विभिन्न तालों के ठेके एवं लयकारी | Class 11 Sangeet Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 6 मिनट का पठन

विभिन्न तालों के ठेके एवं लयकारी – this guide gives you a concise, exam-ready overview of विभिन्न तालों के ठेके एवं लयकारी from Class 11 Sangeet, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
सारांश एवं अभ्यास
इस अध्याय में हमने विभिन्न तालों के ठेकों और लयकारी का विस्तार से अध्ययन किया। ताल संगीत में समय नापने का महत्वपूर्ण साधन है जो लयबद्धता और ठेका निर्धारित करता है। पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा विकसित ताल-स्वर लिपि पद्धति ने तालों को लिखित रूप में सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
त्रिताल, एकताल, दादरा, कहरवा, चारताल, तीव्रा और धमार जैसे प्रमुख तालों के ठेकों और उनके लयकारी शैलियों को समझा। प्रत्येक ताल की मात्राएँ, ताली, खाली, ठेका बोल और उनके चिह्नों को विस्तार से जाना। ठेकों को दुगुन, तिगुन, चौगुन आदि गति में प्रस्तुत करने की विधि से संगीत में विविधता आती है।
अध्याय के अंत में अभ्यास प्रश्नों और बहुविकल्पीय प्रश्नों के माध्यम से तालों की समझ को परखा गया। विद्यार्थियों को तालों के ठेकों को कंठस्थ कर अभ्यास करने और विभिन्न तालों की लयकारी में निपुण बनने का सुझाव दिया गया।
इस अध्याय से संगीत के विद्यार्थियों को ताल की पकड़ मजबूत करने, ठेकों को सही ढंग से प्रस्तुत करने और संगीत की लयबद्धता को समझने में सहायता मिलेगी।
📊 Diagram: Table on page 14 (3×16); Table on page 15 (3×12); Table on page 15 (3×6); Table on page 15 (3×8); Table on page 15 (3×10); Table on page 15 (7×2)
🧪 Activity: विद्यार्थियों को लोकगीतों, फ़िल्मी गीतों और बंदिशों को ताल पद्धति में लिखने और उनके दुगुन, तिगुन, चौगुन रूपों का अभ्यास करने के लिए गतिविधियाँ दी गई हैं।
🔗 Connection: यह अध्याय संगीत के अन्य विषयों जैसे गायन, वादन और नृत्य में ताल की भूमिका को समझने के लिए आधार प्रदान करता है।
Table on page 14 (3×16)
| 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धा | धिं | ... | ... | धा | ... | ... | ... | ... | ... | ति | ता | ता | ... | ... | धा |
| 1 | 2 | ... | 3 |
Table on page 14 (3×12)
| 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धिं | ... | धागे | ... | तू | ना | ... | ... | ... | तिरकिट | ... | ना |
| × | ... | ... | ... | 0 | ... | 4 |
Table on page 15 (3×6)
| 1 | 2 | 3 | ... | 5 | 6 |
|---|---|---|---|---|---|
| धा | ... | ना | धा | ती | ... |
| × | ... |
Table on page 15 (3×8)
| 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धा | ... | ना | ... | ना | ... | धि | ... |
| × | 0 |
Table on page 15 (3×10)
| 1 | 2 | ... | ... | 5 | 6 | ... | ... | 9 | 10 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धा | धा | दिं | ... | ... | धा | तिट | ... | ... | गन |
| × | ... | 2 | ... | 4 |
Table on page 15 (7×2)
| अ | आ |
|---|---|
| (क) क्रमिक पुस्तक मालिका | 1. आठ मात्रा |
| (ख) गांध्वं महाविद्यालय | 2. 1901 |
| (ग) धागे तिरकिट बोल | 3. 9, 10, 11, 12 |
| (घ) चारताल में तिटकत गदिगन | 4. विष्णु नारायण भातखण्डे |
| (ङ) सूलताल की जाति | 5. एकताल |
| (च) कहरवा | 6. चतस्त्र जाति |
Table on page 15 (3×12)
| 1 | 2 | 3 | ... | ... | 6 | 7 | 8 | ... | ... | 11 | 12 |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धा | धा | ... | ... | किट | ... | ... | ता | तिट | ... | ... | गन |
| × | 0 | 2 | ... | ... | 4 |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
संगीत में ताल का क्या अर्थ है और यह संगीत में किस प्रकार महत्वपूर्ण है?
ताल वह समय चक्र है जिसमें संगीत की लयबद्धता और ठेका व्यवस्थित होता है। यह संगीत को अनुशासित करता है और उसे एक निश्चित स्वरूप प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, त्रिताल संगीत की लयबद्धता को स्पष्ट करता है।
पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा बनाई गई ताल लिपि पद्धति की तीन मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
1. ताल की प्रत्येक मात्रा को ताल चिह्नों और टेके के बोलों के साथ प्रदर्शित किया जाता है। 2. उत्तर भारतीय संगीत में ताल की प्रथम मात्रा पर सम के लिए '×' चिह्न का प्रयोग होता है। 3. खाली मात्रा को दर्शाने के लिए '0' चिह्न का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए रूपक ताल में प्रथम मात्रा पर खाली होती है।
त्रिताल के ठेका में कुल कितनी मात्राएँ होती हैं और वे कितने विभागों में विभाजित होती हैं? साथ ही ताली और खाली की स्थितियाँ बताइए।
त्रिताल में कुल 16 मात्राएँ होती हैं जो चार विभागों में 4/4/4/4 के रूप में विभाजित होती हैं। ताली पहली, पाँचवीं और तेरहवीं मात्रा पर होती है और खाली नौवीं मात्रा पर होती है।
ताल लिपि में खाली मात्रा को दर्शाने के लिए कौन सा चिह्न प्रयोग किया जाता है और इसका क्या महत्व है?
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