सत्त्वमाहो रजस्तमः | Class 11 Sanskrit Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

सत्त्वमाहो रजस्तमः – this guide gives you a concise, exam-ready overview of सत्त्वमाहो रजस्तमः from Class 11 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
सच्चमाहो रजस्तम:
इस अध्याय का आरंभ श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश से होता है, जो किसी विशेष जाति, धर्म, सम्प्रदाय अथवा देश के लिए सीमित नहीं है, बल्कि इसका उपदेश सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। गीता का संदेश जीवन के हर पक्ष के समुचित विकास हेतु है जिससे मनुष्य श्रेष्ठता और देवत्व की प्राप्ति कर सकता है। गीता को उपनिषदों के साररूप में माना गया है और इसमें जीवन के उच्चतम आदर्शों को सरल और सर्वसुलभ रूप में प्रस्तुत किया गया है। अर्जुन की हृदय की दुर्बलता पर विजय प्राप्ति का उदाहरण देते हुए पाठक को प्रेरित किया गया है कि गीता के उपदेशों का पालन कर ऐहिक और पारमार्थिक सुखों की प्राप्ति संभव है। इस खंड में गीता के दार्शनिक चिंतन, भक्तिवर्णन और कर्मनिष्ठा की महत्ता को भी बताया गया है, जिससे यह ग्रंथ विश्व में अत्यंत प्रतिष्ठित हो चुका है। इस प्रकार यह खंड गीता के महत्व और उसके सार्वभौमिक संदेश का परिचय कराता है।
📊 Diagram: Reprint 2026-27
🔗 Connection: यह परिचय अगले खंड में जीवों में व्याप्त स्वभावजन्य श्रद्धा तथा सत्त्व-रजस्-तमो गुणों के भेदों के वर्णन से जुड़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. एकपदेन उत्तरत। (क) श्रद्धा कतिविधा भवति? (ख) देहिनां का स्वभावजा भवति? (ग) आहार: कतिविधो भवति? (घ) दु:खशोकामयप्रदा: आहारा: कस्य इष्टा:? (ङ) कीदूशं वाक्यं वाङ्मयं तप उच्यते? (च) देशे काले पात्रे च दीयमानं कीदूशं दानं भवति? (छ) प्रत्युपकारार्थं यद्दानं तत् कीदूशं दानं कथ्यते? (ज) तामसं दानं पात्रेभ्य: दीयते अपात्रेभ्य: वा?
उत्तर: (क) श्रद्धा त्रिविधा भवति - सत्त्विका, राजसिका, तामसिका। (ख) देहिनां स्वभावजा सत्त्व, रज, तम इति गुणा: भवति। (ग) आहार: त्रिविधो भवति - सात्विक, राजसिक, तामसिक। (घ) दु:खशोकामयप्रदा: आहारा: तामसिकाः इष्टाः। (ङ) वाक्यं वाङ्मयं तप उच्यते यत् वाक्यं ज्ञानप्रदं, शुद्धं च भवति। (च) देशे काले पात्रे च दीयमानं दानं सात्विकं दानं भवति। (छ) प्रत्युपकारार्थं यद्दानं तत् राजसिकं दानं कथ्यते। (ज) तामसं दानं पात्रेभ्य: दीयते, अपात्रेभ्य: न।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत। (क) श्रद्धा कस्य अनुरूपा भवति? (ख) तामसा जना: कानू यजन्ते? (ग) के जना: दम्भाहंकारसंयुक्ता: भवन्ति? (घ) सात्विकप्रिया: आहारा: कीदूशा: भवन्ति? (ङ) किं किं शारीरं तप उच्यते? (च) राजसं दानं किम् उच्यते?
उत्तर: (क) श्रद्धा तस्य व्यक्तेः गुणानुरूपा भवति। (ख) तामसा जना: अधमं कर्म यजन्ते। (ग) दम्भाहंकारसंयुक्ता: ते जना: रजसिकाः भवन्ति। (घ) सात्विकप्रिया: आहारा: निर्मलाः, स्वास्थ्यकराः च भवन्ति। (ङ) शरीरं, वाक्यं, मनः च तप उच्यते। (च) राजसं दानं तत्त्वेन प्रेरितं, प्रत्युपकारार्थं दत्तं दानं भवति।
3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत। (क) अयं पुरूजं: श्रद्धामय: भवति। (ख) सात्विका: देवानु यजन्ते। (ग) पर्युषितं भोजनं तामसप्रियं भवति। (घ) शारीरं तप उच्यते। (ङ) वाङ्मयं तप उच्यते। (च) यद्दानम् अपात्रेभ्य: दीयते।
उत्तर: (क) श्रद्धामय: पुरूजं: कः भवति? (ख) को जना: सात्विका: देवानु यजन्ते? (ग) तामसप्रियं भोजनं किम् भवति? (घ) शारीरं किम् तप उच्यते? (ङ) वाङ्मयं किम् तप उच्यते? (च) अपात्रेभ्य: दानं किम् भवति?
4. प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत। प्रकृति: प्रत्यय: यथा-त्रिविधा - त्रिविध टाप् (क) सात्विकी - ... ... (ख) पर्युषितम् - ... ... (ग) सौम्यत्वम् - ... ... (घ) तप्तम् - ... ... (ङ) दातव्यम् - ... ... (च) उद्देश्य - ... ...
उत्तर: (क) सात्विकी - सत्त्व + इ (ख) पर्युषितम् - पर्युष् + इतम् (ग) सौम्यत्वम् - सौम्य + त्वम् (घ) तप्तम् - तप् + तम् (ङ) दातव्यम् - दा + त्व्यम् (च) उद्देश्य - उद् + देश्य
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