Sanskritकक्षा 10सौहार्दं प्रकृते: शोभाहिंदी

सौहार्दं प्रकृते: शोभा | Class 10 Sanskrit Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

सौहार्दं प्रकृते: शोभा | Class 10 Sanskrit Notes

सौहार्दं प्रकृते: शोभा – this guide gives you a concise, exam-ready overview of सौहार्दं प्रकृते: शोभा from Class 10 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

शब्दार्थ

इस खंड में अध्याय में प्रयुक्त मुख्य शब्दों के अर्थ दिए गए हैं, जो श्लोकों और संवादों को समझने में सहायक हैं। जैसे कि 'धुनाति' का अर्थ है पकड़कर घुमाना, 'कर्णमाकृष्य' का अर्थ कान खींचना, 'तुदन्ति' का अर्थ तंग करना, 'कलरवम्' पक्षियों की चहचहाहट आदि।

यह शब्दार्थ छात्रों को संस्कृत शब्दों के सही अर्थ और उनके भाव को समझने में मदद करता है, जिससे वे पाठ को बेहतर ढंग से समझ सकें। शब्दार्थ के माध्यम से भाषा की गहराई और सौंदर्य का अनुभव होता है।

📊 Diagram: Table on page 6 (12×4)

🧪 Activity: शब्दार्थ याद करना और उनका प्रयोग वाक्यों में करना।

🔗 Connection: यह खंड अभ्यास प्रश्नों और पाठ के व्याकरणिक अभ्यास की ओर ले जाता है।

Table on page 6 (12×4)

धुनाति/धूनोति- गृहीत्वा आन्दोलयति- पकड़कर घुमा देता है- Twists
कर्णमाकृष्य- श्रोत्रं कर्षियित्वा, कर्णम्+आकृष्ट्य- कान खींचकर- Pulling ears
तुदन्ति- अवसादयन्ति- तंग करते हैं- Teasing
कलरवम्- पक्षिणां कूजनम्- चहचहाहट को- Birds’ chirping
सन्नपि- सन्+अपि- होते हुए भी- Even being so
वित्रस्तान्- विशेषेण भीतान्- विशेषरूप से डरे हुओं को- Very scared
कृतान्त:- मृत्यु का देवता-यमराज- जीवन का अन्त करने वाले- God of death
अनृतम्- न ऋतम्, अलीकम्- असत्य- Lie
अतिविकल्थनम्- आत्मश्लाघा- डींगे मारना- Brag about
शृणवन्नेवाहम्- शृणवन्+एव+अहम्, आकर्णयन् एव अहम्- सुनते हुए ही मैं- Listeninig while
पोथयित्वा मारयिष्यामि- पीडियित्वा हनिष्यामि- क्लेश देकर मार डालूँगा- Kill by torturing
विधूय- आकृष्ट्य- खींचकर- By dragging

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. एकपदेन उत्तरं लिखत- (क) वनराज: कै: दुरवस्थां प्राप्त:? (ख) क: वातावरणं कर्कशध्वनिना आकुलीकरोति? (ग) काकचेप्ट: विद्यार्थी कीदृश: छात्र: मन्यते? (घ) क: आत्मानं बलशालिनं, विशालकायं, पराक्रमिणं च कथयति। (ङ) बक: कीदृशान् मीनान् क्रूरतया भक्षयति?

उत्तर: (क) वनराज: सिंह: दुरवस्थां प्राप्त:। (ख) काक: वातावरणं कर्कशध्वनिना आकुलीकरोति। (ग) काकचेप्ट: विद्यार्थी: मेधावी छात्र: मन्यते। (घ) गज: आत्मानं बलशालिनं, विशालकायं, पराक्रमिणं च कथयति। (ङ) बक: क्रूरतया मीनान् भक्षयति।

2. अधोलिखितप्रशनानामुत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत- (क) निःसंशयं क: कृतान्त: मन्यते? (ख) बक: वन्यजन्तूनां रक्षोपायान् कथं चिन्तयितुं कथयति? (ग) अन्ते प्रकृतिमाता प्रविश्य सर्वप्रथमं किं वदति? (घ) यदि राजा सम्यक् न भवति तदा प्रजा कथं विप्लवेत? (ङ) मयूर: कथं नृत्यमुद्रायां स्थित: भवति? (च) अन्ते सर्वे मिलित्वा कस्य राज्याभिषेकाय तत्परा: भवति? (छ) अस्मिन्नाटके कति पात्राणि सन्ति?

उत्तर: (क) निःसंशयं सिंह: कृतान्त: मन्यते। (ख) बक: वन्यजन्तूनां रक्षोपायान् सूक्ष्मतया चिन्तयितुं कथयति। (ग) अन्ते प्रकृतिमाता प्रविश्य सर्वप्रथमं सर्वेभ्य: सौहार्दं वदति। (घ) यदि राजा सम्यक् न भवति तदा प्रजा विप्लवेत्, कारणं असंतोष:। (ङ) मयूर: नृत्यमुद्रायां स्थित: अत्यन्तं मनोहर: भवति। (च) अन्ते सर्वे मिलित्वा वनराजस्य राज्याभिषेकाय तत्परा: भवति। (छ) अस्मिन्नाटके सप्त पात्राणि सन्ति।

3. रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत- (क) सिंह: वानराभ्यां स्वरक्षायाम् असमर्थ: एवासीत्। (ख) गज: वन्यपशून् तुदन्तं शुण्डेन पोथयित्वा मारयति। (ग) वानर: आत्मानं वनराजपदाय योग्यं मन्यते। (घ) मयूरस्य नृत्यं प्रकृते: आराधना। (ङ) सर्वे प्रकृतिमातरं प्रणमन्ति।

उत्तर: (क) सिंह: वानराभ्यां स्वरक्षायाम् असमर्थ: एवासीत्, कथं? (ख) गज: वन्यपशून् तुदन्तं शुण्डेन पोथयित्वा मारयति, कथं? (ग) वानर: आत्मानं वनराजपदाय योग्यं मन्यते, किमर्थं? (घ) मयूरस्य नृत्यं प्रकृते: आराधना, कथं? (ङ) सर्वे प्रकृतिमातरं प्रणमन्ति, किमर्थं?

4. शुद्धकथनानां समक्षम् आम् अशुद्धकथनानां च समक्षं न इति लिखत- (क) सिंह: आत्मानं तुदन्तं वानरं मारयति। (ख) का-का इति बकस्य ध्वनि: भवति। (ग) काकपिक्यो: वर्ण: कृष्ण: भवति। (घ) गज: लघुकाय:, निर्बल: च भवति। (ङ) मयूर: बकस्य कारणात् पक्षिकुलम् अवमानितं मन्यते। (च) अन्योन्यसहयोगेन प्राणिनाम् लाभ: जायते।

उत्तर: (क) न इति। (अशुद्ध) सिंह: वानरं मारयति, किन्तु आत्मानं तुदन्तं न। (ख) न इति। बकस्य ध्वनि: 'का-का' न होकर 'कृ-कृ' इति भवति। (ग) न इति। काकपिक्यो: वर्ण: कृष्ण: न भवति। (घ) न इति। गज: विशालकाय:, बलशाली च भवति। (ङ) न इति। मयूर: बकस्य कारणात् पक्षिकुलम् अवमानितं न मन्यते। (च) आम्। अन्योन्यसहयोगेन प्राणिनाम् लाभ: जायते।

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