Chapter 13
Chapter 13 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 8 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
13.1 जैव विविधता
व्याख्या13.1 जैव विविधता
जैव विविधता का अर्थ है पृथ्वी पर जीवन के सभी स्तरों पर उपस्थित जीवों की विविधता। यह विविधता न केवल जाति (स्पीशीज) स्तर पर होती है, बल्कि आनुवंशिक स्तर से लेकर पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) स्तर तक फैली होती है। जैव विविधता शब्द को सामाजिक जीववैज्ञानिक एडवर्ड विलसन ने जैविक संगठन के प्रत्येक स्तर पर उपस्थित विविधता को दर्शाने के लिए प्रचलित किया। इसमें तीन मुख्य प्रकार की विविधता शामिल हैं: (क) आनुवंशिक विविधता, जो एक जाति के भीतर आनुवंशिक भिन्नता को दर्शाती है; (ख) जातीय विविधता, जो विभिन्न जातियों की संख्या और प्रकार को दर्शाती है; और (ग) पारिस्थितिकीय विविधता, जो विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, भारत में 50,000 से अधिक आनुवंशिक रूप से भिन्न धान की जातियाँ हैं। भारत का भूमिक्षेत्र विश्व का केवल 2.4 प्रतिशत है, लेकिन इसकी वैश्विक जातीय विविधता 8.1 प्रतिशत है, इसलिए भारत को 12 महाविविध देशों में गिना जाता है। जैव विविधता पृथ्वी पर समान रूप से वितरित नहीं होती, बल्कि उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक होती है। यह विविधता पृथ्वी के विकास के लाखों वर्षों में विकसित हुई है, लेकिन वर्तमान में मानव गतिविधियों के कारण यह तेजी से घट रही है। जैव विविधता का संरक्षण इसलिए आवश्यक है ताकि पारितंत्र के कार्य सही ढंग से चलते रहें और मानव जीवन सुरक्षित रहे।
- जैव विविधता में आनुवंशिक, जातीय और पारिस्थितिकीय विविधता शामिल है।
- भारत में वैश्विक जैव विविधता का 8.1 प्रतिशत हिस्सा है।
- जैव विविधता का वितरण समान नहीं है, उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में अधिक है।
- जैव विविधता पृथ्वी के विकास के लाखों वर्षों में विकसित हुई है।
- मानव गतिविधियाँ जैव विविधता की क्षति का मुख्य कारण हैं।
- जैव विविधता का संरक्षण पारितंत्र के स्थायित्व और मानव जीवन के लिए आवश्यक है।
- 📌 जैव विविधता: पृथ्वी पर जीवन के सभी स्तरों पर उपस्थित जीवों की विविधता।
- 📌 आनुवंशिक विविधता: एक जाति के भीतर आनुवंशिक भिन्नता।
- 📌 जातीय विविधता: विभिन्न जातियों की संख्या और प्रकार।
13.1.1 पृथ्वी तथा भारत में कितनी जातियाँ (स्पीशीज) हैं?
व्याख्या13.1.1 पृथ्वी तथा भारत में कितनी जातियाँ (स्पीशीज) हैं?
पृथ्वी पर अब तक खोजी और नामित जातियों की संख्या लगभग 1.5 मिलियन से अधिक है, लेकिन वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। आई.यू.सी.एन. (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेस) के अनुसार, पृथ्वी पर लगभग 7 मिलियन (70 लाख) जातियाँ हो सकती हैं। जंतु जातियाँ कुल खोजी जातियों का लगभग 70 प्रतिशत हैं, जिनमें कीट जातियाँ सबसे अधिक हैं। भारत में लगभग 45,000 पादप जातियाँ और उससे दोगुनी जंतु जातियाँ पाई जाती हैं। भारत का क्षेत्रफल विश्व का केवल 2.4 प्रतिशत है, लेकिन इसकी जैव विविधता वैश्विक जैव विविधता का 8.1 प्रतिशत है। भारत को 12 महाविविध देशों में गिना जाता है। जंतु वर्गों में कवक जातियाँ मछली, उभयचर, सरीसृप और स्तनधारियों की तुलना में अधिक हैं। प्रोकैरियोटिक जातियों की संख्या ज्ञात नहीं है क्योंकि उनकी पहचान पारंपरिक वर्गीकरण विधियों से कठिन है।
- पृथ्वी पर खोजी गई जातियों की संख्या लगभग 1.5 मिलियन से अधिक है।
- वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार पृथ्वी पर लगभग 7 मिलियन जातियाँ हो सकती हैं।
- जंतु जातियाँ कुल जातियों का लगभग 70 प्रतिशत हैं, जिनमें कीट सबसे अधिक हैं।
- भारत में लगभग 45,000 पादप जातियाँ और उससे दोगुनी जंतु जातियाँ हैं।
- भारत का क्षेत्रफल विश्व का 2.4 प्रतिशत है, लेकिन जैव विविधता का 8.1 प्रतिशत हिस्सा है।
- प्रोकैरियोटिक जातियों की संख्या ज्ञात नहीं है क्योंकि उनकी पहचान कठिन है।
- 📌 आई.यू.सी.एन.: अंतरराष्ट्रीय संगठन जो प्रकृति संरक्षण और संसाधनों के संरक्षण के लिए काम करता है।
- 📌 महाविविध देश: वे देश जिनमें जैव विविधता अत्यधिक होती है।
13.1.2 जैव विविधता के प्रतिरूप (पैटर्न)
व्याख्या13.1.2 जैव विविधता के प्रतिरूप (पैटर्न)
जैव विविधता पृथ्वी पर समान रूप से वितरित नहीं होती है, बल्कि इसका वितरण अक्षांशीय प्रवणता और जातीय क्षेत्र संबंध के आधार पर होता है। अक्षांशीय प्रवणता के अनुसार, भूमध्य रेखा के निकट उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में जैव विविधता अधिक होती है और ध्रुवों की ओर
अभ्यास प्रश्न — Chapter 13
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. जैव-विविधता के तीन आवश्यक घटकों (कंपोनेंट) के नाम बताइए?
उत्तर:
जैव-विविधता के तीन आवश्यक घटक हैं: 1. आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): किसी जाति के भीतर आनुवंशिक भिन्नता। 2. जातीय विविधता (Species Diversity): किसी क्षेत्र में पाए जाने वाली विभिन्न जातियाँ। 3. पारितंत्र विविधता (Ecosystem Diversity): विभिन्न पारितंत्रों का विविध रूप।
व्याख्या:
जैव-विविधता का अध्ययन तीन स्तरों पर किया जाता है। आनुवंशिक विविधता से जाति के अंदर के भिन्नता को समझा जाता है। जातीय विविधता से क्षेत्र में पाए जाने वाली विभिन्न जातियों की संख्या और प्रकार को जाना जाता है। पारितंत्र विविधता से विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता को समझा जाता है।
Q2.2. पारिस्थितिकीविद् किस प्रकार विश्व की कुल जातियों का आंकलन करते हैं?
उत्तर:
पारिस्थितिकीविद् विश्व की कुल जातियों का आंकलन अनुमानित विधि से करते हैं। वे ज्ञात क्षेत्रों में जाति संख्या का अध्ययन करते हैं और फिर इसे विश्व के अन्य क्षेत्रों पर लागू कर अनुमान लगाते हैं। इसके लिए वे जाति-क्षेत्र संबंध (Species-Area Relationship) का उपयोग करते हैं, जिसमें क्षेत्रफल के बढ़ने पर जाति संख्या में वृद्धि का गणितीय संबंध होता है।
व्याख्या:
जाति-क्षेत्र संबंध के आधार पर, यदि किसी क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्ञात है और उसमें जाति संख्या ज्ञात है, तो बड़े क्षेत्र के लिए जाति संख्या का अनुमान लगाया जा सकता है। यह विधि विश्व की कुल जातियों का अनुमान लगाने में सहायक होती है।
Q3.3. उष्ण कटिबंध क्षेत्रों में सबसे अधिक स्तर की जाति-समृद्धि क्यों मिलती हैं? इसकी तीन परिकल्पनाएँ दीजिए?
उत्तर:
उष्ण कटिबंध क्षेत्रों में अधिक जाति-समृद्धि के कारण: 1. स्थिर जलवायु: उष्ण कटिबंध में जलवायु स्थिर और अनुकूल होती है, जिससे जीवों के लिए अनुकूल आवास बनता है। 2. अधिक ऊर्जा उपलब्धता: सूर्य की ऊर्जा अधिक मात्रा में मिलती है, जिससे पौधों और जीवों की वृद्धि होती है। 3. विकास की लंबी अवधि: उष्ण कटिबंध में विकास की अवधि अधिक होती है, जिससे अधिक जातियाँ विकसित हो पाती हैं। तीन परिकल्पनाएँ: (i) जलवायु स्थिरता परिकल्पना: स्थिर जलवायु अधिक विविधता को बढ़ावा देती है। (ii) ऊर्जा परिकल्पना: अधिक ऊर्जा उपलब्धता से जैव-विविधता बढ़ती है। (iii) विकास समय परिकल्पना: अधिक समय के कारण विकास और विविधीकरण अधिक होता है।
व्याख्या:
उष्ण कटिबंध में जलवायु स्थिरता, ऊर्जा की अधिकता और विकास के लिए लंबा समय उपलब्ध होने के कारण जैव-विविधता अधिक होती है। ये तीन परिकल्पनाएँ इस तथ्य को समझाने में मदद करती हैं कि क्यों उष्ण कटिबंध में जाति-समृद्धि अधिक होती है।
Q4.4. जातीय - क्षेत्र संबंध में समाश्रयण (रिग्रेशन) की ढलान का क्या महत्व हैं?
उत्तर:
जातीय-क्षेत्र संबंध में समाश्रयण की ढलान यह दर्शाती है कि क्षेत्रफल के बढ़ने पर जाति संख्या किस दर से बढ़ती है। इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि यह हमें यह समझने में मदद करती है कि बड़े क्षेत्र में कितनी नई जातियाँ मिल सकती हैं। ढलान अधिक होने पर क्षेत्रफल में वृद्धि के साथ जाति संख्या में तीव्र वृद्धि होती है।
व्याख्या:
समाश्रयण की ढलान (Slope) से पता चलता है कि क्षेत्रफल और जाति संख्या के बीच संबंध कितना मजबूत है। यह जैव-विविधता के अध्ययन और संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे क्षेत्र के आकार के अनुसार जैव-विविधता का अनुमान लगाया जा सकता है।
Q5.5. किसी भौगोलिक क्षेत्र में जाति क्षति के मुख्य कारण क्या हैं?
उत्तर:
जाति क्षति के मुख्य कारण: 1. आवास विनाश (Habitat Destruction): जंगलों की कटाई, शहरीकरण आदि। 2. प्रदूषण (Pollution): जल, वायु और मृदा प्रदूषण। 3. अत्यधिक शिकार (Overhunting) और मछली पकड़ना। 4. विदेशी जातियों का आक्रमण (Invasive Species)। 5. जलवायु परिवर्तन (Climate Change)। 6. प्राकृतिक आपदाएँ।
व्याख्या:
जाति क्षति के कारणों को समझना जैव-विविधता संरक्षण के लिए आवश्यक है। आवास विनाश और प्रदूषण से प्राकृतिक आवास प्रभावित होते हैं, जिससे जातियाँ विलुप्त होने लगती हैं। विदेशी जातियाँ स्थानीय जातियों के लिए खतरा बनती हैं। जलवायु परिवर्तन भी जाति क्षति में योगदान देता है।
Q6.6. पारितंत्र के कार्यों के लिए जैवविविधता कैसे उपयोगी है?
उत्तर:
जैवविविधता पारितंत्र के कार्यों को सुचारू रूप से चलाने में सहायक होती है। विभिन्न जातियाँ पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह, पोषक तत्व चक्रण, प्रदूषण नियंत्रण, जल संरक्षण, और रोग नियंत्रण जैसे कार्य करती हैं। जैवविविधता के कारण पारितंत्र अधिक स्थिर और लचीला होता है।
व्याख्या:
जैवविविधता के बिना पारितंत्र के कार्य प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, विभिन्न पौधे और जीव पोषक तत्वों को पुनः चक्रित करते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। विभिन्न जीवों की उपस्थिति से पारितंत्र में संतुलन बना रहता है।
Q7.7. पवित्र उपवन क्या हैं? उनकी संरक्षण में क्या भूमिका है?
उत्तर:
पवित्र उपवन वे वन होते हैं जिन्हें धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से संरक्षित किया जाता है। ये उपवन जैवविविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि यहाँ पेड़-पौधों और जीवों को संरक्षण मिलता है। पवित्र उपवन स्थानीय समुदायों द्वारा संरक्षित होते हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है।
व्याख्या:
धार्मिक आस्था के कारण पवित्र उपवन को काटा या नष्ट नहीं किया जाता, जिससे वहाँ जैव-विविधता बनी रहती है। ये उपवन पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में सहायक होते हैं और स्थानीय जलवायु को स्थिर रखते हैं।
Q8.8. पारितंत्र सेवा के अंतर्गत बाढ़ व भू-अपरदन (सॉयल-इरोजन) नियंत्रण आते हैं। यह किस प्रकार पारितंत्र के जीबीय घटकों (बायोटिक कंपोनेंट) द्वारा पूर्ण होते हैं?
उत्तर:
बाढ़ और भू-अपरदन नियंत्रण में पारितंत्र के जीवित घटक जैसे पेड़-पौधे, जड़ें, सूक्ष्मजीव, और अन्य जीव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी को बांधती हैं जिससे मिट्टी का अपरदन कम होता है। वनस्पति जल को अवशोषित करती है जिससे बाढ़ की संभावना कम होती है। सूक्ष्मजीव मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं और मिट्टी की संरचना को मजबूत करते हैं।
व्याख्या:
पौधों की जड़ें मिट्टी को स्थिर करती हैं और पानी के बहाव को धीमा करती हैं, जिससे भू-अपरदन कम होता है। वनस्पति जल को अवशोषित कर बाढ़ को नियंत्रित करती है। जीवाणु और कवक मिट्टी में पोषक तत्वों का चक्रण करते हैं जिससे मिट्टी स्वस्थ रहती है। इस प्रकार, पारितंत्र के जीवित घटक प्राकृतिक आपदाओं से संरक्षण प्रदान करते हैं।