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Chapter 8

🎓 Class 10📖 Shemushi📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट
Chapter 7अध्याय 8 / 10Chapter 9

Chapter 8अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

सूक्तयः - परिचय

व्याख्या

सूक्तयः - परिचय

सूक्तयः संस्कृत साहित्य में संक्षिप्त, सारगर्भित और गूढ़ वाक्यांश होते हैं जो जीवन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों, नैतिकताओं और व्यवहारों को संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं। इस अध्याय में प्रस्तुत सूक्तयः मूलतः तमिल भाषा के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'तिरुङ्कुरल्' से लिए गए हैं, जिसे तमिल भाषा का वेद कहा जाता है। इस ग्रन्थ के प्रणेता तिरुवल्लुवर हैं, जिनका काल प्रथम शताब्दी माना जाता है। तिरुङ्कुरल् तीन भागों में विभक्त है - धर्म, अर्थ और काम। 'तिरु' शब्द का अर्थ है 'श्रीवाचक' अर्थात् 'श्रिया युक्त', अतः तिरुङ्कुरल् का अर्थ है 'श्रिया युक्त वाणी'। इस ग्रन्थ में मानव जीवन के लिए उपयोगी सत्य और सरस बोधगम्य पद्य प्रस्तुत किए गए हैं। सूक्तयः जीवन के व्यवहार, आचार, और नैतिक मूल्यों को सरल एवं प्रभावशाली भाषा में व्यक्त करते हैं। इस अध्याय के श्लोक सरल, सारगर्भित और प्रेरणादायक हैं, जो विद्यार्थियों को जीवन में सदाचार, ज्ञान, और विवेक की ओर प्रेरित करते हैं।

  • सूक्तयः संक्षिप्त और सारगर्भित वाक्यांश होते हैं।
  • यह तमिल ग्रन्थ तिरुङ्कुरल् से लिए गए हैं।
  • तिरुवल्लुवर प्रथम शताब्दी के महान कवि हैं।
  • तिरुङ्कुरल् को तमिल भाषा का वेद कहा जाता है।
  • ग्रन्थ तीन भागों में विभक्त है: धर्म, अर्थ, काम।
  • सूक्तयः जीवन के नैतिक और व्यवहारिक सिद्धांतों को सरल भाषा में प्रस्तुत करते हैं।
  • 📌 सूक्तिः - सारगर्भित, संक्षिप्त वाक्यांश जो जीवन के सिद्धांत बताते हैं।
  • 📌 तिरुङ्कुरल् - तमिल भाषा का प्रसिद्ध ग्रन्थ, जिसे वेद कहा जाता है।
  • 📌 तिरुवल्लुवर - तिरुङ्कुरल् के प्रणेता।

सूक्तियों का व्याकरणिक विश्लेषण

व्याख्या

सूक्तियों का व्याकरणिक विश्लेषण

सूक्तियों का व्याकरणिक विश्लेषण संस्कृत भाषा की गहराई को समझने में सहायक होता है। इस भाग में सूक्तियों में प्रयुक्त शब्दों के रूप, कारक, समास, तत्पुरुष, बहुब्रीहि जैसे व्याकरणिक तत्वों का विवेचन किया गया है। उदाहरण स्वरूप, 'पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्' में 'पिता' कर्ता कारक है, 'पुत्राय' को दातृ कारक में रखा गया है, और 'विद्याधनं महत्' कर्म कारक है। समासों की दृष्टि से सूक्तियों में तत्पुरुष समास (जैसे 'तत्त्वार्थनिर्णयः') और बहुब्रीहि समास (जैसे 'महानात्मा') का प्रयोग होता है। तत्पुरुष समास में पहला पद दूसरे पद का विशेषण होता है, जबकि बहुब्रीहि समास में समासबद्ध शब्द का अर्थ पदों के सामान्य अर्थ से भिन्न होता है। व्याकरणिक नियमों के अनुसार, सूक्तियों में शब्दों का संधि, समास, प्रत्यय, और कारक प्रयोग अत्यंत सटीक होता है, जो उनकी भाषा की सुंदरता और अर्थ की गहराई को बढ़ाता है। इस प्रकार का विश्लेषण विद्यार्थियों को संस्कृत व्याकरण की समझ को मजबूत करता है और सूक्तियों के सही अर्थ ग्रहण में मदद करता है। **Table on page 6 (8×3)** | विग्रहः | समस्तपदम् | समासनाम | | --- | --- | --- | | (क) तत्वार्थस्य निर्णयः | --- | पष्ठी तत्पुरुषः | | (ख) वाचि पटुः | --- | सप्तमी तत्पुरुषः | | (ग) धर्म प्रददाति इति (ताम्) | --- | उपपदतत्पुरुषः | | (घ) न कातरः | --- | नञ् तत्पुरुषः | | (ङ) न हितम् | --- | नञ् तत्पुरुषः | | (च) महान् आत्मा येषाम् | --- | बहुब्रीहिः | | (छ) विमूढा धीः यस्य सः | --- | बहुब्रीहिः | **Table on page 6 (6×3)** | लोचनम् | नेत्रम् | भूरि | | --- | --- | --- | | शुभम् | परिषद् | मानसम् | | मनः | सभा | नयनम् | | आननम् | चेतः | विपुलम् | | संसद् | बहु | वक्त्रम् | | वदनम् | शिवम् | कल्याणम् |

  • सूक्तियों में संस्कृत व्याकरण के नियमों का सटीक पालन होता है।
  • समासों में तत्पुरुष और बहुब्रीहि समास प्रमुख हैं।
  • तत्पुरुष समास में पहला पद दूसरे पद का विशेषण होता है।
  • बहुब्रीहि समास में समासबद्ध शब्द का अर्थ सामान्य अर्थ से भिन्न होता है।
  • शब्दों के रूप, कारक, प्रत्यय का सही प्रयोग सूक्तियों की भाषा को प्रभावशाली बनाता है।
  • व्याकरणिक विश्लेषण से सूक्तियों के गूढ़ अर्थ समझने में सहायता मिलती है।
  • 📌 तत्पुरुष समास - ऐसा समास जिसमें पहला पद दूसरे पद का विशेषण हो।
  • 📌 बहुब्रीहि समास - ऐसा समास जिसका अर्थ पदों के सामान्य अर्थ से भिन्न हो।
  • 📌 कारक - संस्कृत व्याकरण में शब्दों के सम्बन्ध को दर्शाने वाला तत्व।

सूक्तियों के अर्थ और व्याख्या

व्याख्या

सूक्तियों के अर्थ और व्याख्या

इस अनुभाग में सूक्तियों के गूढ़ अर्थों को विस्तार से समझाया गया है। प्रत्येक सूक्ति का शाब्दिक और भावार्थ दोनों रूपों में विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। उदाहरण के लिए, 'पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्' का शाब्दिक अर्थ है कि पिता अपने पुत्र

अभ्यास प्रश्नChapter 8

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. एकपदेन उत्तरं लिखत- (क) पिता पुत्राय बाल्ये किं यच्छति? (ख) विमूढधी: कीदृष्टीं वाचं परित्यजति? (ग) अस्मिन् लोके के एव चक्षुष्मन्त: प्रकीर्तिता:? (घ) प्राणेभ्योऽपि क: रक्षणीय:? (ङ) आत्मन: श्रेय: इच्छन् नर: कीदृशं कर्म न कुर्यात्? (च) वाचि का भवेत्?

उत्तर:

उत्तर- (क) पिता पुत्राय बाल्ये विद्याधनं यच्छति। (ख) विमूढधी: मूढदृष्टिं वाचं परित्यजति। (ग) अस्मिन् लोके विद्वांस: एव चक्षुष्मन्त: प्रकीर्तिता:। (घ) प्राणेभ्योऽपि आत्मा रक्षणीय:। (ङ) आत्मन: श्रेय: इच्छन् नर: परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्। (च) वाचि सत्यं भवेत्।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पाठ के अनुसार एकपदेन दिया गया है। पिता पुत्राय बाल्ये विद्याधनं यच्छति, विमूढधी: मूढदृष्टिं वाचं त्यजति, विद्वांस: चक्षुष्मन्त: कहलाते हैं, प्राणों से भी आत्मा रक्षित करनी चाहिए, और जो अपने हित की कामना करता है वह दूसरों के अहित का कार्य नहीं करता। वाणी सत्य होनी चाहिए।

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Q2.2. उदाहरणानुसारं स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत- यथा- विमूढधी: पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्कते। क: पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्कते। (क) संसारे विद्वांस: ज्ञानचक्षुर्भि: नेत्रवन्त: कथ्यन्ते। (ख) जनकेन सुताय शैशवे विद्याधनं दीयते। (ग) तत्त्वार्थस्य निर्णय: विवेकेन कर्तुं शक्य:। (घ) धैर्यवान् लोके परिभवं न प्राप्नोति। (ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नर: परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्।

उत्तर:

प्रश्ननिर्माण- (क) क: संसारे विद्वांस: ज्ञानचक्षुर्भि: नेत्रवन्त: कथ्यन्ते? (ख) जनकेन सुताय शैशवे किं दीयते? (ग) तत्त्वार्थस्य निर्णयं कथं कर्तुं शक्यं? (घ) धैर्यवान् कस्य लोके परिभवं न प्राप्नोति? (ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नर: परेषाम् किं न कुर्यात्?

व्याख्या:

प्रत्येक वाक्य से प्रश्न बनाना है। उदाहरणानुसार, स्थूलपदानि (मुख्य शब्द) लेकर प्रश्न बनाए गए हैं। जैसे संसारे विद्वांस: ज्ञानचक्षुर्भि: नेत्रवन्त: कथ्यन्ते से प्रश्न क: संसारे विद्वांस: ज्ञानचक्षुर्भि: नेत्रवन्त: कथ्यन्ते? आदि।

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Q3.3. पाठात् चित्वा अधोलिखितानां श्लोकानाम् अन्वयम् उचितपदक्रमेण पूर्यत- (क) पिता --- बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति, अस्य पिता किं तप: तेपे इत्युक्ति: --- (ख) येन --- यत् प्रोक्तं तस्य तत्त्वार्थनिर्णय: येन कर्तु --- भवेत्, स: --- इति ---। (ग) य आत्मन: श्रेय: __________ सुखानि च इच्छति, परेभ्य: अहितं __________ कदापि च न _________.

उत्तर:

(क) पिता बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति। अस्य पिता तप: तेपे इत्युक्ति: तपस्यते। (ख) येन तत्त्वार्थनिर्णय: प्रोक्तं तस्य कर्तुं शक्य: भवेत्, स: विवेकी इति कथ्यते। (ग) य आत्मन: श्रेय: इच्छति सुखानि च, परेभ्य: अहितं कदापि च न कुर्यात्।

व्याख्या:

श्लोकों के अनुसार उचित पदक्रम में शब्दों को भरना है। (क) पिता बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति। (ख) तत्त्वार्थनिर्णय: विवेकेन कर्तुं शक्य:। (ग) आत्मन: श्रेय: इच्छन् नर: परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्।

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Q4.4. अधोलिखितम् उदाहरणद्वयं पठित्वा अन्येषां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत– प्रश्ना: उत्तराणि क. श्लोक संख्या - 3 यथा- सत्या मधुरा च वाणी का? धर्मप्रदा (क) धर्मप्रदां वाचं क: त्यजति? (ख) मूढ: पुरुष: कां वाणी वदति? (ग) मन्दमति: क्रीडुशं फलं खादति? ख. श्लोक संख्या - 7 यथा- बुद्धिमान् नर: किम् इच्छति? आत्मन: श्रेय: (क) कियन्ति सुखानि इच्छति? (ख) स: कदापि किं न कुर्यात? (ग) स: केभ्य: अहितं न कुर्यात?

उत्तर:

क. श्लोक संख्या - 3 (क) धर्मप्रदां वाचं मूढ: पुरुष: त्यजति। (ख) मूढ: पुरुष: मिथ्या वाणी वदति। (ग) मन्दमति: क्रीडुशं फलं खादति। ख. श्लोक संख्या - 7 (क) स: अनेकानि सुखानि इच्छति। (ख) स: कदापि परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्। (ग) स: परेषाम् अहितं न कुर्यात।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर श्लोकों के भावानुसार दिया गया है। श्लोक 3 में धर्मप्रदां वाचं मूढ: पुरुष: त्यजति, मन्दमति: क्रीडुशं फलं खादति। श्लोक 7 में बुद्धिमान् नर: अनेकानि सुखानि इच्छति, परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात्।

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Q5.5. मञ्जूषाया: तद्भावात्मकसूक्ती: विचित्य अधोलिखितकथनानां समक्षं लिखत– (क) विद्याधनं महत् (ख) आचार: प्रथमो धर्म: (ग) चित्ते वाचि च अवक्रता एव समत्वम्

उत्तर:

(क) विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्। विद्याधनं धनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरुद्धनम्। (ख) आचार: प्रथमो धर्म:। आचारप्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणाः। (ग) चित्ते वाचि च अवक्रता एव समत्वम्। मनसि एकं वचसि एकं कर्मणि एकं महात्मनाम्।

व्याख्या:

प्रत्येक कथन का भावार्थ विस्तार से लिखा गया है। विद्याधनं सर्वधनप्रधानं है और इसका मूल अन्य धन से अलग है। आचार धर्म का प्रथम आधार है और आचार से धर्म उत्पन्न होता है। चित्त, वाणी और कर्म में अवक्रता (सत्यता, सरलता) ही समत्व है।

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Q6.6. (अ) अधोलिखितानां शब्दानां पुरतः उचितं विलोमशब्दं कोष्ठकात् चित्वा लिखत– शब्दाः             विलोमशब्दाः: (क) पक्वः                 (परिपक्वः, अपक्वः, क्वथितः) (ख) विमूढधीः                 (सुधीः, निधिः, मन्दधीः) (ग) कातरः                    (अकरुणः, अधीरः, अकातरः) (घ) कृतज्ञता                     (कृपणता, कृतघ्नता, कातरता) (ङ) आलस्यम्                        (उद्विग्नता, विलासिता, उद्योगः) (च) परुषा                           (पौरुषी, कोमला, कठोरा) (आ) अधोलिखितानां शब्दानां त्रयः समानार्थकाः शब्दाः मञ्जूषायाः चित्वा लिख्यन्ताम्— (क) प्रभूतम्

उत्तर:

(अ) (क) पक्वः - अपक्वः (ख) विमूढधीः - सुधीः (ग) कातरः - अकातरः (घ) कृतज्ञता - कृतघ्नता (ङ) आलस्यम् - उद्योगः (च) परुषा - कोमला (आ) (क) प्रभूतम् के समानार्थक शब्द हैं: भूरि, विपुलम्, बहु।

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द के लिए उपयुक्त विलोम शब्द को कोष्ठक से चुनकर लिखा गया है। समानार्थक शब्द मञ्जूषा से चुने गए हैं जैसे प्रभूतम् के लिए भूरि, विपुलम्, बहु।

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Q7.7. अधस्तात् समासविग्रहा: दीयन्ते तेषां समस्तपदानि पाठाधारेण दीयन्ताम् – | विग्रहः | समस्तपदम् | समासनाम | | --- | --- | --- | | (क) तत्वार्थस्य निर्णयः | --- | पष्ठी तत्पुरुषः | | (ख) वाचि पटुः | --- | सप्तमी तत्पुरुषः | | (ग) धर्म प्रददाति इति (ताम्) | --- | उपपदतत्पुरुषः | | (घ) न कातरः | --- | नञ् तत्पुरुषः | | (ङ) न हितम् | --- | नञ् तत्पुरुषः | | (च) महान् आत्मा येषाम् | --- | बहुब्रीहिः | | (छ) विमूढा धीः यस्य सः | --- | बहुब्रीहिः |

उत्तर:

(क) तत्वार्थस्य निर्णयः - तत्वार्थनिर्णयः (ख) वाचि पटुः - वाचिपटुः (ग) धर्म प्रददाति इति (ताम्) - धर्मप्रददाति (घ) न कातरः - न कातरः (ङ) न हितम् - न हितम् (च) महान् आत्मा येषाम् - महानात्मा येषाम् (छ) विमूढा धीः यस्य सः - विमूढाधीः यस्य सः

व्याख्या:

प्रत्येक समासविग्रह का समस्तपद पाठ के अनुसार दिया गया है। समास के नाम भी निर्दिष्ट हैं जैसे पष्ठी तत्पुरुषः, सप्तमी तत्पुरुषः, उपपदतत्पुरुषः, नञ् तत्पुरुषः, बहुब्रीहिः।

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Q8.सूक्तयः नामक अध्याय में 'तिरुङ्कुरल्' ग्रन्थ का प्रणेता कौन है और इसका काल कौन सा माना जाता है?
A.A) तिरुवल्लुवर, प्रथम शताब्दी
B.B) वाल्मीकि, द्वितीय शताब्दी
C.C) व्यास, तीसरी शताब्दी
D.D) कालिदास, चौथी शताब्दी

उत्तर:

तिरुवल्लुवर, प्रथम शताब्दी

व्याख्या:

तिरुङ्कुरल् ग्रन्थ के प्रणेता तिरुवल्लुवर हैं और इसका काल प्रथम शताब्दी माना जाता है। यह तमिल भाषा का वेद कहलाता है।

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