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Chapter 2

🎓 Class 12📖 Rasayan vigyan bhag II📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट
Chapter 1अध्याय 2 / 5Chapter 3

Chapter 2अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

परिचय

व्याख्या

परिचय

ऐल्कोहॉल, फ़ीनॉल एवं ईथर कार्बनिक यौगिकों के ऐसे वर्ग हैं जिनमें ऑक्सीजन परमाणु उपस्थित होता है। ये यौगिक कार्बनिक रसायन विज्ञान में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके अणुओं में हाइड्रॉक्सिल (-OH) समूह या ऑक्सीजन से जुड़ा हुआ अन्य समूह होता है। ऐल्कोहॉल में -OH समूह एक संतृप्त कार्बन से जुड़ा होता है, जबकि फ़ीनॉल में -OH समूह सीधे बेंजीन रिंग से जुड़ा होता है। ईथर में ऑक्सीजन परमाणु दो कार्बन समूहों को जोड़ता है। इन यौगिकों की संरचना, नामकरण, भौतिक एवं रासायनिक गुणों को समझना आवश्यक है क्योंकि ये जैविक और औद्योगिक रसायन विज्ञान में व्यापक रूप से उपयोग होते हैं। इस अध्याय में हम इन तीनों वर्गों के गुण, अभिक्रियाएं, तथा उपयोगों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

  • ऐल्कोहॉल, फ़ीनॉल और ईथर में ऑक्सीजन परमाणु उपस्थित होता है।
  • ऐल्कोहॉल में -OH समूह संतृप्त कार्बन से जुड़ा होता है।
  • फ़ीनॉल में -OH समूह बेंजीन रिंग से जुड़ा होता है।
  • ईथर में ऑक्सीजन दो कार्बन समूहों को जोड़ता है।
  • ये यौगिक रसायन विज्ञान और उद्योग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • 📌 ऐल्कोहॉल: ऐसे कार्बनिक यौगिक जिनमें -OH समूह संतृप्त कार्बन से जुड़ा हो।
  • 📌 फ़ीनॉल: बेंजीन रिंग से जुड़े -OH समूह वाले यौगिक।
  • 📌 ईथर: ऐसे यौगिक जिनमें ऑक्सीजन दो कार्बन समूहों को जोड़ता है।

ऐल्कोहॉल का नामकरण

व्याख्या

ऐल्कोहॉल का नामकरण

ऐल्कोहॉल के नामकरण के लिए IUPAC प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। इसमें सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला चुनी जाती है जिसमें -OH समूह जुड़ा होता है। श्रृंखला को इस प्रकार नंबरित किया जाता है कि -OH समूह को सबसे कम संख्या मिले। अंत में 'ओल' प्रत्यय जोड़ा जाता है। यदि एक से अधिक -OH समूह हों तो 'डायहाइड्रॉक्सिल', 'ट्राइहाइड्रॉक्सिल' आदि शब्दों का प्रयोग होता है। सामान्य नामकरण में ऐल्कोहॉल के नाम के अंत में 'ऐल्कोहॉल' शब्द जोड़ा जाता है। उदाहरण के लिए, CH3–CH2–OH का IUPAC नाम एथेनॉल है।

  • सबसे लंबी कार्बन श्रृंखला चुनी जाती है जिसमें -OH समूह हो।
  • श्रृंखला को इस प्रकार नंबरित किया जाता है कि -OH समूह को सबसे कम संख्या मिले।
  • नाम के अंत में 'ओल' प्रत्यय जोड़ा जाता है।
  • बहु-हाइड्रॉक्सिल युक्त यौगिकों के लिए 'डायहाइड्रॉक्सिल', 'ट्राइहाइड्रॉक्सिल' आदि शब्द प्रयोग होते हैं।
  • सामान्य नामकरण में 'ऐल्कोहॉल' शब्द जोड़ा जाता है।
  • 📌 IUPAC नामकरण: वैज्ञानिक नियमों के अनुसार यौगिकों के नामकरण की प्रणाली।
  • 📌 हाइड्रॉक्सिल समूह (-OH): ऐल्कोहॉल की विशेषता समूह।

ऐल्कोहॉल के भौतिक गुण

व्याख्या

ऐल्कोहॉल के भौतिक गुण

ऐल्कोहॉल के भौतिक गुण उनके अणुओं में उपस्थित -OH समूह की वजह से विशेष होते हैं। -OH समूह में उपस्थित हाइड्रोजन बंधन (Hydrogen bonding) के कारण ऐल्कोहॉल की उबलने की बिंदु सामान्य हाइड्रोकार्बनों की तुलना में अधिक होती है। छोटे ऐल्कोहॉल जल में घुलनशील

अभ्यास प्रश्नChapter 2

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.ो अभिक्रियाएं दीजिए जिनसे फ़्रीनॉल की अम्लीय प्रकृति प्रदर्शित होती हो, फ़्रीनॉल की अम्लता की तुलना एथेनॉल से कीजिए।

उत्तर:

फ़्रीनॉल की अम्लीय प्रकृति प्रदर्शित करने के लिए निम्नलिखित अभिक्रियाएं दी जा सकती हैं: 1. NaOH के साथ अभिक्रिया: फ़्रीनॉल + NaOH → फ़ेनॉक्साइड आयन + H₂O यह दर्शाता है कि फ़्रीनॉल अम्लीय है क्योंकि यह क्षार के साथ अभिक्रिया करता है। 2. धातु सोडियम के साथ अभिक्रिया: फ़्रीनॉल + Na → फ़ेनॉक्साइड सोडियम + 1/2 H₂ 3. कार्बोनिल यौगिकों के साथ कोल्बे-शिमोन अभिक्रिया: यह अभिक्रिया भी फ़्रीनॉल की अम्लीय प्रकृति को दर्शाती है। फ़्रीनॉल की अम्लता एथेनॉल की तुलना में अधिक होती है क्योंकि फ़्रीनॉल में -OH समूह बेन्जीन वलय से जुड़ा होता है, जो फ़ेनॉक्साइड आयन के स्थिरीकरण में सहायक होता है। बेन्जीन वलय में इलेक्ट्रॉन खींचने वाले प्रभाव के कारण, फ़ेनॉक्साइड आयन अधिक स्थिर होता है, जिससे फ़्रीनॉल अधिक अम्लीय होता है। जबकि एथेनॉल में ऐसा कोई स्थिरीकरण नहीं होता, इसलिए उसकी अम्लता कम होती है।

व्याख्या:

फ़्रीनॉल में -OH समूह बेन्जीन वलय से जुड़ा होता है, जिससे फ़ेनॉक्साइड आयन का स्थिरीकरण होता है। यह स्थिरीकरण आयन को अधिक स्थिर बनाता है, जिससे फ़्रीनॉल की अम्लता बढ़ जाती है। एथेनॉल में ऐसा स्थिरीकरण नहीं होता, इसलिए उसकी अम्लता कम होती है।

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Q2.7.15 समझाइए कि ऑर्थो-नाइट्रोफ्रीनॉल, ऑर्थो-मेथॉक्सीफ्रीनॉल से अधिक अम्लीय क्यों होती है?

उत्तर:

ऑर्थो-नाइट्रोफ्रीनॉल अधिक अम्लीय होती है क्योंकि नाइट्रो समूह (-NO₂) एक शक्तिशाली इलेक्ट्रॉन खींचने वाला समूह है जो फ़ेनॉक्साइड आयन को स्थिर करता है। यह इलेक्ट्रॉन खींचने वाला प्रभाव -OH समूह से जुड़े हाइड्रोजन आयन को छोड़ने में सहायक होता है, जिससे अम्लता बढ़ती है। वहीं, ऑर्थो-मेथॉक्सीफ्रीनॉल में मेथॉक्सी समूह (-OCH₃) एक इलेक्ट्रॉन दान करने वाला समूह है, जो फ़ेनॉक्साइड आयन को स्थिर नहीं करता बल्कि इलेक्ट्रॉन दान करके स्थिरीकरण कम करता है, जिससे अम्लता कम होती है।

व्याख्या:

नाइट्रो समूह का इलेक्ट्रॉन खींचने वाला प्रभाव हाइड्रोजन आयन के निकलने को बढ़ावा देता है, जिससे अम्लता बढ़ती है। मेथॉक्सी समूह इलेक्ट्रॉन दान करता है, जिससे अम्लता कम होती है।

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Q3.7.16 समझाइए कि बेन्जीन वलय से जुड़ा -OH समूह उसे इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के प्रति कैसे सक्रियित करता है?

उत्तर:

बेन्जीन वलय से जुड़ा -OH समूह इलेक्ट्रॉन दान करने वाला समूह होता है। यह अपने lone pair इलेक्ट्रॉनों को बेन्जीन वलय के π-इलेक्ट्रॉनों के साथ सम्मिलित करता है, जिससे बेन्जीन वलय में इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है। इस बढ़े हुए इलेक्ट्रॉन घनत्व के कारण, बेन्जीन वलय इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के लिए अधिक सक्रिय हो जाता है। -OH समूह मुख्यतः ऑर्थो और पैरास्थानों पर प्रतिस्थापन को निर्देशित करता है क्योंकि वहाँ इलेक्ट्रॉन घनत्व सबसे अधिक होता है।

व्याख्या:

-OH समूह के lone pair इलेक्ट्रॉन बेन्जीन वलय के π-इलेक्ट्रॉनों के साथ सम्मिलित होकर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं, जिससे वलय अधिक प्रतिक्रियाशील होता है।

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Q4.7.17 निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण दीजिए— (i) प्रोपेन-1-ऑल का धारीय KMnO₄ के साथ ऑक्सीकरण (ii) ब्रोमीन की CS₄ में फ़्रीनॉल के साथ अभिक्रिया (iii) तनु HNO₃ की फ़्रीनॉल से अभिक्रिया (iv) फ़्रीनॉल की जलीय NaOH की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म के साथ अभिक्रिया

उत्तर:

(i) प्रोपेन-1-ऑल का धारीय KMnO₄ के साथ ऑक्सीकरण: CH₃-CH₂-CH₂OH + [O] → CH₃-CH₂-COOH (प्रोपेनोइक अम्ल) (ii) ब्रोमीन की CS₄ में फ़्रीनॉल के साथ अभिक्रिया: फ़्रीनॉल + Br₂ (CS₂ में) → 2,4,6-ट्राइब्रोमोफ़्रीनॉल (iii) तनु HNO₃ की फ़्रीनॉल से अभिक्रिया: फ़्रीनॉल + HNO₃ → 2-नाइट्रोफ़्रीनॉल + 4-नाइट्रोफ़्रीनॉल (नाइट्रोकरण) (iv) फ़्रीनॉल की जलीय NaOH की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म के साथ अभिक्रिया: फ़्रीनॉल + CHCl₃ + NaOH → 2-हाइड्रॉक्सिफेनिल क्लोरफॉर्म (क्लोरफॉर्म अभिक्रिया)

व्याख्या:

प्रत्येक अभिक्रिया के लिए उपयुक्त रासायनिक समीकरण दिए गए हैं जो अभिक्रिया की प्रकृति को दर्शाते हैं।

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Q5.7.18 निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए— (i) कोल्बे अभिक्रिया (ii) राइमर-टीमन अभिक्रिया (iii) विलियम्सन ईथर संश्लेषण (iv) असममित ईथर।

उत्तर:

(i) कोल्बे अभिक्रिया: यह एक प्रकार की कार्बोक्सिलिक अम्ल संश्लेषण अभिक्रिया है जिसमें फ़्रीनॉल के साथ कार्बोनिल यौगिक अभिक्रिया करते हैं। उदाहरण: फ़्रीनॉल + NaOH + HCHO → 2-हाइड्रॉक्सीबेंजोइक अम्ल (ii) राइमर-टीमन अभिक्रिया: यह अभिक्रिया फ़्रीनॉल के साथ फॉर्मल्डिहाइड की होती है, जिससे ऑर्थो-हाइड्रॉक्साइलेटेड उत्पाद बनते हैं। उदाहरण: फ़्रीनॉल + HCHO + NaOH → 2-हाइड्रॉक्सीबेंजाल्डिहाइड (iii) विलियम्सन ईथर संश्लेषण: यह एक विधि है जिसमें एल्कॉक्साइड आयन और प्राथमिक एल्किल हैलाइड के अभिक्रिया से ईथर बनते हैं। उदाहरण: C₂H₅ONa + CH₃Br → C₂H₅OCH₃ + NaBr (iv) असममित ईथर: ऐसे ईथर जिनमें दोनों पक्षों पर अलग-अलग एल्किल या आरील समूह होते हैं। उदाहरण: C₂H₅-O-CH₃ (एथॉक्सीमेथेन)

व्याख्या:

प्रत्येक अभिक्रिया की परिभाषा और उदाहरण दिए गए हैं जो उनकी प्रकृति को स्पष्ट करते हैं।

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Q6.7.19 एथेनॉल के अम्लीय निर्जलन से एथीन प्राप्त करने की क्रियाविधि लिखिए।

उत्तर:

एथेनॉल के अम्लीय निर्जलन से एथीन प्राप्त करने की क्रियाविधि: एथेनॉल को सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) की उपस्थिति में 170°C पर गरम किया जाता है। इस प्रक्रिया में एथेनॉल से जल (H₂O) निकलता है और एथीन (C₂H₄) बनता है। समीकरण: C₂H₅OH 170DCC, H_2SO_4 → C₂H₄ + H₂O यह एक निर्जलन अभिक्रिया है जिसमें एथेनॉल से जल निकलकर एथीन बनता है।

व्याख्या:

सांद्र H₂SO₄ के अम्लीय वातावरण में एथेनॉल का निर्जलन होता है, जिससे एथीन बनता है।

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Q7.7.20 निम्नलिखित परिवर्तनों को किस प्रकार किया जा सकता है? (i) प्रोपीन → प्रापेन-2-ऑल (ii) बेन्जिल क्लोराइड → बेन्जिल ऐल्कोहॉल (iii) एथिल मैग्नीशियम क्लोराइड → प्रापेन-1-ऑल (iv) मेथिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड → 2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल

उत्तर:

(i) प्रोपीन → प्रापेन-2-ऑल: प्रोपीन का हाइड्रेशन (H₂O की अभिक्रिया) सांद्र H₂SO₄ की उपस्थिति में होता है, जिससे प्रापेन-2-ऑल बनता है। CH₃-CH=CH₂ + H₂O → CH₃-CHOH-CH₃ (ii) बेन्जिल क्लोराइड → बेन्जिल ऐल्कोहॉल: बेन्जिल क्लोराइड को जल के साथ हाइड्रोलिसिस किया जाता है। C₆H₅-CH₂Cl + H₂O → C₆H₅-CH₂OH + HCl (iii) एथिल मैग्नीशियम क्लोराइड → प्रापेन-1-ऑल: एथिल मैग्नीशियम क्लोराइड को फॉर्मल्डिहाइड के साथ अभिक्रिया कराकर, तत्पश्चात अम्लीय जल में हाइड्रोलिसिस किया जाता है। C₂H₅MgCl + HCHO → C₂H₅-CH₂OMgCl → (H₃O⁺) → C₂H₅-CH₂OH (iv) मेथिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड → 2-मेथिलप्रोपेन-2-ऑल: मेथिल मैग्नीशियम ब्रोमाइड को कार्बोनिल यौगिक (जैसे एसिटोन) के साथ अभिक्रिया कराकर, अम्लीय जल में हाइड्रोलिसिस किया जाता है। (CH₃)MgBr + (CH₃)₂CO → (CH₃)₃C-OMgBr → (H₃O⁺) → (CH₃)₃C-OH

व्याख्या:

प्रत्येक परिवर्तन के लिए उपयुक्त अभिक्रियाओं और अभिकर्मकों का उपयोग करके लक्ष्य यौगिक प्राप्त किया जाता है।

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Q8.7.21 निम्नलिखित अभिक्रियाओं में प्रयुक्त अभिकर्मकों के नाम बताइए— (i) प्राथमिक ऐल्कोहॉल का कार्बॉक्सिलिक अम्ल में आक्सीकरण (ii) बेथिल ऐल्कोहॉल से बेन्जोइक अम्ल (iii) प्राथमिक ऐल्कोहॉल का ऐल्डिहाइड में आक्सीकरण (iv) प्रोपेन-2-ऑल का प्रोपीन में निर्जलन (iv) प्रोपेन-2-ऑल में ब्यूटेन-2-ऑल (iii) प्रोपेनॉल का 2,4,6-ट्राइब्रोमोफीनॉल में ब्रोमीनन (vi) ब्यूटेन-2-ऑन से ब्यूटेन-2-ऑल

उत्तर:

(i) प्राथमिक ऐल्कोहॉल का कार्बॉक्सिलिक अम्ल में आक्सीकरण: अभिकर्मक: KMnO₄ या K₂Cr₂O₇ (अम्लीय माध्यम में) (ii) बेथिल ऐल्कोहॉल से बेन्जोइक अम्ल: अभिकर्मक: KMnO₄ (धारीय) (iii) प्राथमिक ऐल्कोहॉल का ऐल्डिहाइड में आक्सीकरण: अभिकर्मक: PCC (पायरिडिनियम क्लोरोक्रोमेट) (iv) प्रोपेन-2-ऑल का प्रोपीन में निर्जलन: अभिकर्मक: सांद्र H₂SO₄ या H₃PO₄ (उच्च तापमान पर) (iv) प्रोपेन-2-ऑल में ब्यूटेन-2-ऑल: अभिकर्मक: Na (धातु सोडियम) (iii) प्रोपेनॉल का 2,4,6-ट्राइब्रोमोफीनॉल में ब्रोमीनन: अभिकर्मक: Br₂ (जल में) (vi) ब्यूटेन-2-ऑन से ब्यूटेन-2-ऑल: अभिकर्मक: NaBH₄ या LiAlH₄

व्याख्या:

प्रत्येक अभिक्रिया के लिए उपयुक्त अभिकर्मक नामित किए गए हैं जो अभिक्रिया को संचालित करते हैं।

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