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भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण | Class 11 Sangeet Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण | Class 11 Sangeet Notes

भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण – this guide gives you a concise, exam-ready overview of भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण from Class 11 Sangeet, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

तत् वाद्य (तार वाले वाद्य)

तत् वाद्य वे वाद्य होते हैं जिनमें ध्वनि उत्पन्न करने का मुख्य माध्यम तारों का कंपन होता है। इन तारों को खींचकर, पिढ़कर या झंकृत करके ध्वनि उत्पन्न की जाती है। भारतीय संगीत में तत् वाद्यों का विशेष स्थान है क्योंकि ये वाद्य स्वर की गहराई, लय और भावों को व्यक्त करने में सक्षम होते हैं। तत् वाद्यों के उदाहरणों में वीणा, सितार, सरोद, तानपुरा, वॉयलिन आदि प्रमुख हैं। प्राचीन काल से ही वीणा को भारतीय संगीत का प्रमुख तत् वाद्य माना गया है। तारों की संख्या, उनकी लंबाई, मोटाई और तनाव ध्वनि की गुणवत्ता और स्वर की तीव्रता को प्रभावित करते हैं। तत् वाद्यों में तारों को बजाने के लिए विभिन्न तकनीकों का उपयोग किया जाता है जैसे कि पिढ़ना, खींचना, झंकृत करना आदि। ये वाद्य मुख्यतः शास्त्रीय संगीत में उपयोग किए जाते हैं और इनके माध्यम से रागों की विविधता और भावनात्मक अभिव्यक्ति संभव होती है। तत् वाद्यों की संरचना और निर्माण में लकड़ी, धातु और अन्य प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग होता है। इनके तार सामान्यतः रेशम, धातु या सिंथेटिक सामग्री के होते हैं। तत् वाद्य संगीत के स्वरूप को समृद्ध बनाते हैं और इनके माध्यम से संगीत की गहराई और विस्तार को महसूस किया जा सकता है।

📊 Diagram: Figure 8.5—प्राचीन कालीन वीणा (तत् वाद्य); Figure 8.11—सितार बजाते हुए स्व. पंडित देबू चौधरी; Figure 8.12 — सरोद; Figure 8.13—वॉयलिन बजाते हुए कलाकार; Figure 8.14—इसराज; Figure 8.15— गिटार बजाते हुए कलाकार दीप

🧪 Activity: छात्रों से विभिन्न तत् वाद्यों के तारों की संख्या और उनकी ध्वनि की तुलना करने के लिए प्रयोग करना।

🔗 Connection: यह वर्गीकरण सुषिर वाद्यों की ओर बढ़ता है, जहाँ हवा के माध्यम से ध्वनि उत्पन्न करने वाले वाद्यों की चर्चा होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण के मुख्य चार वर्ग कौन-कौन से हैं और प्रत्येक वर्ग की ध्वनि उत्पन्न करने की विधि क्या है?

भारतीय संगीत में वाद्य वर्गीकरण के चार मुख्य वर्ग हैं: तत् वाद्य (तार वाले वाद्य) जिनमें तारों के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है; सुषिर वाद्य (हवा वाले वाद्य) जिनमें हवा के प्रवाह से ध्वनि उत्पन्न होती है; अवनद्ध वाद्य (चमड़े वाले वाद्य) जिनमें चमड़े को मारकर ध्वनि उत्पन्न होती है; और घन वाद्य (ठोस वस्तु वाले वाद्य) जिनमें दो ठोस वस्तुओं के टकराने से ध्वनि उत्पन्न होती है।

चित्र 8.1 में विक्कू विनायकराम अवनद्ध वाद्य घटम् बजाते हुए दिखाए गए हैं। अवनद्ध वाद्यों की ध्वनि उत्पन्न करने की विधि और इनके सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व को समझाइए। चित्र विवरण: चित्र में विक्कू विनायकराम हाथों से चमड़े वाले वाद्य घटम् को बजाते हुए दिख रहे हैं। घटम् एक मृद्भांड जैसा वाद्य है जिसमें चमड़े की सतह होती है।

अवनद्ध वाद्य वे वाद्य होते हैं जिनमें ध्वनि चमड़े या त्वचा को हाथ या किसी वस्तु से मारकर उत्पन्न की जाती है। इन वाद्यों का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों में ताल और लय के निर्धारण में होता है। उदाहरण के लिए, घटम् का प्रयोग दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में ताल के लिए किया जाता है।

घन वाद्य क्या होते हैं? चित्र 8.2 में दिखाए गए थाली वाद्य के आधार पर घन वाद्यों की ध्वनि उत्पन्न करने की विधि और उनके संगीत में महत्व को समझाइए। चित्र विवरण: चित्र 8.2 में एक धातु की थाली दिखाई गई है जो घन वाद्य वर्ग में आती है।

घन वाद्य वे वाद्य होते हैं जिनमें ध्वनि उत्पन्न करने के लिए दो ठोस वस्तुओं को आपस में टकराया जाता है या किसी ठोस वस्तु को सतह से टकराया जाता है। थाली एक धातु की थाली है जिसे बजाने पर स्पष्ट और तीव्र ध्वनि उत्पन्न होती है। घन वाद्यों का संगीत में ताल और लय की स्पष्टता प्रदान करने में महत्वपूर्ण स्थान है।

भारतीय संगीत में तत् वाद्यों का क्या महत्व है? तत् वाद्यों की ध्वनि उत्पन्न करने की प्रक्रिया को विस्तार से समझाइए।

(a) परिचय: तत् वाद्य वे वाद्य होते हैं जिनमें ध्वनि उत्पन्न करने का मुख्य माध्यम तारों का कंपन होता है।

(b) ध्वनि उत्पन्न करने की प्रक्रिया: तारों को खींचकर, पिढ़कर या झंकृत करके ध्वनि उत्पन्न की जाती है। तारों की संख्या, लंबाई, मोटाई और तनाव ध्वनि की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

(c) महत्व: तत् वाद्य भारतीय शास्त्रीय संगीत में रागों की विविधता और भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं। वीणा, सितार, सरोद आदि प्रमुख तत् वाद्य हैं।

(d) निष्कर्ष: तत् वाद्य संगीत की गहराई और विस्तार को बढ़ात

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