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Chapter 5

🎓 Class 11📖 Bharat ka Samvidhan Sidhant aur Vyavhar📖 9 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~14 मिनट
Chapter 4अध्याय 5 / 10Chapter 6

Chapter 5अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

परिचय: फेडरलिज़्म (संघवाद)

व्याख्या

परिचय: फेडरलिज़्म (संघवाद)

फेडरलिज़्म या संघवाद एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें सत्ता का वितरण केंद्र और राज्यों के बीच होता है। यह व्यवस्था भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देशों के लिए उपयुक्त होती है, जहाँ विभिन्न क्षेत्रों की अपनी विशेषताएँ, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और आवश्यकताएँ होती हैं। भारत में संविधान ने संघीय ढांचे को अपनाया है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों के पास अपनी-अपनी शक्तियाँ होती हैं। संघवाद का मुख्य उद्देश्य विभिन्न राज्यों को उनकी स्वायत्तता देना और साथ ही एक मजबूत केंद्र सरकार के माध्यम से राष्ट्रीय एकता बनाए रखना है। इस व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों का स्पष्ट विभाजन होता है, जिससे दोनों स्तरों की सरकारें स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकती हैं। संघवाद की यह संरचना भारत की विविधता को संरक्षित करते हुए लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।

  • फेडरलिज़्म में सत्ता का वितरण केंद्र और राज्यों के बीच होता है।
  • भारत में संघीय ढांचा संविधान द्वारा स्थापित है।
  • संघवाद का उद्देश्य राज्यों को स्वायत्तता देना और राष्ट्रीय एकता बनाए रखना है।
  • केंद्र और राज्यों के अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से निर्धारित होते हैं।
  • यह व्यवस्था विविधता में एकता को सुनिश्चित करती है।
  • 📌 फेडरलिज़्म: ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें सत्ता केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित होती है।
  • 📌 संघवाद: केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों का संवैधानिक वितरण।

संघवाद की अवधारणा

व्याख्या

संघवाद की अवधारणा

संघवाद एक ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें दो या दो से अधिक सरकारें होती हैं — एक राष्ट्रीय या केंद्र सरकार और अन्य क्षेत्रीय या राज्य सरकारें। इन दोनों सरकारों के अधिकार और कर्तव्य संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से निर्धारित किए जाते हैं। संघवाद की विशेषता यह है कि दोनों सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं और एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करती हैं। यह व्यवस्था विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक विविधताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें स्वायत्तता प्रदान करती है। संघवाद में सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है, जिससे टकराव की संभावना कम होती है। भारत में संघवाद की यह अवधारणा ब्रिटिश काल के बाद राजनीतिक विचारकों और संविधान निर्माताओं द्वारा अपनाई गई, ताकि देश की विशालता और विविधता को ध्यान में रखते हुए शासन व्यवस्था को प्रभावी बनाया जा सके।

  • संघवाद में दो या अधिक सरकारें होती हैं: केंद्र और राज्य।
  • दोनों सरकारों के अधिकार संविधान द्वारा निर्धारित होते हैं।
  • संघवाद में सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र होती हैं।
  • यह व्यवस्था सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को मान्यता देती है।
  • शक्तियों का स्पष्ट विभाजन टकराव को कम करता है।
  • 📌 राष्ट्रीय सरकार: पूरे देश के लिए जिम्मेदार सरकार।
  • 📌 क्षेत्रीय सरकार: राज्य या क्षेत्र के लिए जिम्मेदार सरकार।

भारतीय संविधान में संघवाद

व्याख्या

भारतीय संविधान में संघवाद

भारतीय संविधान ने संघीय ढांचे को अपनाया है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट वितरण किया गया है। संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ दी गई हैं — केंद्र सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। केंद्र सूची में वे विषय आते हैं जिन पर के

अभ्यास प्रश्नChapter 5

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. आलोक मानता है कि किसी देश को कारगर सरकार की जरूरत होती है जो जनता की भलाई करे। अत: यदि हम सीधे-सीधे अपना प्रधानमंत्री और मंत्रिगण चुन लें और शासन का काम उन पर छोड़ दें, तो हमें विधायिका की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।

उत्तर:

इस कथन से सहमत नहीं होना चाहिए क्योंकि विधायिका सरकार की कार्यप्रणाली में संतुलन और नियंत्रण का काम करती है। प्रधानमंत्री और मंत्रिगण को सीधे चुन लेने से कार्यपालिका का दुरुपयोग हो सकता है। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका को नियंत्रित करती है और जनता की आवाज़ संसद में सुनाती है। बिना विधायिका के, कार्यपालिका के पास असीमित शक्ति हो सकती है, जो लोकतंत्र के लिए हानिकारक है। अतः विधायिका की आवश्यकता होती है ताकि सरकार जवाबदेह और पारदर्शी बनी रहे।

व्याख्या:

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति का संतुलन लोकतंत्र की आधारशिला है। विधायिका कानून बनाती है और कार्यपालिका को नियंत्रित करती है। सीधे प्रधानमंत्री और मंत्रिगण चुनने से यह संतुलन टूट सकता है, जिससे तानाशाही की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए विधायिका की जरूरत आवश्यक है।

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Q2.2. किसी कक्षा में द्वि-सदनीय प्रणाली के गुणों पर बहस चल रही थी। चर्चा में निम्नलिखित बातें उभरकर सामने आयीं। इन तर्कों को पढ़िए और इनसे अपनी सहमति-असहमति के कारण बताइए। (क) नेहा ने कहा कि द्वि-सदनीय प्रणाली से कोई उद्देश्य नहीं सधता। (ख) शामा का तर्क था कि राज्य सभा में विशेषज्ञों का मनोनयन होना चाहिए। (ग) त्रिदेव ने कहा कि यदि कोई देश संघीय नहीं है, तो फिर दूसरे सदन की जरूरत नहीं रह जाती।

उत्तर:

(क) नेहा का कथन गलत है क्योंकि द्वि-सदनीय प्रणाली से विधायी प्रक्रिया में संतुलन और गहराई आती है। यह विधायिका को अधिक विचारशील और व्यापक बनाती है। (ख) शामा का तर्क सही है क्योंकि राज्य सभा में विशेषज्ञों का मनोनयन होने से संसद में विशेषज्ञता आती है और बेहतर कानून बनते हैं। (ग) त्रिदेव का कथन भी सही है क्योंकि द्वि-सदनीय प्रणाली का मुख्य उद्देश्य संघीयता को मजबूत करना है। यदि देश संघीय नहीं है, तो दूसरे सदन की आवश्यकता कम हो जाती है।

व्याख्या:

द्वि-सदनीय प्रणाली के फायदे हैं कि यह विधायी प्रक्रिया को संतुलित करती है, विशेषज्ञता लाती है और संघीयता को मजबूत करती है। इसलिए उपरोक्त तर्कों का विश्लेषण करते समय इनके संदर्भ में सहमति या असहमति स्पष्ट करनी चाहिए।

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Q3.3. लोकसभा कार्यपालिका को राज्यसभा की तुलना में क्यों कारगर ढंग से नियंत्रण में रख सकती है?

उत्तर:

लोकसभा को सीधे जनता द्वारा चुना जाता है, इसलिए यह जनप्रतिनिधित्व का सशक्त माध्यम है। कार्यपालिका संसद के प्रति जवाबदेह होती है और लोकसभा में बहुमत होने पर ही सरकार बनती है। इसलिए लोकसभा कार्यपालिका को प्रभावी रूप से नियंत्रित कर सकती है क्योंकि सरकार को लोकसभा का विश्वास प्राप्त करना होता है। इसके विपरीत, राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं और सरकार पर उसका नियंत्रण सीमित होता है।

व्याख्या:

लोकसभा में सरकार का गठन होता है और वह सदन सरकार को गिरा भी सकता है। इसलिए लोकसभा के पास कार्यपालिका पर नियंत्रण का वास्तविक अधिकार होता है। राज्यसभा केवल विधायी समीक्षा करती है, परन्तु कार्यपालिका पर नियंत्रण में उसकी भूमिका सीमित है।

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Q4.4. लोकसभा कार्यपालिका पर कारगर ढंग से नियंत्रण रखने की नहीं बल्कि जनभावनाओं और जनता की अपेक्षाओं की अभिव्यक्ति का मंच है। क्या आप इससे सहमत हैं? कारण बताएँ।

उत्तर:

हाँ, मैं इससे सहमत हूँ। लोकसभा सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है और यह जनता की भावनाओं, अपेक्षाओं और समस्याओं को संसद में प्रस्तुत करती है। कार्यपालिका पर नियंत्रण रखना लोकसभा का एक कार्य है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य जनता की आवाज़ को संसद में पहुंचाना और उनकी अपेक्षाओं को पूरा करना भी है। इसलिए लोकसभा जनप्रतिनिधित्व का प्रमुख मंच है।

व्याख्या:

लोकसभा में जनता के प्रतिनिधि होते हैं जो सरकार की नीतियों और कार्यों पर चर्चा करते हैं। वे जनता की समस्याओं को उठाते हैं और सरकार को जवाबदेह बनाते हैं। अतः लोकसभा का कार्य केवल नियंत्रण करना नहीं बल्कि जनभावनाओं को अभिव्यक्त करना भी है।

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Q5.5. नीचे संसद को ज्यादा कारगर बनाने के कुछ प्रस्ताव लिखे जा रहे हैं। इनमें से प्रत्येक के साथ अपनी सहमति या असहमति का उल्लेख करें। यह भी बताएँ कि इन सुझावों को मानने के क्या प्रभाव होंगे? (क) संसद को अपेक्षाकृत ज्यादा समय तक काम करना चाहिए। (ख) संसद के सदस्यों की सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी जानी चाहिए। (ग) अध्यक्ष को यह अधिकार होना चाहिए कि सदन की कार्यवाही में बाधा पैदा करने पर सदस्य को दंडित कर सकें।

उत्तर:

(क) सहमत हूँ। अधिक समय तक काम करने से विधायी कार्यों की गुणवत्ता और गहराई बढ़ेगी, जिससे बेहतर कानून बनेंगे। (ख) सहमत हूँ। सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होने से संसद की कार्यवाही प्रभावी होगी और बहसों में विविधता आएगी। (ग) सहमत हूँ। अध्यक्ष को यह अधिकार होने से सदन की कार्यवाही व्यवस्थित रहेगी और अनावश्यक बाधा नहीं आएगी, जिससे संसद का कामकाज सुचारू होगा।

व्याख्या:

संसद के कारगर संचालन के लिए समय, सदस्यों की उपस्थिति और अनुशासन आवश्यक हैं। इन सुझावों को लागू करने से संसद की कार्यक्षमता बढ़ेगी, विधायी प्रक्रिया में सुधार होगा और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली मजबूत होगी।

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Q6.6. आरिफ यह जानना चाहता था कि अगर मंत्री ही अधिकांश महत्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत करते हैं और बहुसंख्यक दल अक्सर सरकारी विधेयक को पारित कर देता है, तो फिर कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की भूमिका क्या है? आप आरिफ को क्या उत्तर देंगे?

उत्तर:

संसद कानून बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मंत्री विधेयक प्रस्तुत करते हैं, लेकिन संसद में बहस, संशोधन और मतदान के द्वारा विधेयक को अंतिम रूप दिया जाता है। संसद विधेयकों की समीक्षा करती है, जनता के हितों का ध्यान रखती है और सरकार को जवाबदेह बनाती है। इसलिए संसद केवल विधेयक पारित करने का माध्यम नहीं, बल्कि कानून बनाने की प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार है।

व्याख्या:

सरकार विधेयक प्रस्तुत करती है, लेकिन संसद के सदस्यों द्वारा उसकी समीक्षा, बहस और संशोधन होते हैं। यह प्रक्रिया लोकतंत्र की मजबूती का आधार है। संसद की भूमिका विधेयक को पारित करने से अधिक है, वह जनता की आवाज़ को कानून में बदलने का माध्यम है।

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Q7.7. आप निम्नलिखित में से किस कथन से सबसे ज्यादा सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण दें। (क) सांसद/विधायकों को अपनी पसंद की पार्टी में शामिल होने की छूट होनी चाहिए। (ख) दलबदल विरोधी कानून के कारण पार्टी के नेता का दबदबा पार्टी के सांसद/विधायकों पर बढ़ा है। (ग) दलबदल हमेशा स्वार्थ के लिए होता है और इस कारण जो विधायक/सांसद दूसरे दल में शामिल होना चाहता है उसे आगामी दो वर्षों के लिए मंत्री-पद के अयोग्य करार कर दिया जाना चाहिए।

उत्तर:

मैं (ख) से सहमत हूँ क्योंकि दलबदल विरोधी कानून ने पार्टी अनुशासन को मजबूत किया है, जिससे पार्टी के नेताओं का दबदबा बढ़ा है। यह दबदबा कभी-कभी सांसदों की स्वतंत्र सोच और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है। (क) गलत है क्योंकि इससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। (ग) भी कठोर है और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन कर सकता है।

व्याख्या:

दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है, लेकिन इससे पार्टी नेतृत्व का दबदबा बढ़ा है। यह सांसदों की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। अतः इस विषय में संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।

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Q8.8. डॉली और सुधा में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि मौजूदा वक्त में संसद कितनी कारगर और प्रभावकारी है। डॉली का मानना था कि भारतीय संसद के कामकाज में गिरावट आयी है। यह गिरावट एकदम साफ दिखती है क्योंकि अब बहस-मुबाहिसे पर समय कम खर्च होता है और सदन की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने अथवा वॉकआउट (बहिर्गमन) करने में ज्यादा। सुधा का तर्क था कि लोकसभा में अलग-अलग सरकारों ने मुँह की खायी है, धराशायी हुई हैं। आप सुधा या डॉली के तर्क के पक्ष या विपक्ष में और कौन-सा तर्क देंगे?

उत्तर:

मैं डॉली के तर्क के पक्ष में हूँ क्योंकि संसद की कार्यवाही में गिरावट स्पष्ट है। बहसों पर कम समय देना और वॉकआउट जैसी घटनाएँ संसद की गरिमा को कम करती हैं। हालांकि सुधा का तर्क भी सही है कि सरकारों को लोकसभा में चुनौती मिलती है, परंतु संसद की प्रभावशीलता में कमी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। इसलिए संसद को अधिक सक्रिय, अनुशासित और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

व्याख्या:

संसद की कार्यवाही में गिरावट लोकतंत्र की कमजोरी को दर्शाती है। बहसों की कमी और बाधा उत्पन्न करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इसलिए संसद को पुनः प्रभावी बनाने के लिए सुधार आवश्यक हैं।

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