जैव-विविधता एवं संरक्षण | Class 12 Biology Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

जैव-विविधता एवं संरक्षण – this guide gives you a concise, exam-ready overview of जैव-विविधता एवं संरक्षण from Class 12 Biology, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
13.1.1 पृथ्वी तथा भारत में कितनी जातियाँ (स्पीशीज) हैं?
पृथ्वी पर अब तक खोजी और नामित जातियों की संख्या लगभग 1.5 मिलियन से अधिक है, लेकिन वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। आई.यू.सी.एन. (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेस) के अनुसार, पृथ्वी पर लगभग 7 मिलियन (70 लाख) जातियाँ हो सकती हैं। जंतु जातियाँ कुल खोजी जातियों का लगभग 70 प्रतिशत हैं, जिनमें कीट जातियाँ सबसे अधिक हैं। भारत में लगभग 45,000 पादप जातियाँ और उससे दोगुनी जंतु जातियाँ पाई जाती हैं। भारत का क्षेत्रफल विश्व का केवल 2.4 प्रतिशत है, लेकिन इसकी जैव विविधता वैश्विक जैव विविधता का 8.1 प्रतिशत है। भारत को 12 महाविविध देशों में गिना जाता है। जंतु वर्गों में कवक जातियाँ मछली, उभयचर, सरीसृप और स्तनधारियों की तुलना में अधिक हैं। प्रोकैरियोटिक जातियों की संख्या ज्ञात नहीं है क्योंकि उनकी पहचान पारंपरिक वर्गीकरण विधियों से कठिन है।
📊 Diagram: चित्र 13.1 वैश्विक जैव विविधता का प्रतिनिधित्व- अकशेरुकी, कशेरुकी तथा पादप जाति के वर्गकों की अनुपातिक संख्या
🧪 Activity: इस खंड में कोई विशेष गतिविधि नहीं दी गई है।
🔗 Connection: यह खंड जैव विविधता के वितरण के प्रतिरूप (पैटर्न) की चर्चा के लिए आधार प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. जैव-विविधता के तीन आवश्यक घटकों (कंपोनेंट) के नाम बताइए?
जैव-विविधता के तीन आवश्यक घटक हैं: 1. आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): किसी जाति के भीतर आनुवंशिक भिन्नता। 2. जातीय विविधता (Species Diversity): किसी क्षेत्र में पाए जाने वाली विभिन्न जातियाँ। 3. पारितंत्र विविधता (Ecosystem Diversity): विभिन्न पारितंत्रों का विविध रूप।
2. पारिस्थितिकीविद् किस प्रकार विश्व की कुल जातियों का आंकलन करते हैं?
पारिस्थितिकीविद् विश्व की कुल जातियों का आंकलन अनुमानित विधि से करते हैं। वे ज्ञात क्षेत्रों में जाति संख्या का अध्ययन करते हैं और फिर इसे विश्व के अन्य क्षेत्रों पर लागू कर अनुमान लगाते हैं। इसके लिए वे जाति-क्षेत्र संबंध (Species-Area Relationship) का उपयोग करते हैं, जिसमें क्षेत्रफल के बढ़ने पर जाति संख्या में वृद्धि का गणितीय संबंध होता है।
3. उष्ण कटिबंध क्षेत्रों में सबसे अधिक स्तर की जाति-समृद्धि क्यों मिलती हैं? इसकी तीन परिकल्पनाएँ दीजिए?
उष्ण कटिबंध क्षेत्रों में अधिक जाति-समृद्धि के कारण: 1. स्थिर जलवायु: उष्ण कटिबंध में जलवायु स्थिर और अनुकूल होती है, जिससे जीवों के लिए अनुकूल आवास बनता है। 2. अधिक ऊर्जा उपलब्धता: सूर्य की ऊर्जा अधिक मात्रा में मिलती है, जिससे पौधों और जीवों की वृद्धि होती है। 3. विकास की लंबी अवधि: उष्ण कटिबंध में विकास की अवधि अधिक होती है, जिससे अधिक जातियाँ विकसित हो पाती हैं।
तीन परिकल्पनाएँ: (i) जलवायु स्थिरता परिकल्पना: स्थिर जलवायु अधिक विविधता को बढ़ावा देती है। (ii) ऊर्जा परिकल्पना: अधिक ऊर्जा उपलब्
4. जातीय - क्षेत्र संबंध में समाश्रयण (रिग्रेशन) की ढलान का क्या महत्व हैं?
जातीय-क्षेत्र संबंध में समाश्रयण की ढलान यह दर्शाती है कि क्षेत्रफल के बढ़ने पर जाति संख्या किस दर से बढ़ती है। इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि यह हमें यह समझने में मदद करती है कि बड़े क्षेत्र में कितनी नई जातियाँ मिल सकती हैं। ढलान अधिक होने पर क्षेत्रफल में वृद्धि के साथ जाति संख्या में तीव्र वृद्धि होती है।
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