Chapter 8
Chapter 8 — अध्ययन नोट्स
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8.1 भूमिका
व्याख्या8.1 भूमिका
इस अनुभाग में वैद्युतचुंबकीय तरंगों के सिद्धांत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसकी आवश्यकता को विस्तार से समझाया गया है। अध्याय 4 में हमने जाना कि विद्युत धारा चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है और अध्याय 6 में यह भी देखा कि समय के साथ परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है। मैक्सवेल ने यह तर्क दिया कि समय के साथ परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र भी चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है। उन्होंने ऐम्पियर के नियम में एक असंगति पाई और इसे दूर करने के लिए विस्थापन धारा की अवधारणा प्रस्तुत की। मैक्सवेल ने विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों तथा उनके स्रोतों (आवेश एवं धारा-घनत्व) को सम्मिलित करते हुए चार समीकरणों का समुच्चय दिया, जिन्हें मैक्सवेल समीकरण कहा जाता है। इन समीकरणों से यह निष्कर्ष निकला कि विद्युत और चुंबकीय क्षेत्र युग्मित होकर अंतरिक्ष में संचरित होते हैं, जिन्हें वैद्युतचुंबकीय तरंगें कहा जाता है। इन तरंगों की चाल प्रकाश की गति के बराबर होती है, जिससे यह सिद्ध होता है कि प्रकाश भी एक वैद्युतचुंबकीय तरंग है। 1885 में हर्ट्ज ने प्रयोग द्वारा वैद्युतचुंबकीय तरंगों के अस्तित्व को प्रमाणित किया। आगे इस अध्याय में विस्थापन धारा, वैद्युतचुंबकीय तरंगों के गुण, और उनका स्पेक्ट्रम विस्तार से समझाया जाएगा।
- विद्युत धारा चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है।
- समय के साथ परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है।
- मैक्सवेल ने समय के साथ परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र को चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करने वाला माना।
- विस्थापन धारा की अवधारणा ऐम्पियर के नियम की असंगति को दूर करती है।
- मैक्सवेल समीकरणों से वैद्युतचुंबकीय तरंगों का अस्तित्व सिद्ध होता है।
- वैद्युतचुंबकीय तरंगों की गति प्रकाश की गति के बराबर होती है।
- 📌 विस्थापन धारा: समय के साथ परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र के कारण उत्पन्न अतिरिक्त धारा।
- 📌 मैक्सवेल समीकरण: विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों के चार आधारभूत समीकरण।
- 📌 वैद्युतचुंबकीय तरंगें: युग्मित विद्युत और चुंबकीय क्षेत्र जो अंतरिक्ष में संचरित होते हैं।
8.2 विस्थापन धारा
व्याख्या8.2 विस्थापन धारा
इस अनुभाग में विस्थापन धारा की आवश्यकता, उसकी गणना और भौतिक महत्व को विस्तार से समझाया गया है। अध्याय 4 में हमने देखा था कि विद्युत धारा अपने चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। मैक्सवेल ने यह दर्शाया कि समय के साथ परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र भी चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है, जिसे विस्थापन धारा कहा जाता है। इसे समझने के लिए एक समांतर प्लेट संधारित्र पर विचार किया गया है जिसमें समय के साथ परिवर्तनशील धारा l(t) प्रवाहित हो रही है। संधारित्र के बाहर किसी बिंदु P पर चुंबकीय क्षेत्र ज्ञात करने के लिए ऐम्पियर के परिपथीय नियम का उपयोग किया गया। परंतु, जब चुंबकीय क्षेत्र की गणना दो भिन्न सतहों से की गई तो परिणामों में विरोधाभास पाया गया। एक सतह से धारा गुजरती है और दूसरी से नहीं, जिससे चुंबकीय क्षेत्र का मान भिन्न निकला। इस विरोधाभास को दूर करने के लिए मैक्सवेल ने विस्थापन धारा की अवधारणा दी, जो परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र के कारण उत्पन्न होती है। संधारित्र की प्लेटों के बीच विद्युत क्षेत्र E का परिमाण Q/(ε₀ A) होता है, जहाँ Q आवेश है। विद्युत फ्लक्स Φ_E = E × A = Q/ε₀ होता है। यदि आवेश Q समय के साथ परिवर्तित होता है तो dΦ_E/dt = (1/ε₀) dQ/dt होता है। इस परिवर्तनशील फ्लक्स को विस्थापन धारा के रूप में जोड़ा जाता है। इस प्रकार, कुल धारा i = चालन धारा i_c + विस्थापन धारा i_d होती है। विस्थापन धारा के कारण चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है, जो चालन धारा के समान प्रभावी होता है। इस अवधारणा से विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों के बीच अधिक सममिति स्थापित होती है। इस सममिति के कारण वैद्युतचुंबकीय तरंगों का अस्तित्व संभव होता है।
- चालन धारा के अतिरिक्त परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र भी चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है।
- विस्थापन धारा को मैक्सवेल ने ऐम्पियर के नियम में जोड़ा।
- संधारित्र की प्लेटों के बीच विद्युत क्षेत्र का परिमाण Q/(ε₀ A) होता है।
- विस्थापन धारा i_d = ε₀ dΦ_E/dt होती है।
- कुल धारा i = चालन धारा i_c + विस्थापन धारा i_d होती है।
- विस्थापन धारा के कारण विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों के बीच सममिति स्थापित होती है।
- 📌 चालन धारा (i_c): चालकों में प्रवाहित विद्युत धारा।
- 📌 विस्थापन धारा (i_d): परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र के कारण उत्पन्न धारा।
- 📌 विद्युत फ्लक्स (Φ_E): विद्युत क्षेत्र का सतह से गुजरने वाला फ्लक्स।
निर्वात में मैक्सवेल के समीकरण
सूत्रनिर्वात में मैक्सवेल के समीकरण
इस खंड में निर्वात में विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों के व्यवहार को चार समीकरणों के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिन्हें मैक्सवेल के समीकरण कहा जाता है। ये समीकरण विद्युत आवेश, विद्युत क्षेत्र, चुंबकीय क्षेत्र और धारा के बीच संबंध स्थापित करते हैं। ये
अभ्यास प्रश्न — Chapter 8
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.चित्र 8.5 में एक संधारित्र दर्शाया गया है जो 12 cm त्रिज्या की दो वृत्ताकार प्लेटों को 5.0 cm की दूरी पर रखकर बनाया गया है। संधारित्र को एक बाह्य स्रोत (जो चित्र में नहीं दर्शाया गया है) द्वारा आवेशित किया जा रहा है। आवेशकारी धारा नियत है और इसका मान 0.15A है। (a) धारिता एवं प्लेटों के बीच विभवांतर परिवर्तन की दर का परिकलन कीजिए। (b) प्लेटों के बीच विस्थापन धारा ज्ञात कीजिए। (c) क्या किरखोफ का प्रथम नियम संधारित्र की प्रत्येक प्लेट पर लागू होता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
समाधान: (a) संधारित्र की धारिता C = ε₀ A/d जहाँ, ε₀ = 8.854 × 10⁻¹² F/m (निर्वात में विद्युत स्थिरांक) A = π r² = π × (0.12 m)² = π × 0.0144 = 0.04524 m² d = 0.05 m तो, C = (8.854 × 10⁻¹²) × (0.04524) / 0.05 = 8.01 × 10⁻¹² F विभवांतर परिवर्तन की दर dV/dt = I / C जहाँ I = 0.15 A तो, dV/dt = 0.15 / (8.01 × 10⁻¹²) = 1.87 × 10¹⁰ V/s (b) विस्थापन धारा I_d = ε₀ (dΦ_E/dt) परन्तु Φ_E = E × A और E = V/d इसलिए, dΦ_E/dt = A/d × dV/dt तो, I_d = ε₀ × A/d × dV/dt = ε₀ × A/d × (I/C) = I (ε₀ A/d) / C चूँकि C = ε₀ A/d, इसलिए I_d = I = 0.15 A (c) Kirchhoff का प्रथम नियम (धारा का संरक्षण) संधारित्र की प्रत्येक प्लेट पर लागू नहीं होता क्योंकि संधारित्र में आवेश संचरण नहीं होता, बल्कि विस्थापन धारा होती है। इसलिए, प्लेटों पर आवेश का प्रवाह नहीं होता, अतः Kirchhoff का प्रथम नियम संधारित्र की प्रत्येक प्लेट पर सीधे लागू नहीं होता।
व्याख्या:
संधारित्र की धारिता सूत्र C = ε₀ A/d से ज्ञात की गई। विभवांतर परिवर्तन की दर I/C से निकाली गई। विस्थापन धारा की गणना विस्थापन धारा सूत्र से की गई। Kirchhoff के नियम की व्याख्या संधारित्र में आवेश प्रवाह न होने के कारण की गई।
Q2.एक समांतर प्लेट संधारित्र (चित्र 8.6), R = 6.0 cm त्रिज्या की दो वृत्ताकार प्लेटों से बना है और इसकी धारिता C = 100 pF है। संधारित्र को 230 V, 300 rad s⁻¹ की (कोणीय) आवृत्ति के किसी स्रोत से जोड़ा गया है। (a) चालन धारा का rms मान क्या है? (b) क्या चालन धारा विस्थापन धारा के बराबर है? (c) प्लेटों के बीच, अक्ष से 3.0 cm की दूरी पर स्थित बिंदु पर B का आयाम ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
समाधान: दिए गए: C = 100 pF = 100 × 10⁻¹² F V₀ = 230 V (rms) ω = 300 rad/s R = 6.0 cm = 0.06 m (a) चालन धारा I = C dV/dt V = V₀ sin ωt तो, dV/dt = ω V₀ cos ωt अतः I = C ω V₀ cos ωt चूँकि V₀ rms है, तो I rms = C ω V₀ I rms = 100 × 10⁻¹² × 300 × 230 = 6.9 × 10⁻⁶ A = 6.9 μA (b) चालन धारा और विस्थापन धारा बराबर होती हैं क्योंकि संधारित्र में आवेश संचरण नहीं होता, विस्थापन धारा ही धारा का स्थान लेती है। अतः वे बराबर हैं। (c) चुंबकीय क्षेत्र B का आयाम: B = (μ₀ I) / (2π r) जहाँ r = 3.0 cm = 0.03 m I = 6.9 μA = 6.9 × 10⁻⁶ A μ₀ = 4π × 10⁻⁷ T·m/A तो, B = (4π × 10⁻⁷ × 6.9 × 10⁻⁶) / (2π × 0.03) = (4 × 10⁻⁷ × 6.9 × 10⁻⁶) / (0.06) = (2.76 × 10⁻¹²) / 0.06 = 4.6 × 10⁻¹¹ T अतः B का आयाम 4.6 × 10⁻¹¹ टेस्ला है।
व्याख्या:
चालन धारा rms मान CωV₀ से निकाला गया। विस्थापन धारा और चालन धारा की समानता को समझाया गया। चुंबकीय क्षेत्र सूत्र B = μ₀ I / 2π r से B का मान निकाला गया।
Q3.10⁻¹⁰ m तरंगदैर्घ्य की X-किरणों, 6800 Å तरंगदैर्घ्य के प्रकाश, तथा 500 m की रेडियो तरंगों के लिए किस भौतिक राशि का मान समान है?
उत्तर:
उत्तर: इन तीनों के लिए तरंगदैर्घ्य अलग-अलग है, परन्तु उनकी आवृत्ति (frequency) अलग-अलग होगी। परंतु, इन तीनों के लिए प्रकाश की गति (c = 3 × 10⁸ m/s) समान होती है क्योंकि वे सभी निर्वात में चल रही तरंगें हैं। अतः, इन तीनों के लिए तरंग की गति समान है।
व्याख्या:
X-किरण, प्रकाश और रेडियो तरंगें सभी निर्वात में विद्युतचुम्बकीय तरंगें हैं, इसलिए उनकी गति c समान होती है।
Q4.एक समतल बैद्युतचुंबकीय तरंग निर्वात में z-अक्ष के अनुदिश चल रही है। इसके विद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्रों के सदिश की दिशा के बारे में आप क्या कहेंगे? यदि तरंग की आवृत्ति 30 MHz हो तो उसकी तरंगदैर्घ्य कितनी होगी?
उत्तर:
उत्तर: (1) विद्युत क्षेत्र (E) और चुंबकीय क्षेत्र (B) दोनों परस्पर लम्बवत होते हैं और वे तरंग के प्रसरण दिशा (z-अक्ष) के प्रति लम्बवत होते हैं। अर्थात्, यदि तरंग z-अक्ष के अनुदिश चल रही है, तो E और B दोनों x और y अक्षों के अनुदिश होंगे और E, B तथा प्रसरण दिशा परस्पर लम्बवत होंगे। (2) तरंगदैर्घ्य λ = c / ν जहाँ, c = 3 × 10⁸ m/s ν = 30 MHz = 30 × 10⁶ Hz तो, λ = (3 × 10⁸) / (30 × 10⁶) = 10 m अतः तरंगदैर्घ्य 10 मीटर होगी।
व्याख्या:
बैद्युतचुंबकीय तरंगों में E, B और प्रसरण दिशा परस्पर लम्बवत होते हैं। तरंगदैर्घ्य आवृत्ति और गति के अनुपात से ज्ञात होती है।
Q5.एक रेडियो 7.5 MHz से 12 MHz बैंड के किसी स्टेशन से समस्वरित हो सकता है। संगत तरंगदैर्घ्य बैंड क्या होगा?
उत्तर:
उत्तर: तरंगदैर्घ्य λ = c / ν जहाँ, c = 3 × 10⁸ m/s ν₁ = 7.5 MHz = 7.5 × 10⁶ Hz ν₂ = 12 MHz = 12 × 10⁶ Hz तो, λ₁ = (3 × 10⁸) / (12 × 10⁶) = 25 m λ₂ = (3 × 10⁸) / (7.5 × 10⁶) = 40 m अतः तरंगदैर्घ्य बैंड 25 m से 40 m तक होगा।
व्याख्या:
तरंगदैर्घ्य आवृत्ति के व्युत्क्रमानुपाती होती है। आवृत्ति के न्यूनतम और अधिकतम मानों से तरंगदैर्घ्य सीमा ज्ञात की गई।
Q6.एक आवेशित कण अपनी माध्य साम्यावस्था के दोनों ओर 10⁹ Hz आवृत्ति से दोलन करता है। दोलक द्वारा जनित बैद्युतचुंबकीय तरंगों की आवृत्ति कितनी है?
उत्तर:
उत्तर: जब आवेशित कण 10⁹ Hz की आवृत्ति से दोलन करता है, तो वह आवृत्ति ही बैद्युतचुंबकीय तरंगों की आवृत्ति होती है। अतः, बैद्युतचुंबकीय तरंगों की आवृत्ति = 10⁹ Hz।
व्याख्या:
दोलन की आवृत्ति ही उत्पन्न तरंग की आवृत्ति होती है।
Q7.निर्वात में एक आवर्त बैद्युतचुंबकीय तरंग के चुंबकीय क्षेत्र वाले भाग का आयाम B₀ = 510 nT है। तरंग के विद्युत क्षेत्र वाले भाग का आयाम क्या है?
उत्तर:
समाधान: निर्वात में E और B के बीच संबंध: E₀ = c B₀ जहाँ, c = 3 × 10⁸ m/s B₀ = 510 nT = 510 × 10⁻⁹ T तो, E₀ = 3 × 10⁸ × 510 × 10⁻⁹ = 153 V/m अतः विद्युत क्षेत्र का आयाम 153 V/m होगा।
व्याख्या:
निर्वात में विद्युत और चुंबकीय क्षेत्र के आयाम c के गुणनफल के बराबर होते हैं।
Q8.कल्पना कीजिए कि एक बैद्युतचुंबकीय तरंग के विद्युत क्षेत्र का आयाम E₀ = 120 N/C है तथा इसकी आवृत्ति v = 50.0 MHz है। (a) B₀, ω, k तथा λ ज्ञात कीजिए, (b) E तथा B के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
समाधान: दिए गए: E₀ = 120 N/C ν = 50.0 MHz = 50 × 10⁶ Hz (a) चुंबकीय क्षेत्र का आयाम: B₀ = E₀ / c = 120 / (3 × 10⁸) = 4.0 × 10⁻⁷ T कोणीय आवृत्ति: ω = 2π ν = 2π × 50 × 10⁶ = 3.14 × 10⁸ rad/s तरंग संख्या: k = ω / c = (3.14 × 10⁸) / (3 × 10⁸) = 1.05 m⁻¹ तरंगदैर्घ्य: λ = 2π / k = 2π / 1.05 = 6.0 m (b) विद्युत क्षेत्र: E = E₀ sin(kz - ωt) î चुंबकीय क्षेत्र: B = B₀ sin(kz - ωt) ĵ यहाँ, î और ĵ क्रमशः x और y दिशा के एकक सदिश हैं।
व्याख्या:
B₀ = E₀/c से चुंबकीय क्षेत्र निकाला गया। ω = 2πν, k = ω/c और λ = 2π/k सूत्रों का प्रयोग किया गया। E और B के लिए सदिश व्यंजक बनाए गए।
Bhautiki-I के सभी 8 अध्याय
Physics · Class 12