जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग | Class 12 Biology Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग – this guide gives you a concise, exam-ready overview of जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग from Class 12 Biology, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
10.2 चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग
चिकित्सा क्षेत्र में पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी ने सुरक्षित, प्रभावी और अधिक मात्रा में चिकित्सीय औषधियों के उत्पादन में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। पुनर्योगज औषधियाँ अमानवीय स्रोतों से प्राप्त औषधियों की तुलना में अधिक उपयुक्त होती हैं क्योंकि इनमें अवांछित प्रतिरक्षात्मक प्रभाव नहीं होता।
10.2.1 आनुवंशिकत: निर्मित इंसुलीन: मधुमेह रोग के उपचार के लिए इंसुलीन आवश्यक है। पहले जानवरों से इंसुलीन निकाला जाता था, जिससे एलर्जी जैसी समस्याएँ होती थीं। 1983 में एली लिली कंपनी ने मानव इंसुलीन की दो पालीपेप्टाइड शृंखलाओं (ए और बी) के डीएनए अनुक्रम तैयार कर इन्हें ई. कोलाई में क्लोन किया। बाद में शृंखलाओं को संयोजित कर मानव इंसुलीन प्राप्त किया गया। इंसुलीन में दो शृंखलाएँ डाईसल्फाइड बंधों से जुड़ी होती हैं, और इसमें 'सी' पेप्टाइड नामक अतिरिक्त भाग होता है जो परिपक्वता के दौरान अलग हो जाता है।
10.2.2 जीन चिकित्सा: यह विधि आनुवंशिक रोगों के उपचार के लिए दोषपूर्ण जीनों को स्वस्थ जीनों से बदलने की प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए, एडीनोसीन डिएमीनेज (एडीए) की कमी से प्रतिरक्षा तंत्र प्रभावित होता है। जीन चिकित्सा में रोगी के लसीकाणुओं को निकालकर उनमें सक्रिय एडीए जीन प्रविष्ट किया जाता है और पुनः शरीर में डाला जाता है।
10.2.3 आणविक निदान: रोग की प्रारंभिक पहचान के लिए पुनर्योगज डीएनए तकनीक जैसे पॉलीमरेज शृंखला अभिक्रिया (पीसीआर), एंजाइम सहलग्न प्रतिरक्षा शोषक आमापन (एलाइजा) आदि का उपयोग होता है। पीसीआर द्वारा रोगजनक के न्यूक्लिक अम्ल की न्यूनतम मात्रा का पता लगाया जाता है, जिससे संदेहात्मक रोगों जैसे एड्स की पहचान संभव होती है। एलाइजा तकनीक प्रतिजन-प्रतिरक्षी की क्रिया पर आधारित है।
📊 Diagram: चित्र 10.3 प्राक्-इंसुलिन का सी-पेप्टाइड के अलग होने के बाद इंसुलिन में परिपक्वता
🧪 Activity: जीन चिकित्सा के लिए रक्त से लसीकाणु निकालना और पुनः शरीर में डालने की प्रक्रिया का अध्ययन।
🔗 Connection: पारजीवी जंतु (ट्रांसजेनिक एनिमल्स) के निर्माण और उपयोग की चर्चा के लिए आधार।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. विषाणु मुक्त पादप तैयार करने के लिए पादप का कौन सा भाग सबसे अधिक उपयुक्त है तथा क्यों?
विषाणु मुक्त पादप तैयार करने के लिए पादप का सबसे अधिक उपयुक्त भाग 'मेरिस्टेमेटिक टिशू' होता है। मेरिस्टेमेटिक टिशू पादप के विकासशील भाग होते हैं जो तेजी से विभाजित होते हैं और इनमें विषाणु कम या नहीं होते। इसलिए इन्हें सूक्ष्मप्रवर्धन (micropropagation) में प्रयोग किया जाता है ताकि विषाणु मुक्त पादप प्राप्त हो सकें।
2. सूक्ष्मप्रवर्धन द्वारा पादपों के उत्पादन के मुख्य लाभ क्या हैं?
सूक्ष्मप्रवर्धन के मुख्य लाभ हैं: 1. विषाणु मुक्त पादपों का उत्पादन। 2. कम समय में बड़ी संख्या में समान पादपों का उत्पादन। 3. दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण। 4. मौसम और स्थान की सीमाओं से स्वतंत्र उत्पादन। 5. उच्च गुणवत्ता वाले पौधों का उत्पादन।
3. पत्ती में कर्तृतिक पादप के प्रवर्धन में जिस माध्यम का प्रयोग किया गया है, उसमें विभिन्न घटकों का पता लगाओ।
पत्ती में कर्तृतिक पादप के प्रवर्धन के लिए प्रयोग किए गए माध्यम में निम्नलिखित घटक होते हैं:
- कार्बन स्रोत के रूप में शुगर (जैसे सुक्रोज)
- मिनरल्स (जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम)
- विटामिन्स
- पादप हार्मोन्स (ऑक्सिन और साइटोकिनिन)
- जल
- ठोस माध्यम के लिए एजेंट (जैसे अगर)
ये घटक पादप के विकास और विभाजन के लिए आवश्यक पोषण और संकेत प्रदान करते हैं।
4. बीटी (Bt) आविष्क के रवे कुछ जीवाणुओं द्वारा बनाए जाते हैं लेकिन जीवाणु स्वयं को नहीं मारते हैं; क्योंकि— (क) जीवाणु आविष्क के प्रति प्रतिरोधी है। (ख) आविष्क अपरिपक्व है। (ग) आविष्क निष्क्रिय होता है। (घ) आविष्क जीवाणु की विशेष थैली में मिलता है।
सही उत्तर: (घ) आविष्क जीवाणु की विशेष थैली में मिलता है।
विवरण: बीटी (Bacillus thuringiensis) जीवाणु अपने शरीर में विशेष थैली (क्रिस्टल थैली) में टॉक्सिन (आविष्क) बनाते हैं जो कीटों के लिए विषैला होता है। जीवाणु स्वयं को इस टॉक्सिन से नहीं मारते क्योंकि यह टॉक्सिन थैली के अंदर सुरक्षित रहता है और तब तक निष्क्रिय रहता है जब तक कीट के शरीर में प्रवेश न करे।
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