Sangeetकक्षा 11विभिन्न तालों के ठेके एवं लयकारीहिंदी

विभिन्न तालों के ठेके एवं लयकारी | Class 11 Sangeet Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

विभिन्न तालों के ठेके एवं लयकारी | Class 11 Sangeet Notes

विभिन्न तालों के ठेके एवं लयकारी – this guide gives you a concise, exam-ready overview of विभिन्न तालों के ठेके एवं लयकारी from Class 11 Sangeet, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

विभिन्न तालों के टेके एवं लयकारी

संगीत में ताल का अर्थ है समय का वह चक्र जिसमें संगीत की लयबद्धता और ठेका व्यवस्थित होता है। मानव ने सभ्यता के विकास के साथ-साथ अपने अनुभवों और विचारों को सुरक्षित रखने के लिए लिपि का आविष्कार किया। इसी प्रकार संगीत को भी लिपिबद्ध करने की आवश्यकता हुई ताकि उसकी रचनाएँ समय के साथ सुरक्षित रहें और उनका मूल स्वरूप बना रहे। ताल, संगीत का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसे व्यवस्थित रूप से लिखने के लिए विभिन्न लिपि पद्धतियाँ विकसित हुईं। 18वीं-19वीं शताब्दी में मौलाबख्श, सौरूद्र मोहन टैगोर, क्षेत्र मोहन गोस्वामी, पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर तथा पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जैसे विद्वानों ने संगीत और ताल को लिपिबद्ध करने के लिए अलग-अलग पद्धतियाँ विकसित कीं।

पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे ने उत्तर भारतीय संगीत के तालों को लिखने के लिए एक लोकप्रिय ताल-स्वर लिपि पद्धति बनाई, जिसमें ताल की प्रत्येक मात्रा को चिह्नों और ठेकों के बोलों के साथ प्रदर्शित किया जाता है। इस पद्धति में ताल की प्रथम मात्रा को सम के रूप में दर्शाने के लिए '×' चिह्न का प्रयोग होता है। खाली मात्रा को दर्शाने के लिए '0' चिह्न का उपयोग किया जाता है। ताल के विभागों को अलग करने के लिए खड़ी पाई '|' चिह्न का प्रयोग होता है।

तालों के ठेकों को बोलों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, जो ताल की लयबद्धता को स्पष्ट करते हैं। ठेका ताल की मात्राओं का वह समूह होता है जिसे बोलों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। ताल की लयकारी ठेकों को सजाने और प्रस्तुत करने की कला है, जिससे संगीत में विविधता और आकर्षण आता है।

इस अध्याय में हम उत्तर भारतीय संगीत के प्रमुख तालों जैसे त्रिताल, एकताल, दादरा, कहरवा, चारताल, तीव्रा, धमार आदि के ठेकों और उनकी लयकारी का विस्तृत अध्ययन करेंगे। साथ ही ताल लिपि पद्धति के चिह्नों और उनके प्रयोग को समझेंगे।

📊 Diagram: मानव ने सभ्यता के विकास के साथ-साथ प्रयास किया कि उसके उपार्जित अनुभव और विचार भविष्य के लिए भी संचित रह सकें। संभवत: लिपि का जन्म इसी का परिणाम है। संगीत को लिपिबद्ध करना ही संगीत की रचनाओं को सुरक्षा कवच पहनाना है। लिपिबद्ध होने से बंदिश के मूल स्वरूप की रक्षा होती है। यही बात उसके एक मुख्य अंग ताल के साथ भी है। राग और ताल संबंधित क्रियात्मक रचनाओं को व्यवस्थित रीति से विभिन्न संकेतों द्वारा लिपिबद्ध करके समय-समय पर कई लिपि पद्धतियों का निर्माण विद्वानों द्वारा किया गया है। आधुनिक काल अर्थात् 18वीं–19वीं शताब्दी में मौलाबख्श, सौरूद्र मोहन टैगोर, क्षेत्र मोहन गोस्वामी, पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर तथा पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जैसे विद्वानों ने संगीत को लिपिबद्ध करने के लिए अलग-अलग लिपि पद्धतियाँ अपनाईं।

🧪 Activity: ताल के चिह्नों और ठेकों को समझने के लिए ताल लिपि पद्धति के अनुसार ताल की प्रथम मात्रा पर सम (×), खाली (0) और ताली की संख्या लिखने का अभ्यास करें।

🔗 Connection: यह परिचयात्मक खंड ताल लिपि पद्धति के चिह्नों और ठेकों के विस्तार से अध्ययन की ओर ले जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संगीत में ताल का क्या अर्थ है और यह संगीत में किस प्रकार महत्वपूर्ण है?

ताल वह समय चक्र है जिसमें संगीत की लयबद्धता और ठेका व्यवस्थित होता है। यह संगीत को अनुशासित करता है और उसे एक निश्चित स्वरूप प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, त्रिताल संगीत की लयबद्धता को स्पष्ट करता है।

पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा बनाई गई ताल लिपि पद्धति की तीन मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

1. ताल की प्रत्येक मात्रा को ताल चिह्नों और टेके के बोलों के साथ प्रदर्शित किया जाता है। 2. उत्तर भारतीय संगीत में ताल की प्रथम मात्रा पर सम के लिए '×' चिह्न का प्रयोग होता है। 3. खाली मात्रा को दर्शाने के लिए '0' चिह्न का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए रूपक ताल में प्रथम मात्रा पर खाली होती है।

त्रिताल के ठेका में कुल कितनी मात्राएँ होती हैं और वे कितने विभागों में विभाजित होती हैं? साथ ही ताली और खाली की स्थितियाँ बताइए।

त्रिताल में कुल 16 मात्राएँ होती हैं जो चार विभागों में 4/4/4/4 के रूप में विभाजित होती हैं। ताली पहली, पाँचवीं और तेरहवीं मात्रा पर होती है और खाली नौवीं मात्रा पर होती है।

ताल लिपि में खाली मात्रा को दर्शाने के लिए कौन सा चिह्न प्रयोग किया जाता है और इसका क्या महत्व है?

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