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Chapter 7

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Chapter 7अध्ययन नोट्स

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वैष्णव जन तो तेने कहीये ...

व्याख्या

वैष्णव जन तो तेने कहीये ...

यह खंड प्रसिद्ध गुजराती संत कवि नरसी मेहता द्वारा रचित भजन 'वैष्णव जन तो तेने कहीये' प्रस्तुत करता है। यह भजन भक्ति और मानवता का संदेश देता है। भजन में वैष्णव अर्थात् भगवान विष्णु के भक्त के गुणों का वर्णन है। कवि ने बताया है कि सच्चा वैष्णव वह है जो दूसरों के दुःख को समझता है, परोपकार करता है, मन में अभिमान नहीं रखता, सभी जीवों का सम्मान करता है, निंदा से दूर रहता है, और मन-निश्चल होता है। इसके अतिरिक्त, वह समदृष्टि रखता है, तृष्णा त्यागता है, परस्त्री से बचता है, असत्य नहीं बोलता, मोह-माया से मुक्त होता है, वैराग्य रखता है, रामनाम का जाप करता है, लोभ और कपट से दूर रहता है, और काम, क्रोध को त्यागता है। इस भजन का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि महात्मा गांधीजी के आश्रम में इसे प्रार्थना के समय गाया जाता था। यह भजन सामाजिक सद्भाव, सहिष्णुता और नैतिकता का संदेश देता है।

  • वैष्णव जन के गुणों का वर्णन है जो दूसरों के दुःख को समझता है।
  • परोपकार करता है और मन में अभिमान नहीं रखता।
  • सभी जीवों का सम्मान करता है और निंदा से बचता है।
  • मोह-माया से मुक्त होकर रामनाम का जाप करता है।
  • काम, क्रोध, लोभ और कपट से दूर रहता है।
  • यह भजन महात्मा गांधीजी के आश्रम में प्रार्थना के समय गाया जाता था।
  • 📌 वैष्णव: भगवान विष्णु के भक्त।
  • 📌 अभिमान: घमंड या अहंकार।
  • 📌 परोपकार: दूसरों की सहायता करना।

कबीर

व्याख्या

कबीर

इस खंड में कबीर के जीवन और उनकी रचनाओं का परिचय दिया गया है। कबीर का जन्म सन् 1398 में काशी में हुआ माना जाता है और उनकी मृत्यु सन् 1518 के आसपास मगहर में हुई। वे एक निर्गुण संत थे, जिन्होंने विधिवत शिक्षा नहीं पाई थी, परंतु सत्संग, अनुभव और पर्यटन से ज्ञान प्राप्त किया। कबीर ने धार्मिक पाखंड, जाति-धर्म के भेदभाव और कर्मकांडों का कड़ा विरोध किया। उनकी भाषा सरल और जनभाषा के निकट थी, जिससे उनके विचार आम जनता तक आसानी से पहुँच सके। कबीर ने ईश्वर-प्रेम, ज्ञान, वैराग्य, गुरुभक्ति, सत्संग और आत्मबोध को अपने काव्य में अभिव्यक्त किया। उनकी रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रंथावली और बीजक में संकलित हैं। कबीर की साखियाँ उनके धार्मिक और सामाजिक विचारों का सार प्रस्तुत करती हैं।

  • कबीर का जन्म काशी में सन् 1398 में हुआ था।
  • वे निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रमुख कवि थे।
  • कबीर ने जाति, धर्म और कर्मकांडों का विरोध किया।
  • उनकी भाषा सरल और जनसाधारण के लिए समझने योग्य थी।
  • उनकी रचनाएँ कबीर ग्रंथावली और बीजक में संकलित हैं।
  • कबीर ने ईश्वर-प्रेम, ज्ञान, वैराग्य और गुरुभक्ति पर बल दिया।
  • 📌 निर्गुण भक्ति: ऐसी भक्ति जिसमें ईश्वर को निराकार माना जाता है।
  • 📌 सत्संग: अच्छे लोगों का संग।
  • 📌 वैष्णव: भगवान विष्णु के भक्त।

साखियाँ

व्याख्या

साखियाँ

इस खंड में कबीर की प्रसिद्ध साखियों का संग्रह प्रस्तुत किया गया है। साखियाँ छोटे-छोटे दोहे होते हैं जिनमें गूढ़ दार्शनिक और सामाजिक संदेश होते हैं। यहाँ प्रेम का महत्व, संत के लक्षण, ज्ञान की महिमा और बाह्यांडंबरों का विरोध प्रमुख विषय हैं। कबीर ने ब