तबला एवं पखावज वाद्यों पर बजने वाले वर्ण एवं बोल | Class 11 Sangeet Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 5 मिनट का पठन

तबला एवं पखावज वाद्यों पर बजने वाले वर्ण एवं बोल – this guide gives you a concise, exam-ready overview of तबला एवं पखावज वाद्यों पर बजने वाले वर्ण एवं बोल from Class 11 Sangeet, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
नाना पानसे
नाना पानसे का जन्म सतारा जनपद के वाई नामक स्थान के पास, बनधन (महाराष्ट्र) में हुआ था। उनकी जन्म तिथि के विषय में कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह निश्चित है कि वे उन्नीसवीं शताब्दी में रहे थे। उनका परिवार कीर्तनकारों का धार्मिक परिवार था, जिसके साथ पखावज की संगति हुआ करती थी।
पखावज पर हाथ रखना सर्वप्रथम उनके पिता ने सिखाया। बाद में उन्होंने पुणे के मान्याबा कोडीतकर, चौन्डे बुवा, मार्तंड बुवा, बाबू जोध सिंह और योगीराज माधव स्वामी से पखावज की शिक्षा ग्रहण की। कुछ लोगों का मानना है कि उनका वास्तविक नाम नारायण थोरपे था। घर में पुकारने का नाम नाना था और पाँच सौ लोगों को तबला एवं पखावज सिखाने के कारण उनके नाम के साथ 'पानसे' शब्द जुड़ गया।
नाना जीवन भर इंदौर के राज दरबार से जुड़े रहे। कई अन्य राजाओं ने उन्हें अपने दरबार में आमंत्रित किया, लेकिन नाना जीवनपर्यंत इंदौर में ही रहे। इंदौर के कृष्णपुरा मोहल्ले की गली को आज भी पानसे गली के नाम से जाना जाता है।
अपने शांत, सौम्य और निराभमानी स्वभाव के कारण नाना पानसे ने न तो किसी के साथ सांगीतिक प्रतियोगिता की और न किसी को पराजित किया। वे पखावज के साथ-साथ तबला वादन में भी निपुण थे। उन्होंने पखावज वादन की शैली में अनेक सुधारात्मक प्रयोग किए और अनेक रचनाएँ भी रचीं।
प्राचीन शास्त्रीय ग्रंथों के आधार पर उन्होंने कई तालों के ठेकों का नवीनीकरण किया। अँगुलियों पर मात्रा गिनने की परंपरा भी नाना ने ही आरंभ की। उन्होंने पखावज, तबला और कथक नृत्य तीनों में शिष्यों को तैयार किया। 'सुदर्शन' नामक एक नवीन ताल की रचना भी उनकी ही है।
नाना पानसे की रचनाओं में पखावज और तबले की निकटता सहज ही दिखती है। उनके द्वारा रचित बोल मधुर, कर्णप्रिय और कम परिश्रम से द्रुत गति में बजने योग्य हैं। उनकी परंपरा की रचनाएँ चमत्कारी और चित्ताकर्षक हैं। तकतक, धुमकिट, कीटितक, पिड़नग, तिरकिट, तगिन्न और गदिगन जैसे बोल उनकी रचनाओं में प्रमुख हैं।
मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में आज जो पखावज बज रहा है, उसका बड़ा श्रेय नाना पानसे और उनके सैकड़ों शिष्यों को जाता है।
📊 Diagram: Reprint 2026-27
🧪 Activity: विद्यार्थी नाना पानसे के जीवन और संगीत योगदान पर निबंध लिखें।
🔗 Connection: यह अध्याय तबला एवं पखावज वाद्यों के वर्णों और बोलों के अभ्यास तथा सांस्कृतिक महत्व के समापन के साथ समाप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. निम्नलिखित वर्णों के निकास की विधि लिखिए— - ति, तिं, दी, र, न, गे, कि, कत्
प्रत्येक वर्ण के निकास की विधि तबले एवं पखावज वाद्यों पर बजने के दौरान उनके ध्वनिक स्वरूप और तालबद्धता के अनुसार होती है। उदाहरण स्वरूप:
- ति: ता और इ की संयुक्त ध्वनि, ता के बाद हल्की इ ध्वनि।
- तिं: ति के साथ नासिक्य ध्वनि।
- दी: दी की ध्वनि जिसमें द और ई की संयुक्तता होती है।
- र: र की स्पष्ट और तीव्र ध्वनि।
- न: न की नासिक्य ध्वनि।
- गे: ग और ए की संयुक्त ध्वनि।
- कि: क और इ की संयुक्त ध्वनि।
- कत्: क और त् की संयुक्त ध्वनि।
इन वर्णों के निकास में ताल, गति और वाद्य के विभिन्न भागों का प्रयोग
2. तबले और डगो पर बजाए जाने वाले निम्नलिखित बोलों के निकास की विधि लिखिए— - तिर, तिरकिट, गदिगन, चिड़नग, धागेतिट, चिटचिट, किटतक
प्रत्येक बोल का निकास तबले या डगो के विभिन्न भागों से होता है, जो ध्वनि की प्रकृति और ताल के अनुसार निर्धारित होता है। उदाहरण:
- तिर: ता और र की संयुक्त ध्वनि, जिसमें ता मैदान से और र लव से निकलती है।
- तिरकिट: तिर के बाद किट का संयोजन, जिसमें किट तबले की स्याही और मैदान से निकलता है।
- गदिगन: ग, दि, ग, न के संयोजन से बना बोल, जिसमें ग स्याही से, दि लव से, न नासिक्य ध्वनि के साथ बजता है।
- चिड़नग: चि, ड़, न, ग के संयोजन से, विभिन्न भागों से निकली ध्वनियाँ।
- धागेतिट: धा, गे, ति, ट के संयोजन से,
3. तबला और डगो के विविध स्थानों पर कौन-कौन से वर्ण बजते हैं? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण दीजिए— - (क) चाँट - (ख) लव - (ग) तबले की स्याही - (घ) डगो का मैदान
तबला और डगो के विभिन्न भागों पर बजने वाले वर्ण और उनके उदाहरण: (क) चाँट: तबले के किनारे पर बजने वाली हल्की ध्वनि। उदाहरण: तिट, टिट (ख) लव: तबले के किनारे का भाग जहाँ हल्की और तीव्र ध्वनि निकलती है। उदाहरण: तिर, तिरकिट (ग) तबले की स्याही: तबले के मध्य काले भाग से निकलने वाली गहरी और तीव्र ध्वनि। उदाहरण: धागे, गदिगन (घ) डगो का मैदान: डगो के सफेद भाग से निकलने वाली मध्यम तीव्रता की ध्वनि। उदाहरण: चिटचिट, किटतक
1. तबला वाद्य पर बजने वाले मूलतः 16 वर्ण माने जाते हैं। 2. ‘दी’ एक संयुक्त वर्ण है। 3. ‘ती’ वर्ण तबले की लव पर बजाया जाता है। 4. ‘तिट’ बोल डगो की स्याही पर बजने वाला बोल है। 5. ‘तिरकिट’ एक ऐसा बोल है जो तबला और डगो पर बजता है। 6. ‘तूना’ बोल सिर्फ तबले पर बजाया जाता है। 7. ‘क’ वर्ण तबले की स्याही पर बजने वाला वर्ण है। 8. बोल का अर्थ ही वर्ण होता है।
1. सही - तबला वाद्य पर मूलतः 16 वर्ण माने जाते हैं। 2. सही - ‘दी’ एक संयुक्त वर्ण है जिसमें दो ध्वनियाँ मिलती हैं। 3. सही - ‘ती’ वर्ण तबले की लव (किनारे) पर बजाया जाता है। 4. गलत - ‘तिट’ बोल डगो की स्याही पर नहीं बल्कि मैदान या लव पर बजता है। 5. सही - ‘तिरकिट’ ऐसा बोल है जो तबला और डगो दोनों पर बजता है। 6. सही - ‘तूना’ बोल केवल तबले पर बजाया जाता है। 7. सही - ‘क’ वर्ण तबले की स्याही पर बजने वाला वर्ण है। 8. गलत - बोल और वर्ण में अंतर होता है; बोल ताल और लय के अनुसार बजाए जाने वाले शब्द होते हैं
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