कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम् | Class 12 Sanskrit Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम् – this guide gives you a concise, exam-ready overview of कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम् from Class 12 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
अलंकार
अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व हैं। जैसे आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही अलंकार काव्य को सुंदर और प्रभावशाली बनाते हैं। अलंकार दो प्रकार के होते हैं - शब्दालंकार और अर्थालंकार।
शब्दालंकार वे होते हैं जो शब्दों के द्वारा काव्य की चारता बढ़ाते हैं, जैसे अनुप्रास, यमक। उदाहरण स्वरूप, अनुप्रास में समान वर्णों की आवृत्ति होती है, जैसे रामायण के श्लोक में 'वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति'। यमक में एक ही शब्द का भिन्न अर्थों में पुनरावृत्ति होती है, जैसे 'मानसं' शब्द का प्रयोग।
अर्थालंकार वे होते हैं जो अर्थ के द्वारा काव्य की चारता बढ़ाते हैं, जैसे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास, अतिशयोक्ति, श्लेष, व्याजस्तुति, अन्योक्तिः।
प्रत्येक अलंकार का विशिष्ट नियम, प्रकार और उदाहरण होते हैं जो काव्य को सौंदर्य प्रदान करते हैं। अलंकारों का अध्ययन संस्कृत साहित्य के गहन अध्ययन के लिए आवश्यक है।
📊 Diagram: Reprint 2026-27
🧪 Activity: विद्यार्थी विभिन्न अलंकारों के उदाहरण लिखें और उनका विश्लेषण करें।
🔗 Connection: यह अनुभाग अलंकारों की समझ प्रदान करता है, जो संस्कृत साहित्य के अध्ययन को समृद्ध बनाता है। अगले परिशिष्ट में अनुशंसित ग्रन्थों की सूची दी गई है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. संस्कृतभाषायाम् उत्तरत । (क) मनुष्यस्य आयु: कति वर्षाणि मन्यते? (ख) कस्य नियमेन अभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते? (ग) गाम्यकुक्कुट: भक्ष्य: अभक्ष्य: वा? (घ) क: ज्याय: अस्ति? (ङ) क: गरीयान् अस्ति?
उत्तर: (क) मनुष्यस्य आयु: शतवर्षाणि मन्यते। (ख) नियमेन अभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते। अर्थात् नियम के अनुसार अभक्ष्य (जो न खाया जाना चाहिए) का प्रतिबंध होता है। (ग) गाम्यकुक्कुट: भक्ष्य: न अभक्ष्य:। अर्थात् गाम्यकुक्कुट भक्ष्य (खाने योग्य) है, अभक्ष्य (न खाने योग्य) नहीं। (घ) ज्याय: वह है जो अधिक है। (ङ) गरीयान् वह है जो अधिक नीच या खराब है।
2. रेखाद्भितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत । (क) एकैकस्य शब्दस्य बहव: अपभ्रंश: सन्ति। (ख) शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठ: कर्तव्य:। (ग) बृहस्पति: इन्द्राय प्रतिपदशब्दान् उक्तवान्। (घ) चतुर्भिश्च प्रकारैविंद्योपयुक्ता भवति। (ङ) सामान्येन उत्सर्ग: कर्तव्य:।
प्रश्ननिर्माण: (क) एकैकस्य शब्दस्य बहव: अपभ्रंश: किमस्ति? (ख) शब्दानां प्रतिपत्तौ किम् कर्तव्यं? (ग) बृहस्पति: कस्य प्रति प्रतिपदशब्दान् उक्तवान्? (घ) चतुर्भिश्च प्रकारैविंद्योपयुक्ता कथम् भवति? (ङ) सामान्येन उत्सर्ग: कथम् कर्तव्य:?
3 विपरीतार्थ: सह मेलनं कुरुत । (क) भक्ष्यम् - तदानीम् (ख) लघीयान् - अनिष्टान् (ग) एक: - अभक्ष्यम् (घ) इष्टान् - गरीयान् (ङ) इदानीम् - बहव:
उत्तर: (क) भक्ष्यम् - अभक्ष्यम् (ख) लघीयान् - गरीयान् (ग) एक: - बहव: (घ) इष्टान् - अनिष्टान् (ङ) इदानीम् - तदानीम्
व्याख्या: विपरीतार्थ शब्दों को मेल करना है। जैसे भक्ष्यम् (खाने योग्य) का विपरीत अभक्ष्यम् (न खाने योग्य) है।
4. अधोलिखितवाक्यानि पठित्वा शुद्धं अशुद्धं वा समक्षं लिखत । (क) अन्यतरोपदेशेन कृतं स्यात्। (ख) इष्टान्वाख्यानं खल्वपि भवति। (ग) य: सर्वथा चिरं जीवति वर्षशतं न जीवति। (घ) चतुर्भिश्च प्रकारैविंद्योपयुक्ता न भवति। (ङ) आगमकालेनैवायु: कृत्स्नं पर्युपयुक्तं स्यात्।
उत्तर: (क) अशुद्ध (ख) शुद्ध (ग) अशुद्ध (घ) अशुद्ध (ङ) शुद्ध
व्याख्या: प्रत्येक वाक्य का व्याकरण और अर्थ के अनुसार परीक्षण कर शुद्ध अथवा अशुद्ध लिखा गया है।
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