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Chapter 10

🎓 Class 11📖 Shashwati📖 6 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~9 मिनट
Chapter 9अध्याय 10 / 11Chapter 11

Chapter 10अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 6 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

सच्चमाहो रजस्तम:

अवधारणा

सच्चमाहो रजस्तम:

इस अध्याय का आरंभ श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य संदेश से होता है, जो किसी विशेष जाति, धर्म, सम्प्रदाय अथवा देश के लिए सीमित नहीं है, बल्कि इसका उपदेश सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। गीता का संदेश जीवन के हर पक्ष के समुचित विकास हेतु है जिससे मनुष्य श्रेष्ठता और देवत्व की प्राप्ति कर सकता है। गीता को उपनिषदों के साररूप में माना गया है और इसमें जीवन के उच्चतम आदर्शों को सरल और सर्वसुलभ रूप में प्रस्तुत किया गया है। अर्जुन की हृदय की दुर्बलता पर विजय प्राप्ति का उदाहरण देते हुए पाठक को प्रेरित किया गया है कि गीता के उपदेशों का पालन कर ऐहिक और पारमार्थिक सुखों की प्राप्ति संभव है। इस खंड में गीता के दार्शनिक चिंतन, भक्तिवर्णन और कर्मनिष्ठा की महत्ता को भी बताया गया है, जिससे यह ग्रंथ विश्व में अत्यंत प्रतिष्ठित हो चुका है। इस प्रकार यह खंड गीता के महत्व और उसके सार्वभौमिक संदेश का परिचय कराता है।

  • गीता का संदेश सार्वभौमिक और सार्वकालिक है।
  • यह किसी जाति, धर्म या देश विशेष के लिए सीमित नहीं।
  • गीता उपनिषदों के साररूप मानी गई है।
  • अर्जुन की हृदय दुर्बलता पर विजय का उदाहरण।
  • गीता के उपदेशों से ऐहिक और पारमार्थिक सुखों की प्राप्ति।
  • गीता दार्शनिक चिंतन, भक्तिवर्णन और कर्मनिष्ठा का संगम।
  • 📌 सार्वभौमिक: जो सभी के लिए समान रूप से लागू हो।
  • 📌 सार्वकालिक: जो सभी कालों में प्रासंगिक हो।
  • 📌 ऐहिक सुख: सांसारिक सुख।

जीवों में व्याप्त स्वभावजन्य श्रद्धा तथा सत्त्व-रजस्-तमो गुणोपेत भेद

अवधारणा

जीवों में व्याप्त स्वभावजन्य श्रद्धा तथा सत्त्व-रजस्-तमो गुणोपेत भेद

इस खंड में जीवों में स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा के तीन प्रकारों का वर्णन है: सात्त्विकी, राजसी, और तामसी। श्रद्धा का यह त्रिविध स्वरूप जीवों के स्वभाव के अनुरूप होता है। सात्त्विकी श्रद्धा शुद्ध, स्थिर और ज्ञानयुक्त होती है, जो व्यक्ति को सत्य और धर्म की ओर ले जाती है। राजसी श्रद्धा क्रियाशील, उत्साही और कामनाओं से प्रेरित होती है, जो व्यक्ति को कर्मशील बनाती है लेकिन अस्थिरता और अहंकार भी उत्पन्न कर सकती है। तामसी श्रद्धा अज्ञानता, निष्क्रियता और भ्रम से युक्त होती है, जो व्यक्ति को आलस्य और उदासीनता की ओर ले जाती है। इस प्रकार श्रद्धा के ये तीन भेद जीवों के स्वभाव और मानसिक अवस्थाओं को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त, इन तीनों प्रकार की श्रद्धा से युक्त आहार, तप और दान के भेद भी वर्णित हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं में गुणों के प्रभाव को स्पष्ट करते हैं।

  • श्रद्धा तीन प्रकार की होती है: सात्त्विकी, राजसी, तामसी।
  • सात्त्विकी श्रद्धा शुद्धता और ज्ञान से युक्त होती है।
  • राजसी श्रद्धा क्रिया, उत्साह और कामना से प्रेरित होती है।
  • तामसी श्रद्धा अज्ञानता और निष्क्रियता का प्रतीक है।
  • श्रद्धा के प्रकार जीवों के स्वभाव के अनुरूप होते हैं।
  • आहार, तप और दान भी इन गुणों के अनुसार भिन्न होते हैं।
  • 📌 श्रद्धा: आस्था या विश्वास।
  • 📌 सात्त्विकी: सत्त्व गुण से युक्त।
  • 📌 राजसी: रजोगुण से युक्त।

त्रिविध आहार, तप और दान का वर्णन

अवधारणा

त्रिविध आहार, तप और दान का वर्णन

इस खंड में आहार, तप और दान के तीन प्रकारों का विस्तृत वर्णन है जो सत्त्व, रजस् और तमस् गुणों से प्रभावित होते हैं। सात्त्विक आहार वह होता है जो आयु, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाता है, जैसे स्निग्ध, स्थिर, हृदय को प्रिय और शुद्ध आहार। राजसी आहार

अभ्यास प्रश्नChapter 10

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. एकपदेन उत्तरत। (क) श्रद्धा कतिविधा भवति? (ख) देहिनां का स्वभावजा भवति? (ग) आहार: कतिविधो भवति? (घ) दु:खशोकामयप्रदा: आहारा: कस्य इष्टा:? (ङ) कीदूशं वाक्यं वाङ्मयं तप उच्यते? (च) देशे काले पात्रे च दीयमानं कीदूशं दानं भवति? (छ) प्रत्युपकारार्थं यद्दानं तत् कीदूशं दानं कथ्यते? (ज) तामसं दानं पात्रेभ्य: दीयते अपात्रेभ्य: वा?

उत्तर:

उत्तर: (क) श्रद्धा त्रिविधा भवति - सत्त्विका, राजसिका, तामसिका। (ख) देहिनां स्वभावजा सत्त्व, रज, तम इति गुणा: भवति। (ग) आहार: त्रिविधो भवति - सात्विक, राजसिक, तामसिक। (घ) दु:खशोकामयप्रदा: आहारा: तामसिकाः इष्टाः। (ङ) वाक्यं वाङ्मयं तप उच्यते यत् वाक्यं ज्ञानप्रदं, शुद्धं च भवति। (च) देशे काले पात्रे च दीयमानं दानं सात्विकं दानं भवति। (छ) प्रत्युपकारार्थं यद्दानं तत् राजसिकं दानं कथ्यते। (ज) तामसं दानं पात्रेभ्य: दीयते, अपात्रेभ्य: न।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पाठ्यपुस्तक के अनुसार दिया गया है। श्रद्धा और आहार के प्रकार, दान के भेद, तथा वाक्य और दान की प्रकृति पर आधारित है।

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Q2.2. पूर्णवाक्येन उत्तरत। (क) श्रद्धा कस्य अनुरूपा भवति? (ख) तामसा जना: कानू यजन्ते? (ग) के जना: दम्भाहंकारसंयुक्ता: भवन्ति? (घ) सात्विकप्रिया: आहारा: कीदूशा: भवन्ति? (ङ) किं किं शारीरं तप उच्यते? (च) राजसं दानं किम् उच्यते?

उत्तर:

उत्तर: (क) श्रद्धा तस्य व्यक्तेः गुणानुरूपा भवति। (ख) तामसा जना: अधमं कर्म यजन्ते। (ग) दम्भाहंकारसंयुक्ता: ते जना: रजसिकाः भवन्ति। (घ) सात्विकप्रिया: आहारा: निर्मलाः, स्वास्थ्यकराः च भवन्ति। (ङ) शरीरं, वाक्यं, मनः च तप उच्यते। (च) राजसं दानं तत्त्वेन प्रेरितं, प्रत्युपकारार्थं दत्तं दानं भवति।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पाठ्यपुस्तक के अनुसार पूर्णवाक्य में दिया गया है। श्रद्धा, आहार, दान, तथा तप की परिभाषा स्पष्ट की गई है।

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Q3.3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत। (क) अयं पुरूजं: श्रद्धामय: भवति। (ख) सात्विका: देवानु यजन्ते। (ग) पर्युषितं भोजनं तामसप्रियं भवति। (घ) शारीरं तप उच्यते। (ङ) वाङ्मयं तप उच्यते। (च) यद्दानम् अपात्रेभ्य: दीयते।

उत्तर:

उत्तर: (क) श्रद्धामय: पुरूजं: कः भवति? (ख) को जना: सात्विका: देवानु यजन्ते? (ग) तामसप्रियं भोजनं किम् भवति? (घ) शारीरं किम् तप उच्यते? (ङ) वाङ्मयं किम् तप उच्यते? (च) अपात्रेभ्य: दानं किम् भवति?

व्याख्या:

प्रत्येक रेखांकित पद के आधार पर प्रश्न बनाए गए हैं, जो पाठक से उस पद की व्याख्या या विवरण मांगते हैं।

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Q4.4. प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत। प्रकृति: प्रत्यय: यथा-त्रिविधा - त्रिविध टाप् (क) सात्विकी - ... ... (ख) पर्युषितम् - ... ... (ग) सौम्यत्वम् - ... ... (घ) तप्तम् - ... ... (ङ) दातव्यम् - ... ... (च) उद्देश्य - ... ...

उत्तर:

उत्तर: (क) सात्विकी - सत्त्व + इ (ख) पर्युषितम् - पर्युष् + इतम् (ग) सौम्यत्वम् - सौम्य + त्वम् (घ) तप्तम् - तप् + तम् (ङ) दातव्यम् - दा + त्व्यम् (च) उद्देश्य - उद् + देश्य

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द को उसके मूल प्रकृति और प्रत्यय में विभाजित किया गया है। प्रत्यय शब्द के अंत में जुड़ने वाले उपसर्ग या प्रत्यय होते हैं।

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Q5.5. पर्यायपदै: सह मेलनं कुरुत। यथा- जना: मनुष्या: (क) देव: - ... ... (ख) गुरु: - ... ... (ग) प्राज्ञ: - ... ... (घ) शौचम् - ... ... (ङ) आर्जवम् - ... ...

उत्तर:

उत्तर: (क) देव: - ईश्वर, भगवान् (ख) गुरु: - शिक्षक, आचार्य (ग) प्राज्ञ: - ज्ञानी, विद्वान् (घ) शौचम् - पवित्रता, स्वच्छता (ङ) आर्जवम् - सादगी, सरलता

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द के पर्यायवाची शब्दों को मिलाया गया है जो समान अर्थ व्यक्त करते हैं।

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Q6.6. विलोमपदै: सह योजयत। यथा- देव: दानव: (क) अहिंसा अपात्रे (ख) अनुद्वेगकरम् असत्यम् (ग) अभ्यसनम् काठिन्यम् (घ) सत्यम् अनभ्यसनम् (ङ) पात्रे उद्वेगकरम् (च) सौम्यत्वम् हिंसा

उत्तर:

उत्तर: (क) अहिंसा - हिंसा (ख) अनुद्वेगकरम् - उद्वेगकरम् (ग) अभ्यसनम् - अनभ्यसनम् (घ) सत्यम् - असत्यम् (ङ) पात्रे - अपात्रे (च) सौम्यत्वम् - क्रूरत्वम् (हिंसा)

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द के विलोम शब्दों को मिलाया गया है जो विपरीत अर्थ व्यक्त करते हैं।

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Q7.7. विशेषणं विशेषेण सह मेलनं कुरुत। यथा- त्रिविधा श्रद्धा (क) सत्त्वानुरूपा आहार: (ख) तामसा: भोजनम् (ग) घोरम् वाक्यम् (घ) प्रिय: जना: (ङ) पर्युषितम् तप: (च) अनुद्वेगकरम् श्रद्धा

उत्तर:

उत्तर: (क) सत्त्वानुरूपा आहार: - सात्विक आहार (ख) तामसा: भोजनम् - तामसिक भोजन (ग) घोरम् वाक्यम् - राजसिक वाक्य (घ) प्रिय: जना: - सत्त्विक जना: (ङ) पर्युषितम् तप: - तामसिक तप (च) अनुद्वेगकरम् श्रद्धा - राजसिक श्रद्धा

व्याख्या:

प्रत्येक विशेषण को उसके उपयुक्त विशेष्य के साथ मिलाया गया है जो गुणों के अनुसार वर्गीकृत हैं।

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Q8.8. सन्धि सन्धिच्छेदं वा कुरुत। (क) चैव - …………………… …………………… (ख) तपो जना: - …………………… …………………… (ग) यज्ञस्तपस्तथा - …………………… …………………… (घ) आहारस्त्वपि - …………………… …………………… (ङ) राजसस्य+इष्टा - …………………… …………………… (च) उत्+शिष्टम् - …………………… …………………… (छ) वाक्+मयम् - …………………… …………………… (ज) प्रति+उपकारार्थम् - …………………… ……………………

उत्तर:

उत्तर: (क) चैव = च + एव (ख) तपो जना: = तपस् + जनाः (ग) यज्ञस्तपस्तथा = यज्ञस् + तपस् + तथा (घ) आहारस्त्वपि = आहारस् + त्वपि (ङ) राजसस्य + इष्टा = राजस् + इष्टा (च) उत् + शिष्टम् = उत् + शिष्टम् (छ) वाक् + मयम् = वाक् + मयम् (ज) प्रति + उपकारार्थम् = प्रति + उपकारार्थम्

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द को उसके सन्धि और सन्धिच्छेद में विभाजित किया गया है।

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