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मानव स्वास्थ्य तथा रोग | Class 12 Biology Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

मानव स्वास्थ्य तथा रोग | Class 12 Biology Notes

मानव स्वास्थ्य तथा रोग – this guide gives you a concise, exam-ready overview of मानव स्वास्थ्य तथा रोग from Class 12 Biology, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

प्रतिरक्षा

प्रतिरक्षा तंत्र वह जैविक प्रणाली है जो शरीर को रोगजनकों से बचाती है। प्रतिरक्षा दो प्रकार की होती है: सहज (जन्मजात) प्रतिरक्षा और उपार्जित (अर्जित) प्रतिरक्षा।

सहज प्रतिरक्षा जन्म के समय से ही मौजूद होती है और यह शरीर के बाहरी और आंतरिक रोधों के माध्यम से रोगजनकों के प्रवेश को रोकती है। इसमें शारीरिक रोध जैसे त्वचा और श्लेष्म झिल्लियाँ, कायिकीय रोध जैसे आमाशय का अम्ल, लार और आँसुओं में रोगाणुरोधी पदार्थ, कोशिकीय रोध जैसे श्वेताणु और साइटोकाइन रोध शामिल हैं।

उपार्जित प्रतिरक्षा विशिष्ट होती है और इसमें स्मृति होती है। जब शरीर पहली बार किसी रोगजनक से मिलता है तो यह प्राथमिक प्रतिक्रिया करता है, और पुनः मिलने पर द्वितीयक प्रतिक्रिया अधिक तीव्र होती है। उपार्जित प्रतिरक्षा में बी-लसीकाणु और टी-लसीकाणु मुख्य भूमिका निभाते हैं। बी-लसीकाणु प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) बनाते हैं जो रोगजनकों को निष्प्रभावी करते हैं। टी-लसीकाणु बी-लसीकाणुओं की सहायता करते हैं और कोशिका-माध्यत प्रतिरक्षा में भी भाग लेते हैं।

सक्रिय प्रतिरक्षा तब होती है जब शरीर स्वयं प्रतिरक्षी बनाता है, जैसे टीकाकरण या प्राकृतिक संक्रमण के दौरान। निष्क्रिय प्रतिरक्षा तब होती है जब प्रतिरक्षी सीधे शरीर को दिए जाते हैं, जैसे माँ के दूध में पाए जाने वाले प्रतिरक्षी।

टीकाकरण में निष्क्रिय या दुर्बल रोगजनकों को शरीर में प्रवेश कराया जाता है ताकि प्रतिरक्षा तंत्र स्मृति विकसित कर सके। ऐलर्जी प्रतिरक्षा तंत्र की अतिव्यक्ति है, जिसमें पर्यावरणीय पदार्थों के प्रति असामान्य प्रतिक्रिया होती है। स्वप्रतिरक्षा रोगों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करती है।

मानव प्रतिरक्षा तंत्र में अस्थि मज्जा, थाइमस, प्लीहा, लसीका ग्रंथियाँ और एमएएलटी जैसे अंग शामिल हैं जो लसीकाणुओं के उत्पादन, परिपक्वन और सक्रियण के लिए आवश्यक हैं।

📊 Diagram: चित्र 7.4 प्रतिरक्षी अणु की संरचना; चित्र 7.5 लसीका तंत्र

🧪 Activity: छात्रों को प्रतिरक्षा तंत्र के अंगों की पहचान और उनके कार्यों पर चर्चा करने के लिए कहा जा सकता है।

🔗 Connection: यह अनुभाग एड्स जैसे प्रतिरक्षा तंत्र से संबंधित रोगों की समझ के लिए आधार प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कौन से विभिन्न जन स्वास्थ्य उपाय हैं, जिन्हें आप संक्रामक रोगों के विरुद्ध रक्षा-उपायों के रूप में सुझायेंगे?

संक्रामक रोगों के विरुद्ध जन स्वास्थ्य उपायों में शामिल हैं: 1. स्वच्छता बनाए रखना जैसे हाथ धोना, साफ-सफाई रखना। 2. स्वच्छ जल और भोजन का सेवन। 3. टीकाकरण (लसीकरण) कराना। 4. संक्रमित व्यक्तियों से दूरी बनाए रखना। 5. संक्रमित स्थानों की सैनिटाइजेशन। 6. मच्छरदानी का उपयोग और मच्छर नियंत्रण। 7. सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता फैलाना। 8. उचित कचरा प्रबंधन। 9. रोगों के लक्षणों को पहचान कर समय पर चिकित्सकीय सहायता लेना।

जैविकी के अध्ययन ने संक्रामक रोगों को नियंत्रित करने में किस प्रकार हमारी सहायता की है?

जैविकी के अध्ययन से संक्रामक रोगों के कारण, उनके संचरण के तरीके, रोगजनकों की संरचना और जीवन चक्र को समझने में मदद मिली है। इससे: 1. रोगों की पहचान और निदान में सुधार हुआ। 2. प्रभावी टीके और दवाओं का विकास संभव हुआ। 3. रोगजनकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपाय विकसित हुए। 4. रोग नियंत्रण के लिए जन स्वास्थ्य नीतियाँ बनाई गईं। 5. रोगों के फैलाव को रोकने के लिए जैव प्रौद्योगिकी आधारित तकनीकों का उपयोग हुआ।

निम्नलिखित रोगों का संचरण कैसे होता है? (क) अमीबता (ख) मलेरिया (ग) एस्केरिसता (घ) न्यूमोनिया

संचरण के तरीके: (क) अमीबता: दूषित जल या भोजन के माध्यम से, अमीबा नामक परजीवी के कारण होता है। यह मल-प्रदूषित जल के सेवन से फैलता है। (ख) मलेरिया: संक्रमित मच्छर (ऐनाफिलीस) के काटने से फैलता है। मलेरिया प्लाज्मोडियम नामक परजीवी के कारण होता है। (ग) एस्केरिसता: दूषित भोजन या जल के माध्यम से फैलता है। यह एक प्रकार का कीड़ा (पैरासाइट) है जो आंतों में रहता है। (घ) न्यूमोनिया: यह मुख्यतः हवा में मौजूद जीवाणु या विषाणु के छींकने या खांसने से फैलता है।

जल-वाहित रोगों की रोकथाम के लिए आप क्या उपाय अपनायेंगे?

जल-वाहित रोगों की रोकथाम के उपाय: 1. स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल का उपयोग। 2. जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाना। 3. पानी को उबालकर या फिल्टर करके पीना। 4. शौचालयों का उचित प्रबंधन और खुले में शौच से बचाव। 5. हाथों की स्वच्छता बनाए रखना, विशेषकर भोजन से पहले। 6. जलाशयों और तालाबों में मच्छर नियंत्रण। 7. जन जागरूकता अभियान चलाना।

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