Chapter 10
Chapter 10 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 12 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
परिचय
व्याख्यापरिचय
इस अध्याय की शुरुआत भारतीय संविधान के राजनीतिक दर्शन को समझने के प्रयास से होती है। संविधान केवल कानूनों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक विचारधारा, मूल्यों और आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है। स्वतंत्रता संग्राम के बाद संविधान को अपनाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई, यह समझना आवश्यक है। संविधान सभा की बहसों का अध्ययन इसलिए जरूरी है ताकि हम संविधान के पीछे छिपे आदर्शों, नैतिक दृष्टिकोण और राजनीतिक दर्शन को समझ सकें। इस अध्याय में हम यह जानेंगे कि संविधान के अंतर्निहित दर्शन को समझना क्यों आवश्यक है, भारतीय संविधान की मूलभूत विशेषताएँ क्या हैं, इसकी आलोचनाएँ और सीमाएँ क्या हैं। संविधान के राजनीतिक दर्शन को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह हमें संविधान के नियमों के पीछे छिपे नैतिक और राजनीतिक तर्कों को जानने में मदद करता है।
- संविधान केवल नियमों का संग्रह नहीं, बल्कि एक विचारधारा है।
- संविधान सभा की बहसों का अध्ययन संविधान के दर्शन को समझने में सहायक है।
- संविधान के पीछे छिपे आदर्श और नैतिक दृष्टिकोण को समझना आवश्यक है।
- भारतीय संविधान की मूलभूत विशेषताएँ, आलोचनाएँ और सीमाएँ इस अध्याय में समझी जाएंगी।
- 📌 संविधान: एक लिखित दस्तावेज जो देश के शासन और समाज के नियमों को निर्धारित करता है।
- 📌 राजनीतिक दर्शन: राजनीतिक सिद्धांत और मूल्य जो संविधान के पीछे काम करते हैं।
संविधान के दर्शन का क्या आशय है?
व्याख्यासंविधान के दर्शन का क्या आशय है?
संविधान के दर्शन का आशय है संविधान के पीछे छिपे नैतिक, राजनीतिक और सामाजिक मूल्यों को समझना। कुछ लोग संविधान को केवल कानूनी दस्तावेज मानते हैं, लेकिन संविधान में कई ऐसे कानून होते हैं जो हमारे मूल्यों और आदर्शों से जुड़े होते हैं, जैसे समानता का अधिकार। इसलिए संविधान को केवल कानूनों के रूप में नहीं, बल्कि एक नैतिक दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है। संविधान के राजनीतिक दर्शन के अंतर्गत तीन मुख्य बातें आती हैं: संविधान की अवधारणाओं की व्याख्या, समाज और शासन की उस तस्वीर को समझना जो संविधान के आदर्शों से मेल खाती हो, और संविधान सभा की बहसों के माध्यम से संविधान के आदर्शों का मूल्यांकन करना। संविधान के आदर्शों को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज ये आदर्श विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक बहसों का हिस्सा हैं। संविधान के आदर्शों की विभिन्न व्याख्याएँ हो सकती हैं, इसलिए हमें यह समझना होगा कि कौन-सी व्याख्या सही और सुसंगत है।
- संविधान केवल कानून नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक मूल्यों का दस्तावेज है।
- संविधान की अवधारणाओं जैसे अधिकार, नागरिकता, अल्पसंख्यक, लोकतंत्र की व्याख्या जरूरी है।
- संविधान सभा की बहसों से संविधान के आदर्शों का मूल्यांकन किया जा सकता है।
- संविधान के आदर्शों की विभिन्न व्याख्याएँ हो सकती हैं, जिनका तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
- 📌 नैतिकता: सही और गलत के सिद्धांत।
- 📌 राजनीतिक दर्शन: शासन और समाज के लिए मूलभूत विचार।
- 📌 अधिकार: कानूनी या नैतिक रूप से मान्यता प्राप्त स्वातंत्र्य।
संविधान–लोकतांत्रिक बदलाव का साधन
व्याख्यासंविधान–लोकतांत्रिक बदलाव का साधन
संविधान का एक मुख्य उद्देश्य सत्ता को निरंकुश होने से रोकना है। आधुनिक राज्य अत्यंत शक्तिशाली होते हैं और यदि ये गलत हाथों में पड़ जाएं तो वे समाज के हित के बजाय कुछ व्यक्तियों या समूहों के हित में काम कर सकते हैं। इसलिए संविधान सत्ता के खेल के नियम
अभ्यास प्रश्न — Chapter 10
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. नीचे कुछ कानून दिए गए हैं। क्या इनका संबंध किसी मूल्य से है? यदि हाँ, तो वह अंतर्निहित मूल्य क्या है? कारण बताएँ। (क) पुत्र और पुत्री दोनों का परिवार की संपत्ति में हिस्सा होगा। (ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री-कर का सीमांकन अलग-अलग होगा। (ग) किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। (घ) ‘बेगार’ अथवा बंधुआ मजदूरी नहीं कराई जा सकती।
उत्तर:
इन कानूनों का संबंध विभिन्न सामाजिक और नैतिक मूल्यों से है। (क) पुत्र और पुत्री दोनों का परिवार की संपत्ति में हिस्सा होगा – यह समानता और लैंगिक न्याय के मूल्य को दर्शाता है। यह पारंपरिक लैंगिक भेदभाव को समाप्त कर महिलाओं को समान अधिकार देता है। (ख) अलग-अलग उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्री-कर का सीमांकन अलग-अलग होगा – यह आर्थिक न्याय और सामाजिक नीति के मूल्य को दर्शाता है, जिससे कराधान में समानता और उचित वितरण सुनिश्चित होता है। (ग) किसी भी सरकारी विद्यालय में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी – यह धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को दर्शाता है, जिससे सभी धर्मों का सम्मान होता है और राज्य धर्म से अलग रहता है। (घ) ‘बेगार’ अथवा बंधुआ मजदूरी नहीं कराई जा सकती – यह मानवाधिकार और स्वतंत्रता के मूल्य को दर्शाता है, जो किसी भी प्रकार के शोषण और जबरदस्ती मजदूरी को रोकता है।
व्याख्या:
प्रत्येक कानून के पीछे एक नैतिक या सामाजिक मूल्य निहित होता है जो समाज में न्याय, समानता, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देता है। इन मूल्यों को समझकर हम कानूनों के उद्देश्य और उनके सामाजिक प्रभाव को जान सकते हैं।
Q2.2. नीचे कुछ विकल्प दिए जा रहे हैं। बताएँ कि इसमें किसका इस्तेमाल निम्नलिखित कथन को पूरा करने में नहीं किया जा सकता? लोकतांत्रिक देश को संविधान की ज़रूरत”’ (क) सरकार की शक्तियों पर अंकुश रखने के लिए होती है। (ख) अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से सुरक्षा देने के लिए होती है। (ग) औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है। (घ) यह सुनिश्चित करने के लिए होती है कि क्षणिक आवेग में दूरगामी के लक्ष्यों से कहीं विचलित न हो जाएँ। (ङ) शांतिपूर्ण ढंग से सामाजिक बदलाव लाने के लिए होती है।
उत्तर:
इस कथन को पूरा करने में विकल्प (ग) 'औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता अर्जित करने के लिए होती है।' का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कारण: लोकतांत्रिक देश को संविधान की जरूरत सरकार की शक्तियों को सीमित करने, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, स्थिरता बनाए रखने और सामाजिक बदलाव को शांतिपूर्ण रूप से लाने के लिए होती है। जबकि औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करना संविधान की आवश्यकता का कारण हो सकता है, परंतु संविधान का उद्देश्य स्वतंत्रता अर्जित करना नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता के बाद शासन व्यवस्था को व्यवस्थित करना है। इसलिए यह कथन संविधान की आवश्यकता को स्पष्ट करने में उपयुक्त नहीं है।
व्याख्या:
विकल्प (ग) स्वतंत्रता प्राप्ति के संदर्भ में है, जो संविधान की आवश्यकता का कारण हो सकता है, लेकिन संविधान की आवश्यकता के उद्देश्य को स्पष्ट करने में यह उपयुक्त विकल्प नहीं है। बाकी विकल्प संविधान के उद्देश्य और आवश्यकता को सही ढंग से दर्शाते हैं।
Q3.3. संविधान सभा की बहसों को पढ़ने और समझने के बारे में नीचे कुछ कथन दिए गए हैं – (अ) इनमें से कौन-सा कथन इस बात की दलील है कि संविधान सभा की बहसें आज भी प्रासंगिक हैं? कौन-सा कथन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि ये बहसें प्रासंगिक नहीं हैं। (ब) इनमें से किस पक्ष का आप समर्थन करेंगे और क्यों? (क) आम जनता अपनी जीविका कमाने और जीवन की विभिन्न परेशानियों के निपटारे में व्यस्त होती हैं। आम जनता इन बहसों की कानूनी भाषा को नहीं समझ सकती। (ख) आज की स्थितियाँ और चुनौतियाँ संविधान बनाने के वक्त की चुनौतियों और स्थितियों से अलग हैं। संविधान निर्माताओं के विचारों को पढ़ना और अपने नए जमाने में इस्तेमाल करना दरअसल अतीत को वर्तमान में खींच लाना है। (ग) संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझने की हमारी दृष्टि पूर्णतया नहीं बदली है। संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तर्क मिल सकते हैं कि कुछ संवैधानिक व्यवहार क्यों महत्वपूर्ण हैं। एक ऐसे समय में जब संवैधानिक व्यवहारों को चुनौती दी जा रही है, इन तर्कों को न जानना संवैधानिक-व्यवहारों को नष्ट कर सकता है।
उत्तर:
(अ) प्रासंगिकता के पक्ष में कथन: (ग) – संसार और मौजूदा चुनौतियों को समझने की हमारी दृष्टि पूर्णतया नहीं बदली है। संविधान सभा की बहसों से हमें यह समझने के तर्क मिल सकते हैं कि कुछ संवैधानिक व्यवहार क्यों महत्वपूर्ण हैं। प्रासंगिकता के विरुद्ध कथन: (क) और (ख) – (क) आम जनता इन बहसों की कानूनी भाषा को नहीं समझ सकती; (ख) आज की स्थितियाँ संविधान बनाने के वक्त से अलग हैं, इसलिए पुराने विचारों को वर्तमान में लाना उचित नहीं। (ब) मेरा समर्थन (ग) पक्ष को है क्योंकि संविधान सभा की बहसें हमारे संवैधानिक मूल्यों और व्यवहारों की समझ को गहरा करती हैं। ये बहसें आज भी संवैधानिक सिद्धांतों को समझने और उनका पालन करने में मददगार हैं, विशेषकर जब संवैधानिक व्यवहारों को चुनौती दी जा रही हो। इसलिए इन्हें प्रासंगिक माना जाना चाहिए।
व्याख्या:
संविधान सभा की बहसें संविधान के मूल सिद्धांतों और विचारों को समझने में सहायक हैं। वर्तमान समय में भी संवैधानिक व्यवहारों की रक्षा के लिए इन बहसों की प्रासंगिकता बनी रहती है। जबकि कुछ लोग इसे जटिल और अप्रासंगिक मानते हैं, परंतु बहसों से हमें संविधान की गहराई से समझ मिलती है।
Q4.4. निम्नलिखित प्रसंगों के आलोक में भारतीय संविधान और पश्चिमी अवधारणा में अंतर स्पष्ट करें – (क) धर्मनिरपेक्षता की समझ (ख) अनुच्छेद 371 (ग) सकारात्मक कार्य-योजना या अफरमेटिव एक्शन (घ) सार्वभौम व्यस्क मताधिकार
उत्तर:
(क) धर्मनिरपेक्षता की समझ: भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान और राज्य का किसी धर्म से अलग रहना। पश्चिमी अवधारणा में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ आमतौर पर धर्म और राज्य के पूर्ण पृथक्करण से है। भारत में धर्मनिरपेक्षता में धर्मों के बीच सहिष्णुता और संरक्षण भी शामिल है। (ख) अनुच्छेद 371: भारतीय संविधान में अनुच्छेद 371 विभिन्न राज्यों के विशेष सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रावधान करता है, जो पश्चिमी संविधान में सामान्यतः नहीं पाया जाता। यह स्थानीय स्वायत्तता और विविधता को मान्यता देता है। (ग) सकारात्मक कार्य-योजना या अफरमेटिव एक्शन: भारतीय संविधान में सामाजिक और आर्थिक पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण जैसी सकारात्मक कार्य-योजनाएँ हैं, जबकि पश्चिमी अवधारणा में समानता के सिद्धांत के तहत समान अवसर दिए जाते हैं, लेकिन आरक्षण जैसी व्यवस्था कम होती है। (घ) सार्वभौम व्यस्क मताधिकार: भारतीय संविधान में सार्वभौम व्यस्क मताधिकार है, जिसका अर्थ है 18 वर्ष से ऊपर सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार। पश्चिमी देशों में भी यह प्रचलित है, लेकिन कुछ देशों में मताधिकार की आयु या शर्तें भिन्न हो सकती हैं।
व्याख्या:
भारतीय संविधान की विशेषताएँ और प्रावधान पश्चिमी अवधारणाओं से भिन्न हैं क्योंकि भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग है। इसलिए संविधान में स्थानीय आवश्यकताओं और विविधताओं को ध्यान में रखते हुए प्रावधान किए गए हैं।
Q5.5. निम्नलिखित में धर्मनिरपेक्षता का कौन-सा सिद्धांत भारत के संविधान में अपनाया गया है? (क) राज्य का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। (ख) राज्य का धर्म से नजदीकी रिश्ता है। (ग) राज्य धर्मों के बीच भेदभाव कर सकता है। (घ) राज्य धार्मिक समूहों के अधिकार को मान्यता देगा। (ङ) राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होगी।
उत्तर:
भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत है कि 'राज्य को धर्म के मामलों में हस्तक्षेप करने की सीमित शक्ति होगी' (विकल्प ङ)। कारण: भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्ष है, जिसका अर्थ है कि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखता है और धर्म के मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन यह हस्तक्षेप सीमित और न्यायसंगत होना चाहिए ताकि धार्मिक स्वतंत्रता बनी रहे।
व्याख्या:
भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता को इस रूप में स्वीकार करता है कि राज्य धर्मों के बीच भेदभाव नहीं करता, परन्तु आवश्यकतानुसार धर्म के मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, जैसे सामाजिक सुधारों के लिए। इसलिए विकल्प (ङ) सही है।
Q6.6. निम्नलिखित कथनों को सुमेलित करें – (क) विधवाओं के साथ किए जाने वाले बरताव की आलोचना की आजादी। (ख) संविधान-सभा में फ़ैसलों का स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जाना। (ग) व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्व को स्वीकार करना। (घ) अनुच्छेद 371 (ङ) महिलाओं और बच्चों को परिवार की संपत्ति में असमान अधिकार। आधारभूत महत्व की उपलब्धि प्रक्रियागत उपलब्धि लैंगिक-न्याय की उपेक्षा उदारवादी व्यक्तिवाद धर्म-विशेष की ज़रूरतों के प्रति ध्यान देना
उत्तर:
सुमेलित उत्तर: (क) विधवाओं के साथ किए जाने वाले बरताव की आलोचना की आजादी – उदारवादी व्यक्तिवाद (ख) संविधान-सभा में फ़ैसलों का स्वार्थ के आधार पर नहीं बल्कि तर्कबुद्धि के आधार पर लिया जाना – प्रक्रियागत उपलब्धि (ग) व्यक्ति के जीवन में समुदाय के महत्व को स्वीकार करना – आधारभूत महत्व की उपलब्धि (घ) अनुच्छेद 371 – धर्म-विशेष की ज़रूरतों के प्रति ध्यान देना (ङ) महिलाओं और बच्चों को परिवार की संपत्ति में असमान अधिकार – लैंगिक-न्याय की उपेक्षा
व्याख्या:
प्रत्येक कथन को उसके संबंधित मूल्य या उपलब्धि से जोड़ा गया है। यह समझना आवश्यक है कि संविधान में विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिए गए हैं, जैसे तर्कबुद्धि, समुदाय का महत्व, धर्म विशेष की आवश्यकताएँ, लैंगिक न्याय आदि।
Q7.7. यह चर्चा एक कक्षा में चल रही थी। विभिन्न तकों को पढ़ें और बताएँ कि आप इनमें किस-से सहमत हैं और क्यों? जयेश – मैं अब भी मानता हूँ कि हमारा संविधान एक उधार का दस्तावेज है। सबा – क्या तुम यह कहना चाहते हो कि इसमें भारतीय कहने जैसा कुछ है ही नहीं? क्या मूल्यों और विचारों पर हम ‘भारतीय’ अथवा ‘पश्चिमी’ जैसा लेबल चिपका सकते हैं? महिलाओं और पुरुषों की समानता का ही मामला लो। इसमें ‘पश्चिमी’ कहने जैसा क्या है? और, अगर ऐसा है भी तो क्या हम इसे महज पश्चिमी होने के कारण खारिज कर दें? जयेश – मेरे कहने का मतलब यह है कि अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ने के बाद क्या हमने उनकी संसदीय-शासन की व्यवस्था नहीं अपनाई? नेहा – तुम यह भूल जाते हो कि जब हम अंग्रेजों से लड़ रहे थे तो हम सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ़ थे। अब इस बात का, शासन की जो व्यवस्था हम चाहते थे उसको अपनाने से कोई लेना-देना नहीं, चाहे यह जहाँ से भी आई हो।
उत्तर:
मैं इस चर्चा में नेहा के विचार से सहमत हूँ। क्योंकि संविधान केवल एक उधार का दस्तावेज नहीं है, बल्कि इसमें भारतीय संदर्भ, सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता और आवश्यकताओं को भी शामिल किया गया है। अंग्रेजों से संसदीय शासन की व्यवस्था अपनाई गई है, लेकिन उसे भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढाला गया है। इसलिए यह कहना उचित होगा कि संविधान में भारतीय और पश्चिमी दोनों तत्व हैं, परंतु यह पूरी तरह से भारतीय संदर्भ में निर्मित है।
व्याख्या:
संविधान में विदेशी तत्वों का होना उसे भारतीय नहीं बनाता; बल्कि यह आवश्यक है कि संविधान भारतीय समाज की विविधताओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया हो। इसलिए विदेशी तत्वों को अपनाना और उन्हें भारतीय संदर्भ में ढालना दोनों जरूरी हैं।
Q8.8. ऐसा क्यों कहा जाता है कि भारतीय संविधान को बनाने की प्रक्रिया प्रतिनिधिमूलक नहीं थी? क्या इस कारण हमारा संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं रह जाता? अपने उत्तर के कारण बताएँ।
उत्तर:
भारतीय संविधान को बनाने की प्रक्रिया को पूरी तरह से प्रतिनिधिमूलक नहीं माना जाता क्योंकि संविधान सभा के सभी वर्गों और समुदायों का समान प्रतिनिधित्व नहीं था। कुछ वर्गों, जैसे महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व सीमित था। इसके अलावा, आम जनता का प्रत्यक्ष चुनाव नहीं था। फिर भी, यह कहना गलत होगा कि संविधान प्रतिनिध्यात्मक नहीं रह जाता। क्योंकि संविधान सभा में विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक समूहों और क्षेत्रों के प्रतिनिधि शामिल थे, जिन्होंने व्यापक बहस और विचार-विमर्श के बाद संविधान बनाया। इसलिए, संविधान में जनता की इच्छाओं और आवश्यकताओं का समावेश हुआ।
व्याख्या:
प्रतिनिधिमूलकता का अर्थ है कि सभी समाज के वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व हो। भारतीय संविधान सभा में कुछ वर्गों का प्रतिनिधित्व कम था, लेकिन व्यापक राजनीतिक और सामाजिक समूहों ने भाग लिया। इसलिए संविधान को पूरी तरह गैर-प्रतिनिधिमूलक नहीं कहा जा सकता।
Bharat ka Samvidhan Sidhant aur Vyavhar के सभी 10 अध्याय
Political Science · Class 11