Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
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3.1 परिचय
व्याख्या3.1 परिचय
इस खंड में हम भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक संगठनों के विभिन्न स्वरूपों का परिचय प्राप्त करेंगे। हमारे दैनिक जीवन में विभिन्न प्रकार के व्यवसायिक संगठन देखे जा सकते हैं, जिनमें निजी क्षेत्र के संगठन जैसे एकल स्वामित्व वाली दुकानें, साझेदारी फर्में, संयुक्त हिंदू परिवार, सहकारी समितियाँ एवं कंपनियाँ शामिल हैं। ये सभी निजी स्वामित्व के संगठन होते हैं जिनका संचालन व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा किया जाता है। इसके विपरीत, सार्वजनिक क्षेत्र के संगठन सरकार के स्वामित्व में होते हैं और उनका प्रबंधन भी सरकार द्वारा किया जाता है। ये संगठन पूर्ण या आंशिक रूप से केंद्र या राज्य सरकार के अधीन होते हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसे व्यावसायिक संगठन भी हैं जो एक से अधिक देशों में फैले हुए हैं, जिन्हें भूमंडलीय उपक्रम या बहुराष्ट्रीय निगम कहा जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था कहा जाता है क्योंकि इसमें निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों के उद्यम सक्रिय हैं। सरकार ने आर्थिक नीति के माध्यम से दोनों क्षेत्रों को स्वतंत्रता दी है, जिससे वे समानांतर रूप से कार्य कर रहे हैं। 1948 और 1956 के औद्योगिक नीति प्रस्तावों में दोनों क्षेत्रों की भूमिकाओं को स्पष्ट किया गया था। 1991 की औद्योगिक नीति में निजीकरण और विनिवेश की अवधारणा को शामिल किया गया, जिससे निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता मिली और विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिला। इस प्रकार, आज भारत में निजी, सार्वजनिक और भूमंडलीय उपक्रम एक साथ अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं।
- व्यवसायिक संगठन निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में विभाजित होते हैं।
- निजी क्षेत्र में एकल स्वामित्व, साझेदारी, सहकारी समितियाँ और कंपनियाँ शामिल हैं।
- सार्वजनिक क्षेत्र के संगठन सरकार के स्वामित्व और नियंत्रण में होते हैं।
- भूमंडलीय उपक्रम बहुराष्ट्रीय निगम होते हैं जो कई देशों में कार्यरत होते हैं।
- भारतीय अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था कहा जाता है।
- 1991 की औद्योगिक नीति ने निजीकरण और विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया।
- 📌 निजी क्षेत्र: ऐसे व्यवसाय जिनका स्वामित्व व्यक्ति या निजी समूह के पास होता है।
- 📌 सार्वजनिक क्षेत्र: ऐसे व्यवसाय जिनका स्वामित्व और नियंत्रण सरकार के पास होता है।
- 📌 भूमंडलीय उपक्रम: बहुराष्ट्रीय निगम जो कई देशों में व्यवसाय करते हैं।
3.2 सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के संगठनों के स्वरूप
व्याख्या3.2 सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के संगठनों के स्वरूप
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के संगठनात्मक स्वरूपों को समझना आवश्यक है क्योंकि ये सरकार की आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी के लिए आवश्यक ढाँचा प्रदान करते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के तीन मुख्य स्वरूप होते हैं: विभागीय उपक्रम, वैधानिक निगम, और सरकारी कंपनी। सार्वजनिक उपक्रमों का स्वामित्व जनता के पास होता है और ये संसद के माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं। ये संगठनात्मक स्वरूप उपक्रम की प्रकृति और सरकार से संबंधों पर निर्भर करते हैं। सार्वजनिक उपक्रमों को संगठनात्मक कार्य, उत्पादकता और गुणवत्ता के मानकों को सुनिश्चित करना होता है। विभागीय उपक्रम मंत्रालय के विभाग के रूप में स्थापित होते हैं और स्वतंत्र वैधानिक अस्तित्व नहीं रखते। वैधानिक निगम संसद के विशेष अधिनियम द्वारा स्थापित होते हैं और निगमित संगठन होते हैं जिनके अधिकार, कर्तव्य और कर्मचारी नियम विधिवत परिभाषित होते हैं। सरकारी कंपनियाँ भारतीय कंपनी अधिनियम-2013 के अंतर्गत स्थापित होती हैं, जिनमें सरकार की कम से कम 51% चुकता अंशपूंजी होती है और ये निजी कंपनियों की तरह पंजीकृत होती हैं।
- सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के तीन स्वरूप हैं: विभागीय उपक्रम, वैधानिक निगम, सरकारी कंपनी।
- सार्वजनिक उपक्रम जनता के स्वामित्व में होते हैं और संसद के प्रति जवाबदेह होते हैं।
- विभागीय उपक्रम स्वतंत्र वैधानिक अस्तित्व नहीं रखते और मंत्रालय के अधीन होते हैं।
- वैधानिक निगम संसद के विशेष अधिनियम द्वारा स्थापित होते हैं और निगमित संगठन होते हैं।
- सरकारी कंपनियाँ कंपनी अधिनियम के तहत स्थापित होती हैं और सरकार की 51% से अधिक चुकता पूंजी होती है।
- संगठनात्मक स्वरूप उपक्रम की आवश्यकताओं और सरकार से संबंधों पर निर्भर करता है।
- 📌 विभागीय उपक्रम: मंत्रालय के विभाग के रूप में स्थापित सार्वजनिक उपक्रम।
- 📌 वैधानिक निगम: संसद के अधिनियम द्वारा स्थापित निगमित सार्वजनिक उपक्रम।
- 📌 सरकारी कंपनी: कंपनी अधिनियम के तहत स्थापित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी।
3.2.1 विभागीय उपक्रम
व्याख्या3.2.1 विभागीय उपक्रम
विभागीय उपक्रम सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे पुराने और पारंपरिक स्वरूप हैं। ये उपक्रम किसी मंत्रालय के विभाग के रूप में स्थापित होते हैं और स्वतंत्र वैधानिक अस्तित्व नहीं रखते। ये सरकार के अधीन होते हैं और इनके कर्मचारी सरकारी कर्मचारी होते हैं। इनका वित
अभ्यास प्रश्न — Chapter 3
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र वे संगठन होते हैं जिनका स्वामित्व और नियंत्रण सरकार के पास होता है। ये संगठन समाज के आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के लिए काम करते हैं। निजी क्षेत्र वे संगठन होते हैं जिनका स्वामित्व और नियंत्रण निजी व्यक्तियों या समूहों के पास होता है, जो लाभ कमाने के उद्देश्य से कार्य करते हैं।
व्याख्या:
सार्वजनिक क्षेत्र का उद्देश्य समाज के व्यापक हित में काम करना होता है जबकि निजी क्षेत्र का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। इसलिए दोनों क्षेत्रों की अवधारणा में स्वामित्व, नियंत्रण और उद्देश्य के आधार पर अंतर होता है।
Q2.2. निजी क्षेत्र के विभिन्न संगठनों के बारे में बताइए।
उत्तर:
निजी क्षेत्र के संगठन मुख्यतः निम्नलिखित प्रकार के होते हैं: (i) एकल स्वामित्व (Sole Proprietorship): एक व्यक्ति के स्वामित्व में होता है। (ii) साझेदारी (Partnership): दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच साझेदारी होती है। (iii) कंपनी (Company): यह एक कानूनी संस्था होती है जिसमें शेयरधारक होते हैं। (iv) सहकारी संस्थाएं (Cooperative Societies): ये सदस्य आधारित संगठन होते हैं जो सामूहिक लाभ के लिए काम करते हैं।
व्याख्या:
निजी क्षेत्र के विभिन्न संगठन उनके स्वामित्व, नियंत्रण और कानूनी स्वरूप के आधार पर वर्गीकृत किए जाते हैं। प्रत्येक प्रकार के संगठन की अपनी विशेषताएं और कार्यप्रणाली होती है।
Q3.3. सार्वजनिक क्षेत्र में आने वाले संगठन कौन-कौन से है?
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र में आने वाले मुख्य संगठन निम्नलिखित हैं: (i) सरकारी विभाग (Government Departments) (ii) सार्वजनिक उपक्रम (Public Enterprises) (iii) सरकारी कंपनियां (Government Companies) (iv) सहकारी संस्थाएं (Cooperative Societies) (v) क्षेत्रीय विकास निगम (Regional Development Corporations)
व्याख्या:
सार्वजनिक क्षेत्र के संगठन सरकार के नियंत्रण में होते हैं और ये विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं जो देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में योगदान देते हैं।
Q4.4. सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों के नाम बताओ तथा उनका वर्गीकरण करो।
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र के संगठन निम्नलिखित हैं: (i) सरकारी विभाग (Government Departments) (ii) सार्वजनिक उपक्रम (Public Enterprises) (iii) सरकारी कंपनियां (Government Companies) (iv) सहकारी संस्थाएं (Cooperative Societies) वर्गीकरण: 1. सरकारी विभाग: सीधे सरकार द्वारा संचालित 2. सार्वजनिक उपक्रम: सरकार के स्वामित्व वाले व्यवसाय 3. सरकारी कंपनियां: कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत 4. सहकारी संस्थाएं: सदस्य आधारित संगठन
व्याख्या:
सार्वजनिक क्षेत्र के संगठन उनके स्वामित्व, नियंत्रण और कानूनी स्वरूप के आधार पर वर्गीकृत किए जाते हैं। यह वर्गीकरण उनकी कार्यप्रणाली और उद्देश्य को स्पष्ट करता है।
Q5.5. सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य विविध संगठनों की तुलना में सरकारी कंपनी संगठन को प्राथमिकता क्यों दी जाती है?
उत्तर:
सरकारी कंपनी संगठन को प्राथमिकता इसलिए दी जाती है क्योंकि: (i) यह कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत होती है, जिससे इसका कानूनी स्वरूप स्पष्ट होता है। (ii) इसका प्रबंधन और नियंत्रण अधिक व्यवस्थित होता है। (iii) यह पूंजी जुटाने में सक्षम होती है। (iv) इसका संचालन व्यावसायिक दृष्टिकोण से होता है जिससे दक्षता बढ़ती है। (v) यह सरकार के लिए राजस्व उत्पन्न करने में सक्षम होती है।
व्याख्या:
सरकारी कंपनी संगठन का स्वरूप और संचालन इसे अन्य सार्वजनिक संगठनों की तुलना में अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाता है, इसलिए इसे प्राथमिकता दी जाती है।
Q6.6. सरकार देश में क्षेत्रीय संतुलन कैसे बनाए रखती है?
उत्तर:
सरकार क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए निम्नलिखित उपाय करती है: (i) क्षेत्रीय विकास निगमों की स्थापना करती है। (ii) विभिन्न क्षेत्रों में उद्योगों और उपक्रमों को स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन देती है। (iii) अविकसित क्षेत्रों में विशेष योजनाएं लागू करती है। (iv) संसाधनों का समान वितरण सुनिश्चित करती है। (v) क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने के लिए नीतियां बनाती है।
व्याख्या:
क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने से देश के सभी भागों का समुचित विकास होता है और आर्थिक असमानताएं कम होती हैं। सरकार की नीतियां और योजनाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
Q7.1. सार्वजनिक क्षेत्र की 1991 की औद्योगिक नीति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1991 की औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। इस नीति के तहत निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता दी गई और सार्वजनिक क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया गया। नीति ने सार्वजनिक उपक्रमों के पुनर्गठन, निजीकरण और दक्षता बढ़ाने पर जोर दिया। इसके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र को आर्थिक विकास में संतुलन बनाए रखने और सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक माना गया।
व्याख्या:
1991 की औद्योगिक नीति ने भारत के आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को पुनः परिभाषित किया गया। नीति ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया।
Q8.2. 1991 से पहले सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका क्या थी?
उत्तर:
1991 से पहले सार्वजनिक क्षेत्र का मुख्य उद्देश्य देश के आर्थिक विकास में अग्रणी भूमिका निभाना था। यह उद्योगों, बुनियादी ढांचे और सेवाओं के विकास में सरकार के नियंत्रण में था। सार्वजनिक क्षेत्र ने रोजगार सृजन, क्षेत्रीय विकास और सामाजिक कल्याण के लिए काम किया। निजी क्षेत्र सीमित था और अधिकांश उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण था।
व्याख्या:
1991 से पहले भारत में समाजवादी नीतियों के तहत सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई थी ताकि आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
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Business Studies · Class 11