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Chapter 7

🎓 Class 11📖 Vyavsay Adhyanan📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट
Chapter 6अध्याय 7 / 11Chapter 8

Chapter 7अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

7.1 परिचय

व्याख्या

7.1 परिचय

आज के युग में व्यवसाय के लिए बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है और प्रतियोगिता भी तीव्र होती जा रही है। इस संदर्भ में, मध्य और बड़े पैमाने के व्यावसायिक संगठन स्थापित करने के लिए कंपनी संगठन को प्राथमिकता दी जाती है। कंपनी निर्माण की प्रक्रिया में व्यवसाय के विचार के जन्म से लेकर कंपनी के वैधानिक रूप से व्यवसाय प्रारंभ करने तक के विभिन्न चरण शामिल होते हैं। इन चरणों को कंपनी निर्माण की विभिन्न स्थितियाँ कहा जाता है। जो लोग कंपनी के निर्माण के लिए पहल करते हैं और उससे जुड़े जोखिम उठाते हैं, उन्हें कंपनी के प्रवर्तक कहा जाता है। इस अध्याय में कंपनी निर्माण की विभिन्न स्थितियों और प्रत्येक स्थिति के विभिन्न चरणों का विस्तृत वर्णन किया गया है, जिससे विद्यार्थी कंपनी निर्माण की प्रक्रिया को समझ सकें।

  • व्यवसाय के लिए बड़ी पूंजी की आवश्यकता होती है।
  • प्रतियोगिता के कारण कंपनी संगठन को प्राथमिकता मिलती है।
  • कंपनी निर्माण की प्रक्रिया में विभिन्न चरण होते हैं।
  • कंपनी के निर्माण के लिए जो पहल करते हैं उन्हें प्रवर्तक कहते हैं।
  • यह अध्याय कंपनी निर्माण की विभिन्न स्थितियों का वर्णन करता है।
  • 📌 कंपनी निर्माण: व्यवसाय के विचार से लेकर कंपनी के वैधानिक रूप से व्यवसाय प्रारंभ तक की प्रक्रिया।
  • 📌 प्रवर्तक: वे व्यक्ति जो कंपनी के निर्माण के लिए पहल करते हैं और जोखिम उठाते हैं।

7.2 कंपनी की संरचना

व्याख्या

7.2 कंपनी की संरचना

कंपनी की संरचना एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई वैधानिक औपचारिकताएँ और प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। इसे समझने के लिए इसे तीन मुख्य चरणों में बांटा गया है: (क) प्रवर्तन, (ख) समामेलन, और (ग) पूंजी का अभिदान। प्रवर्तन में व्यवसाय के अवसरों की खोज और कंपनी स्थापना के लिए पहल शामिल है। समामेलन में कंपनी के पंजीकरण की औपचारिकताएँ पूरी की जाती हैं और समामेलन प्रमाण पत्र प्राप्त किया जाता है, जो कंपनी के अस्तित्व का प्रमाण होता है। पूंजी अभिदान में कंपनी जनता से पूंजी जुटाने के लिए आवश्यक कदम उठाती है। निजी कंपनी समामेलन प्रमाण पत्र मिलने के बाद तुरंत व्यापार प्रारंभ कर सकती है, जबकि सार्वजनिक कंपनी को पूंजी अभिदान की प्रक्रिया से गुजरना होता है। इस प्रकार, कंपनी निर्माण की प्रक्रिया में ये तीन स्थितियाँ महत्वपूर्ण हैं।

  • कंपनी निर्माण की प्रक्रिया तीन चरणों में होती है: प्रवर्तन, समामेलन, पूंजी अभिदान।
  • प्रवर्तन में व्यवसाय के अवसरों की खोज और कंपनी स्थापना की पहल होती है।
  • समामेलन में कंपनी का पंजीकरण और समामेलन प्रमाण पत्र प्राप्त होता है।
  • पूंजी अभिदान में जनता से पूंजी जुटाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाते हैं।
  • निजी कंपनी समामेलन के बाद तुरंत व्यापार प्रारंभ कर सकती है।
  • सार्वजनिक कंपनी को पूंजी अभिदान की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
  • 📌 प्रवर्तन: कंपनी निर्माण की पहली स्थिति जिसमें व्यवसाय के अवसरों की खोज और पहल होती है।
  • 📌 समामेलन: कंपनी के पंजीकरण की प्रक्रिया और समामेलन प्रमाण पत्र प्राप्ति।
  • 📌 पूंजी अभिदान: जनता से पूंजी जुटाने की प्रक्रिया।

7.2.1 कंपनी प्रवर्तन

व्याख्या

7.2.1 कंपनी प्रवर्तन

कंपनी निर्माण की प्रक्रिया में प्रवर्तन प्रथम स्थिति है। इसमें व्यवसाय के अवसरों की खोज और कंपनी स्थापना के लिए पहल शामिल होती है। जो व्यक्ति या समूह कंपनी स्थापना की दिशा में कदम बढ़ाते हैं, उन्हें प्रवर्तक कहा जाता है। प्रवर्तक व्यवसाय के अवसरों की

अभ्यास प्रश्नChapter 7

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. कंपनी के निर्माण की विभिन्न स्थितियों के नाम लिखें।

उत्तर:

कंपनी के निर्माण की विभिन्न स्थितियाँ निम्नलिखित हैं: 1. प्रारंभिक स्थिति (Incorporation) 2. समामेलन (Registration) 3. प्रवर्तन (Commencement of Business) इन स्थितियों के अंतर्गत कंपनी का विधिवत रूप से पंजीकरण और कानूनी रूप से स्थापित होना शामिल है।

व्याख्या:

कंपनी के निर्माण की प्रक्रिया में सबसे पहले कंपनी का नाम पंजीकृत किया जाता है, फिर समामेलन के लिए आवश्यक दस्तावेज जमा किए जाते हैं और अंत में कंपनी को कानूनी रूप से व्यापार प्रारंभ करने की अनुमति मिलती है।

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Q2.2. कंपनी समामेलन के लिए आवश्यक प्रलेखों को सूचीबद्ध करें।

उत्तर:

कंपनी समामेलन के लिए आवश्यक प्रलेख निम्नलिखित हैं: 1. कंपनी का नाम प्रस्ताव 2. कंपनी के अंतर्नियम (Memorandum of Association) 3. कंपनी के नियम एवं विनियम (Articles of Association) 4. प्रवर्तकों के हस्ताक्षर सहित आवेदन पत्र 5. पंजीकरण शुल्क का भुगतान प्रमाण 6. अन्य कानूनी दस्तावेज जो संबंधित प्राधिकरण द्वारा मांगे जाते हैं।

व्याख्या:

कंपनी के समामेलन के लिए उपरोक्त दस्तावेज आवश्यक होते हैं ताकि कंपनी का पंजीकरण विधिवत रूप से किया जा सके और कंपनी कानूनी रूप से स्थापित हो सके।

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Q3.3. प्रविवरण पत्र क्या है? क्या प्रत्येक कंपनी के लिए प्रविवरण पत्र जमा कराना आवश्यक है?

उत्तर:

प्रविवरण पत्र (Prospectus) वह दस्तावेज होता है जिसमें कंपनी अपने शेयरों या प्रतिभूतियों के सार्वजनिक निर्गमन के संबंध में जानकारी देती है। इसमें कंपनी के व्यवसाय, वित्तीय स्थिति, प्रबंधन, और निवेशकों के लिए आवश्यक अन्य विवरण होते हैं। प्रत्येक कंपनी के लिए प्रविवरण पत्र जमा कराना आवश्यक नहीं है। केवल वे सार्वजनिक कंपनी जो सार्वजनिक निर्गमन करती हैं, उन्हें प्रविवरण पत्र जमा करना अनिवार्य होता है। निजी कंपनियों के लिए यह आवश्यक नहीं होता।

व्याख्या:

प्रविवरण पत्र का उद्देश्य निवेशकों को कंपनी के बारे में सही और पूर्ण जानकारी देना है ताकि वे सूचित निर्णय ले सकें। निजी कंपनियों के लिए यह अनिवार्य नहीं है क्योंकि वे सार्वजनिक रूप से शेयर जारी नहीं करतीं।

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Q4.4. ‘आवंटन विवरणी’ शब्द को संक्षेप में समझाइए।

उत्तर:

आवंटन विवरणी (Allotment Letter) वह दस्तावेज होता है जो कंपनी द्वारा निवेशकों को जारी किया जाता है, जिसमें उनके द्वारा मांगे गए शेयरों की संख्या और आवंटित शेयरों की संख्या का विवरण होता है। यह निवेशकों को सूचित करता है कि उन्हें कितने शेयर आवंटित किए गए हैं।

व्याख्या:

आवंटन विवरणी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह उनके निवेश की पुष्टि करती है और कंपनी के साथ उनके शेयरधारक संबंध की शुरुआत होती है।

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Q5.5. कंपनी निर्माण के किस स्तर पर उसे सेबी (SEBI) से संपर्क करना होता है?

उत्तर:

कंपनी को सेबी (SEBI) से संपर्क तब करना होता है जब वह सार्वजनिक निर्गमन (Public Issue) के लिए आवेदन करती है। अर्थात्, जब कंपनी अपने शेयरों को सार्वजनिक रूप से जारी करना चाहती है तो उसे सेबी से अनुमति लेनी होती है।

व्याख्या:

सेबी का उद्देश्य प्रतिभूतियों के बाजार को नियंत्रित करना और निवेशकों के हितों की रक्षा करना है। इसलिए सार्वजनिक निर्गमन के समय कंपनी को सेबी से संपर्क करना आवश्यक होता है।

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Q6.1. प्रवर्तन शब्द का क्या अर्थ है? प्रवर्तकों ने जिस कंपनी का प्रवर्तन किया है उसके संदर्भ में उनकी कानूनी स्थिति की चर्चा कीजिए।

उत्तर:

प्रवर्तन (Commencement) का अर्थ है कंपनी का कानूनी रूप से अपना व्यवसाय प्रारंभ करना। यह वह चरण है जब कंपनी समामेलन के बाद व्यापार शुरू करती है। प्रवर्तक (Promoters) वे व्यक्ति होते हैं जिन्होंने कंपनी के निर्माण की पहल की और समामेलन की प्रक्रिया पूरी की। प्रवर्तकों की कानूनी स्थिति इस प्रकार होती है: - वे कंपनी के लिए प्रारंभिक अनुबंध करते हैं। - समामेलन के बाद, प्रवर्तक कंपनी के लिए किए गए अनुबंधों की स्वीकृति प्राप्त करते हैं। - प्रवर्तक कंपनी के प्रति एक विशेष दायित्व रखते हैं और कंपनी के हित में कार्य करते हैं। - प्रवर्तक कंपनी के लिए आवश्यक दस्तावेज तैयार करते हैं और पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करते हैं।

व्याख्या:

प्रवर्तन कंपनी के निर्माण की अंतिम अवस्था है, जिसमें कंपनी कानूनी रूप से अस्तित्व में आती है और व्यापार शुरू करती है। प्रवर्तक इस प्रक्रिया के मुख्य कर्ता होते हैं और उनकी कानूनी जिम्मेदारियाँ होती हैं।

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Q7.2. कंपनी के प्रवर्तन के लिए, प्रवर्तक क्या कदम उठाते हैं उनको समझाइए।

उत्तर:

कंपनी के प्रवर्तन के लिए प्रवर्तक निम्नलिखित कदम उठाते हैं: 1. कंपनी के नाम का चयन और आरक्षण कराना। 2. कंपनी के अंतर्नियम और नियमावली तैयार करना। 3. समामेलन के लिए आवश्यक दस्तावेज तैयार करना और संबंधित प्राधिकरण को जमा करना। 4. पंजीकरण शुल्क का भुगतान करना। 5. समामेलन प्रमाणपत्र प्राप्त करना। 6. प्रारंभिक अनुबंध करना और आवश्यक अनुमोदन लेना। 7. सार्वजनिक निर्गमन के लिए प्रविवरण पत्र तैयार करना (यदि आवश्यक हो)। 8. सेबी या अन्य नियामक संस्थाओं से अनुमति लेना। 9. कंपनी के लिए बैंक खाता खोलना और आवश्यक वित्तीय व्यवस्थाएँ करना।

व्याख्या:

प्रवर्तक कंपनी के निर्माण की प्रक्रिया के मुख्य कर्ता होते हैं और वे सभी कानूनी, प्रशासनिक और वित्तीय कार्यों को पूरा करते हैं ताकि कंपनी कानूनी रूप से स्थापित हो सके और व्यापार प्रारंभ कर सके।

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Q8.3. कंपनी के सीमा नियम क्या हैं? इसकी धाराओं को संक्षेप में समझाइए।

उत्तर:

कंपनी के सीमा नियम (Doctrine of Ultra Vires) का अर्थ है कि कंपनी केवल अपने अंतर्नियम में वर्णित उद्देश्यों के लिए ही कार्य कर सकती है। यदि कंपनी अपने उद्देश्यों के बाहर कोई कार्य करती है तो वह अवैध माना जाएगा। धाराएँ: - कंपनी के अंतर्नियम में वर्णित उद्देश्यों के बाहर किया गया कार्य अमान्य होगा। - ऐसे कार्यों से कंपनी को कोई लाभ नहीं होगा और वे अनुबंध रद्द किए जा सकते हैं। - यह नियम कंपनी के सदस्यों और बाहरी पक्षों की सुरक्षा के लिए है ताकि कंपनी के संसाधनों का दुरुपयोग न हो।

व्याख्या:

सीमा नियम कंपनी के कार्यों को नियंत्रित करता है और सुनिश्चित करता है कि कंपनी केवल अपने निर्धारित उद्देश्यों के लिए ही कार्य करे। इससे निवेशकों और अन्य हितधारकों का संरक्षण होता है।

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