Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
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पर्यावरण और समाज
व्याख्यापर्यावरण और समाज
पर्यावरण और समाज के बीच गहरा और जटिल संबंध है। हमारे चारों ओर जो भी वस्तुएँ हैं, जैसे स्कूल की वर्दी, कुर्सियाँ, बैग, बिजली आदि, ये सभी प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त होती हैं। उदाहरण के लिए, कक्षा की कुर्सी लकड़ी, कीलें, गोंद आदि से बनी होती है, जो जंगलों से प्राप्त होती हैं। इसके निर्माण और वितरण में कई लोग और संस्थाएँ शामिल होती हैं, जैसे लकड़ी काटने वाले, कारीगर, वाहन चालक, व्यापारी आदि। यह संसाधन चक्र जटिल है और इसमें पर्यावरण और समाज की अंतःक्रिया स्पष्ट होती है। इस अध्याय में हम पर्यावरण के संदर्भ में सामाजिक संबंधों का अध्ययन करेंगे, जिनमें समय के साथ परिवर्तन हुए हैं। विभिन्न स्थानों पर ये संबंध भिन्न होते हैं। आज पर्यावरण संबंधी कई समस्याएँ हैं, जिनका समाधान समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। हमें यह जानना होगा कि ये समस्याएँ क्यों उत्पन्न होती हैं और इन्हें कैसे रोका जा सकता है।
- पर्यावरण प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश है जिसमें हम रहते हैं।
- सामाजिक संबंध पर्यावरण के संसाधनों के उपयोग और वितरण को प्रभावित करते हैं।
- पर्यावरण और समाज के बीच जटिल और परस्पर निर्भर संबंध होता है।
- पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान सामाजिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टिकोणों से आवश्यक है।
- 📌 पर्यावरण: प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश जिसमें जीव रहते हैं।
- 📌 संसाधन चक्र: प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और वितरण की प्रक्रिया।
पारिस्थितिकी और सामाजिक पर्यावरण
व्याख्यापारिस्थितिकी और सामाजिक पर्यावरण
पारिस्थितिकी का अर्थ है भौतिक और जैविक व्यवस्थाओं तथा प्रक्रियाओं का जाल जिसमें मनुष्य भी शामिल है। पर्वत, नदियाँ, मैदान, सागर, जीव-जंतु आदि पारिस्थितिकी के अंग हैं। किसी स्थान की पारिस्थितिकी पर वहाँ के भूगोल और जलमंडल की अंतःक्रियाएँ प्रभाव डालती हैं। उदाहरण के लिए, मरुस्थलीय प्रदेशों के जीव-जंतु कम वर्षा, रेतीली मिट्टी और उच्च तापमान के अनुसार अपने आप को ढाल लेते हैं। समय के साथ मनुष्य की गतिविधियों ने पारिस्थितिकी में परिवर्तन किया है। जैसे जंगलों की कटाई से बाढ़ की स्थिति बढ़ती है। विश्वव्यापी तापमान वृद्धि भी मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है। प्राकृतिक और मानवीय कारणों को अलग करना कठिन है क्योंकि दोनों अंतःक्रिया करते हैं। सामाजिक पर्यावरण जैवभौतिक पारिस्थितिकी और मनुष्य के हस्तक्षेप की द्वि-तरफा प्रक्रिया है। प्रकृति समाज को आकार देती है और समाज भी प्रकृति को। उदाहरण के तौर पर सिंधु-गंगा के बाढ़ के मैदानों की उपजाऊ भूमि घनी आबादी और जटिल समाज का आधार बनी। वहीं राजस्थान के मरुस्थल पशुपालकों का सहारा हैं। पूंजीवादी सामाजिक संगठनों ने विश्व की प्रकृति को भी आकार दिया है।
- पारिस्थितिकी में भौतिक और जैविक प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
- मनुष्य पारिस्थितिकी में परिवर्तन करता है, जिससे प्राकृतिक घटनाओं की तीव्रता बढ़ती है।
- सामाजिक पर्यावरण जैवभौतिक पारिस्थितिकी और मानवीय हस्तक्षेप की अंतःक्रिया है।
- प्रकृति और समाज एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।
- सामाजिक संगठन प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और नियंत्रण को निर्धारित करते हैं।
- 📌 पारिस्थितिकी: जीव और पर्यावरण के बीच संबंध।
- 📌 सामाजिक पर्यावरण: जैवभौतिक पारिस्थितिकी और मानवीय हस्तक्षेप की अंतःक्रिया।
- 📌 पूंजीवादी सामाजिक संगठन: आर्थिक व्यवस्था जो पर्यावरण को प्रभावित करती है।
भोपाल औद्योगिक दुर्घटना : जिम्मेदार कौन?
व्याख्याभोपाल औद्योगिक दुर्घटना : जिम्मेदार कौन?
3 दिसंबर 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड कीटनाशक फैक्ट्री से मिथाइल आईसोसाइनेट (MIC) गैस रिसने से लगभग 4,000 लोगों की मृत्यु और 2,00,000 से अधिक लोग अपंग हो गए। इस दुर्घटना के कारणों की जांच में पता चला कि फैक्ट्री की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर थी, कई
अभ्यास प्रश्न — Chapter 3
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. पारिस्थितिकी से आपका क्या अभिप्राय है? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पारिस्थितिकी का अर्थ है जीवों और उनके पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन। इसमें यह देखा जाता है कि जीव अपने पर्यावरण के साथ कैसे जुड़ते हैं, संसाधनों का उपयोग कैसे करते हैं, और पर्यावरणीय कारकों का उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है। यह अध्ययन प्राकृतिक और सामाजिक दोनों प्रकार के पर्यावरण को शामिल करता है।
व्याख्या:
पारिस्थितिकी जीवों और पर्यावरण के बीच के अंतर्संबंधों को समझने की प्रक्रिया है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि कैसे जीव अपने वातावरण के साथ तालमेल बिठाते हैं और पर्यावरणीय बदलावों का उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
Q2.2. पारिस्थितिकी सिर्फ प्राकृतिक शाक्तियों तक ही सीमित क्यों नहीं है?
उत्तर:
पारिस्थितिकी केवल प्राकृतिक शक्तियों तक सीमित नहीं है क्योंकि इसमें सामाजिक और मानव निर्मित पर्यावरण भी शामिल होता है। मानव गतिविधियाँ जैसे औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, और सामाजिक संस्थाएँ भी पर्यावरण को प्रभावित करती हैं। इसलिए पारिस्थितिकी का अध्ययन प्राकृतिक और सामाजिक दोनों पर्यावरणों के बीच के संबंधों को समझने के लिए आवश्यक है।
व्याख्या:
प्राकृतिक शक्तियाँ जैसे जल, वायु, मिट्टी आदि पर्यावरण के भाग हैं, लेकिन मानव समाज की गतिविधियाँ भी पर्यावरण को प्रभावित करती हैं। इसलिए पारिस्थितिकी का दायरा प्राकृतिक से आगे बढ़कर सामाजिक पर्यावरण तक फैलता है।
Q3.3. उस दोहरी प्रक्रिया का वर्णन करें जिसके कारण सामाजिक पर्यावरण का उद्भव होता है?
उत्तर:
सामाजिक पर्यावरण के उद्भव के पीछे दोहरी प्रक्रिया होती है: (i) मानव समाज का विकास और (ii) प्राकृतिक पर्यावरण के साथ मानव की अंतःक्रिया। मानव समाज के विकास के साथ सामाजिक संस्थाएँ, संस्कृतियाँ, और नियम बनते हैं जो पर्यावरण को आकार देते हैं। दूसरी ओर, प्राकृतिक पर्यावरण में बदलाव और संसाधनों का उपयोग भी सामाजिक पर्यावरण को प्रभावित करता है। इन दोनों प्रक्रियाओं के मेल से सामाजिक पर्यावरण का निर्माण होता है।
व्याख्या:
पहली प्रक्रिया में मानव समाज के विकास से सामाजिक संरचनाएँ बनती हैं, जो पर्यावरण के साथ संबंध स्थापित करती हैं। दूसरी प्रक्रिया में प्राकृतिक पर्यावरण के तत्वों का मानव जीवन पर प्रभाव पड़ता है। इन दोनों के संयोजन से सामाजिक पर्यावरण का स्वरूप बनता है।
Q4.4. सामाजिक संस्थाएँ कैसे तथा किस प्रकार से पर्यावरण तथा समाज के आपसी रिश्तों को आकार देती हैं?
उत्तर:
सामाजिक संस्थाएँ जैसे परिवार, शिक्षा, धर्म, और सरकार पर्यावरण और समाज के बीच के संबंधों को निर्धारित करती हैं। ये संस्थाएँ संसाधनों के उपयोग, संरक्षण, और वितरण के नियम बनाती हैं। उदाहरण के लिए, सरकार पर्यावरण संरक्षण के लिए कानून बनाती है, परिवार संसाधनों का उपभोग करता है, और शिक्षा पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाती है। इस प्रकार, सामाजिक संस्थाएँ पर्यावरण और समाज के आपसी रिश्तों को संरचित और नियंत्रित करती हैं।
व्याख्या:
सामाजिक संस्थाएँ पर्यावरणीय नियमों और व्यवहारों को निर्धारित करती हैं, जिससे समाज और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित होता है। ये संस्थाएँ संसाधनों के संरक्षण और उपयोग के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करती हैं।
Q5.5. पर्यावरण व्यवस्था समाज के लिए एक महत्वपूर्ण तथा जटिल कार्य क्यों है?
उत्तर:
पर्यावरण व्यवस्था समाज के लिए महत्वपूर्ण और जटिल इसलिए है क्योंकि यह प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, उपयोग, और पुनरुत्पादन का संतुलन बनाए रखती है। समाज की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए पर्यावरण की रक्षा करना चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि संसाधन सीमित हैं और उनकी मांग बढ़ती रहती है। इसके अलावा, पर्यावरणीय समस्याएँ जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन आदि सामाजिक और आर्थिक जीवन को प्रभावित करते हैं, जिससे यह कार्य और भी जटिल हो जाता है।
व्याख्या:
पर्यावरण व्यवस्था में संसाधनों का संतुलित उपयोग और संरक्षण शामिल है, जो समाज की आवश्यकताओं और पर्यावरण की सीमाओं के बीच संतुलन बनाता है। यह कार्य जटिल इसलिए है क्योंकि इसमें विभिन्न हितधारकों और पर्यावरणीय कारकों को ध्यान में रखना पड़ता है।
Q6.6. प्रदूषण संबंधित प्राकृतिक विपदाओं के मुख्य रूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
प्रदूषण संबंधित प्राकृतिक विपदाओं के मुख्य रूप हैं: (i) वायु प्रदूषण जिससे स्मॉग और सांस संबंधी बीमारियाँ होती हैं, (ii) जल प्रदूषण जिससे जल स्रोत दूषित हो जाते हैं और जल जनित रोग फैलते हैं, (iii) ध्वनि प्रदूषण जो मानसिक तनाव और सुनने की समस्या उत्पन्न करता है, और (iv) मृदा प्रदूषण जिससे कृषि योग्य भूमि की उर्वरता कम हो जाती है। ये सभी प्राकृतिक विपदाएँ मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं।
व्याख्या:
प्रदूषण के विभिन्न प्रकार प्राकृतिक संसाधनों को प्रभावित करते हैं और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में प्रकट होते हैं, जो समाज और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा हैं।
Q7.7. संसाधनों की क्षीणता से संबंधित पर्यावरण के प्रमुख मुद्दे कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
संसाधनों की क्षीणता से संबंधित पर्यावरण के प्रमुख मुद्दे हैं: (i) जल संकट, (ii) वन संसाधनों का क्षरण, (iii) खनिज संसाधनों की कमी, (iv) ऊर्जा संसाधनों का सीमित होना, और (v) जैव विविधता का नुकसान। ये मुद्दे पर्यावरणीय असंतुलन और सामाजिक आर्थिक समस्याओं को जन्म देते हैं।
व्याख्या:
संसाधनों की कमी से पर्यावरणीय दबाव बढ़ता है, जिससे प्राकृतिक तंत्र प्रभावित होते हैं और समाज के लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता घटती है।
Q8.8. पर्यावरण की समस्याएँ सामाजिक समस्याएँ भी हैं। कैसे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण की समस्याएँ सामाजिक समस्याएँ इसलिए भी हैं क्योंकि ये मानव जीवन के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य पहलुओं को प्रभावित करती हैं। उदाहरण के लिए, प्रदूषण से स्वास्थ्य संबंधी बीमारियाँ बढ़ती हैं, जल संकट से सामाजिक असमानता और संघर्ष उत्पन्न होते हैं, और प्राकृतिक संसाधनों की कमी से गरीबी और बेरोजगारी बढ़ती है। इसलिए पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान सामाजिक सुधारों और नीतियों के माध्यम से ही संभव है।
व्याख्या:
पर्यावरणीय समस्याएँ सीधे तौर पर समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित करती हैं, जिससे सामाजिक असमानता, स्वास्थ्य समस्याएँ और आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार ये समस्याएँ सामाजिक समस्याओं के रूप में भी देखी जाती हैं।
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