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शिशुलालनम् | Class 10 Sanskrit Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

शिशुलालनम् | Class 10 Sanskrit Notes

शिशुलालनम् – this guide gives you a concise, exam-ready overview of शिशुलालनम् from Class 10 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

शिशुलालनम् में प्रयुक्त शब्दावली और उनके अर्थ

शिशुलालनम् पाठ में अनेक संस्कृत शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनका अर्थ जानना पाठ की गहन समझ के लिए आवश्यक है। इस खंड में उन शब्दों का विस्तृत विवेचन किया गया है। जैसे 'पितामहः' का अर्थ है पिता के पिता अर्थात दादा, 'सहस्त्रदीधितिः' का अर्थ है सूर्य, 'कण्ठाश्लेषस्य' का अर्थ है गले लगाने का क्रिया, 'परिष्वन्य' का अर्थ है आलिंगन करके, 'विचिन्त्य' का अर्थ है विचार करके, 'अध्यासितुम्' का अर्थ है बैठने के लिए, 'सव्यवधानम्' का अर्थ है व्यवधान सहित, 'अध्यास्यताम्' का अर्थ है बैठिये, 'अलमतिदाक्षिण्येन' का अर्थ है अत्यधिक दक्षता न करना, 'अद्भूम्' का अर्थ है गोद में, 'हिमकरः' का अर्थ है चन्द्रमा, 'पशुपतिः' का अर्थ है शिव, 'केतकछदत्वम्' का अर्थ है केतकी पुष्प से बनी मस्तक की शोभा, 'स्वगतम्' का अर्थ है मन ही मन, 'समानाभिजनौ' का अर्थ है एक ही कुल में पैदा हुए, 'संवृत्तौ' का अर्थ है हो गये, 'प्रतिवचनम्' का अर्थ है उत्तर।

इन शब्दों के अर्थ जानने से पाठ की समझ में आसानी होती है और संस्कृत भाषा की समृद्धि का अनुभव होता है। विद्यार्थियों को इन शब्दों का अभ्यास करना चाहिए ताकि वे संस्कृत भाषा में दक्षता प्राप्त कर सकें।

📊 Diagram: See table_1, table_2, table_3, table_4, table_5: विभिन्न शब्दों के अर्थों की तालिका।

🧪 Activity: विद्यार्थी इन शब्दों के अर्थों को याद करें और वाक्यों में उनका प्रयोग करें।

🔗 Connection: यह शब्दावली बालक के लिए उपयुक्त आसन और संस्कारों के महत्व को समझने में सहायक है, जो अगले खंड में विस्तार से वर्णित है।

Table on page 5 (7×4)

पितामहः- पितुः पिता- पिता के पिता- Grand father
सहस्त्रदीधितिः- सूर्यः- सूर्य- The sun
कण्ठाश्लेषस्य- कण्ठे आश्लेषस्य- गले लगाने का- Hug
परिष्वन्य- आलिङ्गुनं कृत्वा- आलिङ्गुन करके- Embracing
विचिन्त्य- विचार्य- विचार करके- Considering
अध्यासितुम्- उपवेष्टुम्- बैठने के लिए- To sit

| सव्यवधानम् | - व्यवधानेन सहितम् | - रुकावट सहित | - With

Table on page 5 (1×4)

अध्यास्यताम्- उपविश्यताम्- बैठिये- Be seated

| अलमतिदाक्षिण्येन | - अलमतिकौशलेन | - अत्यधिक दक्षता,

Table on page 5 (3×4)

अद्भूम्- क्रोडम्- गोद में- Lap
हिमकरः- चन्द्रः- चन्द्रमा- The moon
पशुपतिः- शिवः- शिव- Lord shiva

| केतकछदत्वम् | - केतकस्य छदत्वम् | - केतकी (केवड़े)

Table on page 5 (1×4)

स्वगतम्- आत्मगतम्- मन ही मन- Inner self

| समानाभिजनौ | - समानकुलोत्पन्नौ | - एक कुल में पैदा

Table on page 5 (1×4)

संवृत्तौ- संजातौ- हो गये- Both became
प्रतिवचनम्- उत्तरम्- उत्तर- Reply

Table on page 8 (2×1)

शिवः शिष्टाचारः शाशिः चन्द्रशेखरः सुतः इदानीम्
अधुना पुत्रः सूर्यः सदाचारः निशाकरः भानुः

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. एकपदेन उत्तरं लिखत- (क) कुशलवौ कम् उपसृत्य प्रणमतः? (ख) तपोवनवासिनः कुशस्य मातरं केन नाम्ना आह्वयन्ति ? (ग) वयोऽनुरोधात् कः लालनीयः भवति? (घ) केन सम्बन्धेन वाल्मीकि: लवकुशयो: गुरुः? (ङ) कुत्र लवकुशयो: पितु: नाम न व्यवहियते?

उत्तर- (क) राम उपसृत्य प्रणमतः। (ख) तपोवनवासिनः कुशस्य मातरं सीतया नाम्ना आह्वयन्ति। (ग) वयोऽनुरोधात् हिमकरः लालनीयः भवति। (घ) वाल्मीकि: लवकुशयो: गुरुः सम्बन्धेन गुरुः। (ङ) लवकुशयो: पितु: नाम अयोध्यायाम् न व्यवहियते।

2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत- (क) रामाय कुशलवयो: कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः कीदृशः आसीत्? (ख) राम: लवकुशौ कुत्र उपवेशियितुम् कथयति? (ग) बालभावात् हिमकर: कुत्र विराजते? (घ) कुशलवयो: वंशस्य कर्ता क:? (ङ) कुशलवयो: मातरं वाल्मीकि: केन नाम्ना आह्वयति?

उत्तर- (क) रामाय कुशलवयो: कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः सौम्यः आसीत्। (ख) राम: लवकुशौ सिंहासनम् उपवेशियितुम् कथयति। (ग) बालभावात् हिमकर: वाल्मीकि-तपोवनवासिनाम् मध्ये विराजते। (घ) कुशलवयो: वंशस्य कर्ता रामः अस्ति। (ङ) वाल्मीकि: कुशलवयो: मातरं सीतया नाम्ना आह्वयति।

3. रेखाड्डितेषु पदेषु विभक्तिं तत्कारणं च उदाहरणानुसारं निर्दिशत— | विभक्तिः | तत्कारणम् | | --- | --- | | यथा– राजन्! अलम् अतिदाक्षिण्येन्। | तृतीया ‘अलम्’ योगे | | (क) रामः लवकुशौ आसनार्थम् उपवेशयति। | ………………… | | (ख) धिङ् मामु एवं भूतम्। | ………………… | | (ग) अङ्कल्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्। | ………………… | | (घ) अलम् अतिविस्तरेण। | ………………… | | (ङ) रामम् उपसृत्य प्रणम्य च। | ………………… |

उत्तर- (क) द्वितीया विभक्तिः, कारणम् आसनार्थम् (लक्ष्ये) उपवेशयति। (ख) सप्तमी विभक्तिः, कारणम् एवं भूतम् (सहायक) दर्शयति। (ग) सप्तमी विभक्तिः, कारणम् अध्यास्यतां (स्थानम्) सूचयति। (घ) तृतीया विभक्तिः, कारणम् अतिविस्तरेण (प्रकारेण) सूचयति। (ङ) चतुर्थी विभक्तिः, कारणम् उपसृत्य प्रणम्य (कर्तृकर्मणि) सूचयति।

4. यथानिर्देशम् उत्तरत— (क) ‘जानाम्यहं तस्य नामधेयम्’ अस्मिन् वाक्ये कर्तृपदं किम्? (ख) ‘किं कुपिता एवं भगति उत प्रकृतिस्था’– अस्मात् वाक्यात् ‘हर्षिता’ इति पदस्य विपरीतार्थकपदं चित्वा लिखत। (ग) विदूषकः (उपसृत्य) ‘आज्ञापयतु भवान्!’ अत्र भवान् इति पदं कस्मै प्रयुक्तम्? (घ) ‘तस्मादङ्का–व्यवहितम् अध्यास्यताम् सिंहासनम्’– अत्र क्रियापदं किम्? (ङ) ‘वयसस्तु न किञ्चिदन्तरम्’– अत्र ‘आयुषः इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्?

उत्तर- (क) कर्तृपदं 'जानामि' अस्ति। (ख) विपरीतार्थकपदं 'विषण्णा' अथवा 'दुःखिता' लिखितम्। (ग) 'भवान्' इति पदं सम्बोधनार्थम् प्रयुक्तम्। (घ) क्रियापदं 'अध्यास्यताम्' अस्ति। (ङ) 'वयसः' पदं आयुषः अर्थे प्रयुक्तम्।

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