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Chapter 2

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Chapter 2अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 7 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

राहुल सांकृत्यायन

व्याख्या

राहुल सांकृत्यायन

इस अनुभाग में राहुल सांकृत्यायन के जीवन और उनके साहित्यिक योगदान का विस्तृत परिचय दिया गया है। राहुल सांकृत्यायन का जन्म 1893 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के ननिहाल गाँव पंदहा में हुआ था। उनका मूल नाम केदार पांडेय था। उन्होंने काशी, आगरा और लाहौर में शिक्षा प्राप्त की। 1930 में श्रीलंका जाकर उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण किया और तब से उनका नाम राहुल सांकृत्यायन हो गया। वे अनेक भाषाओं जैसे पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, तिब्बती, चीनी, जापानी, रूसी आदि के ज्ञाता थे, इसलिए उन्हें महापंडित कहा जाता था। राहुल सांकृत्यायन ने उपन्यास, कहानी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, जीवनी, आलोचना, शोध आदि अनेक साहित्यिक विधाओं में कार्य किया। उनकी प्रमुख कृतियों में मेरी जीवन यात्रा (छह भाग), दर्शन-दिग्दर्शन, बाइसवीं सदी, वोल्गा से गंगा, भागो नहीं दुनिया को बदलो, दिमागी गुलामी, घुमक्कड़ शास्त्र आदि शामिल हैं। उन्होंने अनेक ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद भी किया। इसके अतिरिक्त दर्शन, राजनीति, धर्म, इतिहास, विज्ञान जैसे विषयों पर लगभग 150 पुस्तकें लिखीं। राहुल जी ने लुप्तप्राय सामग्री का उद्धार कर महत्वपूर्ण कार्य किया। यात्रावृत्त लेखन में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने घुमक्कड़ी का शास्त्र रचा और यात्रा को मंजिल से अधिक महत्व दिया। उनकी यात्राओं में मनोरंजन, ज्ञानवर्धन, भाषा और संस्कृति का आदान-प्रदान होता था। उन्होंने विभिन्न स्थानों के भौगोलिक और जन-जीवन का सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया। इस खंड में प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत उनकी प्रथम तिब्बत यात्रा का अंश है, जो उन्होंने 1929-30 में नेपाल के रास्ते की थी। उस समय भारतीयों को तिब्बत जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए वे भिखमंगे के छद्म वेश में गए थे। इस यात्रा-वृत्तांत से तिब्बती समाज की भी जानकारी मिलती है।

  • राहुल सांकृत्यायन का जन्म 1893 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में हुआ।
  • उनका मूल नाम केदार पांडेय था, बाद में बौद्ध धर्म ग्रहण कर राहुल सांकृत्यायन हुए।
  • वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता और महापंडित थे।
  • साहित्य के अनेक विधाओं में कार्य किया और लगभग 150 पुस्तकें लिखीं।
  • यात्रावृत्त लेखन में उनका विशेष स्थान है।
  • उनकी प्रथम तिब्बत यात्रा 1929-30 में नेपाल के रास्ते हुई।
  • 📌 महापंडित: अनेक भाषाओं के ज्ञाता विद्वान।
  • 📌 यात्रावृत्त: यात्रा के दौरान लिखे गए अनुभवों का लेखन।
  • 📌 छद्म वेश: किसी असली रूप को छिपाने के लिए अपनाया गया कपड़ा या रूप।

ल्हासा की ओर

व्याख्या

ल्हासा की ओर

यह खंड तिब्बत की राजधानी ल्हासा की ओर जाने वाले मुख्य रास्ते का वर्णन करता है। नेपाल से तिब्बत जाने का यह मार्ग व्यापारिक और सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। रास्ते में कई फौजी चौकियाँ और किले बने हुए थे, जिनमें कभी चीनी सेना की पलटन रहती थी। लेखक ने बताया कि कई फौजी मकान अब टूट चुके हैं और कुछ जगहों पर किसान वहाँ बसे हुए हैं। लेखक ने यात्रियों के लिए तिब्बत की कुछ विशेषताएँ बताईं जैसे जाति-पौति और छुआछूत का अभाव, महिलाओं का न परदा करना, और भिखमंगों के प्रति लोगों का व्यवहार। उन्होंने बताया कि भिखमंगों को चोरी के डर से घर के अंदर नहीं आने दिया जाता, परन्तु अपरिचित व्यक्ति को भी घर की बहू या सासु चाय पिला सकती है। तिब्बती चाय मक्खन, नमक और सोडा से बनी होती है, जिसे मिट्टी के टोटीदार बरतन में परोसा जाता है। चाय बनाने की प्रक्रिया में चोङी (मिट्टी का बर्तन) में चाय मथना और मक्खन डालना शामिल है। लेखक ने एक परित्यक्त चीनी किले में चाय पीने का अनुभव साझा किया और बताया कि वहाँ से आगे बढ़ते हुए उन्हें राहदारी (टोल) के लिए एक आदमी मिला, जिसे उन्होंने चिट्टे (राहदारी के कागज) दे दिए। इस प्रकार वे थोड्ला के पहले के आखिरी गाँव तक पहुँचे जहाँ उन्हें भिखमंगे के वेश में भी रहने के लिए अच्छी जगह मिली।

  • नेपाल से तिब्बत जाने वाला मुख्य रास्ता व्यापारिक और सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
  • रास्ते में कई फौजी चौकियाँ और किले थे, जिनमें चीनी सेना रहती थी।
  • तिब्बत में जाति-पौति और छुआछूत नहीं है, महिलाएँ परदा नहीं करतीं।
  • भिखमंगों को चोरी के डर से घर के अंदर नहीं आने दिया जाता।
  • तिब्बती चाय मक्खन, नमक और सोडा से बनाई जाती है।
  • लेखक को भिखमंगे के वेश में भी ठहरने के लिए अच्छी जगह मिली।
  • 📌 राहदारी: यात्रा के दौरान रास्ते में दी जाने वाली अनुमति या टोल।
  • 📌 चोङी: तिब्बती मिट्टी का बर्तन जिसमें चाय बनाई जाती है।
  • 📌 भिखमंगा: भिक्षु या भिखारी का वेश।

डाँड़े पार करना

व्याख्या

डाँड़े पार करना

इस खंड में लेखक ने तिब्बत के डाँड़े नामक ऊँचे और खतरनाक स्थान को पार करने का विस्तृत वर्णन किया है। डाँड़े की ऊँचाई सोलह से सत्रह हजार फीट के बीच है, जहाँ दोनों ओर मीलों तक कोई गाँव नहीं होता। यह स्थान डाकुओं के लिए उपयुक्त होता है क्योंकि यहाँ दूर त

अभ्यास प्रश्नChapter 2

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.थोड़ला के पहले के आखिरी गाँव पहुँचने पर भिखमंगे के वेश में होने के बावजूद लेखक को ठहरने के लिए उचित स्थान मिला जबकि दूसरी यात्रा के समय भद्र वेश भी उन्हें उचित स्थान नहीं दिला सका। क्यों?

उत्तर:

पहली यात्रा में लेखक भिखमंगे के वेश में था, जिससे वह लोगों को अपनी स्थिति का एहसास नहीं होने देता था और इसलिए उसे ठहरने के लिए उचित स्थान मिला। दूसरी यात्रा में भद्र वेश होने के कारण लोग उसकी असली पहचान समझ गए और इसलिए उसे उचित स्थान नहीं मिला।

व्याख्या:

पहली यात्रा में लेखक का भिखमंगे का वेश उसे अनजान और असहाय दिखाता था, जिससे लोग उसकी मदद करते थे। दूसरी यात्रा में भद्र वेश होने से लोग उसकी असली स्थिति जान गए और इसलिए उसे ठहरने के लिए जगह नहीं मिली।

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Q2.उस समय के तिब्बत में हथियार का कानून न रहने के कारण यात्रियों को किस प्रकार का भय बना रहता था?

उत्तर:

तिब्बत में हथियार रखने का कोई कानून न होने के कारण यात्रियों को डाकुओं और लुटेरों के हमले का भय बना रहता था। वे हमेशा सतर्क रहते थे कि कहीं उनका सामान या जीवन खतरे में न पड़ जाए।

व्याख्या:

हथियारों पर नियंत्रण न होने से अपराधी स्वतंत्र होकर यात्रियों को लूट सकते थे, इसलिए यात्रियों में भय और असुरक्षा की भावना बनी रहती थी।

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Q3.लेखक लड़कोर के मार्ग में अपने साथियों से किस कारण पिछड़ गया?

उत्तर:

लेखक लड़कोर के मार्ग में अपने साथियों से इसलिए पिछड़ गया क्योंकि वह रास्ते में रुका, आसपास के दृश्य और वातावरण का आनंद लिया और धीरे-धीरे चलने लगा, जबकि अन्य साथी तेज़ी से आगे बढ़ गए।

व्याख्या:

लेखक की रुचि यात्रा के अनुभवों को महसूस करने में थी, इसलिए वह जल्दी आगे नहीं बढ़ा, जिससे वह समूह से पीछे रह गया।

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Q4.लेखक ने शेकर विहार में सुमति को उनके यजमानों के पास जाने से रोका, परंतु दूसरी बार रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया?

उत्तर:

पहली बार लेखक ने सुमति को यजमानों के पास जाने से इसलिए रोका क्योंकि वह चाहता था कि सुमति उसके साथ रहे और उसकी सहायता करे। दूसरी बार उसने रोकने का प्रयास नहीं किया क्योंकि वह समझ गया कि सुमति का यजमानों के साथ जाना आवश्यक है और उसे उसकी आज़ादी देनी चाहिए।

व्याख्या:

लेखक की पहली बार रोकने की इच्छा उसकी यात्रा में सहायता पाने की थी, लेकिन बाद में उसने सुमति के अधिकार और स्वतंत्रता का सम्मान किया।

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Q5.अपनी यात्रा के दौरान लेखक को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?

उत्तर:

लेखक को यात्रा के दौरान ठंड, ऊँचाई की बीमारी, रास्ते की कठिनाई, असहज आवास, और स्थानीय लोगों के व्यवहार में भेदभाव जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

व्याख्या:

तिब्बत की भौगोलिक स्थिति और सामाजिक परिस्थितियों के कारण यात्रा कठिन थी, जिससे लेखक को शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

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Q6.प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत के आधार पर बताइए कि उस समय का तिब्बती समाज कैसा था?

उत्तर:

उस समय का तिब्बती समाज धार्मिक, परंपरागत और सामाजिक भेदभावों से ग्रस्त था। वहाँ के लोग सरल जीवन जीते थे, परंतु बाहरी यात्रियों के प्रति संकोची और कभी-कभी असहिष्णु भी थे। हथियारों का कानून न होना और सामाजिक व्यवस्था में कठोरता थी।

व्याख्या:

लेखक के अनुभवों से पता चलता है कि तिब्बती समाज में धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक नियम और परंपराएँ गहरी थीं, जो यात्रियों के लिए चुनौतीपूर्ण थीं।

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Q7.‘मैं अब पुस्तकों के भीतर था।’ नीचे दिए गए विकल्पों में से कौन सा इस वाक्य का अर्थ बतलाता है— (क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया। (ख) लेखक पुस्तकों की शैल्फ के भीतर चला गया। (ग) लेखक के चारों ओर पुस्तकें ही थीं। (घ) पुस्तक में लेखक का परिचय और चित्र छपा था।
A.A) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।
B.B) लेखक पुस्तकों की शैल्फ के भीतर चला गया।
C.C) लेखक के चारों ओर पुस्तकें ही थीं।
D.D) पुस्तक में लेखक का परिचय और चित्र छपा था।

उत्तर:

लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।

व्याख्या:

यह वाक्य भावात्मक रूप से दर्शाता है कि लेखक पढ़ाई में इतना मग्न हो गया कि वह मानो पुस्तकों के भीतर चला गया हो।

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Q8.सुमति के यजमान और अन्य परिचित लोग लगभग हर गाँव में मिले। इस आधार पर आप सुमति के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं का चित्रण कर सकते हैं?

उत्तर:

सुमति का व्यक्तित्व मिलनसार, भरोसेमंद और सामाजिक था। वह लोगों के बीच जाना-पहचाना था और उसका व्यवहार ऐसा था कि लोग उसे हर गाँव में पहचानते और स्वागत करते थे। यह दर्शाता है कि वह सरल, विनम्र और सहयोगी स्वभाव का था।

व्याख्या:

सुमति की यात्रा में लोगों से अच्छी पहचान और संबंध उसके सकारात्मक व्यक्तित्व को दर्शाते हैं।

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