Chapter 9
Chapter 9 — अध्ययन नोट्स
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विभिन्न तालों के टेके एवं लयकारी
व्याख्याविभिन्न तालों के टेके एवं लयकारी
संगीत में ताल का अर्थ है समय का वह चक्र जिसमें संगीत की लयबद्धता और ठेका व्यवस्थित होता है। मानव ने सभ्यता के विकास के साथ-साथ अपने अनुभवों और विचारों को सुरक्षित रखने के लिए लिपि का आविष्कार किया। इसी प्रकार संगीत को भी लिपिबद्ध करने की आवश्यकता हुई ताकि उसकी रचनाएँ समय के साथ सुरक्षित रहें और उनका मूल स्वरूप बना रहे। ताल, संगीत का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसे व्यवस्थित रूप से लिखने के लिए विभिन्न लिपि पद्धतियाँ विकसित हुईं। 18वीं-19वीं शताब्दी में मौलाबख्श, सौरूद्र मोहन टैगोर, क्षेत्र मोहन गोस्वामी, पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर तथा पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जैसे विद्वानों ने संगीत और ताल को लिपिबद्ध करने के लिए अलग-अलग पद्धतियाँ विकसित कीं। पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे ने उत्तर भारतीय संगीत के तालों को लिखने के लिए एक लोकप्रिय ताल-स्वर लिपि पद्धति बनाई, जिसमें ताल की प्रत्येक मात्रा को चिह्नों और ठेकों के बोलों के साथ प्रदर्शित किया जाता है। इस पद्धति में ताल की प्रथम मात्रा को सम के रूप में दर्शाने के लिए '×' चिह्न का प्रयोग होता है। खाली मात्रा को दर्शाने के लिए '0' चिह्न का उपयोग किया जाता है। ताल के विभागों को अलग करने के लिए खड़ी पाई '|' चिह्न का प्रयोग होता है। तालों के ठेकों को बोलों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, जो ताल की लयबद्धता को स्पष्ट करते हैं। ठेका ताल की मात्राओं का वह समूह होता है जिसे बोलों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। ताल की लयकारी ठेकों को सजाने और प्रस्तुत करने की कला है, जिससे संगीत में विविधता और आकर्षण आता है। इस अध्याय में हम उत्तर भारतीय संगीत के प्रमुख तालों जैसे त्रिताल, एकताल, दादरा, कहरवा, चारताल, तीव्रा, धमार आदि के ठेकों और उनकी लयकारी का विस्तृत अध्ययन करेंगे। साथ ही ताल लिपि पद्धति के चिह्नों और उनके प्रयोग को समझेंगे।
- ताल संगीत में समय नापने का चक्र है जो लयबद्धता और ठेका निर्धारित करता है।
- संगीत को सुरक्षित रखने के लिए ताल और राग को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता हुई।
- पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे ने लोकप्रिय ताल-स्वर लिपि पद्धति विकसित की।
- ताल की प्रथम मात्रा को सम के रूप में '×' चिह्न से दर्शाया जाता है।
- खाली मात्रा को '0' चिह्न से दर्शाया जाता है।
- ताल के विभागों को अलग करने के लिए खड़ी पाई '|' चिह्न का प्रयोग होता है।
- 📌 ताल: संगीत में समय नापने का चक्र।
- 📌 ठेका: ताल की मात्राओं का वह समूह जिसे बोलों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
- 📌 लयकारी: ठेकों को सजाने और प्रस्तुत करने की कला।
ताल की मात्राएँ एवं ठेके
व्याख्याताल की मात्राएँ एवं ठेके
संगीत में ताल की मात्राएँ समय की इकाइयाँ होती हैं, जिनके आधार पर ठेका बनता है। प्रत्येक ताल में निश्चित संख्या में मात्राएँ होती हैं जो ताल की लयबद्धता को निर्धारित करती हैं। ताल की मात्राएँ विभागों में विभाजित होती हैं, जिनमें ताली और खाली की व्यवस्था होती है। ताली वह संकेत है जो ताल की शुरुआत या महत्वपूर्ण मात्रा को दर्शाता है, जबकि खाली वह मात्रा होती है जहाँ ताल में विराम या विश्रांति होती है। ठेका ताल की मात्राओं का वह समूह है जिसे बोलों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। ठेका ताल की प्रकृति, यति-गति, ताली, खाली और विभागों के अनुसार रचा जाता है। ठेकों के बोल ताल की मात्राओं के अनुरूप होते हैं और संगीत की लयबद्धता को स्पष्ट करते हैं। ठेकों के बोलों को कंठस्थ कर ठेका प्रस्तुत किया जाता है, जो तबले या अन्य तालवाद्यों पर बजाया जाता है। ताल के विभागों को अलग करने के लिए खड़ी पाई '|' चिह्न का प्रयोग होता है। प्रत्येक विभाग की शुरुआत में ताली या खाली को दर्शाने के लिए ताली की संख्या या '0' लिखा जाता है। उदाहरण के लिए, त्रिताल में पहली, पाँचवीं और तेरहवीं मात्रा पर ताली होती है और नौवीं मात्रा पर खाली। विश्रांति या ठहराव को दर्शाने के लिए 'S' चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यदि किसी बोल को दो या अधिक मात्रा काल तक गाया या बजाया जाता है तो उसके साथ 'S' चिह्न लगाया जाता है। एक मात्रा में एक से अधिक स्वर या बोल होने पर उनके नीचे अर्धचंद्र '~' चिह्न लगाया जाता है। इस प्रकार ताल की मात्राएँ, ताली, खाली, ठेका और उनके चिह्न संगीत की लयबद्धता और संरचना को स्पष्ट करते हैं। **Table on page 2 (2×3)** | तिं तिं ना | धि ना | धि ना | | --- | --- | --- | | 0 | 1 | 2 | **Table on page 2 (3×17)** | मात्रा | 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12 | 13 | 14 | 15 | 16 | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | बोल | धा | धिं | धिं | धा | धा | धिं | धिं | धा | धा | ति | ति | ता | ता | धिं | धिं | धा | | चिह्न | × | | | | 2 | | | | 0 | | | | 3 | | | |
- ताल की मात्राएँ समय की इकाइयाँ होती हैं जो ताल की लयबद्धता निर्धारित करती हैं।
- ठेका ताल की मात्राओं का वह समूह है जिसे बोलों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
- ताल के विभागों को अलग करने के लिए खड़ी पाई '|' चिह्न का प्रयोग होता है।
- ताली को ताली की संख्या से दर्शाया जाता है, खाली को '0' से।
- विश्रांति या ठहराव के लिए 'S' चिह्न का प्रयोग होता है।
- एक मात्रा में एक से अधिक स्वर या बोल के लिए अर्धचंद्र '~' चिह्न लगाया जाता है।
- 📌 मात्रा: ताल की समय इकाई।
- 📌 ताली: ताल की महत्वपूर्ण मात्रा को दर्शाने वाला संकेत।
- 📌 खाली: ताल में विराम या विश्रांति को दर्शाने वाली मात्रा।
तालों का उनके ठेकों सहित विवरण
व्याख्यातालों का उनके ठेकों सहित विवरण
संगीत में ताल समय नापने का वह साधन है जो विभिन्न मात्राओं, विभागों, ताली और खाली के योग से बनता है। ताल संगीत को अनुशासित करता है और उसे एक निश्चित स्वरूप प्रदान करता है। उत्तर भारतीय संगीत में प्रत्येक ताल के ठेके होते हैं जो उसकी पहचान होते हैं। ठे
अभ्यास प्रश्न — Chapter 9
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. नाट्यशास्त्र में ताल को किस तरह प्रदर्शित किया गया है?
उत्तर:
नाट्यशास्त्र में ताल को विभिन्न मात्राओं और उनके संयोजन के रूप में प्रदर्शित किया गया है, जिसमें ताल के विभिन्न भागों जैसे कि अंग, खण्ड, और मात्रा को स्पष्ट किया गया है। ताल के चिह्नों और ठेकों के माध्यम से ताल की संरचना और लयकारी को समझाया गया है।
व्याख्या:
नाट्यशास्त्र में ताल को मात्राओं के समूह के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें प्रत्येक ताल की अपनी विशिष्ट लय और ठेका होता है। ताल के चिह्नों द्वारा ताल की गति और लय को दर्शाया जाता है।
Q2.2. नाट्यशास्त्र में प्रयोग किए गए तालों के चिह्नों को बताइए।
उत्तर:
नाट्यशास्त्र में तालों के चिह्नों के रूप में विभिन्न मात्राओं को दर्शाने के लिए विशेष संकेतों का प्रयोग किया गया है, जैसे कि ताली (थाप), खली (खाली हाथ), और अन्य लयात्मक संकेत। ये चिह्न ताल के विभिन्न भागों को पहचानने में सहायक होते हैं।
व्याख्या:
ताल के चिह्नों में ताली और खली प्रमुख हैं, जहाँ ताली को हाथ थपथपाने से और खली को खाली हाथ से दर्शाया जाता है। ये चिह्न ताल की लय और ठेका समझाने में मदद करते हैं।
Q3.3. 1901 में लाहौर में किसने और कौन-से संगीत महाविद्यालय की स्थापना की थी?
उत्तर:
1901 में लाहौर में पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने संगीत महाविद्यालय की स्थापना की थी।
व्याख्या:
पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने 1901 में लाहौर में संगीत शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए यह महाविद्यालय स्थापित किया था, जो बाद में भारतीय संगीत शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा।
Q4.4. पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के दो महान शिष्यों के नाम बताइए।
उत्तर:
पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के दो महान शिष्य थे: उस्ताद अहमद जॉन थिरकवा और पंडित अन्नपूर्णा देवी।
व्याख्या:
पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने संगीत शिक्षा में योगदान दिया और उनके शिष्यों ने भी भारतीय संगीत को समृद्ध किया।
Q5.5. उस्ताद अहमद जॉन थिरकवा किस वाद्य यंत्र के महारथी थे?
उत्तर:
उस्ताद अहमद जॉन थिरकवा तबला वाद्य यंत्र के महारथी थे।
व्याख्या:
उस्ताद अहमद जॉन थिरकवा को तबला वादन में महान माना जाता है और उन्होंने तबला वादन की तकनीक को विकसित किया।
Q6.6. तीन ताल का तिगुन लिखिए।
उत्तर:
तीन ताल का तिगुन इस प्रकार है: धा धिं धिं धा | धा धिं धिं धा | धा ति ता ता | यह तीन ताल के ठेकों का तिगुना है, जिसमें प्रत्येक मात्रा तीन गुना बढ़ जाती है।
व्याख्या:
तीन ताल में 16 मात्राएँ होती हैं, तिगुन में प्रत्येक मात्रा को तीन गुना बढ़ाकर ठेका लिखा जाता है, जिससे लय की गति बढ़ती है।
Q7.7. दादरा ताल के बोल लिखकर उसका दुगुन लिखिए।
उत्तर:
दादरा ताल के बोल हैं: धा दि ना धिं ना ता | दादरा ताल का दुगुन इस प्रकार होगा: धा दि ना धिं ना ता | धा दि ना धिं ना ता | यहाँ प्रत्येक मात्रा को दुगना करके ठेका लिखा गया है।
व्याख्या:
दादरा ताल में 6 मात्राएँ होती हैं, दुगुन में प्रत्येक मात्रा को दो गुना करके ठेका प्रस्तुत किया जाता है।
Q8.8. ध्रुपद में किन-किन तालों का प्रयोग होता है। उन तालों का तिगुन और चौगुन लिखिए।
उत्तर:
ध्रुपद में मुख्यतः तीनताल, चौताल, और दादरा ताल का प्रयोग होता है। तीनताल का तिगुन: धा धिं धिं धा | धा धिं धिं धा | धा ति ता ता | तीनताल का चौगुन: धा धिं धिं धा | धा धिं धिं धा | धा ति ता ता | (चार गुना मात्रा में) चौताल का तिगुन और चौगुन भी इसी प्रकार मात्रा बढ़ाकर लिखा जाता है। दादरा ताल का तिगुन और चौगुन भी दुगुना और चौगुना करके ठेका लिखा जाता है।
व्याख्या:
ध्रुपद गायन में तालों का प्रयोग लय की स्थिरता और गंभीरता के लिए किया जाता है। तिगुन और चौगुन में ताल की गति क्रमशः तीन और चार गुना बढ़ जाती है।