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शिशुलालनम् | Class 10 Sanskrit Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

शिशुलालनम् | Class 10 Sanskrit Notes

शिशुलालनम् – this guide gives you a concise, exam-ready overview of शिशुलालनम् from Class 10 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

आसनार्थमुपवेशयति - बालक को बैठाने की विधि

पाठ में 'आसनार्थमुपवेशयति' शब्द का प्रयोग बालक को उचित आसन पर बैठाने की विधि के लिए हुआ है। बालक को सम्मानपूर्वक और शिष्टाचार के साथ बैठाना आवश्यक होता है। राम अपने पुत्र लव-कुश को सिंहासन पर बैठाने का प्रयास करते हैं, पर वे विनम्रता से मना करते हैं क्योंकि वे अतिशालीनता से बचना चाहते हैं। इस संदर्भ में राम कहते हैं कि राजासन (सिंहासन) पर दोनों का बैठना उचित नहीं है, अतः वे अङ्क्रमुपवेशयति अर्थात क्रमबद्ध बैठने की व्यवस्था करते हैं।

बालक के लिए उपयुक्त आसन वह होता है जो आरामदायक हो, शिष्टाचारपूर्ण हो और बालक के शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो। बालक को गोद में बैठाना भी स्नेह और सम्मान का प्रतीक है। इस प्रकार आसन का चयन बालक के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक होता है। इस खंड में बालक के लिए आसन की महत्ता और उसकी विधि का सुंदर वर्णन है।

📊 Diagram: See figure_1: (आसनार्थमुपवेशयति)

🧪 Activity: विद्यार्थी अपने घर में परिवार के छोटे सदस्यों को सम्मानपूर्वक बैठाने का अभ्यास करें।

🔗 Connection: यह खंड बालक के लिए आलिंगन और प्रणाम की क्रिया से जुड़ता है, जो अगले भाग में समझाया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. एकपदेन उत्तरं लिखत- (क) कुशलवौ कम् उपसृत्य प्रणमतः? (ख) तपोवनवासिनः कुशस्य मातरं केन नाम्ना आह्वयन्ति ? (ग) वयोऽनुरोधात् कः लालनीयः भवति? (घ) केन सम्बन्धेन वाल्मीकि: लवकुशयो: गुरुः? (ङ) कुत्र लवकुशयो: पितु: नाम न व्यवहियते?

उत्तर- (क) राम उपसृत्य प्रणमतः। (ख) तपोवनवासिनः कुशस्य मातरं सीतया नाम्ना आह्वयन्ति। (ग) वयोऽनुरोधात् हिमकरः लालनीयः भवति। (घ) वाल्मीकि: लवकुशयो: गुरुः सम्बन्धेन गुरुः। (ङ) लवकुशयो: पितु: नाम अयोध्यायाम् न व्यवहियते।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत- (क) रामाय कुशलवयो: कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः कीदृशः आसीत्? (ख) राम: लवकुशौ कुत्र उपवेशियितुम् कथयति? (ग) बालभावात् हिमकर: कुत्र विराजते? (घ) कुशलवयो: वंशस्य कर्ता क:? (ङ) कुशलवयो: मातरं वाल्मीकि: केन नाम्ना आह्वयति?

उत्तर- (क) रामाय कुशलवयो: कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः सौम्यः आसीत्। (ख) राम: लवकुशौ सिंहासनम् उपवेशियितुम् कथयति। (ग) बालभावात् हिमकर: वाल्मीकि-तपोवनवासिनाम् मध्ये विराजते। (घ) कुशलवयो: वंशस्य कर्ता रामः अस्ति। (ङ) वाल्मीकि: कुशलवयो: मातरं सीतया नाम्ना आह्वयति।

3. रेखाड्डितेषु पदेषु विभक्तिं तत्कारणं च उदाहरणानुसारं निर्दिशत— | विभक्तिः | तत्कारणम् | | --- | --- | | यथा– राजन्! अलम् अतिदाक्षिण्येन्। | तृतीया ‘अलम्’ योगे | | (क) रामः लवकुशौ आसनार्थम् उपवेशयति। | ………………… | | (ख) धिङ् मामु एवं भूतम्। | ………………… | | (ग) अङ्कल्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्। | ………………… | | (घ) अलम् अतिविस्तरेण। | ………………… | | (ङ) रामम् उपसृत्य प्रणम्य च। | ………………… |

उत्तर- (क) द्वितीया विभक्तिः, कारणम् आसनार्थम् (लक्ष्ये) उपवेशयति। (ख) सप्तमी विभक्तिः, कारणम् एवं भूतम् (सहायक) दर्शयति। (ग) सप्तमी विभक्तिः, कारणम् अध्यास्यतां (स्थानम्) सूचयति। (घ) तृतीया विभक्तिः, कारणम् अतिविस्तरेण (प्रकारेण) सूचयति। (ङ) चतुर्थी विभक्तिः, कारणम् उपसृत्य प्रणम्य (कर्तृकर्मणि) सूचयति।

4. यथानिर्देशम् उत्तरत— (क) ‘जानाम्यहं तस्य नामधेयम्’ अस्मिन् वाक्ये कर्तृपदं किम्? (ख) ‘किं कुपिता एवं भगति उत प्रकृतिस्था’– अस्मात् वाक्यात् ‘हर्षिता’ इति पदस्य विपरीतार्थकपदं चित्वा लिखत। (ग) विदूषकः (उपसृत्य) ‘आज्ञापयतु भवान्!’ अत्र भवान् इति पदं कस्मै प्रयुक्तम्? (घ) ‘तस्मादङ्का–व्यवहितम् अध्यास्यताम् सिंहासनम्’– अत्र क्रियापदं किम्? (ङ) ‘वयसस्तु न किञ्चिदन्तरम्’– अत्र ‘आयुषः इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्?

उत्तर- (क) कर्तृपदं 'जानामि' अस्ति। (ख) विपरीतार्थकपदं 'विषण्णा' अथवा 'दुःखिता' लिखितम्। (ग) 'भवान्' इति पदं सम्बोधनार्थम् प्रयुक्तम्। (घ) क्रियापदं 'अध्यास्यताम्' अस्ति। (ङ) 'वयसः' पदं आयुषः अर्थे प्रयुक्तम्।

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