NCERTCh 5निःशुल्क

Chapter 5

🎓 Class 11📖 Shashwati📖 9 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~14 मिनट
Chapter 4अध्याय 5 / 11Chapter 6

Chapter 5अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

आहारविचार: परिचय

व्याख्या

आहारविचार: परिचय

आहारविचार: संस्कृत कक्षा 11 के इस अध्याय का मूल आधार चरकसंहिता के 'विमानस्थानम्' प्रकरण के 'रसविमान' नामक प्रथम अध्याय से संकलित है। यहाँ 'विमान' शब्द का तात्पर्य रोगात्मक दोषों एवं औषधियों के विज्ञान से है। इस अध्याय में स्वास्थ्य का मूल आधार समुचित आहार को माना गया है। आहार के प्रकार, उसकी मात्रा, उचित समय, और आहार के गुणों का विधान इस अंश का मुख्य विषय है। चरकसंहिता के अनुसार, आहार न केवल शरीर की ऊर्जा का स्रोत है, बल्कि वह शरीर के दोषों के संतुलन और रोगों के निवारण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आहार के गुणों का ज्ञान होना आवश्यक है ताकि हम अपने शरीर को स्वस्थ रख सकें और रोगों से बचाव कर सकें। इस परिचय में आहार के महत्व को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि उचित आहार के बिना शरीर का स्वास्थ्य स्थिर नहीं रह सकता।

  • आहारविचार चरकसंहिता के 'विमानस्थानम्' प्रकरण से लिया गया है।
  • 'विमान' का अर्थ है रोगात्मक दोषों और औषधियों का विज्ञान।
  • स्वास्थ्य का मूल आधार समुचित आहार है।
  • आहार के प्रकार, मात्रा और समय का विधान आवश्यक है।
  • आहार शरीर के दोषों के संतुलन में सहायक होता है।
  • 📌 आहारः - भोजन
  • 📌 विमान - रोगात्मक दोषों एवं औषधियों का विज्ञान
  • 📌 चरकसंहिता - प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथ

आहार के गुण और प्रभाव

व्याख्या

आहार के गुण और प्रभाव

इस खंड में आहार के विभिन्न गुणों जैसे उष्णता (गर्माहट), शीतलता (ठंडक), स्निग्धता (चिकनाई), आदि का वर्णन किया गया है। उष्णमट्टनीय आहार वह होता है जो गर्माहट उत्पन्न करता है, जिससे वात दोष नियंत्रित होता है और शरीर में जलन होती है। स्निग्ध आहार चिकनाईयुक्त होता है जो शरीर को पोषण देता है, बल और इन्द्रिय शक्ति बढ़ाता है तथा वर्ण में निखार लाता है। मात्रा अनुसार आहार लेने से शरीर सुखी रहता है और पाचन क्रिया सही रहती है। इसके विपरीत, अजीर्ण आहार दोषों को बढ़ाता है तथा शरीर में विषाक्तता उत्पन्न करता है। वीर्याविरुद्ध आहार से शरीर में विकार उत्पन्न होते हैं। इसलिए आहार के गुणों को समझकर उचित मात्रा में और उचित समय पर भोजन करना आवश्यक है। आहार के ये गुण शरीर के दोषों के संतुलन, ऊर्जा, और स्वास्थ्य बनाए रखने में सहायक होते हैं।

  • उष्णमट्टनीय आहार वात दोष को नियंत्रित करता है।
  • स्निग्ध आहार शरीर को पोषण और बल प्रदान करता है।
  • मात्रावद्धि से वात, पित्त, कफ दोष बढ़ते हैं।
  • अजीर्ण आहार शरीर में दोषों को बढ़ाता है।
  • वीर्याविरुद्ध आहार से शरीर में विकार उत्पन्न होते हैं।
  • 📌 उष्णमट्टनीय - गर्माहट उत्पन्न करने वाला आहार
  • 📌 स्निग्ध - चिकनाईयुक्त आहार
  • 📌 मात्रावद् - उचित मात्रा में लिया गया आहार

आहार के प्रकार

व्याख्या

आहार के प्रकार

इस भाग में आहार के मुख्य तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है: सात्विक, राजसिक, और तामसिक। सात्विक आहार वह होता है जो शरीर और मन को शुद्ध करता है, जिससे व्यक्ति में शांति, संतुलन और स्वास्थ्य बना रहता है। यह आहार ताजे, हल्के, और पौष्टिक पदार्थों से बना

अभ्यास प्रश्नChapter 5

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. संस्कृतेन उत्तरत। (क) एषः पाठः कस्मात् ग्रन्थात् उद्भूतः? (ख) चरकसंहिताया: रचयिता कः? (ग) कीटूशं भोजनम् इन्द्रियाणि दूढीकरोति? (घ) अजीर्णं भुज्जानस्य कः दोषः भवति? (ङ) कीटूशं भोजनं श्लेष्माणं परिहासयति? (च) कीटूशं भोजनं बलाभिवृद्धिम् उपजनयति? (छ) इष्टसर्वोपकरणं भोजनं कुत्र अश्नीयात्? (ज) कथं भुज्जानस्य उत्स्नेहनस्य समाप्तिः न नियता? (झ) अतिविलम्बितं हि भुज्जानः कां न अधिगच्छति? (ञ) जल्पतः हसतः अन्यमनसः वा भुज्जानस्य के दोषाः भवन्ति?

उत्तर:

1.(क) एषः पाठः चरकसंहिता इति प्राचीन आयुर्वेदग्रन्थात् उद्भूतः। (ख) चरकसंहिताया: रचयिता आयुर्वेदस्य प्राचीनतमः चिकित्सकः चरकः अस्ति। (ग) कीटूशं भोजनम् इन्द्रियाणि दूढीकरोति यतः तत्र दोषाः उत्पद्यन्ते, शरीरं दुर्बलतां प्राप्नोति। (घ) अजीर्णं भुज्जानस्य पाचनतन्त्रे दोषः भवति, यतः भोजनं सम्यक् पचति न। (ङ) कीटूशं भोजनं श्लेष्माणं परिहासयति, यतः तत्र श्लेष्मदोषः निवार्यते। (च) कीटूशं भोजनं बलाभिवृद्धिम् उपजनयति, यतः शरीरस्य बलं वर्धते। (छ) इष्टसर्वोपकरणं भोजनं गृहस्थे अश्नीयात्, यतः तत्र सर्वसाधनानि सुलभानि सन्ति। (ज) भुज्जानस्य उत्स्नेहनस्य समाप्तिः न नियता यतः पाचनक्रिया विलम्बिता भवति। (झ) अतिविलम्बितं हि भुज्जानः रोगाणि अधिगच्छति, यतः शरीरं दुर्बलतां प्राप्नोति। (ञ) जल्पतः हसतः अन्यमनसः वा भुज्जानस्य दोषाः सन्ति, यतः तेषां कारणेन पाचनक्रिया बाधिते भवति।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्नस्य संस्कृतपाठानुसारं उत्तरं दत्तम्। चरकसंहितायाः महत्त्वं, दोषाणां प्रभावः, तथा भोजनस्य प्रकाराः स्पष्टीकृताः।

MediumNCERT
Q2.2. उचितक्रियापदैः रिक्तस्थानानि पूर्यत। (क) बहु भुक्तं आहारजातम् (ख) अजल्पन् अहसन् (ग) उष्णं हि भुज्यमानं (घ) उष्णं भोजनं उदरस्य अग्निम् (ङ) स्निग्धं भुज्यमानं भोजनम् शरीरम् (च) मात्रावद् हि भुक्तं सुखं (छ) अतिद्वुतं हि न (ज) उष्णं भोजनं वातम्

उत्तर:

2.(क) बहु भुक्तं आहारजातम् न शोचते। (ख) अजल्पन् अहसन् सन्तः सुखिनः भवन्ति। (ग) उष्णं हि भुज्यमानं भोजनं पच्यते। (घ) उष्णं भोजनं उदरस्य अग्निम् प्रकोपयति। (ङ) स्निग्धं भुज्यमानं भोजनम् शरीरम् पोषयति। (च) मात्रावद् हि भुक्तं सुखं भवति। (छ) अतिद्वुतं हि न शोचते। (ज) उष्णं भोजनं वातम् वर्धयति।

व्याख्या:

प्रत्येक रिक्तस्थानं उचितक्रियापदेन पूरितम् यथा वाक्यस्य अर्थः सम्यक् स्यात्।

EasyNCERT
Q3.3. अधोलिखितपदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत। शीघ्रम्, उष्णम्, स्निग्धम्, तैलादियुक्तम्, विवर्धयति, अतिद्वुतम्, अतिविलम्बितम्, पच्यते।

उत्तर:

3. वाक्येषु पदानां प्रयोगः - (1) शीघ्रम् भोजनं पच्यते। (2) उष्णं भोजनं उदरं प्रकोपयति। (3) स्निग्धं भोजनं शरीरं पोषयति। (4) तैलादियुक्तं भोजनं बलं वर्धयति। (5) भोजनं विवर्धयति शरीरस्य बलम्। (6) अतिद्वुतं भोजनं न शोचते। (7) अतिविलम्बितं भोजनं रोगाणि जनयति। (8) भोजनं सम्यक् पच्यते यदि उचितं आहारः।

व्याख्या:

प्रत्येकं पदं वाक्येषु सम्यक् प्रकारेण योजितम् यथा तेषां अर्थः स्पष्टः स्यात्।

MediumNCERT
Q4.4. अधोलिखितप्रकृतिप्रत्ययविभागं योजयत। यथा- जु + क नपुं., प्र. एकवचनम् = जीर्णम्। अश् शत् पुं. प्रथमा एकवचनम् = ... अभि वृध् णिच् लट् प्र. पु. एकवचनम् = ... उप + सूज् कर्मवाच्य, लट्, प्र. पु. एकवचनम् = ... इष् + क पुं. सप्तमी एकवचनम् = ... भुज् शानच्, पुं. षष्ठी, एकवचनम् = ... न हसन् इति = ... प्र + कुप् + णिच् लट्, प्र.पु. एकवचनम् = ... जन् + क स्त्रीलिङ्गम् = ... उप + चि + लट्, प्र. पु. एकवचनम् = ... अभि + नि + वृत्त् + णिच्, लट्लकार, = ... प्र. पु. एकवचनम् = ...

उत्तर:

4. प्रकृतिप्रत्ययविभागस्य योजनेन उत्तराणि - (1) अश् शत् पुं. प्रथमा एकवचनम् = अश्नाति (2) अभि वृध् णिच् लट् प्र. पु. एकवचनम् = अभिवर्धति (3) उप + सूज् कर्मवाच्य, लट्, प्र. पु. एकवचनम् = उपसूचयति (4) इष् + क पुं. सप्तमी एकवचनम् = इष्यते (5) भुज् शानच्, पुं. षष्ठी, एकवचनम् = भुजस्य (6) न हसन् इति = न हसति (7) प्र + कुप् + णिच् लट्, प्र.पु. एकवचनम् = प्रकोपयति (8) जन् + क स्त्रीलिङ्गम् = जनिका (9) उप + चि + लट्, प्र. पु. एकवचनम् = उपचिकित्सते (10) अभि + नि + वृत्त् + णिच्, लट्लकार, प्र. पु. एकवचनम् = अभिनिवर्तते

व्याख्या:

प्रत्येकं धातुं प्रकृतिप्रत्ययेन योज्य वाक्यरूपेण प्रस्तुतम्। संस्कृतव्याकरणस्य नियमाः अनुसृताः।

HardNCERT
Q5.5. अधोलिखतानां पदानां सन्धिच्छेदं कुरुत। जीर्णेऽश्नीयात्, चोष्माणं, पूर्वस्याहारस्य, प्रकोपयत्याशु, दोषेष्वग्नौ, अभ्यवहतम्, तस्माज्जीर्णै, चाश्नीयात्।

उत्तर:

5. सन्धिच्छेदाः - (1) जीर्णेऽश्नीयात् = जीर्णे + अश्नीयात् (2) चोष्माणं = च + उष्माणं (3) पूर्वस्याहारस्य = पूर्वस्य + आहारस्य (4) प्रकोपयत्याशु = प्रकोपयत्य + आशु (5) दोषेष्वग्नौ = दोषेषु + अग्नौ (6) अभ्यवहतम् = अभि + अवहतम् (7) तस्माज्जीर्णै = तस्मात् + जीर्णै (8) चाश्नीयात् = च + अश्नीयात्

व्याख्या:

प्रत्येकं समासं वा सन्धिं यथावत् छिन्नीकृतम्। संस्कृतसन्धिनियमाः पालनम्।

MediumNCERT
Q6.6. अधोलिखितेषु पदेषु विभक्तिं वचनं च दर्शयत। मुखेषु, सर्वान्, हृदये, वृद्धिम्, जराम्, भुज्जानस्य।

उत्तर:

6. पदेषु विभक्तिः वचनं च - (1) मुखेषु = बहुवचनम्, सप्तमी विभक्तिः (2) सर्वान् = बहुवचनम्, द्वितीया विभक्तिः (3) हृदये = एकवचनम्, सप्तमी विभक्तिः (4) वृद्धिम् = एकवचनम्, द्वितीया विभक्तिः (5) जराम् = एकवचनम्, द्वितीया विभक्तिः (6) भुज्जानस्य = एकवचनम्, षष्ठी विभक्तिः

व्याख्या:

प्रत्येकं पदं संस्कृतव्याकरणानुसारं विभक्तिं वचनं च निर्दिष्टम्।

MediumNCERT
Q7.7. पाठात् चित्वा विलोमशब्दान् लिखत। यथा- विरुद्धम् अविरुद्धम् अतिविलम्बितम् ... जल्पन् ... हसन् ... जीर्णै ... इष्टम् ... तन्मना: ... अतिद्वतम् ...

उत्तर:

7. विलोमशब्दाः - (1) अतिविलम्बितम् - शीघ्रम् (2) जल्पन् - मौनम् (3) हसन् - रोदन् (4) जीर्णै - नवीनै (5) इष्टम् - अनिष्टम् (6) तन्मना: - अनत्मना: (7) अतिद्वतम् - अल्पद्वतम्

व्याख्या:

प्रत्येकं शब्दस्य विपरीतार्थकं शब्दं पाठानुसारं निर्दिष्टम्।

EasyNCERT
Q8.8. इष्टे देशे ... चाश्नीयात् इत्यस्य गद्यांशस्य आशयं हिन्दी भाषया स्पष्टं कुरुत।

उत्तर:

8. इस गद्यांश का आशय यह है कि जिस स्थान पर उचित और स्वास्थ्यवर्धक भोजन उपलब्ध हो, वहाँ भोजन करना चाहिए। उचित भोजन से शरीर को बल मिलता है और रोगों से बचाव होता है। अतः भोजन के स्थान का चयन सावधानीपूर्वक करना आवश्यक है ताकि स्वास्थ्य और शक्ति का विकास हो सके।

व्याख्या:

गद्यांश के भावार्थ को हिन्दी में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है, जिससे पाठक को मूल आशय समझ में आ सके।

MediumNCERT