Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
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तबला एवं पखावज वाद्यों पर बजने वाले वर्ण एवं बोल
व्याख्यातबला एवं पखावज वाद्यों पर बजने वाले वर्ण एवं बोल
तबला और पखावज भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रमुख ताल वाद्य हैं, जिनका उपयोग संगीत की लयबद्धता और ताल की मधुरता को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इस अध्याय में हम तबला एवं पखावज वाद्यों पर बजने वाले वर्णों (ध्वनियों) और बोलों (ताल के पैटर्न) का विस्तृत अध्ययन करेंगे। तबला दो ड्रमों का युग्म होता है, जिसमें दायाँ तबला (छोटा ड्रम) और बायाँ तबला या डग्गा (बड़ा ड्रम) शामिल हैं। तबले पर कुल दस मूल वर्ण माने जाते हैं, जिनमें से छह वर्ण दाहिने तबले पर, दो वर्ण बायें तबले पर स्वतंत्र रूप से बजाए जाते हैं, जबकि दो वर्ण संयुक्त वर्ण होते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य वर्ण भी प्रयोग में लाए जाते हैं। बायें तबले पर दो मुख्य वर्ण होते हैं: कत/के/कि और घे/गे। दायें तबले पर छह वर्ण होते हैं: ता/ना, ति/ते, तु/तू, दी/थु/न/ता, ट/र, और तिं। इसके अलावा था और धिं दो संयुक्त वर्ण हैं जो दोनों तबलों के संयोजन से उत्पन्न होते हैं। प्रत्येक वर्ण तबले के विभिन्न भागों पर अलग-अलग तकनीकों से बजाए जाते हैं, जिससे विभिन्न स्वर उत्पन्न होते हैं। तबला वादन में वर्णों का सही उच्चारण और उनकी पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये ताल की लयबद्धता और संगीत की सुंदरता को निर्धारित करते हैं। पखावज भी एक प्रमुख ताल वाद्य है, जिसका आकार बेलनाकार होता है और दोनों सिरों पर चमड़े की त्वचा लगी होती है। पखावज के वर्ण तबले की तरह होते हैं, लेकिन इनके बजाने की विधि और ध्वनि में कुछ भिन्नता होती है। पखावज के चार मूल वर्ण हैं: ता, दीं, थुं, और ना। आधुनिक युग में पखावज के कुल सात वर्ण माने जाते हैं। इस अध्याय में हम तबला और पखावज के वर्णों के बजाने की विधि, उनके निकास, और ताल के विभिन्न बोलों का अध्ययन करेंगे। साथ ही, हम प्रसिद्ध पखावज वादकों और उनके योगदान को भी जानेंगे। यह ज्ञान विद्यार्थियों को ताल वाद्यों के स्वरूप और उनकी लयबद्धता को समझने में मदद करेगा।
- तबला दो ड्रमों का युग्म है: दायाँ तबला और बायाँ तबला (डग्गा)।
- तबले पर कुल दस मूल वर्ण होते हैं: छह दाहिने तबले पर, दो बायें तबले पर, और दो संयुक्त।
- बायें तबले के वर्ण: कत/के/कि और घे/गे।
- दायें तबले के वर्ण: ता/ना, ति/ते, तु/तू, दी/थु/न/ता, ट/र, तिं।
- पखावज के मूल चार वर्ण हैं: ता, दीं, थुं, और ना।
- संयुक्त वर्ण थे और धिं दोनों तबलों के संयोजन से उत्पन्न होते हैं।
- 📌 तबला: दो ड्रमों का युग्म, भारतीय शास्त्रीय संगीत का प्रमुख ताल वाद्य।
- 📌 पखावज: बेलनाकार ताल वाद्य, दोनों सिरों पर चमड़े की त्वचा लगी होती है।
- 📌 वर्ण: तबले या पखावज पर बजाई जाने वाली ध्वनियाँ।
दाहिने तबले पर निकलने वाले वर्ण
व्याख्यादाहिने तबले पर निकलने वाले वर्ण
दाहिने तबले पर कुल छह प्रमुख वर्ण बजाए जाते हैं, जिनके बजाने की विधि विशिष्ट होती है। ये वर्ण तबले के विभिन्न भागों पर अलग-अलग तकनीकों से बजाए जाते हैं, जिससे उनकी ध्वनि में भिन्नता आती है। 1. ता/ना: दाहिने तबले पर अनामिका (अनामिका = अनामिका अंगुली) को रखते हुए तर्जनी से तबले की चाँटी पर आघात करके उठाने से 'ता' या 'ना' ध्वनि उत्पन्न होती है। बजाते समय मध्यमा अंगुली ऊपर की ओर होती है। 2. तिं: अनामिका को रखते हुए तर्जनी से तबले के लव (तबले के किनारे का हिस्सा) पर आघात करने से 'तिं' की ध्वनि निकलती है। 3. ति/ते: मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अंगुलियों को जोड़कर तबले की स्याही के मध्य भाग पर दबा देने से 'ति' या 'ते' ध्वनि उत्पन्न होती है। 4. ट/र: तर्जनी से स्याही के मध्य भाग पर आघात करके दबा देने से 'ट' या 'र' ध्वनि उत्पन्न होती है। बजाते समय अन्य अंगुलियाँ ऊपर उठी होती हैं। 5. तूं/तू: तर्जनी से स्याही के किनारे पर आघात करने पर 'तूं' या 'तू' ध्वनि निकलती है। बजाते समय अंगुलियों का कोई हिस्सा तबले से नहीं छूना चाहिए। 6. न/ता/दी/थु: हाथ की चारों अंगुलियों को जोड़कर स्याही के शीर्ष भाग पर आघात करके उठाने से 'थुं' या 'दी' ध्वनि उत्पन्न होती है। इन वर्णों की सही तकनीक सीखना तबला वादन में अत्यंत आवश्यक है क्योंकि ये ताल की लयबद्धता और स्वर की विविधता को नियंत्रित करते हैं। प्रत्येक वर्ण की ध्वनि की पहचान और अभ्यास से संगीत की मधुरता बढ़ती है।
- ता/ना: तर्जनी से चाँटी पर आघात कर बजाया जाता है।
- तिं: तर्जनी से तबले के लव पर प्रहार।
- ति/ते: तीन अंगुलियों को जोड़कर स्याही के मध्य भाग पर दबाव।
- ट/र: तर्जनी से स्याही के मध्य भाग पर दबाव।
- तूं/तू: तर्जनी से स्याही के किनारे पर आघात।
- न/ता/दी/थु: चार अंगुलियों को जोड़कर स्याही के शीर्ष भाग पर प्रहार।
- 📌 चाँटी: तबले का वह भाग जहाँ तर्जनी से प्रहार किया जाता है।
- 📌 ल्यव: तबले का किनारा, जहाँ से 'तिं' ध्वनि निकलती है।
- 📌 स्याही: तबले के मध्य भाग पर लगी काली स्याही, जो ध्वनि को नियंत्रित करती है।
डगगे पर निकलने वाले वर्ण
व्याख्याडगगे पर निकलने वाले वर्ण
डग्गा, जिसे बायाँ तबला भी कहा जाता है, तबला युग्म का बड़ा ड्रम होता है। डग्गे पर दो मुख्य वर्ण बजाए जाते हैं, जिनकी बजाने की तकनीक विशिष्ट है: 1. कत/के/कि: बायें हाथ की कलाई को मैदान में रखते हुए चारों अंगुलियों को मिलाकर बायें तबले के किनारे पर आघा
अभ्यास प्रश्न — Chapter 3
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. निम्नलिखित वर्णों के निकास की विधि लिखिए— - ति, तिं, दी, र, न, गे, कि, कत्
उत्तर:
प्रत्येक वर्ण के निकास की विधि तबले एवं पखावज वाद्यों पर बजने के दौरान उनके ध्वनिक स्वरूप और तालबद्धता के अनुसार होती है। उदाहरण स्वरूप: - ति: ता और इ की संयुक्त ध्वनि, ता के बाद हल्की इ ध्वनि। - तिं: ति के साथ नासिक्य ध्वनि। - दी: दी की ध्वनि जिसमें द और ई की संयुक्तता होती है। - र: र की स्पष्ट और तीव्र ध्वनि। - न: न की नासिक्य ध्वनि। - गे: ग और ए की संयुक्त ध्वनि। - कि: क और इ की संयुक्त ध्वनि। - कत्: क और त् की संयुक्त ध्वनि। इन वर्णों के निकास में ताल, गति और वाद्य के विभिन्न भागों का प्रयोग होता है, जैसे स्याही, मैदान, लव आदि।
व्याख्या:
प्रत्येक वर्ण का निकास तबले या पखावज के विभिन्न भागों से होता है, जैसे स्याही (काला भाग), मैदान (सफेद भाग), लव (किनारा) आदि। ध्वनि की प्रकृति और ताल के अनुसार वादक इन वर्णों को बजाता है। उदाहरण के लिए, 'ति' में ता की तीव्रता और इ की हल्की ध्वनि होती है, जो तबले के मैदान से निकलती है। इसी प्रकार अन्य वर्णों के लिए भी अलग-अलग तकनीकें अपनाई जाती हैं।
Q2.2. तबले और डगो पर बजाए जाने वाले निम्नलिखित बोलों के निकास की विधि लिखिए— - तिर, तिरकिट, गदिगन, चिड़नग, धागेतिट, चिटचिट, किटतक
उत्तर:
प्रत्येक बोल का निकास तबले या डगो के विभिन्न भागों से होता है, जो ध्वनि की प्रकृति और ताल के अनुसार निर्धारित होता है। उदाहरण: - तिर: ता और र की संयुक्त ध्वनि, जिसमें ता मैदान से और र लव से निकलती है। - तिरकिट: तिर के बाद किट का संयोजन, जिसमें किट तबले की स्याही और मैदान से निकलता है। - गदिगन: ग, दि, ग, न के संयोजन से बना बोल, जिसमें ग स्याही से, दि लव से, न नासिक्य ध्वनि के साथ बजता है। - चिड़नग: चि, ड़, न, ग के संयोजन से, विभिन्न भागों से निकली ध्वनियाँ। - धागेतिट: धा, गे, ति, ट के संयोजन से, जिसमें ट तबले के मैदान से निकलता है। - चिटचिट: चि और ट के दोहराव से बना बोल। - किटतक: किट और तक के संयोजन से, जिसमें किट स्याही से और तक मैदान से निकलता है।
व्याख्या:
बोलों के निकास में तबले और डगो के विभिन्न भागों का प्रयोग होता है। स्याही से गहरी और तीव्र ध्वनि निकलती है, मैदान से मध्यम तीव्रता की ध्वनि, और लव से हल्की ध्वनि निकलती है। इन बोलों को बजाने के लिए वादक को सही स्थान और गति का ध्यान रखना होता है। उदाहरण के लिए, 'तिरकिट' में तिर मैदान से और किट स्याही से बजाया जाता है।
Q3.3. तबला और डगो के विविध स्थानों पर कौन-कौन से वर्ण बजते हैं? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण दीजिए— - (क) चाँट - (ख) लव - (ग) तबले की स्याही - (घ) डगो का मैदान
उत्तर:
तबला और डगो के विभिन्न भागों पर बजने वाले वर्ण और उनके उदाहरण: (क) चाँट: तबले के किनारे पर बजने वाली हल्की ध्वनि। उदाहरण: तिट, टिट (ख) लव: तबले के किनारे का भाग जहाँ हल्की और तीव्र ध्वनि निकलती है। उदाहरण: तिर, तिरकिट (ग) तबले की स्याही: तबले के मध्य काले भाग से निकलने वाली गहरी और तीव्र ध्वनि। उदाहरण: धागे, गदिगन (घ) डगो का मैदान: डगो के सफेद भाग से निकलने वाली मध्यम तीव्रता की ध्वनि। उदाहरण: चिटचिट, किटतक
व्याख्या:
तबले और डगो के विभिन्न भागों से निकलने वाली ध्वनियाँ उनके स्थान और बनावट के अनुसार भिन्न होती हैं। चाँट और लव पर हल्की और तीव्र ध्वनियाँ निकलती हैं, जबकि स्याही से गहरी और तीव्र ध्वनि निकलती है। डगो के मैदान से मध्यम तीव्रता की ध्वनि निकलती है। वादक इन भागों का सही उपयोग कर विभिन्न वर्णों को बजाता है।
Q4.1. तबला वाद्य पर बजने वाले मूलतः 16 वर्ण माने जाते हैं। 2. ‘दी’ एक संयुक्त वर्ण है। 3. ‘ती’ वर्ण तबले की लव पर बजाया जाता है। 4. ‘तिट’ बोल डगो की स्याही पर बजने वाला बोल है। 5. ‘तिरकिट’ एक ऐसा बोल है जो तबला और डगो पर बजता है। 6. ‘तूना’ बोल सिर्फ तबले पर बजाया जाता है। 7. ‘क’ वर्ण तबले की स्याही पर बजने वाला वर्ण है। 8. बोल का अर्थ ही वर्ण होता है।
उत्तर:
1. सही - तबला वाद्य पर मूलतः 16 वर्ण माने जाते हैं। 2. सही - ‘दी’ एक संयुक्त वर्ण है जिसमें दो ध्वनियाँ मिलती हैं। 3. सही - ‘ती’ वर्ण तबले की लव (किनारे) पर बजाया जाता है। 4. गलत - ‘तिट’ बोल डगो की स्याही पर नहीं बल्कि मैदान या लव पर बजता है। 5. सही - ‘तिरकिट’ ऐसा बोल है जो तबला और डगो दोनों पर बजता है। 6. सही - ‘तूना’ बोल केवल तबले पर बजाया जाता है। 7. सही - ‘क’ वर्ण तबले की स्याही पर बजने वाला वर्ण है। 8. गलत - बोल और वर्ण में अंतर होता है; बोल ताल और लय के अनुसार बजाए जाने वाले शब्द होते हैं जबकि वर्ण ध्वनि के स्वरूप होते हैं।
व्याख्या:
प्रत्येक कथन का विश्लेषण तबले एवं डगो वाद्यों के स्वरूप और बजाने की तकनीक के आधार पर किया गया है। उदाहरण के लिए, तबले पर 16 मूल वर्ण होते हैं जो विभिन्न ध्वनियों का निर्माण करते हैं। ‘दी’ संयुक्त वर्ण है क्योंकि इसमें दो ध्वनियाँ मिलती हैं। ‘तिट’ डगो की स्याही पर नहीं बजता, इसलिए वह कथन गलत है। इसी प्रकार अन्य कथनों का सही या गलत होना उनके संगीत सिद्धांतों पर आधारित है।
Q5.तबला वाद्य पर कुल कितने मूल वर्ण माने जाते हैं और इनमें से कितने वर्ण दाहिने तबले पर स्वतंत्र रूप से बजाए जाते हैं?
उत्तर:
10 वर्ण, जिनमें 6 दाहिने तबले पर
व्याख्या:
तबला वाद्य पर कुल 10 मूल वर्ण माने जाते हैं, जिनमें से 6 वर्ण दाहिने तबले पर स्वतंत्र रूप से बजाए जाते हैं।
Q6.चित्र 3.1 में बायें तबले के वर्ण दिखाए गए हैं। बायें तबले पर बजने वाले दो मुख्य वर्ण कौन-कौन से हैं? चित्र में बायें तबले के किनारे और स्याही के बीच के स्थान को दर्शाया गया है, जहाँ 'कत/के/कि' और 'घे/गे' वर्ण बजते हैं।
उत्तर:
कत/के/कि और घे/गे
व्याख्या:
बायें तबले पर दो मुख्य वर्ण होते हैं: कत/के/कि और घे/गे, जो चित्र 3.1 में बायें तबले के किनारे और स्याही के बीच बजाए जाते हैं।
Q7.तबले के दाहिने भाग पर बजने वाले छह वर्णों में से 'ता/ना' वर्ण बजाने की विधि क्या है?
उत्तर:
ता/ना वर्ण तबले के दाहिने भाग पर अनामिका को रखते हुए तर्जनी से तबले की चाँटी पर आघात करके उठाने से उत्पन्न होते हैं। बजाते समय मध्यमा अंगुली ऊपर की ओर होती है।
व्याख्या:
ता/ना वर्ण बजाने के लिए अनामिका अंगुली को तबले पर रखते हैं और तर्जनी से चाँटी पर आघात कर उसे उठाते हैं। इस क्रिया से 'ता' या 'ना' की ध्वनि उत्पन्न होती है। बजाते समय मध्यमा अंगुली ऊपर की ओर होनी चाहिए।
Q8.तर्जनी से तबले की स्याही के मध्य भाग में आघात करके दबा देने से कौन-कौन से वर्ण बजते हैं? दाहिने तबले पर मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अंगुलियों को जोड़कर दबाने से भी कौन-कौन से वर्ण उत्पन्न होते हैं?
उत्तर:
ति/ते और ट/र
व्याख्या:
तर्जनी से स्याही के मध्य भाग में आघात करके दबा देने पर 'ट' या 'र' ध्वनि उत्पन्न होती है। मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अंगुलियों को जोड़कर स्याही के मध्य भाग में दबाने से 'ति' या 'ते' ध्वनि उत्पन्न होती है।
Tabla evam Pakhawaj के सभी 8 अध्याय
Sangeet · Class 11