विकास | Class 12 Biology Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

विकास – this guide gives you a concise, exam-ready overview of विकास from Class 12 Biology, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
6.1 जीवन की उत्पत्ति
जीवन की उत्पत्ति को समझने के लिए हमें ब्रह्मांड और पृथ्वी के विकास की पृष्ठभूमि जाननी आवश्यक है। ब्रह्मांड लगभग 1380 करोड़ वर्ष पुराना है। ब्रह्मांड की उत्पत्ति 'विग बैंग' सिद्धांत द्वारा समझाई जाती है, जिसमें एक महाविस्फोट के बाद ब्रह्मांड का विस्तार हुआ। प्रारंभ में ब्रह्मांड में हाइड्रोजन और हीलियम गैसें बनीं, जो गुरुत्वाकर्षण के कारण आकाशगंगाओं का निर्माण करती गईं। पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 450 करोड़ वर्ष पूर्व हुई। प्रारंभिक पृथ्वी पर वायुमंडल नहीं था, परंतु जल वाष्प, मीथेन, अमोनिया, कार्बन डाइऑक्साइड आदि गैसें थीं। सूर्य की पराबैंगनी किरणों ने जल को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया, जिससे पृथ्वी पर ऑक्सीजन और ओजोन परत बनी। जलवाष्प के संघनन से वर्षा हुई और महासागरों का निर्माण हुआ। जीवन की उत्पत्ति लगभग 400 करोड़ वर्ष पूर्व महासागरों में हुई।
कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि जीवन अंतरिक्ष से आया होगा, जिसे पैन-स्पर्मिया सिद्धांत कहते हैं। परंतु लुई पाश्चर ने स्वत: जनन सिद्धांत को खारिज कर दिया कि जीवन केवल पूर्व-विद्यमान जीवन से ही उत्पन्न होता है। रूस के आपेरिन और इंग्लैंड के हालडेन ने रासायनिक विकास का सिद्धांत दिया कि जीवन की शुरुआत अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक अणुओं के निर्माण से हुई। एस.एल. मिलर ने 1953 में प्रयोगशाला में मिथेन, हाइड्रोजन, अमोनिया आदि गैसों के मिश्रण में विद्युत डिस्चार्ज कर अमीनो एसिड का निर्माण दिखाया, जो जीवन के अणुओं के निर्माण का प्रमाण है।
प्रारंभिक जीवन संभवतः 3 अरब वर्ष पूर्व एककोशिकीय था, जो महासागरों में रहता था। यह जीवन अकार्बनिक से कार्बनिक अणुओं के रासायनिक विकास के बाद उत्पन्न हुआ। इस प्रकार जीवन की उत्पत्ति रासायनिक विकास के माध्यम से हुई, जिसे अजीवात् जनन सिद्धांत भी कहा जाता है।
📊 Diagram: 6.1 जीवन की उत्पत्ति
🧪 Activity: एस.एल. मिलर के प्रयोग का अध्ययन करें जिसमें मिथेन, हाइड्रोजन, अमोनिया के मिश्रण में विद्युत डिस्चार्ज कर अमीनो एसिड का निर्माण दिखाया गया।
🔗 Connection: यह खंड जीवन के विकास के सिद्धांतों की चर्चा की ओर ले जाता है, जो अगले खंड में विस्तार से समझाया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. डार्विन के चयन सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में जीवाणुओं में देखी गई प्रतिजैविक प्रतिरोध का स्पष्टीकरण करें।
डार्विन के चयन सिद्धांत के अनुसार, जीवों में आनुवंशिक विविधता होती है और पर्यावरणीय दबावों के कारण कुछ जीव अधिक अनुकूल होते हैं। जीवाणुओं में प्रतिजैविक प्रतिरोध का विकास भी इसी सिद्धांत के अनुरूप है। जब जीवाणु किसी प्रतिजैविक के संपर्क में आते हैं, तो उनमें से कुछ में आनुवंशिक परिवर्तन (म्यूटेशन) हो सकते हैं जो उन्हें उस दवा के प्रति प्रतिरोधी बनाते हैं। ये प्रतिरोधी जीवाणु जीवित रहते हैं और प्रजनन करते हैं, जबकि संवेदनशील जीवाणु मर जाते हैं। इस प्रकार, प्राकृतिक चयन के कारण प्रतिजैविक प्रतिरोध
2. समाचार पत्रों और लोकप्रिय वैज्ञानिक लेखों से विकास संबंधी नए जीवाश्मों और मतभेदों की जानकारी प्राप्त करें।
यह प्रश्न शोध और जानकारी संग्रहण पर आधारित है। विद्यार्थी समाचार पत्रों, लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाओं और ऑनलाइन स्रोतों से नवीनतम जीवाश्म खोजों और विकास से संबंधित मतभेदों की जानकारी एकत्रित करें। उदाहरण के लिए, हाल के वर्षों में पाए गए नए मानव पूर्वज जीवाश्म, डायनासोर के नए प्रजाति के जीवाश्म आदि।
3. ‘प्रजाति’ की स्पष्ट परिभाषा देने का प्रयास करें।
प्रजाति (Species) जीवों का वह समूह होता है जिनके बीच प्राकृतिक परिस्थितियों में प्रजनन संभव होता है और वे अपनी संतति उत्पन्न कर सकते हैं जो पुनः प्रजनन योग्य होती है। प्रजाति के सदस्यों में समान लक्षण और गुण होते हैं।
4. मानव-विकास के विभिन्न घटकों का पता करें (संकेत – मस्तिष्क साइज और कार्य, कंकाल-संरचना, भोजन में पसंदगी आदि)।
मानव विकास के घटक निम्नलिखित हैं:
- मस्तिष्क का आकार और कार्य: मानव मस्तिष्क का आकार अन्य प्राइमेट्स की तुलना में बड़ा है, जिससे जटिल सोच, भाषा और समस्या समाधान संभव होता है।
- कंकाल संरचना: मानव कंकाल में सीधे चलने के लिए विशेष परिवर्तन हुए हैं, जैसे कि रीढ़ की हड्डी की वक्रता, पैरों की लंबाई, और हाथों की संरचना।
- भोजन में पसंदगी: मानव ने शाकाहारी से सर्वाहारी भोजन की ओर विकास किया है, जिससे पोषण में विविधता आई है।
- अन्य घटक: सामाजिक व्यवहार, उपकरणों का उपयोग, भाषा विकास आदि।
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