Sangeetकक्षा 11तबला एवं पखावज वाद्यों की उत्पत्ति एवं विकासहिंदी

तबला एवं पखावज वाद्यों की उत्पत्ति एवं विकास | Class 11 Sangeet Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 2 मिनट का पठन

तबला एवं पखावज वाद्यों की उत्पत्ति एवं विकास | Class 11 Sangeet Notes

तबला एवं पखावज वाद्यों की उत्पत्ति एवं विकास – this guide gives you a concise, exam-ready overview of तबला एवं पखावज वाद्यों की उत्पत्ति एवं विकास from Class 11 Sangeet, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

मनुष्य का अभिनव चिंतन

भरतकालीन मृदंग को इच्छित स्वरों में मिलाने के लिए मिट्टी (मुत्तिका) का लेपन किया जाता था। यदि मिट्टी उपलब्ध न हो तो गुड़ और चावल का लेप भी प्रयुक्त होता था। बाद में लौहचूर्ण का आविष्कार होने पर इसका प्रयोग तबला और पखावज दोनों में स्याही के लिए किया गया। पखावज के दाहिने मुख पर लौहचूर्ण युक्त स्याही लगाई जाती है, जिससे नादात्मकता में सुधार होता है। बायें मुख पर गेहूँ के आटे की पुलिका लगाई जाती है ताकि दोनों मुखों के स्वर संतुलित रहें। कार्यक्रम के बाद यह पुलिका हटा दी जाती है। इस अभिनव सोच से वाद्यों की ध्वनि गुणवत्ता में सुधार हुआ और संगीत में नादात्मकता का विकास हुआ।

🧪 Activity: शोध एवं विचार: पखावज के पूड़ी पर आटा लगाने का कारण और तबले की पूड़ी पर लौहचूर्ण लगाने के कारण बताइए।

🔗 Connection: यह अभिनव चिंतन तबला एवं पखावज के घरानों और परंपराओं की चर्चा से जुड़ता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तबला किस प्रकार का वाद्य यंत्र है?

दो ड्रमों का युग्म

पखावज का प्रयोग मुख्यतः किस शैली के संगीत में होता है?

ध्रुपद

तबला के दाहिने ड्रम को क्या कहते हैं?

ध्यान

पखावज की उत्पत्ति किस ग्रंथ में वर्णित वाद्यों से मानी जाती है?

नाट्यशास्त्र

इस अध्याय में महारत हासिल करें

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