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विद्ययाऽमृतमश्नुते | Class 12 Sanskrit Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 2 मिनट का पठन

विद्ययाऽमृतमश्नुते | Class 12 Sanskrit Notes

विद्ययाऽमृतमश्नुते – this guide gives you a concise, exam-ready overview of विद्ययाऽमृतमश्नुते from Class 12 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

ईशावास्योपनिषद् के मन्त्रों का विश्लेषण

इस खंड में ईशावास्योपनिषद् के प्रथम छह मन्त्रों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। प्रथम मन्त्र में ईश्वर की सर्वत्र विद्यमानता और संसार के पदार्थों का त्यागपूर्वक उपयोग करने का निर्देश है। दूसरे मन्त्र में कर्म करते हुए जीवन जीने की इच्छा रखने की बात कही गई है, जिससे कर्म के प्रति लगाव न हो। तीसरे मन्त्र में उन लोगों का वर्णन है जो आत्मस्वरूप ईश्वर की व्यापकता को स्वीकार नहीं करते और अज्ञान के अंधकार में डूबे रहते हैं। चौथे मन्त्र में चैतन्य स्वरूप, स्वयं प्रकाश एवं सर्वव्यापक आत्म तत्त्व का निरूपण है। पाँचवे और छठे मन्त्रों में अविद्या (व्यावहारिक ज्ञान) और विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) के बीच सूक्ष्म भेद और उनके प्रभावों पर विचार किया गया है। इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उपनिषद् में ज्ञान के दो प्रकारों का संतुलित महत्व बताया गया है।

🔗 Connection: अगले खंड में विद्या के प्रकारों और उनके प्रभावों पर विस्तृत चर्चा होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. संस्कृतभाष्याम् उत्तरं लिखत । (क) ईशावास्योपनिषद् कस्या: संहिताया: भाग:? (ख) जगत्सर्वं कौंदृशम् अस्ति? (ग) पदार्थभोग: कथं करणीय:? (घ) शतं समा: कथं जिजीविषेत्? (ङ) आत्महनो जना: कौंदृशं लोकं गच्छन्ति? (च) मनसोऽपि वेगवान् क:?

उत्तर: (क) ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदस्य संहिताया: भाग: अस्ति।

(ख) जगत्सर्वं कौंदृशम् अस्ति अर्थात् सम्पूर्णं जगत् ईश्वराधीनम् अस्ति।

(ग) पदार्थभोग: संयमेन, मितमात्रया, नासुर्यरूपेण करणीय:।

(घ) शतं समा: धैर्येण, संयमेण, समत्वेन जिजीविषेत्।

(ङ) आत्महनो जना: तमसाम् अधीनं, अज्ञानरूपं लोकं गच्छन्ति।

(च) मनसोऽपि वेगवान् धीर:, संयमी च भवति।

(छ) तिष्ठन्नपि क: धावत: अन्यान् अत्येति? (ज) अन्धन्तम: के प्रविशन्ति? (झ) धीरेभ्य: ऋषय: किं श्रुतवन्त:? (ञ) अविद्या किं तरति? (ट) विद्या किं प्राप्तोति?

उत्तर: (छ) तिष्ठन्नपि धीर: धावतः अन्यान् अत्येति अर्थात् संयमी धीर पुरुषः स्थिरः अपि च शीघ्रगामी जनान् अतिक्रमति।

(ज) अन्धन्तम: तमसाम् अधीनान्, अज्ञानरूपान् जनान् प्रविशन्ति।

(झ) धीरेभ्य: ऋषय: ज्ञानं, शान्तिम्, आत्मसाक्षात्कारं श्रुतवन्त:।

(ञ) अविद्या दुःखं, मरणं, संसारं तरति न, अपितु अज्ञानरूपा बाधा अस्ति।

(ट) विद्या अमृतत्वं, आत्मज्ञानं, ईश्वरज्ञानं प्राप्तोति।

2. ‘ईशावास्यम्...कस्यस्विद्धनम्’ इत्यस्य भावं सरलसंस्कृतभाषया विशादयत ।

उत्तर: ईशावास्यम् इति मन्त्रः कथयति यत् सम्पूर्णं जगत् ईश्वरस्य अधीनम् अस्ति। सर्वं जगत् ईश्वरः अधीनं धारयति, अतः सर्वं जगत् ईश्वरस्य स्वामित्वे अस्ति।

3. ‘अन्धन्तम: प्रविशन्ति...विद्यायां रता:’ इति मन्त्रस्य भावं हिन्दीभाषया आंग्लभाषया वा विशादयत ।

उत्तर: इस मन्त्र का अर्थ है कि जो लोग अंधकार अर्थात अज्ञानता के अधीन होते हैं, वे अज्ञानता के संसार में प्रवेश करते हैं। जो लोग विद्या में लगे रहते हैं, वे ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर होते हैं।

In English: Those who are enveloped in darkness (ignorance) enter into the world of ignorance, while those who are devoted to knowledge proceed on the path of enlightenment.

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