सूक्तयः | Class 10 Sanskrit Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

सूक्तयः – this guide gives you a concise, exam-ready overview of सूक्तयः from Class 10 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
सूक्तियों के अर्थ और व्याख्या
इस अनुभाग में सूक्तियों के गूढ़ अर्थों को विस्तार से समझाया गया है। प्रत्येक सूक्ति का शाब्दिक और भावार्थ दोनों रूपों में विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। उदाहरण के लिए, 'पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्' का शाब्दिक अर्थ है कि पिता अपने पुत्र को बाल्यकाल में बड़ा विद्याधन देता है। भावार्थ यह है कि शिक्षा और ज्ञान ही सबसे बड़ा धन है जो पिता अपने पुत्र को देता है। इसी प्रकार, 'अवक्रता यथा चिले तथा वाचि भवेद् यदि' का अर्थ है कि जैसे चील की उड़ान सीधी होती है, वैसे ही वाणी भी सरल और स्पष्ट होनी चाहिए। इस प्रकार की सूक्तियाँ जीवन के व्यवहारिक और नैतिक पक्षों को सरल भाषा में समझाती हैं। प्रत्येक श्लोक के भावार्थ को समझकर विद्यार्थी अपने जीवन में उन सिद्धांतों को आत्मसात कर सकते हैं। इस अनुभाग में शब्दार्थ भी दिए गए हैं, जो कठिन शब्दों के अर्थ स्पष्ट करते हैं, जिससे सूक्तियों का सही अर्थ ग्रहण होता है।
📊 Diagram: Table on page 2 (14×4) में सूक्तियों में प्रयुक्त विशेष शब्दों के अर्थ दिए गए हैं।
🧪 Activity: विद्यार्थियों को सूक्तियों के अर्थ लिखने और उनके भावार्थ पर चर्चा करने के लिए गतिविधियाँ दी गई हैं।
🔗 Connection: यह अनुभाग सूक्तियों के व्याकरणिक नियम और प्रयोग से जुड़ता है।
Table on page 2 (14×4)
| तेपे | - तपस्याम् अकरोत् | - उसने तपस्या की | - Performed penance |
|---|---|---|---|
| अवक्रता | - न वक्रता/ऋजुता | - सरलता | - Simplicity |
| वाचि | - वाण्याम् | - वाणी में | - In the speech |
| तथ्यतः | - यथार्थरूपेण | - वास्तव में | - Actually |
| परुषाम् | - कठोराम् | - कठोर | - Harsh |
| अभ्युदीरयेत् | - वदेत् | - बोलना चाहिए | - He/she may say |
| विमूढधीः | - मूर्खः/बुद्धिहीनः | - अज्ञानी/नासमझ | - A fool |
| वाक्पटु: | - वाचि/सम्भाषणे पटु: | - सम्भाषण/वार्तालाप में चतुर | - Eloquent |
| चक्षुष्मन्तः | - नेत्रवन्तः | - नेत्रों से युक्त | - Having eyes |
| वदने | - आनने/मुखे | - मुख पर | - On the face |
| ईरितः | - कथितः | - कहा गया | - Said |
| परिभूयते | - तिरस्क्रियते/अवमान्यते | - अपमानित किया जाता है | - Gets insulted |
| अकातरः | - वीरः/साहसी | - निर्भीक | - Fearless |
| श्रेयः | - कल्याणम् | - कल्याण | - Wellness |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. एकपदेन उत्तरं लिखत- (क) पिता पुत्राय बाल्ये किं यच्छति? (ख) विमूढधी: कीदृष्टीं वाचं परित्यजति? (ग) अस्मिन् लोके के एव चक्षुष्मन्त: प्रकीर्तिता:? (घ) प्राणेभ्योऽपि क: रक्षणीय:? (ङ) आत्मन: श्रेय: इच्छन् नर: कीदृशं कर्म न कुर्यात्? (च) वाचि का भवेत्?
उत्तर- (क) पिता पुत्राय बाल्ये विद्याधनं यच्छति। (ख) विमूढधी: मूढदृष्टिं वाचं परित्यजति। (ग) अस्मिन् लोके विद्वांस: एव चक्षुष्मन्त: प्रकीर्तिता:। (घ) प्राणेभ्योऽपि आत्मा रक्षणीय:। (ङ) आत्मन: श्रेय: इच्छन् नर: परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्। (च) वाचि सत्यं भवेत्।
2. उदाहरणानुसारं स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत- यथा- विमूढधी: पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्कते। क: पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्कते। (क) संसारे विद्वांस: ज्ञानचक्षुर्भि: नेत्रवन्त: कथ्यन्ते। (ख) जनकेन सुताय शैशवे विद्याधनं दीयते। (ग) तत्त्वार्थस्य निर्णय: विवेकेन कर्तुं शक्य:। (घ) धैर्यवान् लोके परिभवं न प्राप्नोति। (ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नर: परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्।
प्रश्ननिर्माण- (क) क: संसारे विद्वांस: ज्ञानचक्षुर्भि: नेत्रवन्त: कथ्यन्ते? (ख) जनकेन सुताय शैशवे किं दीयते? (ग) तत्त्वार्थस्य निर्णयं कथं कर्तुं शक्यं? (घ) धैर्यवान् कस्य लोके परिभवं न प्राप्नोति? (ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नर: परेषाम् किं न कुर्यात्?
3. पाठात् चित्वा अधोलिखितानां श्लोकानाम् अन्वयम् उचितपदक्रमेण पूर्यत- (क) पिता --- बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति, अस्य पिता किं तप: तेपे इत्युक्ति: --- (ख) येन --- यत् प्रोक्तं तस्य तत्त्वार्थनिर्णय: येन कर्तु --- भवेत्, स: --- इति ---। (ग) य आत्मन: श्रेय: __________ सुखानि च इच्छति, परेभ्य: अहितं __________ कदापि च न _________.
(क) पिता बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति। अस्य पिता तप: तेपे इत्युक्ति: तपस्यते। (ख) येन तत्त्वार्थनिर्णय: प्रोक्तं तस्य कर्तुं शक्य: भवेत्, स: विवेकी इति कथ्यते। (ग) य आत्मन: श्रेय: इच्छति सुखानि च, परेभ्य: अहितं कदापि च न कुर्यात्।
4. अधोलिखितम् उदाहरणद्वयं पठित्वा अन्येषां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत– प्रश्ना: उत्तराणि क. श्लोक संख्या - 3 यथा- सत्या मधुरा च वाणी का? धर्मप्रदा (क) धर्मप्रदां वाचं क: त्यजति? (ख) मूढ: पुरुष: कां वाणी वदति? (ग) मन्दमति: क्रीडुशं फलं खादति? ख. श्लोक संख्या - 7 यथा- बुद्धिमान् नर: किम् इच्छति? आत्मन: श्रेय: (क) कियन्ति सुखानि इच्छति? (ख) स: कदापि किं न कुर्यात? (ग) स: केभ्य: अहितं न कुर्यात?
क. श्लोक संख्या - 3 (क) धर्मप्रदां वाचं मूढ: पुरुष: त्यजति। (ख) मूढ: पुरुष: मिथ्या वाणी वदति। (ग) मन्दमति: क्रीडुशं फलं खादति।
ख. श्लोक संख्या - 7 (क) स: अनेकानि सुखानि इच्छति। (ख) स: कदापि परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्। (ग) स: परेषाम् अहितं न कुर्यात।
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