Chapter 7
Chapter 7 — अध्ययन नोट्स
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मानव में सामान्य रोग
व्याख्यामानव में सामान्य रोग
मानव शरीर में अनेक प्रकार के रोग होते हैं जिनमें से अधिकांश संक्रामक रोग होते हैं। संक्रामक रोगों के कारण रोगजनक जीवाणु, विषाणु, कवक, प्रोटोजोआ तथा कृमि होते हैं। ये रोगजनक जीव शरीर में प्रवेश कर उसकी सामान्य क्रियाओं में बाधा उत्पन्न करते हैं और आकृतिक तथा प्रकार्यात्मक क्षति करते हैं। उदाहरण के लिए, साल्मोनेला टाइफी नामक जीवाणु टाइफाइड ज्वर का कारण होता है। यह रोगजनक संदूषित भोजन और पानी के माध्यम से शरीर में प्रवेश करता है और रक्त प्रवाह के द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचता है। टाइफाइड के लक्षणों में लगातार उच्च ज्वर, कमजोरी, आमाशय में पीड़ा, कब्ज, सिरदर्द और भूख न लगना प्रमुख हैं। न्युमोनिया रोग के लिए स्ट्रेप्टोकोकस न्युमोनी और हीमोफिल्स इंफ्लुएंजी जैसे जीवाणु जिम्मेदार होते हैं। यह रोग फेफड़ों के वायुकोष्ठों को संक्रमित करता है जिससे उनमें तरल भर जाता है और सांस लेने में कठिनाई होती है। लक्षणों में ज्वर, ठिठुरन, खांसी और सिरदर्द शामिल हैं। विषाणुओं में नासाविषाणु (राइनोवायरस) सामान्य जुकाम फैलाते हैं। ये नाक और श्वसन पथ को संक्रमित करते हैं। सामान्य जुकाम के लक्षणों में नाक बंद होना, कंठ दाह, स्वरक्षता, खांसी, सिरदर्द और थकावट शामिल हैं। प्रोटोजोआ में प्लैजमोडियम मलेरिया का कारण है। मलेरिया का जीवन चक्र मादा ऐनोफेलीज मच्छर के काटने से शुरू होता है। मच्छर के शरीर में प्लैजमोडियम का विकास होता है और फिर यह मानव रक्त में प्रवेश करता है। यह यकृत और लाल रक्त कणिकाओं को संक्रमित करता है जिससे ज्वर और ठिठुरन होते हैं। कृमियों में ऐस्कारिस, वुचेरेरिया आदि प्रमुख हैं। ऐस्कारिसता रोग आंत्र परजीवी ऐस्कारिस के कारण होता है, जबकि फाइलेरिया लसीका वाहिकाओं में दीर्घकालिक शोध उत्पन्न करता है। कवकों में माइक्रोस्पोरम, ट्राइकोफाइटॉन और एपिडर्मोफाइटॉन दाद रोग के लिए जिम्मेदार हैं। यह त्वचा, नाखून और सिर की त्वचा पर खुजली और शल्की विक्षतियाँ उत्पन्न करते हैं। रोगों की रोकथाम के लिए स्वच्छता, साफ पानी, उचित खाद्य पदार्थों का सेवन, रोगवाहकों का नियंत्रण जैसे उपाय आवश्यक हैं। टीकाकरण और प्रतिजैविकों के उपयोग से संक्रामक रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है।
- रोगजनक जीवाणु, विषाणु, कवक, प्रोटोजोआ और कृमि मानव रोगों के मुख्य कारण हैं।
- टाइफाइड, न्युमोनिया, सामान्य जुकाम, मलेरिया, ऐस्कारिसता आदि प्रमुख संक्रामक रोग हैं।
- रोगवाहक मच्छर, घरेलू मक्खियाँ आदि रोग फैलाने में सहायक होते हैं।
- व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता रोगों की रोकथाम में महत्वपूर्ण है।
- टीकाकरण और प्रतिजैविकों से संक्रामक रोगों का नियंत्रण संभव है।
- रोगजनकों के जीवन चक्र और संक्रमण के तरीके को समझना रोग नियंत्रण के लिए आवश्यक है।
- 📌 रोगजनक: वे सूक्ष्मजीव जो रोग उत्पन्न करते हैं।
- 📌 संक्रामक रोग: ऐसे रोग जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं।
- 📌 प्रतिजैविक: सूक्ष्मजीवों को मारने वाली दवाएँ।
प्रतिरक्षा
व्याख्याप्रतिरक्षा
प्रतिरक्षा तंत्र वह जैविक प्रणाली है जो शरीर को रोगजनकों से बचाती है। प्रतिरक्षा दो प्रकार की होती है: सहज (जन्मजात) प्रतिरक्षा और उपार्जित (अर्जित) प्रतिरक्षा। सहज प्रतिरक्षा जन्म के समय से ही मौजूद होती है और यह शरीर के बाहरी और आंतरिक रोधों के माध्यम से रोगजनकों के प्रवेश को रोकती है। इसमें शारीरिक रोध जैसे त्वचा और श्लेष्म झिल्लियाँ, कायिकीय रोध जैसे आमाशय का अम्ल, लार और आँसुओं में रोगाणुरोधी पदार्थ, कोशिकीय रोध जैसे श्वेताणु और साइटोकाइन रोध शामिल हैं। उपार्जित प्रतिरक्षा विशिष्ट होती है और इसमें स्मृति होती है। जब शरीर पहली बार किसी रोगजनक से मिलता है तो यह प्राथमिक प्रतिक्रिया करता है, और पुनः मिलने पर द्वितीयक प्रतिक्रिया अधिक तीव्र होती है। उपार्जित प्रतिरक्षा में बी-लसीकाणु और टी-लसीकाणु मुख्य भूमिका निभाते हैं। बी-लसीकाणु प्रतिरक्षी (एंटीबॉडी) बनाते हैं जो रोगजनकों को निष्प्रभावी करते हैं। टी-लसीकाणु बी-लसीकाणुओं की सहायता करते हैं और कोशिका-माध्यत प्रतिरक्षा में भी भाग लेते हैं। सक्रिय प्रतिरक्षा तब होती है जब शरीर स्वयं प्रतिरक्षी बनाता है, जैसे टीकाकरण या प्राकृतिक संक्रमण के दौरान। निष्क्रिय प्रतिरक्षा तब होती है जब प्रतिरक्षी सीधे शरीर को दिए जाते हैं, जैसे माँ के दूध में पाए जाने वाले प्रतिरक्षी। टीकाकरण में निष्क्रिय या दुर्बल रोगजनकों को शरीर में प्रवेश कराया जाता है ताकि प्रतिरक्षा तंत्र स्मृति विकसित कर सके। ऐलर्जी प्रतिरक्षा तंत्र की अतिव्यक्ति है, जिसमें पर्यावरणीय पदार्थों के प्रति असामान्य प्रतिक्रिया होती है। स्वप्रतिरक्षा रोगों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करती है। मानव प्रतिरक्षा तंत्र में अस्थि मज्जा, थाइमस, प्लीहा, लसीका ग्रंथियाँ और एमएएलटी जैसे अंग शामिल हैं जो लसीकाणुओं के उत्पादन, परिपक्वन और सक्रियण के लिए आवश्यक हैं।
- प्रतिरक्षा तंत्र शरीर को रोगजनकों से बचाता है।
- सहज प्रतिरक्षा जन्मजात होती है और बाहरी तथा आंतरिक रोधों से रोगजनकों को रोकती है।
- उपार्जित प्रतिरक्षा विशिष्ट होती है और स्मृति के गुण से पुनः संक्रमण पर तीव्र प्रतिक्रिया देती है।
- बी-लसीकाणु प्रतिरक्षी बनाते हैं, टी-लसीकाणु उनकी सहायता करते हैं।
- सक्रिय प्रतिरक्षा और निष्क्रिय प्रतिरक्षा के बीच अंतर होता है।
- प्रतिरक्षा तंत्र के अंगों में अस्थि मज्जा, थाइमस, प्लीहा, लसीका ग्रंथियाँ और एमएएलटी शामिल हैं।
- 📌 प्रतिरक्षा: शरीर की रोगजनकों से लड़ने की क्षमता।
- 📌 सहज प्रतिरक्षा: जन्मजात, अविशिष्ट रक्षा।
- 📌 उपार्जित प्रतिरक्षा: विशिष्ट, स्मृति वाली प्रतिरक्षा।
एड्स
व्याख्याएड्स
एड्स (Acquired Immuno Deficiency Syndrome) एक घातक रोग है जो मानव प्रतिरक्षा न्यूनता विषाणु (एचआईवी) के कारण होता है। यह रोग प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर देता है जिससे व्यक्ति अन्य संक्रमणों और रोगों के प्रति असुरक्षित हो जाता है। एचआईवी एक पश्चविषा
अभ्यास प्रश्न — Chapter 7
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.कौन से विभिन्न जन स्वास्थ्य उपाय हैं, जिन्हें आप संक्रामक रोगों के विरुद्ध रक्षा-उपायों के रूप में सुझायेंगे?
उत्तर:
संक्रामक रोगों के विरुद्ध जन स्वास्थ्य उपायों में शामिल हैं: 1. स्वच्छता बनाए रखना जैसे हाथ धोना, साफ-सफाई रखना। 2. स्वच्छ जल और भोजन का सेवन। 3. टीकाकरण (लसीकरण) कराना। 4. संक्रमित व्यक्तियों से दूरी बनाए रखना। 5. संक्रमित स्थानों की सैनिटाइजेशन। 6. मच्छरदानी का उपयोग और मच्छर नियंत्रण। 7. सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता फैलाना। 8. उचित कचरा प्रबंधन। 9. रोगों के लक्षणों को पहचान कर समय पर चिकित्सकीय सहायता लेना।
व्याख्या:
संक्रामक रोगों के फैलाव को रोकने के लिए उपरोक्त उपाय आवश्यक हैं। ये उपाय रोगजनकों के संपर्क को कम करते हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाते हैं।
Q2.जैविकी के अध्ययन ने संक्रामक रोगों को नियंत्रित करने में किस प्रकार हमारी सहायता की है?
उत्तर:
जैविकी के अध्ययन से संक्रामक रोगों के कारण, उनके संचरण के तरीके, रोगजनकों की संरचना और जीवन चक्र को समझने में मदद मिली है। इससे: 1. रोगों की पहचान और निदान में सुधार हुआ। 2. प्रभावी टीके और दवाओं का विकास संभव हुआ। 3. रोगजनकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपाय विकसित हुए। 4. रोग नियंत्रण के लिए जन स्वास्थ्य नीतियाँ बनाई गईं। 5. रोगों के फैलाव को रोकने के लिए जैव प्रौद्योगिकी आधारित तकनीकों का उपयोग हुआ।
व्याख्या:
जैविकी के अध्ययन ने रोगजनकों की समझ बढ़ाकर और उनके नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक उपाय सुझाकर संक्रामक रोगों के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
Q3.निम्नलिखित रोगों का संचरण कैसे होता है? (क) अमीबता (ख) मलेरिया (ग) एस्केरिसता (घ) न्यूमोनिया
उत्तर:
संचरण के तरीके: (क) अमीबता: दूषित जल या भोजन के माध्यम से, अमीबा नामक परजीवी के कारण होता है। यह मल-प्रदूषित जल के सेवन से फैलता है। (ख) मलेरिया: संक्रमित मच्छर (ऐनाफिलीस) के काटने से फैलता है। मलेरिया प्लाज्मोडियम नामक परजीवी के कारण होता है। (ग) एस्केरिसता: दूषित भोजन या जल के माध्यम से फैलता है। यह एक प्रकार का कीड़ा (पैरासाइट) है जो आंतों में रहता है। (घ) न्यूमोनिया: यह मुख्यतः हवा में मौजूद जीवाणु या विषाणु के छींकने या खांसने से फैलता है।
व्याख्या:
प्रत्येक रोग का संचरण उसके रोगजनक के प्रकार और फैलने के माध्यम पर निर्भर करता है। जल, भोजन, मच्छर और हवा मुख्य माध्यम हैं।
Q4.जल-वाहित रोगों की रोकथाम के लिए आप क्या उपाय अपनायेंगे?
उत्तर:
जल-वाहित रोगों की रोकथाम के उपाय: 1. स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल का उपयोग। 2. जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाना। 3. पानी को उबालकर या फिल्टर करके पीना। 4. शौचालयों का उचित प्रबंधन और खुले में शौच से बचाव। 5. हाथों की स्वच्छता बनाए रखना, विशेषकर भोजन से पहले। 6. जलाशयों और तालाबों में मच्छर नियंत्रण। 7. जन जागरूकता अभियान चलाना।
व्याख्या:
जल-वाहित रोग मुख्यतः दूषित जल के सेवन से फैलते हैं, इसलिए जल की स्वच्छता और व्यक्तिगत स्वच्छता से इन रोगों को रोका जा सकता है।
Q5.डी एन ए वैक्सीन के संदर्भ में ‘उपयुक्त जीन’ के अर्थ के बारे में अपने अध्याय से चर्चा कीजिए।
उत्तर:
डी एन ए वैक्सीन में 'उपयुक्त जीन' का अर्थ है वह जीन जो रोगजनक के किसी विशिष्ट प्रोटीन या एंटीजन का कोडिंग करता है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय कर सके। इस जीन को रोगजनक से अलग कर, उसे वैक्सीन के रूप में उपयोग किया जाता है ताकि शरीर में रोग के खिलाफ प्रतिरक्षा विकसित हो सके।
व्याख्या:
डी एन ए वैक्सीन में रोगजनक के विशिष्ट जीन को शरीर में प्रवेश कराकर प्रतिरक्षा प्रणाली को उस रोग के प्रति जागरूक किया जाता है, जिससे रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।
Q6.प्राथमिक और द्वितीयक लसीकाओं के अंगों के नाम बताइए।
उत्तर:
प्राथमिक लसीकाएँ (Primary lymphoid organs): - अस्थिमज्जा (Bone marrow) - थाइमस ग्रंथि (Thymus gland) द्वितीयक लसीकाएँ (Secondary lymphoid organs): - लिम्फ नोड्स (Lymph nodes) - प्लीहा (Spleen) - टॉन्सिल्स (Tonsils) - लिम्फेटिक टिशू (Lymphatic tissues)
व्याख्या:
प्राथमिक लसीकाएँ वे हैं जहाँ लसीका कोशिकाएँ बनती हैं और परिपक्व होती हैं, जबकि द्वितीयक लसीकाएँ वे हैं जहाँ ये कोशिकाएँ रोगजनकों से लड़ने के लिए सक्रिय होती हैं।
Q7.इस अध्याय में निम्नलिखित सुप्रसिद्ध संकेताक्षर इस्तेमाल किए गए हैं। इनका पूरा रूप बताइए- (क) एमएएलटी (ख) सीएमआई (ग) एड्स (घ) एनएसीओ (च) एचआईवी
उत्तर:
(क) एमएएलटी - Mucosa Associated Lymphoid Tissue (म्यूकोसा सम्बंधित लसीका ऊतक) (ख) सीएमआई - Cell Mediated Immunity (कोशिका मध्यस्थ प्रतिरक्षा) (ग) एड्स - Acquired Immuno Deficiency Syndrome (अधिग्रहीत प्रतिरक्षा अभाव सिंड्रोम) (घ) एनएसीओ - National AIDS Control Organisation (राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन) (च) एचआईवी - Human Immunodeficiency Virus (मानव प्रतिरक्षा अभाव विषाणु)
व्याख्या:
ये संकेताक्षर प्रतिरक्षा तंत्र और एड्स से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दों के संक्षिप्त रूप हैं, जो अध्याय में बार-बार उपयोग किए गए हैं।
Q8.निम्नलिखित में भेद कीजिए और प्रत्येक के उदाहरण दीजिए। (क) सहज (जन्मजात) और उपज्जित प्रतिरक्षा (ख) सक्रिय और निष्क्रिय प्रतिरक्षा
उत्तर:
(क) सहज (जन्मजात) प्रतिरक्षा: - यह जन्म से ही मौजूद होती है। - यह सामान्य और असामान्य पदार्थों से शरीर की पहली रक्षा पंक्ति है। - उदाहरण: त्वचा, लार, आँसू, खाँसी, छींक आदि। उपज्जित प्रतिरक्षा: - यह किसी विशिष्ट रोगजनक के प्रति विकसित होती है। - यह रोगजनक के संपर्क में आने के बाद बनती है। - उदाहरण: टीकाकरण के बाद विकसित प्रतिरक्षा। (ख) सक्रिय प्रतिरक्षा: - जब शरीर स्वयं प्रतिरक्षा अणु (एंटीबॉडी) बनाता है। - यह दीर्घकालिक होती है। - उदाहरण: टीकाकरण या रोग संक्रमण के बाद। निष्क्रिय प्रतिरक्षा: - जब प्रतिरक्षा अणु शरीर को बाहर से मिलते हैं। - यह अल्पकालिक होती है। - उदाहरण: माँ का दूध, इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शन।
व्याख्या:
प्रतिरक्षा के प्रकार उनके उत्पत्ति और कार्य के आधार पर भिन्न होते हैं। सहज प्रतिरक्षा सामान्य होती है जबकि उपज्जित प्रतिरक्षा विशिष्ट होती है। सक्रिय प्रतिरक्षा शरीर द्वारा बनायी जाती है, जबकि निष्क्रिय प्रतिरक्षा बाहरी स्रोत से मिलती है।