Acceptance: Se ction 2(b) “when the person to whom the offer is made signifies his assent there
Acceptance: Se ction 2(b) “when the person to whom the offer is made signifies his assent there — अध्ययन नोट्स
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धारा 2(b): जब उस व्यक्ति को जिसे प्रस्ताव किया गया है, अपनी स्वीकृति प्रकट करता है
परिभाषाधारा 2(b): जब उस व्यक्ति को जिसे प्रस्ताव किया गया है, अपनी स्वीकृति प्रकट करता है
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2(b) के अनुसार, 'स्वीकृति' का अर्थ है—जब वह व्यक्ति जिसे प्रस्ताव किया गया है, उस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए अपनी सहमति प्रकट करता है। अर्थात्, प्रस्ताव को जब वह व्यक्ति जिसे प्रस्ताव दिया गया है, स्पष्ट रूप से या व्यवहार से स्वीकार कर लेता है, तो इसे स्वीकृति कहते हैं। यह स्वीकृति मौखिक, लिखित या आचरण द्वारा भी हो सकती है। स्वीकृति के बिना कोई अनुबंध नहीं बनता। प्रस्ताव और स्वीकृति दोनों का होना आवश्यक है, तभी एक वैध अनुबंध अस्तित्व में आता है। धारा 2(b) स्पष्ट करती है कि—'जब वह व्यक्ति जिसे प्रस्ताव किया गया है, अपनी सहमति उस प्रस्ताव के अनुसार प्रकट करता है, तब प्रस्ताव की स्वीकृति मानी जाती है।' इसका अर्थ है कि स्वीकृति तभी मानी जाएगी जब वह प्रस्ताव के अनुसार ही हो, उसमें कोई परिवर्तन न हो। यदि प्रस्ताव में कोई परिवर्तन कर दिया जाता है, तो वह स्वीकृति नहीं, बल्कि प्रतिप्रस्ताव (counter offer) कहलाता है। स्वीकृति के लिए आवश्यक है कि वह स्पष्ट, निर्विवाद और बिना किसी शर्त के हो। यदि स्वीकृति में कोई शर्त जोड़ दी जाती है, तो वह वैध स्वीकृति नहीं मानी जाएगी। इस प्रकार, अनुबंध बनने के लिए प्रस्ताव की स्वीकृति आवश्यक है, और यह स्वीकृति उसी रूप में होनी चाहिए जैसा प्रस्ताव किया गया है।
- स्वीकृति का अर्थ है—प्रस्ताव को स्वीकार करने की सहमति प्रकट करना।
- स्वीकृति मौखिक, लिखित या आचरण द्वारा हो सकती है।
- स्वीकृति प्रस्ताव के अनुसार ही होनी चाहिए, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
- शर्तों के साथ दी गई स्वीकृति, स्वीकृति नहीं मानी जाती।
- स्वीकृति के बिना अनुबंध अस्तित्व में नहीं आता।
- स्वीकृति स्पष्ट और निर्विवाद होनी चाहिए।
- 📌 स्वीकृति (Acceptance): प्रस्ताव को स्वीकार करने की सहमति।
- 📌 प्रस्ताव (Offer): किसी कार्य या वस्तु के लिए प्रस्तावित शर्तें।
- 📌 प्रतिप्रस्ताव (Counter Offer): प्रस्ताव में परिवर्तन के साथ दी गई प्रतिक्रिया।
स्वीकृति के आवश्यक तत्व
अवधारणास्वीकृति के आवश्यक तत्व
स्वीकृति के लिए कुछ आवश्यक तत्व होते हैं, जिनका होना अनुबंध की वैधता के लिए अनिवार्य है। यदि इन तत्वों का पालन नहीं किया गया, तो स्वीकृति वैध नहीं मानी जाएगी। 1. स्वीकृति स्पष्ट और निर्विवाद होनी चाहिए—स्वीकृति में कोई अस्पष्टता या संदेह नहीं होना चाहिए। 2. स्वीकृति बिना शर्त के होनी चाहिए—यदि स्वीकृति में कोई शर्त जोड़ दी जाती है, तो वह वैध स्वीकृति नहीं मानी जाएगी। 3. स्वीकृति प्रस्ताव के अनुसार ही होनी चाहिए—स्वीकृति में प्रस्ताव के किसी भी भाग में परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए। 4. स्वीकृति उचित माध्यम से होनी चाहिए—यदि प्रस्ताव में स्वीकृति का कोई विशेष माध्यम बताया गया है, तो उसी माध्यम से स्वीकृति दी जानी चाहिए। 5. स्वीकृति उचित समय में होनी चाहिए—स्वीकृति निर्धारित समय के भीतर या यथाशीघ्र दी जानी चाहिए। 6. स्वीकृति ज्ञात होनी चाहिए—प्रस्तावक को स्वीकृति की सूचना मिलनी चाहिए। इन तत्वों के बिना दी गई स्वीकृति वैध नहीं मानी जाएगी और न ही उससे अनुबंध बनता है।
- स्वीकृति स्पष्ट, निर्विवाद और बिना शर्त के होनी चाहिए।
- स्वीकृति प्रस्ताव के अनुसार ही होनी चाहिए।
- स्वीकृति उचित माध्यम और समय में दी जानी चाहिए।
- स्वीकृति ज्ञात होनी चाहिए।
- स्वीकृति के बिना अनुबंध नहीं बनता।
- स्वीकृति में किसी प्रकार का परिवर्तन या शर्त नहीं होनी चाहिए।
- 📌 स्पष्ट स्वीकृति: जिसमें कोई संदेह या अस्पष्टता न हो।
- 📌 बिना शर्त स्वीकृति: जिसमें कोई अतिरिक्त शर्त न जोड़ी गई हो।
- 📌 उचित माध्यम: प्रस्ताव में बताए गए तरीके से स्वीकृति देना।
स्वीकृति के प्रकार
अवधारणास्वीकृति के प्रकार
स्वीकृति के मुख्यतः दो प्रकार होते हैं—(1) व्यक्त (Express) स्वीकृति, (2) निहित (Implied) स्वीकृति। 1. व्यक्त स्वीकृति—जब स्वीकृति स्पष्ट रूप से मौखिक या लिखित रूप में दी जाती है, तो उसे व्यक्त स्वीकृति कहते हैं। उदाहरण के लिए, 'मैं आपका प्रस्ताव स्
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Legal Aspects of Business · Vardhman Mahaveer Open University
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