Sanskritकक्षा 11सत्त्वमाहो रजस्तमःहिंदी

सत्त्वमाहो रजस्तमः | Class 11 Sanskrit Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

सत्त्वमाहो रजस्तमः | Class 11 Sanskrit Notes

सत्त्वमाहो रजस्तमः – this guide gives you a concise, exam-ready overview of सत्त्वमाहो रजस्तमः from Class 11 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

जीवों में व्याप्त स्वभावजन्य श्रद्धा तथा सत्त्व-रजस्-तमो गुणोपेत भेद

इस खंड में जीवों में स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा के तीन प्रकारों का वर्णन है: सात्त्विकी, राजसी, और तामसी। श्रद्धा का यह त्रिविध स्वरूप जीवों के स्वभाव के अनुरूप होता है। सात्त्विकी श्रद्धा शुद्ध, स्थिर और ज्ञानयुक्त होती है, जो व्यक्ति को सत्य और धर्म की ओर ले जाती है। राजसी श्रद्धा क्रियाशील, उत्साही और कामनाओं से प्रेरित होती है, जो व्यक्ति को कर्मशील बनाती है लेकिन अस्थिरता और अहंकार भी उत्पन्न कर सकती है। तामसी श्रद्धा अज्ञानता, निष्क्रियता और भ्रम से युक्त होती है, जो व्यक्ति को आलस्य और उदासीनता की ओर ले जाती है। इस प्रकार श्रद्धा के ये तीन भेद जीवों के स्वभाव और मानसिक अवस्थाओं को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त, इन तीनों प्रकार की श्रद्धा से युक्त आहार, तप और दान के भेद भी वर्णित हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं में गुणों के प्रभाव को स्पष्ट करते हैं।

📊 Diagram: Reprint 2026-27

🔗 Connection: यह खंड अगले भाग में आहार, तप और दान के त्रिविध भेदों के वर्णन से जुड़ता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. एकपदेन उत्तरत। (क) श्रद्धा कतिविधा भवति? (ख) देहिनां का स्वभावजा भवति? (ग) आहार: कतिविधो भवति? (घ) दु:खशोकामयप्रदा: आहारा: कस्य इष्टा:? (ङ) कीदूशं वाक्यं वाङ्मयं तप उच्यते? (च) देशे काले पात्रे च दीयमानं कीदूशं दानं भवति? (छ) प्रत्युपकारार्थं यद्दानं तत् कीदूशं दानं कथ्यते? (ज) तामसं दानं पात्रेभ्य: दीयते अपात्रेभ्य: वा?

उत्तर: (क) श्रद्धा त्रिविधा भवति - सत्त्विका, राजसिका, तामसिका। (ख) देहिनां स्वभावजा सत्त्व, रज, तम इति गुणा: भवति। (ग) आहार: त्रिविधो भवति - सात्विक, राजसिक, तामसिक। (घ) दु:खशोकामयप्रदा: आहारा: तामसिकाः इष्टाः। (ङ) वाक्यं वाङ्मयं तप उच्यते यत् वाक्यं ज्ञानप्रदं, शुद्धं च भवति। (च) देशे काले पात्रे च दीयमानं दानं सात्विकं दानं भवति। (छ) प्रत्युपकारार्थं यद्दानं तत् राजसिकं दानं कथ्यते। (ज) तामसं दानं पात्रेभ्य: दीयते, अपात्रेभ्य: न।

2. पूर्णवाक्येन उत्तरत। (क) श्रद्धा कस्य अनुरूपा भवति? (ख) तामसा जना: कानू यजन्ते? (ग) के जना: दम्भाहंकारसंयुक्ता: भवन्ति? (घ) सात्विकप्रिया: आहारा: कीदूशा: भवन्ति? (ङ) किं किं शारीरं तप उच्यते? (च) राजसं दानं किम् उच्यते?

उत्तर: (क) श्रद्धा तस्य व्यक्तेः गुणानुरूपा भवति। (ख) तामसा जना: अधमं कर्म यजन्ते। (ग) दम्भाहंकारसंयुक्ता: ते जना: रजसिकाः भवन्ति। (घ) सात्विकप्रिया: आहारा: निर्मलाः, स्वास्थ्यकराः च भवन्ति। (ङ) शरीरं, वाक्यं, मनः च तप उच्यते। (च) राजसं दानं तत्त्वेन प्रेरितं, प्रत्युपकारार्थं दत्तं दानं भवति।

3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत। (क) अयं पुरूजं: श्रद्धामय: भवति। (ख) सात्विका: देवानु यजन्ते। (ग) पर्युषितं भोजनं तामसप्रियं भवति। (घ) शारीरं तप उच्यते। (ङ) वाङ्मयं तप उच्यते। (च) यद्दानम् अपात्रेभ्य: दीयते।

उत्तर: (क) श्रद्धामय: पुरूजं: कः भवति? (ख) को जना: सात्विका: देवानु यजन्ते? (ग) तामसप्रियं भोजनं किम् भवति? (घ) शारीरं किम् तप उच्यते? (ङ) वाङ्मयं किम् तप उच्यते? (च) अपात्रेभ्य: दानं किम् भवति?

4. प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत। प्रकृति: प्रत्यय: यथा-त्रिविधा - त्रिविध टाप् (क) सात्विकी - ... ... (ख) पर्युषितम् - ... ... (ग) सौम्यत्वम् - ... ... (घ) तप्तम् - ... ... (ङ) दातव्यम् - ... ... (च) उद्देश्य - ... ...

उत्तर: (क) सात्विकी - सत्त्व + इ (ख) पर्युषितम् - पर्युष् + इतम् (ग) सौम्यत्वम् - सौम्य + त्वम् (घ) तप्तम् - तप् + तम् (ङ) दातव्यम् - दा + त्व्यम् (च) उद्देश्य - उद् + देश्य

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