Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
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भू-उपयोग वर्गीकरण
व्याख्याभू-उपयोग वर्गीकरण
भूमि के विभिन्न उपयोगों को समझने और वर्गीकृत करने के लिए भू-उपयोग वर्गीकरण आवश्यक है। भारत में भू-उपयोग का वर्गीकरण भूराजस्व विभाग द्वारा किया जाता है, जो भूमि के विभिन्न उपयोगों को संवर्गों में बांटता है। यह वर्गीकरण कुल रिपोर्टिंग क्षेत्र के आधार पर होता है, जो भौगोलिक क्षेत्र से भिन्न हो सकता है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग भौगोलिक क्षेत्र की सही जानकारी प्रदान करता है, जो स्थायी होती है। भूराजस्व अभिलेखों में वर्गीकृत वन क्षेत्र तथा वास्तविक वन क्षेत्र में अंतर होता है क्योंकि वर्गीकृत वन क्षेत्र वह क्षेत्र है जहाँ वन विकसित हो सकते हैं। भूराजस्व अभिलेखों के अनुसार भू-उपयोग संवर्ग निम्नलिखित हैं: 1. वनों के अधीन क्षेत्र (Forest): यह वह क्षेत्र है जहाँ वन विकसित हो सकते हैं, परंतु वास्तविक वन क्षेत्र इससे भिन्न हो सकता है। 2. बंजर व व्यर्थ भूमि (Barren and wastelands): ऐसी भूमि जो वर्तमान तकनीकी से कृषि योग्य नहीं बनाई जा सकती, जैसे बंजर पहाड़ी, मरुस्थल, खड्ड आदि। 3. गैर कृषि-कार्यों में प्रयुक्त भूमि (Land put to Non-agricultural uses): इसमें ग्रामीण और शहरी बस्तियाँ, सड़कें, नहरें, उद्योग, दुकानें आदि शामिल हैं। इस क्षेत्र में वृद्धि द्वितीयक और तृतीयक आर्थिक क्रियाकलापों के विस्तार के कारण होती है। 4. स्थायी चरागाह क्षेत्र (Permanent pastures): अधिकांश भूमि ग्राम पंचायत या सरकार के स्वामित्व में होती है, जिसका उपयोग पशुओं के चरागाह के लिए होता है। 5. विविध तरु-प्रस्तलों व उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र (Area under miscellaneous tree crops and groves): इसमें फलदार वृक्ष और उद्यान आते हैं, जो सामान्यतः निजी स्वामित्व में होते हैं। 6. कृषि योग्य व्यर्थ भूमि (Culturable waste land): ऐसी भूमि जो पिछले पाँच वर्षों या उससे अधिक समय तक परती या कृषिरहित रही हो, परंतु सुधार कर कृषि योग्य बनाई जा सकती है। 7. वर्तमान परती भूमि (Current fallow): वह भूमि जो एक कृषि वर्ष या उससे कम समय तक कृषिरहित रहती है, जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है। 8. पुरातन परती भूमि (Fallow other than current fallow): भूमि जो एक वर्ष से अधिक लेकिन पाँच वर्षों से कम समय तक कृषिरहित रहती है। 9. निवल बोया क्षेत्र (Net area sown): वह भूमि जिस पर फ़सलें बोई और काटी जाती हैं। इस वर्गीकरण से भूमि के विभिन्न उपयोगों का विश्लेषण करना संभव होता है, जो नीति निर्धारण और संसाधन प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।
- भू-उपयोग वर्गीकरण भूराजस्व विभाग द्वारा किया जाता है।
- वर्गीकरण कुल रिपोर्टिंग क्षेत्र के आधार पर होता है, जो भौगोलिक क्षेत्र से भिन्न हो सकता है।
- मुख्य भू-उपयोग संवर्गों में वन क्षेत्र, बंजर भूमि, गैर कृषि भूमि, चरागाह, उपवन, व्यर्थ भूमि, परती भूमि और निवल बोया क्षेत्र शामिल हैं।
- वन क्षेत्र में वर्गीकृत भूमि और वास्तविक वन क्षेत्र में अंतर होता है।
- गैर कृषि भूमि में बस्तियाँ, सड़कें, उद्योग आदि आते हैं।
- स्थायी चरागाह और साझा संपत्ति संसाधन ग्राम पंचायत या सरकार के स्वामित्व में होते हैं।
- 📌 भू-उपयोग वर्गीकरण: भूमि के विभिन्न उपयोगों को संवर्गों में बांटना।
- 📌 रिपोर्टिंग क्षेत्र: भूराजस्व अभिलेखों के अनुसार भूमि का क्षेत्रफल।
- 📌 वन क्षेत्र: वह भूमि जहाँ वन विकसित हो सकते हैं।
भारत में भू-उपयोग परिवर्तन
व्याख्याभारत में भू-उपयोग परिवर्तन
भारत में भू-उपयोग परिवर्तन मुख्यतः आर्थिक क्रियाओं की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। भूमि एक स्थायी संसाधन है, लेकिन समय के साथ उसकी उपयोगिता और प्रकार में परिवर्तन होता रहता है। भू-उपयोग परिवर्तन को प्रभावित करने वाले तीन मुख्य कारक हैं: 1. अर्थव्यवस्था का आकार: जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है, आय स्तर में वृद्धि होती है और प्रौद्योगिकी विकसित होती है, वैसे-वैसे अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ता है। इससे भूमि पर दबाव बढ़ता है और सीमांत भूमि का उपयोग भी शुरू हो जाता है। 2. अर्थव्यवस्था की संरचना में बदलाव: समय के साथ द्वितीयक (उद्योग) और तृतीयक (सेवा) क्षेत्रों का विकास प्राथमिक क्षेत्र (कृषि) की तुलना में अधिक तीव्र होता है। इससे कृषि भूमि का गैर-कृषि कार्यों में रूपांतरण होता है, विशेषकर शहरी क्षेत्रों के आसपास। 3. कृषि क्रियाकलापों का दबाव: यद्यपि कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान कम होता जा रहा है, कृषि पर निर्भर जनसंख्या की संख्या बढ़ती जा रही है। इससे कृषि भूमि पर दबाव बना रहता है। 1950-51 से 2019-20 के बीच भारत में भू-उपयोग में कई बदलाव हुए हैं। चित्र 3.1 में इन परिवर्तनों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। इसमें वन क्षेत्र, गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि, स्थायी चरागाह, वर्तमान परती भूमि और निवल बोया क्षेत्र में वृद्धि देखी गई है। विशेष रूप से गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि में सबसे अधिक वृद्धि हुई है, जो औद्योगिक विकास, अवसंरचना विस्तार और शहरीकरण के कारण है। वन क्षेत्र में वृद्धि सीमांकन के कारण हुई है, न कि वास्तविक वन क्षेत्र में। वर्तमान परती भूमि में वृद्धि वर्षा की अनियमितता और फ़सल चक्र के कारण होती है। निवल बोया क्षेत्र में वृद्धि कृषि योग्य व्यर्थ भूमि के उपयोग से हुई है। वहीं, बंजर भूमि, कृषि योग्य व्यर्थ भूमि, फसल वृक्षों के अंतर्गत क्षेत्र और परती भूमि के अनुपात में कमी आई है, जो भूमि के अधिक उपयोग और कृषि भूमि के दबाव के कारण है। इस प्रकार भू-उपयोग परिवर्तन आर्थिक विकास, जनसंख्या वृद्धि और तकनीकी प्रगति के साथ जुड़ा हुआ है।
- भू-उपयोग परिवर्तन आर्थिक क्रियाओं की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।
- अर्थव्यवस्था के आकार और संरचना में बदलाव भूमि उपयोग को प्रभावित करता है।
- गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि में सबसे अधिक वृद्धि हुई है।
- वन क्षेत्र में वृद्धि सीमांकन के कारण हुई है, वास्तविक वन क्षेत्र में नहीं।
- वर्तमान परती भूमि में वृद्धि वर्षा की अनियमितता के कारण होती है।
- निवल बोया क्षेत्र में वृद्धि कृषि योग्य व्यर्थ भूमि के उपयोग से हुई है।
- 📌 वास्तविक वृद्धि: दो समय कालों के भू-उपयोग संवर्गों का क्षेत्रफल का अंतर।
- 📌 वृद्धि दर: वास्तविक वृद्धि का आधार वर्ष के क्षेत्रफल के अनुपात में प्रतिशत।
- 📌 गैर-कृषि कार्य: उद्योग, बस्तियाँ, सड़कें आदि जो कृषि से संबंधित नहीं हैं।
साझा संपत्ति संसाधन (Common Property Resources)
व्याख्यासाझा संपत्ति संसाधन (Common Property Resources)
भूमि के स्वामित्व के आधार पर भूमि को दो मुख्य वर्गों में बांटा जाता है: निजी भूमि और साझा संपत्ति संसाधन (CPRs)। निजी भूमि पर व्यक्तियों या कुछ व्यक्तियों का निजी स्वामित्व होता है, जबकि साझा संपत्ति संसाधन सामुदायिक उपयोग के लिए होते हैं और राज्य या
अभ्यास प्रश्न — Chapter 3
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए। (i) निम्न में से कौन-सा भू-उपयोग संवर्ग नहीं है? (क) परती भूमि (ख) सीमांत भूमि (ग) निवल बोया क्षेत्र (घ) कृषि योग्य व्यर्थ भूमि (ii) पिछले 40 वर्षों में वनों का अनुपात बढ़ने का निम्न में से कौन-सा कारण है? (क) वनीकरण के विस्तृत व सक्षम प्रयास (ख) सामुदायिक वनों के अधीन क्षेत्र में वृद्धि (ग) वन बढ़ोतरी हेतु निर्धारित अधिसूचित क्षेत्र में वृद्धि (घ) वन क्षेत्र प्रबंधन में लोगों की बेहतर भागीदारी (iii) निम्न में से कौन-सा सिंचित क्षेत्रों में भू-निम्नीकरण का मुख्य प्रकार है? (क) अवनालिका अपरदन (ख) वायु अपरदन (ग) मृदा लवणता (घ) भूमि पर सिल्ट का जमाव (iv) शुष्क कृषि में निम्न में से कौन-सी फ़सल नहीं बोई जाती? (क) रागी (ख) ज्वार (ग) मृगफली (घ) गन्ना [Page 20] (v) निम्न में से कौन से देशों में गेहूँ व चावल की अधिक उत्पादकता की किस्में विकसित की गई थीं? (क) जापान तथा आस्ट्रेलिया (ग) मैक्सिको तथा फिलीपींस (ख) संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जापान (घ) मैक्सिको तथा सिंगापुर
उत्तर:
(i) सही उत्तर: (ग) निवल बोया क्षेत्र व्याख्या: निवल बोया क्षेत्र भू-उपयोग का संवर्ग नहीं है, यह कृषि से संबंधित एक माप है। परती भूमि, सीमांत भूमि, और कृषि योग्य व्यर्थ भूमि भू-उपयोग के संवर्ग हैं। (ii) सही उत्तर: (क) वनीकरण के विस्तृत व सक्षम प्रयास व्याख्या: पिछले 40 वर्षों में वनों के अनुपात में वृद्धि का मुख्य कारण वनीकरण के व्यापक और प्रभावी प्रयास हैं, जो वन क्षेत्र की वृद्धि में सहायक हैं। (iii) सही उत्तर: (ग) मृदा लवणता व्याख्या: सिंचित क्षेत्रों में भू-निम्नीकरण का मुख्य प्रकार मृदा लवणता है, जो सिंचाई के कारण मृदा में लवणों के जमाव से होता है। (iv) सही उत्तर: (घ) गन्ना व्याख्या: शुष्क कृषि में गन्ना नहीं बोया जाता क्योंकि यह अधिक जल की मांग करता है, जबकि रागी, ज्वार, और मृगफली शुष्क कृषि के लिए उपयुक्त फसलें हैं। (v) सही उत्तर: (ग) मैक्सिको तथा फिलीपींस व्याख्या: गेहूँ और चावल की अधिक उत्पादकता वाली किस्में मैक्सिको और फिलीपींस में विकसित की गई थीं, जो हरित क्रांति के प्रमुख केंद्र थे।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न के विकल्पों का विश्लेषण करते हुए सही विकल्प चुना गया है। निवल बोया क्षेत्र कृषि माप है, भू-उपयोग संवर्ग नहीं। वनों के अनुपात में वृद्धि के लिए वनीकरण प्रयास मुख्य कारण हैं। सिंचित क्षेत्रों में मृदा लवणता भू-निम्नीकरण का प्रमुख कारण है। शुष्क कृषि में जल की कम मांग वाली फसलें बोई जाती हैं, गन्ना जल की अधिक मांग करता है। गेहूँ और चावल की उच्च उत्पादकता वाली किस्में मैक्सिको और फिलीपींस में विकसित हुईं।
Q2.2. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें। (i) बंजर भूमि तथा कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में अंतर स्पष्ट करें। (ii) निवल बोया गया क्षेत्र तथा सकल बोया गया क्षेत्र में अंतर बताएँ। (iii) भारत जैसे देश में गहन कृषि नीति अपनाने की आवश्यकता क्यों है? (iv) शुष्क कृषि तथा आर्द्र कृषि में क्या अंतर हैं?
उत्तर:
(i) बंजर भूमि वह भूमि होती है जो कृषि के लिए उपयुक्त नहीं होती, जबकि कृषि योग्य व्यर्थ भूमि वह भूमि है जो वर्तमान में उपयोग में नहीं है पर कृषि के लिए उपयुक्त है। (ii) निवल बोया गया क्षेत्र वह भूमि है जिस पर एक बार फसल बोई गई हो, जबकि सकल बोया गया क्षेत्र में एक से अधिक बार फसल बोई जाती है, इसलिए सकल बोया गया क्षेत्र अधिक होता है। (iii) भारत जैसे देश में गहन कृषि नीति अपनाने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि यहाँ जनसंख्या अधिक है और भूमि सीमित है, अतः उत्पादन बढ़ाने के लिए संसाधनों का अधिकतम उपयोग आवश्यक है। (iv) शुष्क कृषि में वर्षा पर निर्भरता अधिक होती है और सिंचाई कम होती है, जबकि आर्द्र कृषि में सिंचाई की सुविधा होती है और वर्षा की कमी कम प्रभाव डालती है।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का संक्षिप्त और स्पष्ट उत्तर दिया गया है। बंजर भूमि और कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में उपयोगिता का अंतर, निवल और सकल बोया गया क्षेत्र की परिभाषा, भारत में गहन कृषि नीति की आवश्यकता और शुष्क व आर्द्र कृषि के बीच मुख्य अंतर को समझाया गया है।
Q3.3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दें। (i) भारत में भूसंसाधनों की विभिन्न प्रकार की पर्यावरणीय समस्याएँ कौन-सी हैं? उनका निदान कैसे किया जाए? (ii) भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कृषि विकास की महत्वपूर्ण नीतियों का वर्णन करें।
उत्तर:
(i) भारत में भूसंसाधनों से जुड़ी पर्यावरणीय समस्याओं में मृदा अपरदन, मृदा क्षरण, मृदा लवणता, वनों की कटाई, और भूमि प्रदूषण प्रमुख हैं। मृदा अपरदन में जल और वायु द्वारा मृदा का कटाव शामिल है। मृदा लवणता सिंचाई के कारण होती है। इन समस्याओं के निदान के लिए वनीकरण, सतत कृषि पद्धतियाँ, मृदा संरक्षण तकनीकें, जल प्रबंधन, और जन जागरूकता आवश्यक है। (ii) स्वतंत्रता के बाद भारत में कृषि विकास के लिए कई नीतियाँ अपनाई गईं जैसे हरित क्रांति, सिंचाई परियोजनाएँ, बीज सुधार, उर्वरक एवं कीटनाशक का उपयोग, कृषि विस्तार सेवाएँ, और भूमि सुधार। इन नीतियों ने कृषि उत्पादन में वृद्धि की, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की और किसानों की आय बढ़ाई।
व्याख्या:
प्रश्न (i) में पर्यावरणीय समस्याओं का वर्णन और उनके समाधान के उपाय विस्तार से दिए गए हैं। प्रश्न (ii) में स्वतंत्रता के बाद की कृषि नीतियों का सारांश प्रस्तुत किया गया है, जो भारत के कृषि विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
Q4.भू-उपयोग वर्गीकरण में 'वनों के अधीन क्षेत्र' का क्या अर्थ है और यह वास्तविक वन क्षेत्र से किस प्रकार भिन्न होता है?
उत्तर:
वनों के अधीन क्षेत्र वह क्षेत्र है जहाँ वन विकसित हो सकते हैं, लेकिन यह वास्तविक वन क्षेत्र से भिन्न होता है क्योंकि इसमें केवल वर्गीकृत वन क्षेत्र शामिल होते हैं, न कि वास्तविक रूप में वन से आच्छादित क्षेत्र। उदाहरण के लिए, भूराजस्व अभिलेखों में वर्गीकृत वन क्षेत्र में वृद्धि हो सकती है, पर इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ वास्तविक वन हैं।
व्याख्या:
वनों के अधीन क्षेत्र का अर्थ है वह भूमि जो वन विकसित करने के लिए वर्गीकृत की गई है। यह वास्तविक वन क्षेत्र से इसलिए भिन्न है क्योंकि वर्गीकरण में वन विकसित होने की संभावित भूमि को शामिल किया जाता है, जबकि वास्तविक वन क्षेत्र में केवल वह भूमि शामिल होती है जहाँ वन वास्तव में मौजूद हैं। भूराजस्व अभिलेखों में इस वर्गीकरण को सतत अपनाया जाता है, जिससे क्षेत्रफल में वृद्धि हो सकती है, लेकिन यह वास्तविक वन क्षेत्र की वृद्धि को दर्शाता नहीं है।
Q5.निम्नलिखित में से कौन-सा भू-उपयोग वर्ग कृषि योग्य व्यर्थ भूमि के अंतर्गत आता है?
उत्तर:
वह भूमि जो पिछले पाँच वर्षों तक या अधिक समय तक कृषिरहित रही हो
व्याख्या:
कृषि योग्य व्यर्थ भूमि वह भूमि होती है जो पिछले पाँच वर्षों या उससे अधिक समय तक परती या कृषिरहित रही हो, लेकिन भूमि उद्धार तकनीक द्वारा इसे सुधार कर कृषि योग्य बनाया जा सकता है। वर्तमान परती भूमि और पुरातन परती भूमि इससे भिन्न हैं।
Q6.1950-51 से 2019-20 तक भारत में गैर कृषि-कार्यों में प्रयुक्त भूमि के क्षेत्रफल में वृद्धि के मुख्य कारण क्या हैं?
उत्तर:
1950-51 से 2019-20 तक गैर कृषि-कार्यों में प्रयुक्त भूमि के क्षेत्रफल में वृद्धि के मुख्य कारण हैं— (i) औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों का विकास, (ii) अवसंरचना जैसे सड़कें, नहरें आदि का विस्तार, (iii) शहरी और ग्रामीण बस्तियों का विस्तार। उदाहरण के लिए, शहरों के आस-पास कृषि भूमि का इमारतों के लिए उपयोग बढ़ा है।
व्याख्या:
गैर कृषि-कार्यों में प्रयुक्त भूमि में वृद्धि का मुख्य कारण भारत की अर्थव्यवस्था की संरचना में बदलाव है, जिसमें द्वितीयक और तृतीयक सेक्टरों का विकास तेजी से हुआ है। इसके साथ ही, अवसंरचना का विस्तार और शहरीकरण ने भी इस भूमि के उपयोग को बढ़ाया है। इस कारण कृषि भूमि का कुछ हिस्सा गैर-कृषि कार्यों के लिए उपयोग में आ गया है।
Q7.साझा संपत्ति संसाधन (Common Property Resources) के क्या लाभ हैं और ग्रामीण महिलाओं के लिए इसका क्या महत्व है?
उत्तर:
साझा संपत्ति संसाधन सामुदायिक उपयोग के लिए होते हैं जो चारा, ईंधन, लकड़ी, फल, औषधीय पौधे आदि उपलब्ध कराते हैं। ग्रामीण महिलाओं के लिए यह महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे चारा और ईंधन लकड़ी एकत्रित करने की जिम्मेदारी निभाती हैं। उदाहरण के लिए, इन संसाधनों की कमी से महिलाओं को दूर तक जाना पड़ता है।
व्याख्या:
साझा संपत्ति संसाधन ग्रामीण गरीबों और भूमिहीन किसानों के लिए आजीविका का स्रोत हैं। ये संसाधन पशुपालन के लिए चारा, घरेलू उपयोग के लिए ईंधन और अन्य वन उत्पाद प्रदान करते हैं। महिलाओं के लिए इन संसाधनों का विशेष महत्व है क्योंकि वे ग्रामीण इलाकों में ईंधन और चारा इकट्ठा करती हैं। संसाधनों की कमी से उनकी जीवनशैली प्रभावित होती है।
Q8.भारत में कृषि गहनता की गणना कैसे की जाती है? निम्नलिखित में से सही सूत्र चुनिए।
उत्तर:
(सकल बोया गया क्षेत्र ÷ निवल बोया गया क्षेत्र) × 100
व्याख्या:
कृषि गहनता का अर्थ है प्रति इकाई भूमि पर एक वर्ष में बोई गई कुल फसल क्षेत्रफल का निवल बोया गया क्षेत्रफल के अनुपात में प्रतिशत। इसका सूत्र है: कृषि गहनता = (सकल बोया गया क्षेत्र ÷ निवल बोया गया क्षेत्र) × 100।
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Geography · Class 12