Chapter 5
Chapter 5 — अध्ययन नोट्स
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भारतीय समाजशास्त्री
व्याख्याभारतीय समाजशास्त्री
भारतीय समाजशास्त्र का इतिहास और विकास लगभग सौ वर्षों से भी अधिक पुराना है। विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र की औपचारिक शिक्षा की शुरुआत 1919 में बंबई विश्वविद्यालय से हुई। इसके बाद कलकत्ता और लखनऊ विश्वविद्यालयों ने भी 1920 के दशक में समाजशास्त्र और मानवविज्ञान में शिक्षण और शोध कार्य प्रारंभ किया। आज भारत के अधिकांश प्रमुख विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र विभाग, सामाजिक मानवविज्ञान या मानवविज्ञान विभाग स्थापित हैं। प्रारंभिक दौर में यह स्पष्ट नहीं था कि भारतीय समाजशास्त्र का स्वरूप कैसा होगा और क्या वास्तव में भारत को समाजशास्त्र की आवश्यकता थी। 20वीं शताब्दी के पहले पच्चीस वर्षों में इस विषय में रुचि रखने वालों को स्वयं यह तय करना था कि भारत में समाजशास्त्र की भूमिका क्या होगी। भारतीय संदर्भ की विशिष्टता ने कई प्रश्न खड़े किए, जैसे कि भारत में आधुनिकता और औपनिवेशिक पराधीनता का मिश्रित अनुभव, भारत की प्राचीन सभ्यता और उसमें आदिम या जनजातीय समाज की उपस्थिति, तथा नव स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में समाजशास्त्र की भूमिका। भारतीय समाजशास्त्र के अग्रणी विद्वानों को न केवल इन प्रश्नों के उत्तर खोजने थे, बल्कि नए प्रश्न भी तलाशने थे। इस संदर्भ में भारतीय समाजशास्त्र का विकास एक अनुभव आधारित प्रक्रिया थी, जो पूर्वनिर्मित रूप में उपलब्ध नहीं थी। प्रारंभिक समाजशास्त्री अकस्मात बने, जैसे एल.के. अनन्तकृष्ण अय्यर और शरतचंद्र रॉय, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में गहन मानवविज्ञान और समाजशास्त्रीय अध्ययन किए। इस अध्याय में भारत के चार प्रमुख समाजशास्त्रियों का परिचय दिया गया है, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में जन्म लेकर स्वतंत्र भारत में समाजशास्त्र को एक औपचारिक और संस्थागत स्वरूप दिया।
- 1919 में बंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की औपचारिक शिक्षा प्रारंभ हुई।
- भारतीय समाजशास्त्र का विकास अनुभव आधारित और संदर्भगत था।
- भारतीय संदर्भ में आधुनिकता और औपनिवेशिकता का मिश्रित अनुभव था।
- एल.के. अनन्तकृष्ण अय्यर और शरतचंद्र रॉय जैसे विद्वान अकस्मात मानवविज्ञानी बने।
- भारतीय समाजशास्त्र के संस्थागत विकास में चार प्रमुख समाजशास्त्रियों का योगदान है।
- 📌 समाजशास्त्र: समाज के विभिन्न पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन।
- 📌 मानवविज्ञान: मानव जाति और उनकी संस्कृतियों का अध्ययन।
- 📌 औपनिवेशिकता: किसी देश पर दूसरे देश का शासन।
गोविंद सदाशिव घूर्ये (1893-1983)
व्याख्यागोविंद सदाशिव घूर्ये (1893-1983)
गोविंद सदाशिव घूर्ये का जन्म 12 दिसंबर 1893 को मालवान के कोंकण तटीय क्षेत्र में हुआ था। उनका परिवार प्रारंभ में संपन्न व्यापारी था, लेकिन बाद में आर्थिक पतन हुआ। उन्होंने एलफिंस्टन कॉलेज, मुंबई से संस्कृत में ऑनर्स स्नातक और फिर संस्कृत तथा अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 1919 में उन्हें विदेश में समाजशास्त्र का प्रशिक्षण प्राप्त करने छात्रवृत्ति मिली। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स में एल.टी. हॉबहाउस और कैम्ब्रिज में डब्ल्यू.एच.आर. रिवर्स के निर्देशन में अध्ययन किया। 1923 में उन्होंने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की और भारत लौटकर बंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के रीडर और विभागाध्यक्ष बने। घूर्ये ने समाजशास्त्र को एक भारतीय विषय के रूप में विकसित किया और बंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग को एक प्रमुख केंद्र बनाया। उन्होंने जाति, प्रजाति, जनजाति, परिवार, विवाह, संस्कृति, धर्म, संघर्ष और एकीकरण जैसे विषयों पर व्यापक शोध किया। घूर्ये ने भारतीय जनजातियों को 'पिछड़े हिंदू समूह' के रूप में देखा और जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के पक्ष में नहीं थे, बल्कि विकास की आवश्यकता पर बल दिया। उनके जाति सिद्धांत ने जाति की छह प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित किया, जिनमें जन्म आधारित सदस्यता, सोपानिक विभाजन, सामाजिक अंत:क्रिया पर प्रतिबंध, अधिकार और कर्तव्य, व्यवसाय का वंशानुगत होना, और विवाह पर प्रतिबंध शामिल हैं। घूर्ये ने भारतीय समाजशास्त्र को संस्थागत रूप दिया और इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी की स्थापना की।
- घूर्ये ने बंबई विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की स्थापना और विकास किया।
- उन्होंने जाति और प्रजाति पर गहन शोध किया और जाति की छह विशेषताओं को परिभाषित किया।
- जनजातीय समाज को उन्होंने 'पिछड़े हिंदू समूह' के रूप में देखा।
- घूर्ये ने इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी की स्थापना की।
- उनका कार्य भारतीय समाजशास्त्र को एक संस्थागत और शैक्षणिक विषय के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण था।
- 📌 जाति: जन्म आधारित सामाजिक खंड जिसमें अंतर्विवाह और व्यवसाय के नियम होते हैं।
- 📌 प्रजाति: शारीरिक विशेषताओं के आधार पर मानव समूह।
- 📌 सोपानिक विभाजन: सामाजिक स्तरों का क्रमबद्ध विभाजन।
धुजटि प्रसाद मुकर्जी (1894-1961)
व्याख्याधुजटि प्रसाद मुकर्जी (1894-1961)
धुजटि प्रसाद मुकर्जी का जन्म 5 अक्टूबर 1894 को एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने विज्ञान में स्नातक और कलकत्ता विश्वविद्यालय से इतिहास तथा अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 1924 में वे लखनऊ विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र और
अभ्यास प्रश्न — Chapter 5
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.2. ‘जनजातीय समुदायों को कैसे जोड़ा जाए’—इस विवाद के दोनों पक्षों के क्या तर्क थे?
उत्तर:
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए हमें दोनों पक्षों के तर्कों को समझना होगा। एक पक्ष का तर्क था कि जनजातीय समुदायों को मुख्यधारा के समाज में जोड़ना चाहिए ताकि वे विकास के लाभ उठा सकें और सामाजिक, आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि क्षेत्रों में समान अवसरों के पक्षधर थे। वहीं दूसरा पक्ष यह मानता था कि जनजातीय समुदायों की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक पहचान होती है, जिसे मुख्यधारा में जोड़ने से खतरा हो सकता है। वे जनजातीय समुदायों की स्वायत्तता और सांस्कृतिक संरक्षण पर जोर देते थे। इस प्रकार, दोनों पक्षों के तर्क विकास और संरक्षण के बीच संतुलन खोजने की आवश्यकता को दर्शाते हैं।
व्याख्या:
प्रश्न में विवाद के दोनों पक्षों के तर्कों को समझना आवश्यक है। पहला पक्ष मुख्यधारा में समावेशन के पक्ष में है, जबकि दूसरा पक्ष संरक्षण और स्वायत्तता के पक्ष में। दोनों के तर्क सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन पर केंद्रित हैं।
Q2.3. भारत में प्रजाति तथा जाति के संबंधों पर हरबर्ट रिजले तथा जी.एस. घूयें की स्थिति की रूपरेखा दें।
उत्तर:
हरबर्ट रिजले और जी.एस. घूयें ने भारत में प्रजाति और जाति के संबंधों पर अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। रिजले ने प्रजाति को जाति से अलग सामाजिक इकाई माना, जिसमें प्रजाति अधिकतर आदिम और पिछड़ी सामाजिक स्थिति में होती है, जबकि जाति सामाजिक व्यवस्था का एक जटिल रूप है। उन्होंने प्रजाति को सामाजिक विकास के प्रारंभिक चरण के रूप में देखा। दूसरी ओर, जी.एस. घूयें ने जाति को सामाजिक संरचना का मुख्य आधार माना और प्रजाति को जाति के अंतर्गत एक विशेष प्रकार की सामाजिक इकाई के रूप में देखा। घूयें ने जाति को सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक कारकों के संयोजन के रूप में समझा। इस प्रकार, दोनों ने जाति और प्रजाति के बीच संबंधों को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझाया।
व्याख्या:
प्रश्न में दोनों समाजशास्त्रियों के दृष्टिकोणों को स्पष्ट करना आवश्यक है। रिजले ने प्रजाति को जाति से अलग माना जबकि घूयें ने जाति को व्यापक सामाजिक संरचना के रूप में देखा।
Q3.4. जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा को सारांश में बताएं।
उत्तर:
जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा में इसे एक सामाजिक समूह के रूप में देखा जाता है, जिसकी सदस्यता जन्म के आधार पर होती है और जो सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नियमों द्वारा परिभाषित होता है। जाति व्यवस्था में सामाजिक पदानुक्रम, अंतर्विवाह, और सामाजिक प्रतिबंध शामिल होते हैं। जाति सामाजिक पहचान, समूह की स्वायत्तता और सामाजिक नियंत्रण के माध्यम से समाज में स्थिरता बनाए रखती है। इस परिभाषा में जाति को एक गतिशील सामाजिक संरचना के रूप में भी देखा जाता है, जो समय के साथ बदलती रहती है।
व्याख्या:
जाति की सामाजिक मानवशास्त्रीय परिभाषा में जन्म आधारित सामाजिक समूह, सामाजिक नियम, पदानुक्रम और सामाजिक नियंत्रण की अवधारणा शामिल होती है।
Q4.5. ‘जीवंत परंपरा’ से डी.पी. मुकर्जी का क्या तात्पर्य है? भारतीय समाजशास्त्रियों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर बल क्यों दिया?
उत्तर:
डी.पी. मुकर्जी द्वारा 'जीवंत परंपरा' से तात्पर्य उस सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा से है जो सक्रिय रूप से समाज में जीवित है और जो समाज के सदस्यों के व्यवहार, सोच और जीवनशैली को प्रभावित करती है। यह परंपरा स्थिर नहीं होती, बल्कि समय के साथ बदलती और विकसित होती रहती है। भारतीय समाजशास्त्रियों ने अपनी परंपरा से जुड़े रहने पर इसलिए बल दिया क्योंकि इससे वे भारतीय समाज की वास्तविकताओं को बेहतर समझ सकते हैं और समाजशास्त्रीय अध्ययन में स्थानीय संदर्भों और सांस्कृतिक विशेषताओं को शामिल कर सकते हैं। इससे शोध अधिक प्रासंगिक और प्रभावी होता है।
व्याख्या:
प्रश्न में 'जीवंत परंपरा' की अवधारणा और भारतीय समाजशास्त्रियों के परंपरा से जुड़े रहने के कारणों को स्पष्ट करना आवश्यक है।
Q5.6. भारतीय संस्कृति तथा समाज की क्या विशिष्टताएँ हैं तथा ये बदलाव के ढाँचे को कैसे प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
भारतीय संस्कृति और समाज की विशिष्टताएँ हैं - बहुलता (प्लूरालिज्म), विविधता, सहिष्णुता, परिवार और समुदाय की महत्ता, धर्म का प्रभाव, और परंपराओं का गहरा प्रभाव। ये विशेषताएँ सामाजिक व्यवहार, मूल्य और संस्थाओं को आकार देती हैं। बदलाव के ढाँचे को प्रभावित करते हुए, ये विशिष्टताएँ परिवर्तन को धीमा करती हैं क्योंकि परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं को बनाए रखना प्राथमिकता होती है। साथ ही, ये विशिष्टताएँ बदलाव को स्थानीय संदर्भों के अनुसार अनुकूलित करती हैं, जिससे सामाजिक परिवर्तन में संतुलन बना रहता है।
व्याख्या:
प्रश्न में भारतीय समाज की विशेषताओं और उनके सामाजिक बदलाव पर प्रभाव को समझाना आवश्यक है।
Q6.7. कल्याणकारी राज्य क्या है? ए.आर. देसाई कुछ देशों द्वारा किए गए दावों की आलोचना क्यों करते हैं?
उत्तर:
कल्याणकारी राज्य वह राज्य होता है जो अपने नागरिकों के सामाजिक और आर्थिक कल्याण के लिए सक्रिय रूप से कार्य करता है, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना। ए.आर. देसाई ने कुछ देशों द्वारा किए गए दावों की आलोचना इसलिए की क्योंकि वे कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को केवल औपचारिक या सतही रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि वास्तविकता में सामाजिक असमानताएँ और अन्याय बने रहते हैं। वे कहते हैं कि कल्याणकारी राज्य की सफलता उसके सामाजिक न्याय और समानता के स्तर से मापी जानी चाहिए, न कि केवल सरकारी नीतियों या घोषणाओं से।
व्याख्या:
प्रश्न में कल्याणकारी राज्य की परिभाषा और ए.आर. देसाई की आलोचना के कारणों को स्पष्ट करना आवश्यक है।
Q7.8. समाजशास्त्रीय शोध के लिए ‘गाँव’ को एक विषय के रूप में लेने पर एम.एन. श्रीनिवास तथा लुई ड्यूमों ने इसके पक्ष तथा विपक्ष में क्या तर्क दिए हैं?
उत्तर:
एम.एन. श्रीनिवास ने गाँव को समाजशास्त्रीय शोध का महत्वपूर्ण विषय माना क्योंकि गाँव भारतीय समाज की बुनियाद है और यहाँ से सामाजिक संरचनाओं, संबंधों और प्रक्रियाओं को समझा जा सकता है। उन्होंने गाँव के अध्ययन को सामाजिक परिवर्तन और विकास के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। दूसरी ओर, लुई ड्यूमों ने गाँव को विषय के रूप में लेने के विपक्ष में तर्क दिया कि गाँव एक सीमित और संकुचित सामाजिक इकाई है, जो व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रक्रियाओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करता। उन्होंने कहा कि गाँव के अध्ययन से समाज के समग्र और जटिल पहलुओं को समझना कठिन हो सकता है। इस प्रकार, दोनों ने गाँव के अध्ययन के पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत किए।
व्याख्या:
प्रश्न में एम.एन. श्रीनिवास और लुई ड्यूमों के तर्कों को स्पष्ट करना आवश्यक है, जो गाँव के अध्ययन के महत्व और सीमाओं को दर्शाते हैं।
Q8.9. भारतीय समाजशास्त्र के इतिहास में ग्रामीण अध्ययन का क्या महत्व है? ग्रामीण अध्ययन को आगे बढ़ाने में एम.एन. श्रीनिवास की क्या भूमिका रही?
उत्तर:
भारतीय समाजशास्त्र के इतिहास में ग्रामीण अध्ययन का महत्व इसलिए है क्योंकि भारत की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और ग्रामीण समाज की संरचना, संबंध और समस्याएँ पूरे समाज को प्रभावित करती हैं। ग्रामीण अध्ययन से सामाजिक परिवर्तन, विकास और नीतियों की प्रभावशीलता को समझने में मदद मिलती है। एम.एन. श्रीनिवास ने ग्रामीण अध्ययन को समाजशास्त्रीय अनुसंधान का केंद्र बनाया और भारतीय गाँवों के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं का गहन अध्ययन किया। उन्होंने ग्रामीण समाज के परिवर्तन और विकास के सिद्धांत प्रस्तुत किए, जिससे ग्रामीण अध्ययन को नई दिशा मिली और यह क्षेत्र मजबूत हुआ।
व्याख्या:
प्रश्न में ग्रामीण अध्ययन के महत्व और एम.एन. श्रीनिवास की भूमिका को विस्तार से समझाना आवश्यक है।
Samaj ka Bodh के सभी 5 अध्याय
Sociology · Class 11