वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत | Class 12 Biology Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत – this guide gives you a concise, exam-ready overview of वंशागति तथा विविधता के सिद्धांत from Class 12 Biology, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
4.1 मेंडल के वंशागति के नियम
उन्नीसवीं सदी के मध्य में ग्रीगोर मेंडल ने मटर के पौधों में सात वर्षों तक संकरण के प्रयोग किए। उनके प्रयोगों में उन्होंने सात जोड़े विपरीत लक्षणों वाले मटर के पौधों का चयन किया, जैसे लंबा/बौना, पीला/हरा बीज, गोल/झुर्रीदार बीज आदि। इन प्रयोगों के माध्यम से मेंडल ने वंशागति के नियमों का आधारभूत सिद्धांत प्रस्तुत किया। उन्होंने देखा कि लक्षणों का संकरण गणितीय नियमों के अनुसार होता है और संतति में लक्षणों का वितरण पूर्वानुमानित किया जा सकता है। मेंडल ने यह भी प्रस्तावित किया कि प्रत्येक लक्षण का निर्धारण एक 'कारक' द्वारा होता है जिसे आज हम जीन कहते हैं। ये कारक जोड़ों में पाए जाते हैं और प्रत्येक जोड़े के दो सदस्य होते हैं जिन्हें अलील कहा जाता है। मेंडल के प्रयोगों में F₁ पीढ़ी में एक ही लक्षण प्रकट होता है जबकि F₂ पीढ़ी में दोनों लक्षण 3:1 के अनुपात में प्रकट होते हैं। इस प्रकार मेंडल के नियम वंशागति के व्यवहार को समझाने में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
📊 Diagram: 61; चित्र 4.2 मटर में संकरण के चरण
🧪 Activity: मेंडल के संकरण प्रयोगों का अध्ययन और उनके परिणामों का विश्लेषण।
🔗 Connection: यह अनुभाग एक जीन की वंशागति के अध्ययन की ओर ले जाता है जहाँ मेंडल के नियमों को विस्तार से समझाया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मेंडल द्वारा प्रयोगों के लिए मटर के पौधे चुनने से क्या लाभ हुए?
मेंडल ने मटर के पौधे इसलिए चुने क्योंकि मटर के पौधों में स्पष्ट और भेद करने योग्य लक्षण होते हैं, जो आसानी से वर्गीकृत किए जा सकते हैं। इसके अलावा, मटर के पौधों का संकरण करना सरल था, उनकी वृद्धि चक्र छोटी थी, और वे स्व-परागण करते थे जिससे शुद्ध जाति बनाए रखना संभव था। ये सभी कारणों से मटर के पौधे आनुवंशिकी के अध्ययन के लिए उपयुक्त थे।
निम्न में भेद करो — - (क) प्रभाविता और अप्रभाविता - (ख) समयुग्मजी और विषमयुग्मजी - (ग) एकसंकर और द्विसंकर।
(क) प्रभाविता और अप्रभाविता: प्रभाविता (Expressivity) का अर्थ है कि एक जीन अपने लक्षण को कितनी मात्रा में व्यक्त करता है, अर्थात लक्षण की तीव्रता। अप्रभाविता (Penetrance) का अर्थ है कि जीन अपने लक्षण को व्यक्त करता है या नहीं, अर्थात जीन का सक्रिय होना या निष्क्रिय रहना।
(ख) समयुग्मजी और विषमयुग्मजी: समयुग्मजी (Homozygous) वह जीव होता है जिसके दोनों जीन एक जैसे (समान) होते हैं, जैसे AA या aa। विषमयुग्मजी (Heterozygous) वह जीव होता है जिसके दोनों जीन भिन्न होते हैं, जैसे Aa।
(ग) एकसंकर और द्विस
कोई द्विगुणित जीन 6 स्थलों के लिए विषमयुग्मजी हैं, कितने प्रकार के युग्मकों का उत्पादन संभव है?
यदि कोई जीव विषमयुग्मजी है और उसके 6 जीन स्थल हैं, तो प्रत्येक जीन स्थल के लिए दो प्रकार के अलील होते हैं। विषमयुग्मजी होने पर प्रत्येक स्थल से दो प्रकार के युग्मक बन सकते हैं।
युग्मकों की संख्या = 2^n = 2^6 = 64
अतः 6 स्थलों के लिए 64 प्रकार के युग्मक उत्पन्न हो सकते हैं।
एकसंकर क्रॉस का प्रयोग करते हुए, प्रभाविता नियम की व्याख्या करो।
प्रभाविता नियम (Law of Dominance) के अनुसार, जब दो शुद्ध जाति वाले जीवों का संकरण किया जाता है, जो किसी लक्षण के लिए विपरीत गुण रखते हैं, तो प्रथम पीढ़ी (F₁) में केवल एक लक्षण प्रकट होता है जिसे प्रभावी (Dominant) कहा जाता है, जबकि दूसरा लक्षण अप्रभावी (Recessive) रहता है।
उदाहरण के लिए, मटर के पौधों में पीले बीज (Y) प्रभावी और हरे बीज (y) अप्रभावी हैं। यदि शुद्ध पीले बीज वाले (YY) और शुद्ध हरे बीज वाले (yy) पौधों का क्रॉस किया जाए, तो F₁ पीढ़ी के सभी पौधे Yy होंगे और पीले बीज वाले होंगे।
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