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Chapter 9

🎓 Class 11📖 Bharat ka Samvidhan Sidhant aur Vyavhar📖 12 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~18 मिनट
Chapter 8अध्याय 9 / 10Chapter 10

Chapter 9अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 12 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

परिचय

व्याख्या

परिचय

इस अध्याय में हम भारतीय संविधान के क्रियान्वयन और उसकी शासन प्रणाली में भूमिका का विश्लेषण करेंगे। संविधान केवल एक लिखित दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह समय के साथ बदलने और विकसित होने वाला एक जीवंत दस्तावेज़ है। भारतीय संविधान को समय की आवश्यकताओं के अनुसार संशोधित किया जा सकता है, जिससे यह समाज के बदलते स्वरूप के अनुरूप बना रहता है। संविधान में कई संशोधन किए जा चुके हैं, परंतु इसका मूल स्वरूप अब भी बना हुआ है। न्यायपालिका ने संविधान की रक्षा और उसकी व्याख्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस अध्याय के अंतर्गत हम यह समझेंगे कि संविधान कैसे एक गतिशील दस्तावेज़ के रूप में कार्य करता है और किस प्रकार यह समय के साथ विकसित होता रहता है।

  • भारतीय संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ है जो समय के साथ विकसित होता है।
  • संविधान में कई संशोधन किए जा चुके हैं, पर इसका मूल स्वरूप नहीं बदला।
  • न्यायपालिका ने संविधान की रक्षा और व्याख्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • संविधान समाज की बदलती परिस्थितियों के अनुसार संशोधित किया जा सकता है।
  • 📌 संविधान: किसी देश के शासन और कानूनों का मूल दस्तावेज़।
  • 📌 संशोधन: संविधान में आवश्यकतानुसार बदलाव करना।
  • 📌 न्यायपालिका: संविधान की व्याख्या और उसकी रक्षा करने वाली संस्था।

क्या संविधान अपरिवर्तनीय होते हैं?

व्याख्या

क्या संविधान अपरिवर्तनीय होते हैं?

संविधान को लेकर यह प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या वे अपरिवर्तनीय होते हैं? विभिन्न देशों के उदाहरणों से पता चलता है कि संविधान समय-समय पर बदलते रहते हैं। जैसे सोवियत संघ में 74 वर्षों के दौरान चार बार संविधान बदला गया, और 1993 में नया संविधान अंगीकृत हुआ। फ्रांस ने भी दो सौ वर्षों में कई बार अपने संविधान को बदला। इसके विपरीत, अमेरिका का संविधान 200 वर्ष पुराना है और उसमें केवल 27 संशोधन हुए हैं। भारत का संविधान 1949 में अंगीकृत हुआ और 1950 से लागू है। यह संविधान लचीला है, जिसका अर्थ है कि इसमें समय-समय पर आवश्यकतानुसार संशोधन किए जा सकते हैं। संविधान के प्रावधानों की व्याख्या में न्यायपालिका और राजनीतिक व्यवहार ने इसे एक जीवंत दस्तावेज़ बनाया है। संविधान को बनाते समय यह ध्यान रखा गया कि वह भविष्य की चुनौतियों का समाधान भी प्रस्तुत कर सके। इसलिए संविधान न केवल वर्तमान समस्याओं का समाधान करता है, बल्कि उसमें स्थायी तत्व भी होते हैं। संविधान को जड़ और अपरिवर्तनीय नहीं माना गया है, बल्कि इसे समाज की इच्छाओं और आकांक्षाओं का प्रतिबिंब माना गया है।

  • संविधान समय-समय पर बदलते रहते हैं, जैसे सोवियत संघ और फ्रांस के उदाहरण।
  • अमेरिका का संविधान लचीला है, जिसमें संशोधन की प्रक्रिया है।
  • भारतीय संविधान भी लचीला है और उसमें संशोधन की गुंजाइश है।
  • संविधान को जड़ और अपरिवर्तनीय नहीं माना गया है।
  • संविधान समाज की इच्छाओं और आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है।
  • 📌 लचीलापन (Flexibility): संविधान में संशोधन की आसानी।
  • 📌 कठोरता (Rigidity): संविधान में संशोधन की कठिनाई।

संविधान का लचीलापन और कठोरता

व्याख्या

संविधान का लचीलापन और कठोरता

भारतीय संविधान के निर्माता चाहते थे कि संविधान में लचीलापन और कठोरता दोनों का संतुलन हो। इसका अर्थ है कि संविधान में आवश्यकतानुसार बदलाव किए जा सकें, लेकिन अनावश्यक और बार-बार बदलावों से बचा जाए। लचीला संविधान वह होता है जिसमें संशोधन करना अपेक्षाकृत

अभ्यास प्रश्नChapter 9

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. निम्नलिखित में से कौन–सा वाक्य सही है– संविधान में समय–समय पर संशोधन करना आवश्यक होता है क्योंकि (क) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है। (ख) किसी समय विशेष में लिखा गया दस्तावेज कुछ समय पश्चात् अप्रासंगिक हो जाता है। (ग) हर पीढ़ी के पास अपनी पसंद का संविधान चुनने का विकल्प होना चाहिए। (घ) संविधान में मौजूदा सरकार का राजनीतिक दर्शन प्रतिबिंबित होना चाहिए।
A.A) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है।
B.B) किसी समय विशेष में लिखा गया दस्तावेज कुछ समय पश्चात् अप्रासंगिक हो जाता है।
C.C) हर पीढ़ी के पास अपनी पसंद का संविधान चुनने का विकल्प होना चाहिए।
D.D) संविधान में मौजूदा सरकार का राजनीतिक दर्शन प्रतिबिंबित होना चाहिए।

उत्तर:

सही उत्तर है (क) परिस्थितियाँ बदलने पर संविधान में उचित संशोधन करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि संविधान एक जीवंत दस्तावेज़ है और समय के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, इसलिए संविधान में आवश्यक संशोधन किए जाते हैं ताकि वह वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप बना रहे।

व्याख्या:

संविधान को स्थिर तो माना जाता है लेकिन वह पूरी तरह स्थिर नहीं होता। समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार उसमें संशोधन करना आवश्यक होता है ताकि वह समाज के बदलते स्वरूप के अनुरूप बना रहे। इसलिए विकल्प (क) सही है। अन्य विकल्प संविधान की प्रकृति के अनुरूप नहीं हैं।

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Q2.2. निम्नलिखित वाक्यों के सामने सही/गलत का निशान लगाएँ। (क) राष्ट्रपति किसी संशोधन विधेयक को संसद के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता। (ख) संविधान में संशोधन करने का अधिकार केवल जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास ही होता है। (ग) न्यायपालिका संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती परंतु उसे संविधान की व्याख्या करने का अधिकार है। व्याख्या के द्वारा वह संविधान को काफी हद तक बदल सकती है। (घ) संसद संविधान के किसी भी खंड में संशोधन कर सकती है।

उत्तर:

सही/गलत उत्तर: (क) सही - राष्ट्रपति संशोधन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता। (ख) सही - संशोधन का अधिकार केवल जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों (संसद) के पास होता है। (ग) सही - न्यायपालिका संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती, पर संविधान की व्याख्या कर सकती है जिससे संविधान का अर्थ बदल सकता है। (घ) गलत - संसद संविधान के सभी खंडों में संशोधन नहीं कर सकती, कुछ खंडों में सीमाएँ हैं।

व्याख्या:

राष्ट्रपति के पास संशोधन विधेयक को पुनर्विचार के लिए भेजने का अधिकार नहीं है, इसलिए (क) सही है। संविधान संशोधन का अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास है, इसलिए (ख) सही है। न्यायपालिका संशोधन प्रस्ताव नहीं ला सकती, पर संविधान की व्याख्या कर सकती है, इसलिए (ग) सही है। संसद संविधान के सभी खंडों में संशोधन नहीं कर सकती, इसलिए (घ) गलत है।

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Q3.3. निम्नलिखित में से कौन भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया में भूमिका निभाते हैं? इस प्रक्रिया में ये कैसे शामिल होते हैं? (क) मतदाता (ख) भारत का राष्ट्रपति (ग) राज्य की विधान सभाएँ (घ) संसद (ड) राज्यपाल (च) न्यायपालिका

उत्तर:

संविधान संशोधन प्रक्रिया में निम्नलिखित की भूमिका है: (क) मतदाता - सीधे संशोधन प्रक्रिया में शामिल नहीं होते, पर वे अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से संशोधन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। (ख) भारत का राष्ट्रपति - संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक होती है, पर वे संशोधन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते। (ग) राज्य की विधान सभाएँ - कुछ संशोधनों के लिए आवश्यक हैं, जैसे संघ और राज्यों के बीच संबंधों से संबंधित संशोधन। (घ) संसद - संशोधन विधेयक पारित करने वाली मुख्य संस्था है। (ड) राज्यपाल - संशोधन प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं है। (च) न्यायपालिका - संशोधन प्रस्ताव नहीं ला सकती, पर संशोधन की वैधता की समीक्षा कर सकती है।

व्याख्या:

संविधान संशोधन प्रक्रिया में मतदाता सीधे शामिल नहीं होते, वे अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रभाव डालते हैं। राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है लेकिन पुनर्विचार का अधिकार नहीं। राज्य विधानसभाएँ कुछ संशोधनों के लिए आवश्यक हैं। संसद संशोधन विधेयक पारित करती है। राज्यपाल की कोई भूमिका नहीं है। न्यायपालिका संशोधन की वैधता की समीक्षा करती है।

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Q4.4. इस अध्याय में आपने पढ़ा कि संविधान का 42वाँ संशोधन अब तक का सबसे विवादास्पद संशोधन रहा है। इस विवाद के क्या कारण थे? (क) यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान किया गया था। आपातकाल की घोषणा अपने आप में ही एक विवाद का मुद्दा था। (ख) यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित नहीं था। (ग) इसे राज्य विधानपालिकाओं का समर्थन प्राप्त नहीं था। (घ) संशोधन के कुछ उपबंध विवादास्पद थे।
A.A) यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान किया गया था। आपातकाल की घोषणा अपने आप में ही एक विवाद का मुद्दा था।
B.B) यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित नहीं था।
C.C) इसे राज्य विधानपालिकाओं का समर्थन प्राप्त नहीं था।
D.D) संशोधन के कुछ उपबंध विवादास्पद थे।

उत्तर:

सही उत्तर है (क) और (घ)। 42वें संशोधन को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान लागू किया गया था, जो अपने आप में विवादास्पद था। इसके अलावा, संशोधन के कुछ उपबंध भी विवादास्पद माने गए क्योंकि उन्होंने न्यायपालिका की शक्तियों को सीमित किया और केंद्र सरकार के अधिकार बढ़ाए। विकल्प (ख) और (ग) सही नहीं हैं क्योंकि यह संशोधन विशेष बहुमत पर आधारित था और राज्य विधानसभाओं का समर्थन भी प्राप्त था।

व्याख्या:

42वें संशोधन को आपातकाल के दौरान लागू किया गया था, जो लोकतंत्र के लिए विवादास्पद था। इसके कुछ प्रावधानों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित किया। इसलिए (क) और (घ) सही कारण हैं। अन्य विकल्प तथ्यात्मक रूप से गलत हैं।

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Q5.5. निम्नलिखित वाक्यों में कौन-सा वाक्य विभिन्न संशोधनों के संबंध में विधायिका और न्यायपालिका के टकराव की सही व्याख्या नहीं करता- (क) संविधान की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है (ख) खंडन-मंडन/बहस और मतभेद लोकतंत्र के अनिवार्य अंग होते हैं। (ग) कुछ नियमों और सिद्धांतों को संविधान में अपेक्षाकृत ज्यादा महत्व दिया गया है। कतिपय संशोधनों के लिए संविधान में विशेष बहुमत की व्याख्या की गई है। (घ) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती। (ड) न्यायपालिका केवल किसी कानून की संवैधानिकता के बारे में फ़ैसला दे सकती है। वह ऐसे कानूनों की वांछनीयता से जुड़ी राजनीतिक बहसों का निपटारा नहीं कर सकती।
A.A) संविधान की कई तरह से व्याख्या की जा सकती है
B.B) खंडन-मंडन/बहस और मतभेद लोकतंत्र के अनिवार्य अंग होते हैं।
C.C) कुछ नियमों और सिद्धांतों को संविधान में अपेक्षाकृत ज्यादा महत्व दिया गया है। कतिपय संशोधनों के लिए संविधान में विशेष बहुमत की व्याख्या की गई है।
D.D) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को नहीं सौंपी जा सकती।
E.E) न्यायपालिका केवल किसी कानून की संवैधानिकता के बारे में फ़ैसला दे सकती है। वह ऐसे कानूनों की वांछनीयता से जुड़ी राजनीतिक बहसों का निपटारा नहीं कर सकती।

उत्तर:

सही उत्तर है (घ)। क्योंकि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी विधायिका को भी सौंपी जा सकती है, यह केवल न्यायपालिका की जिम्मेदारी नहीं है। अन्य विकल्प विधायिका और न्यायपालिका के टकराव की सही व्याख्या करते हैं।

व्याख्या:

विधायिका और न्यायपालिका के बीच टकराव संविधान की व्याख्या, संशोधन प्रक्रिया और अधिकारों की रक्षा को लेकर होता है। विकल्प (घ) गलत है क्योंकि नागरिक अधिकारों की रक्षा में विधायिका की भी भूमिका होती है। अन्य विकल्प सही हैं।

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Q6.6. बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत के बारे में सही वाक्य को चिन्हित करें। गलत वाक्य को सही करें। (क) संविधान में बुनियादी मान्यताओं का खुलासा किया गया है। (ख) बुनियादी ढाँचे को छोड़कर विधायिका संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन कर सकती है। (ग) न्यायपालिका ने संविधान के उन पहलुओं को स्पष्ट कर दिया है जिन्हें बुनियादी ढाँचे के अंतर्गत या उसके बाहर रखा जा सकता है। (घ) यह सिद्धांत सबसे पहले केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित किया गया है। (ड) इस सिद्धांत से न्यायपालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं। सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।

उत्तर:

(क) सही है क्योंकि संविधान में बुनियादी मान्यताओं का खुलासा किया गया है। (ख) सही है क्योंकि विधायिका बुनियादी ढाँचे को छोड़कर संविधान के अन्य हिस्सों में संशोधन कर सकती है। (ग) सही है क्योंकि न्यायपालिका ने स्पष्ट किया है कि कौन से पहलू बुनियादी ढाँचे के अंतर्गत आते हैं। (घ) सही है क्योंकि यह सिद्धांत केशवानंद भारती मामले में प्रतिपादित किया गया था। (ड) सही है क्योंकि इस सिद्धांत से न्यायपालिका की शक्तियाँ बढ़ी हैं और इसे सरकार तथा राजनीतिक दलों ने स्वीकार किया है।

व्याख्या:

बुनियादी ढाँचे का सिद्धांत न्यायपालिका द्वारा विकसित किया गया है, विशेषकर केशवानंद भारती मामले में। इसके अनुसार, संविधान के कुछ मूलभूत तत्वों में संशोधन नहीं किया जा सकता। विधायिका को संविधान के सभी हिस्सों में संशोधन करने का अधिकार नहीं है। यह सिद्धांत न्यायपालिका की शक्तियों को बढ़ाता है और इसे राजनीतिक दलों ने भी स्वीकार किया है।

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Q7.7. सन् 2000–2003 के बीच संविधान में अनेक संशोधन किए गए। इस जानकारी के आधार पर आप निम्नलिखित में से कौन–सा निष्कर्ष निकालेंगे— (क) इस काल के दौरान किए गए संशोधनों में न्यायपालिका ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया। (ख) इस काल के दौरान एक राजनीतिक दल के पास विशेष बहुमत था। (ग) कतिपय संशोधनों के पीछे जनता का दबाव काम कर रहा था। (घ) इस काल में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच कोई वास्तविक अंतर नहीं रह गया था। (ड) ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी।
A.A) इस काल के दौरान किए गए संशोधनों में न्यायपालिका ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
B.B) इस काल के दौरान एक राजनीतिक दल के पास विशेष बहुमत था।
C.C) कतिपय संशोधनों के पीछे जनता का दबाव काम कर रहा था।
D.D) इस काल में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच कोई वास्तविक अंतर नहीं रह गया था।
E.E) ये संशोधन विवादास्पद नहीं थे तथा संशोधनों के विषय को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सहमति पैदा हो चुकी थी।

उत्तर:

सही उत्तर है (ख)। 2000-2003 के बीच किए गए संशोधनों के दौरान एक राजनीतिक दल के पास संसद में विशेष बहुमत था, जिससे संशोधन प्रक्रिया सुगम हुई। अन्य विकल्प तथ्यात्मक रूप से कम उपयुक्त हैं।

व्याख्या:

विशेष बहुमत के बिना संविधान संशोधन करना कठिन होता है। इस अवधि में एक राजनीतिक दल के पास विशेष बहुमत था, जिससे संशोधन किए गए। न्यायपालिका ने हस्तक्षेप किया था, इसलिए (क) गलत है। जनता के दबाव और दलों के बीच सहमति की स्थिति स्पष्ट नहीं है, इसलिए (ग), (घ), (ड) गलत हैं।

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Q8.8. संविधान में संशोधन करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता क्यों पड़ती है? व्याख्या करें।

उत्तर:

संविधान में संशोधन के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता इसलिए होती है ताकि संविधान की स्थिरता और गंभीरता बनी रहे। संविधान एक ऐसा दस्तावेज़ है जो देश के शासन और नागरिकों के अधिकारों की नींव रखता है। यदि संशोधन के लिए सामान्य बहुमत की आवश्यकता होती, तो संविधान में बार-बार और बिना गहराई से विचार किए बदलाव हो सकते हैं, जिससे संविधान की विश्वसनीयता और स्थिरता प्रभावित होती। विशेष बहुमत यह सुनिश्चित करता है कि संशोधन व्यापक सहमति से हो, जिससे संविधान की मूल संरचना और सिद्धांत सुरक्षित रहें।

व्याख्या:

विशेष बहुमत संविधान की स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक है। यह सुनिश्चित करता है कि केवल व्यापक राजनीतिक सहमति से ही संविधान में बदलाव हो। इससे संविधान की गंभीरता और उसकी मूलभूत संरचना की रक्षा होती है।

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