुल ऊर्जा = स्थितिज ऊर्जा + गतिज ऊर्जा यदि कुल ऊर्जा < स्थितिज ऊर्जा किसी क्षेत्र में है, तो कण उस क्षेत्र में नहीं हो सकता। न्यूनतम कुल ऊर्जा वह है जहाँ गतिज ऊर्जा शून्य होती है।

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Q4.5.4 रेखीय सरल आवर्त गति कर रहे किसी कण का स्थितिज ऊर्जा फलन $V(x) = \frac{kx^2}{2}$ है, जहां $k$ दोलक का बल नियतांक है। $k = 0.5\ \mathrm{N\ m^{-1}}$ के लिए $V(x)$ व $x$ के मध्य ग्राफ चित्र 5.12 में दिखाया गया है। यह दिखाइए कि इस विभव के अंतर्गत गतिमान कुल 1J ऊर्जा वाले कण को अवश्य ही ‘वापिस आना’ चाहिए जब यह $x = \pm 2\ \mathrm{m}$ पर पहुंचता है।

उत्तर:

दिया गया: V(x) = \frac{1}{2} k x^2, \quad k = 0.5\ \mathrm{N/m}, \quad E_{total} = 1 J जब कण $x = \pm 2$ m पर हो, तब स्थितिज ऊर्जा: V(2) = \frac{1}{2} \times 0.5 \times (2)^2 = 0.5 \times 2 = 1 J कुल ऊर्जा = 1 J है, अतः इस स्थिति पर गतिज ऊर्जा: K = E_{total} - V(2) = 1 - 1 = 0 J इसका अर्थ है कि कण की गति शून्य हो जाती है, अर्थात वह रुक जाता है और वापस लौटता है। इसलिए कण को वापस आना ही होगा।

व्याख्या:

कुल ऊर्जा = स्थितिज ऊर्जा + गतिज ऊर्जा जब स्थितिज ऊर्जा कुल ऊर्जा के बराबर हो जाती है, गतिज ऊर्जा शून्य हो जाती है, अतः कण रुककर दिशा बदलता है।

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Q5.5.5 निम्नलिखित का उत्तर दीजिए: (a) किसी राकेट का बाह्य आवरण उड़ान के दौरान घर्षण के कारण जल जाता है। जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा किसके व्यय पर प्राप्त की गई—राकेट या वातावरण ? (b) धूमकेतु सूर्य के चारों ओर बहुत ही दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में घूमते हैं। साधारणतया धूमकेतु पर सूर्य का गुरुत्वीय बल धूमकेतु के लंबवत् नहीं होता है। फिर भी धूमकेतु की संपूर्ण कक्षा में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है। क्यों ? (c) पृथ्वी के चारों ओर बहुत ही क्षीण वायुमण्डल में घूमते हुए किसी कृत्रिम उपग्रह की ऊर्जा धीरे-धीरे वायुमण्डलीय प्रतिरोध (चाहे यह कितना ही कम क्यों न हो) के विरुद्ध क्षय के कारण कम होती जाती है फिर भी जैसे-जैसे कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी के समीप आता है तो उसकी चाल में लगातार वृद्धि क्यों होती है ? (d) चित्र 5.13(i) में एक व्यक्ति अपने हाथों में 15kg का कोई द्रव्यमान लेकर 2 m चलता है। चित्र 5.13(ii) में वह उतनी ही दूरी अपने पीछे रस्सी को खींचते हुए चलता है। रस्सी चिरनी पर चढ़ी हुई है और उसके दूसरे सिरे पर 15 kg का द्रव्यमान लटका हुआ है। परिकलन कीजिए कि किस स्थिति में किया गया कार्य अधिक है ?

उत्तर:

(a) राकेट का बाह्य आवरण जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा वातावरण के साथ घर्षण के कारण उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा राकेट द्वारा नहीं बल्कि वातावरण के साथ घर्षण से प्राप्त होती है। (b) गुरुत्वीय बल केन्द्र की ओर होता है और हमेशा गति के लंबवत् होता है, इसलिए गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य शून्य होता है क्योंकि कार्य = बल × विस्थापन × cosθ, और θ = 90° होने पर cos90°=0 होता है। (c) वायुमण्डलीय प्रतिरोध से ऊर्जा कम होती है, लेकिन उपग्रह पृथ्वी के समीप आता है जिससे गुरुत्वीय क्षेत्र मजबूत होता है और गुरुत्वीय ऊर्जा कम होकर गतिज ऊर्जा बढ़ती है, इसलिए चाल बढ़ती है। (d) (i) व्यक्ति 15 kg द्रव्यमान को 2 m ऊपर उठाता है, कार्य = mgh = 15 × 9.8 × 2 = 294 J (ii) रस्सी को खींचने में व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य = बल × दूरी बल = लटका हुआ द्रव्यमान का भार = 15 × 9.8 = 147 N कार्य = 147 × 2 = 294 J दोनों स्थितियों में किया गया कार्य समान है।

व्याख्या:

कार्य बल और विस्थापन की दिशा पर निर्भर करता है। गुरुत्वीय बल केन्द्र की ओर होता है, इसलिए कक्षा में कार्य शून्य होता है। उपग्रह की ऊर्जा में परिवर्तन गुरुत्वीय ऊर्जा और गतिज ऊर्जा के बीच होता है।

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Q6.5.6 सही विकल्प को रेखांकित कीजिए : (a) जब कोई संरक्षी बल किसी वस्तु पर धनात्मक कार्य करता है तो वस्तु की स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है/घटती है/अपरिवर्ती रहती है। (b) किसी वस्तु द्वारा घर्षण के विरुद्ध किए गए कार्य का परिणाम हमेशा इसकी गतिज/स्थितिज ऊर्जा में क्षय होता है। (c) किसी बहुकण निकाय के कुल संवेग-परिवर्तन की दर निकाय के बाह्य बल/आंतरिक बलों के जोड़ के अनुक्रमानुपाती होती है। (d) किन्हीं दो पिंडों के अप्रत्यास्थ संघट्ट में वे राशियाँ, जो संघट्ट के बाद नहीं बदलती हैं; निकाय की कुल गतिज ऊर्जा/कुल रेखीय संवेग/कुल ऊर्जा है।
A.(a) बढ़ती है / घटती है / अपरिवर्ती रहती है
B.(b) गतिज ऊर्जा / स्थितिज ऊर्जा
C.(c) बाह्य बल / आंतरिक बलों
D.(d) कुल गतिज ऊर्जा / कुल रेखीय संवेग / कुल ऊर्जा

उत्तर:

(a) बढ़ती है क्योंकि संरक्षी बल धनात्मक कार्य करता है तो वस्तु की स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है। (b) गतिज ऊर्जा घर्षण के विरुद्ध कार्य करने से गतिज ऊर्जा में क्षय होता है। (c) बाह्य बल कुल संवेग-परिवर्तन की दर निकाय के बाह्य बलों के जोड़ के समानुपाती होती है। (d) कुल रेखीय संवेग अप्रत्यास्थ संघट्ट में कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता है, जबकि कुल ऊर्जा और गतिज ऊर्जा परिवर्तित हो सकती हैं।

व्याख्या:

संरक्षी बल धनात्मक कार्य करता है तो स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है। घर्षण गतिज ऊर्जा को कम करता है। संवेग परिवर्तन बाह्य बलों पर निर्भर करता है। अप्रत्यास्थ संघट्ट में कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता है।

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Q7.5.7 बतलाइए कि निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य। अपने उत्तर के लिए कारण भी दीजिए। (a) किन्हीं दो पिंडों के प्रत्यास्थ संघट्ट में, प्रत्येक पिंड का संवेग व ऊर्जा संरक्षित रहती है। (b) किसी पिंड पर चाहे कोई भी आंतरिक व बाह्य बल क्यों न लग रहा हो, निकाय की कुल ऊर्जा सर्वदा संरक्षित रहती है। (c) प्रकृति में प्रत्येक बल के लिए किसी बंद लूप में, किसी पिंड की गति में किया गया कार्य शून्य होता है। (d) किसी अप्रत्यास्थ संघट्ट में, किसी निकाय की अंतिम गतिज ऊर्जा, आरंभिक गतिज ऊर्जा से हमेशा कम होती है।
A.(a) सत्य / असत्य
B.(b) सत्य / असत्य
C.(c) सत्य / असत्य
D.(d) सत्य / असत्य

उत्तर:

(a) असत्य प्रत्यास्थ संघट्ट में कुल संवेग और कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है, लेकिन प्रत्येक पिंड का संवेग और ऊर्जा व्यक्तिगत रूप से संरक्षित नहीं होती। (b) असत्य यदि बाह्य बल कार्य करता है तो निकाय की कुल ऊर्जा परिवर्तित हो सकती है। केवल बंद निकाय में ऊर्जा संरक्षित रहती है। (c) सत्य संरक्षी बल के लिए बंद लूप में कार्य शून्य होता है। (d) सत्य अप्रत्यास्थ संघट्ट में ऊर्जा क्षय होती है, इसलिए अंतिम गतिज ऊर्जा आरंभिक से कम होती है।

व्याख्या:

प्रत्यास्थ संघट्ट में कुल ऊर्जा और संवेग संरक्षित रहते हैं, लेकिन व्यक्तिगत पिंडों के लिए नहीं। बाह्य बल ऊर्जा को परिवर्तित कर सकते हैं। संरक्षी बल के लिए बंद लूप में कार्य शून्य होता है। अप्रत्यास्थ संघट्ट में ऊर्जा क्षय होती है।

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Q8.5.8 निम्नलिखित का उत्तर ध्यानपूर्वक, कारण सहित दीजिए : (a) किन्हीं दो बिलियर्ड-गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट में, क्या गेंदों के संघट्ट की अल्पावधि में (जब वे संपर्क में होती हैं) कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित रहती है? (b) दो गेंदों के किसी प्रत्यास्थ संघट्ट की लघु अवधि में क्या कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता है? (c) किसी अप्रत्यास्थ संघट्ट के लिए प्रश्न (a) व (b) के लिए आपके उत्तर क्या हैं? (d) यदि दो बिलियर्ड-गेंदों की स्थितिज ऊर्जा केवल उनके केंद्रों के मध्य, पृथक्करण-दूरी पर निर्भर करती है तो संघट्ट प्रत्यास्थ होगा या अप्रत्यास्थ ? (ध्यान दीजिए कि यहाँ हम संघट्ट के दौरान बल के संगत स्थितिज ऊर्जा की बात कर रहे हैं, ना कि गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा की)

उत्तर:

(a) हाँ, प्रत्यास्थ संघट्ट में कुल गतिज ऊर्जा अल्पावधि में संरक्षित रहती है क्योंकि ऊर्जा क्षय नहीं होती। (b) हाँ, कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता है क्योंकि बाह्य बल नहीं लगते। (c) अप्रत्यास्थ संघट्ट में (a) के लिए उत्तर नहीं, क्योंकि ऊर्जा कुछ आंतरिक रूपों में परिवर्तित हो जाती है, अतः कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं रहती। (b) के लिए उत्तर हाँ, क्योंकि कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता है। (d) यदि स्थितिज ऊर्जा केवल केंद्रों के मध्य दूरी पर निर्भर करती है और यह बल संरक्षी है, तो संघट्ट प्रत्यास्थ होगा।

व्याख्या:

प्रत्यास्थ संघट्ट में ऊर्जा और संवेग संरक्षित रहते हैं। अप्रत्यास्थ संघट्ट में ऊर्जा क्षय होती है लेकिन संवेग संरक्षित रहता है। बल के संगत स्थितिज ऊर्जा के आधार पर संघट्ट का प्रकार निर्धारित होता है।

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