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Chapter 1

🎓 Class 12📖 Shaswati📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट
अध्याय 1 / 11Chapter 2

Chapter 1अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

विद्यायास्मृतमश्नुते - परिचय

व्याख्या

विद्यायास्मृतमश्नुते - परिचय

यह अध्याय ईशावास्योपनिषद् से संकलित है, जो यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है। इसमें 18 मन्त्र सम्मिलित हैं। ईशावास्यम् पद से आरम्भ होने के कारण इसे ईशावास्योपनिषद् कहा जाता है। इस उपनिषद् में ईश्वर की सर्वत्र विद्यमानता, कर्तव्य भावना से कर्म करने, त्यागपूर्वक संसार के पदार्थों का उपयोग करने, और आत्मस्वरूप ईश्वर की व्यापकता का निरूपण किया गया है। अध्याय में अविद्या (व्यावहारिक ज्ञान) और विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) के बीच सूक्ष्म भेद और उनके महत्व को समझाया गया है। अंतिम मन्त्र में बताया गया है कि व्यावहारिक ज्ञान से लौकिक अभ्युदय होता है, जबकि अध्यात्मज्ञान से अमरता प्राप्त होती है। इस प्रकार, लौकिक और आध्यात्मिक विद्या दोनों मानव जीवन की पूर्णता और सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं।

  • ईशावास्योपनिषद् यजुर्वेद की माध्यन्दिन एवं काण्व संहिता का 40वाँ अध्याय है।
  • इसमें 18 मन्त्र हैं जो ईश्वर की सर्वव्यापकता और कर्मयोग का संदेश देते हैं।
  • अविद्या और विद्या के भेद को स्पष्ट करते हुए दोनों के महत्व को बताया गया है।
  • अध्यात्मज्ञान से अमरत्व की प्राप्ति संभव है।
  • लौकिक और आध्यात्मिक विद्या एक-दूसरे की पूरक हैं।
  • 📌 ईशावास्योपनिषद् - यजुर्वेद की एक उपनिषद् जो ईश्वर की सर्वव्यापकता का वर्णन करती है।
  • 📌 विद्या - आध्यात्मिक ज्ञान जो आत्मस्वरूप ईश्वर के ज्ञान को दर्शाता है।
  • 📌 अविद्या - व्यावहारिक या लौकिक ज्ञान जो आत्मज्ञान से भिन्न है।

ईशावास्योपनिषद् के मन्त्रों का विश्लेषण

व्याख्या

ईशावास्योपनिषद् के मन्त्रों का विश्लेषण

इस खंड में ईशावास्योपनिषद् के प्रथम छह मन्त्रों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। प्रथम मन्त्र में ईश्वर की सर्वत्र विद्यमानता और संसार के पदार्थों का त्यागपूर्वक उपयोग करने का निर्देश है। दूसरे मन्त्र में कर्म करते हुए जीवन जीने की इच्छा रखने की बात कही गई है, जिससे कर्म के प्रति लगाव न हो। तीसरे मन्त्र में उन लोगों का वर्णन है जो आत्मस्वरूप ईश्वर की व्यापकता को स्वीकार नहीं करते और अज्ञान के अंधकार में डूबे रहते हैं। चौथे मन्त्र में चैतन्य स्वरूप, स्वयं प्रकाश एवं सर्वव्यापक आत्म तत्त्व का निरूपण है। पाँचवे और छठे मन्त्रों में अविद्या (व्यावहारिक ज्ञान) और विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) के बीच सूक्ष्म भेद और उनके प्रभावों पर विचार किया गया है। इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उपनिषद् में ज्ञान के दो प्रकारों का संतुलित महत्व बताया गया है।

  • प्रथम मन्त्र में ईश्वर की सर्वव्यापकता और त्यागपूर्वक भोग करने का निर्देश।
  • द्वितीय मन्त्र कर्म करते हुए जीवन जीने की इच्छा रखने को प्रोत्साहित करता है।
  • तृतीय मन्त्र में अज्ञान के कारण आत्मस्वरूप ईश्वर को न स्वीकारने वालों का वर्णन।
  • चतुर्थ मन्त्र में चैतन्य स्वरूप आत्मा का निरूपण।
  • पञ्चम एवं षष्ठ मन्त्रों में विद्या और अविद्या का सूक्ष्म विवेचन।
  • 📌 असुर्याः - प्रकाशहीन, अज्ञान से ग्रस्त लोग।
  • 📌 चैतन्य स्वरूप - स्वयं प्रकाशमान और सर्वव्यापक आत्मा।

विद्या के प्रकार

अवधारणा

विद्या के प्रकार

इस खंड में विद्या के दो मुख्य प्रकारों का वर्णन किया गया है - सांसारिक (व्यावहारिक) विद्या और आध्यात्मिक विद्या। सांसारिक विद्या वह है जो संसार के भौतिक और प्रायोगिक ज्ञान से संबंधित है, जैसे विज्ञान, तकनीकी ज्ञान, चिकित्सा आदि। यह विद्या जीवन के भौत

अभ्यास प्रश्नChapter 1

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. संस्कृतभाष्याम् उत्तरं लिखत । (क) ईशावास्योपनिषद् कस्या: संहिताया: भाग:? (ख) जगत्सर्वं कौंदृशम् अस्ति? (ग) पदार्थभोग: कथं करणीय:? (घ) शतं समा: कथं जिजीविषेत्? (ङ) आत्महनो जना: कौंदृशं लोकं गच्छन्ति? (च) मनसोऽपि वेगवान् क:?

उत्तर:

उत्तर: (क) ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदस्य संहिताया: भाग: अस्ति। (ख) जगत्सर्वं कौंदृशम् अस्ति अर्थात् सम्पूर्णं जगत् ईश्वराधीनम् अस्ति। (ग) पदार्थभोग: संयमेन, मितमात्रया, नासुर्यरूपेण करणीय:। (घ) शतं समा: धैर्येण, संयमेण, समत्वेन जिजीविषेत्। (ङ) आत्महनो जना: तमसाम् अधीनं, अज्ञानरूपं लोकं गच्छन्ति। (च) मनसोऽपि वेगवान् धीर:, संयमी च भवति।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्नस्य उत्तरं उपनिषद् पाठानुसारं स्पष्टं कृतम्। ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदस्य भाग: अस्ति, जगत् ईश्वराधीनं इति उपनिषद् कथयति। पदार्थभोग: संयमेन करणीय: इति उपदेशः अस्ति। शतं समा: धैर्येण जिजीविषेत् इति जीवनमूल्यं प्रतिपादितम्। आत्महनो जना: तमसाम् अधीनं लोकं गच्छन्ति, मनसोऽपि वेगवान् धीर: इति व्याख्या कृताः।

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Q2.(छ) तिष्ठन्नपि क: धावत: अन्यान् अत्येति? (ज) अन्धन्तम: के प्रविशन्ति? (झ) धीरेभ्य: ऋषय: किं श्रुतवन्त:? (ञ) अविद्या किं तरति? (ट) विद्या किं प्राप्तोति?

उत्तर:

उत्तर: (छ) तिष्ठन्नपि धीर: धावतः अन्यान् अत्येति अर्थात् संयमी धीर पुरुषः स्थिरः अपि च शीघ्रगामी जनान् अतिक्रमति। (ज) अन्धन्तम: तमसाम् अधीनान्, अज्ञानरूपान् जनान् प्रविशन्ति। (झ) धीरेभ्य: ऋषय: ज्ञानं, शान्तिम्, आत्मसाक्षात्कारं श्रुतवन्त:। (ञ) अविद्या दुःखं, मरणं, संसारं तरति न, अपितु अज्ञानरूपा बाधा अस्ति। (ट) विद्या अमृतत्वं, आत्मज्ञानं, ईश्वरज्ञानं प्राप्तोति।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्नस्य उत्तरं उपनिषद् पाठानुसारं स्पष्टं कृतम्। तिष्ठन्नपि धीर: शीघ्रगामी जनान् अतिक्रमति, अन्धन्तम: तमसाम् अधीनाः, ऋषय: ज्ञानं श्रुतवन्तः, अविद्या दुःखं जनयति, विद्या अमृतत्वं ददाति इति व्याख्या कृताः।

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Q3.2. ‘ईशावास्यम्...कस्यस्विद्धनम्’ इत्यस्य भावं सरलसंस्कृतभाषया विशादयत ।

उत्तर:

उत्तर: ईशावास्यम् इति मन्त्रः कथयति यत् सम्पूर्णं जगत् ईश्वरस्य अधीनम् अस्ति। सर्वं जगत् ईश्वरः अधीनं धारयति, अतः सर्वं जगत् ईश्वरस्य स्वामित्वे अस्ति।

व्याख्या:

मन्त्रस्य भावः सरलसंस्कृतभाषया स्पष्टः कृतः यत् ईश्वरः जगत्सर्वस्य स्वामी अस्ति।

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Q4.3. ‘अन्धन्तम: प्रविशन्ति...विद्यायां रता:’ इति मन्त्रस्य भावं हिन्दीभाषया आंग्लभाषया वा विशादयत ।

उत्तर:

उत्तर: इस मन्त्र का अर्थ है कि जो लोग अंधकार अर्थात अज्ञानता के अधीन होते हैं, वे अज्ञानता के संसार में प्रवेश करते हैं। जो लोग विद्या में लगे रहते हैं, वे ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। In English: Those who are enveloped in darkness (ignorance) enter into the world of ignorance, while those who are devoted to knowledge proceed on the path of enlightenment.

व्याख्या:

मन्त्र का भाव स्पष्ट करते हुए हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अर्थ दिया गया है।

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Q5.4. ‘विद्यां चाविद्यां च...प्रमृतमश्नुते’ इति मन्त्रस्य तात्पर्यं स्पष्टयत ।

उत्तर:

उत्तर: इस मन्त्र का तात्पर्य है कि विद्या और अविद्या दोनों से व्यक्ति मृत्यु को पार कर अमरत्व को प्राप्त करता है। अर्थात्, ज्ञान से अज्ञान को दूर कर जीवन में अमरत्व की प्राप्ति होती है।

व्याख्या:

मन्त्र में विद्या और अविद्या के समन्वय से जीवन की उच्चतम प्राप्ति का वर्णन है।

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Q6.5. रिक्तस्थानानि पूर्यत । (क) इदं सर्वं जगत् ...। (ख) मा गृध: ... । (ग) शतं समा: ... जिजीविषेत्। (घ) असुर्यां नाम लोका ... आवृता:। (ङ) अविद्योपासका: ... प्रविशन्ति।

उत्तर:

उत्तर: (क) इदं सर्वं जगत् ईशानः अधीनम् अस्ति। (ख) मा गृध: कस्यस्विद्धनम्। (ग) शतं समा: धैर्येण जिजीविषेत्। (घ) असुर्यां नाम लोका तमसा आवृता:। (ङ) अविद्योपासका: तमसाम् प्रविशन्ति।

व्याख्या:

प्रत्येक रिक्तस्थान में उपयुक्त शब्द या वाक्यांश उपनिषद् के अनुसार पूरित किया गया है।

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Q7.6. अधोलिखितानां सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या । (क) तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:। (ख) न कर्म लिप्यते नरें। (ग) तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति। (घ) अविद्या मृत्युं तीत्वां विद्ययाऽमृतमश्नुते। (ङ) एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति। (च) तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:। (छ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनदेवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।

उत्तर:

उत्तर: (क) तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: — जो व्यक्ति त्याग करता है, वही सुखी होता है। (ख) न कर्म लिप्यते नरें — जो व्यक्ति कर्म करता है, वह कर्म के बंधन में नहीं पड़ता। (ग) तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति — उस जल में मातरिश्वा (जल का देवता) निवास करता है। (घ) अविद्या मृत्युं तीत्वां विद्ययाऽमृतमश्नुते — अज्ञान से मृत्यु को पार कर विद्या से अमरत्व प्राप्त होता है। (ङ) एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति — तुम्हारे लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है। (च) तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना: — वे लोग जो आत्महत्या करते हैं, मृत्यु के बाद उस लोक में जाते हैं। (छ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनदेवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् — मन से तेजस्वी एक ही देवता है, जो पूर्व में प्राप्त नहीं हुआ।

व्याख्या:

प्रत्येक वाक्यांश का हिन्दी में अर्थ और व्याख्या दी गई है, जिससे अर्थ स्पष्ट हो।

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Q8.7. उपनिष्पन्न्यो: अन्वयं लिखत । अन्यदेवाहुर्विद्ध्या अन्यदाहुरविद्ध्या । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विच्चक्षिरे ॥ अनेजदेकं मनसो जबीयो नैनद्देवा आप्नुवन्यूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्सिमन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥

उत्तर:

उत्तर: उपनिष्पन्न्यो: अन्वयः निम्नलिखित है - अन्यदेवाः अन्यथा विद्या कहते हैं, अन्यथा अविद्या कहते हैं। यह हमने धीर पुरुषों से सुना है जो इस विषय को जानते हैं। एक तेजस्वी देवता मन से उत्पन्न होता है, जो पूर्व में प्राप्त नहीं हुआ। वह तेजस्वी देवता अन्य देवताओं से आगे बढ़ता है और स्थिर रहता है। वह तेजस्वी देवता जल में निवास करता है, जिसे मातरिश्वा कहा जाता है।

व्याख्या:

यह उपनिष्पन्न्यो: अन्वयः संस्कृत श्लोकों का क्रमबद्ध अर्थ है, जो श्लोकों के भाव को स्पष्ट करता है।

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