Chapter 7
Chapter 7 — अध्ययन नोट्स
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प्रस्तावना
व्याख्याप्रस्तावना
अध्याय 'विचित्र: साक्षी' में न्याय, सत्य और मानवीय भावनाओं के अंतर्संबंध को रोचक कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। यह कथा ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा संपादित है और बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए निर्णय पर आधारित है। कथा का मूल विषय न्यायाधीश द्वारा प्रमाण के अभाव में भी न्याय करने की युक्ति और बुद्धिमत्ता है। इसमें एक निर्धन व्यक्ति की कहानी है जिसने परिश्रम कर कुछ धन अर्जित किया और अपने पुत्र को महाविद्यालय में प्रवेश दिलाया। पुत्र के रुग्ण होने पर पिता उसे देखने गया, रास्ते में एक ग्रामस्थ के घर में रात्रि विश्राम किया। उसी रात उस घर में चोरी हुई और चोरी के आरोप में ग्राम का आरक्षी (सैनिक) गिरफ्तार किया गया। न्यायालय में न्यायाधीश ने प्रमाणों के अभाव में भी न्याय करने के लिए एक विचित्र साक्षी का प्रयोग किया। इस कथा के माध्यम से न्याय की प्रक्रिया, सत्य की खोज और मानवीय संवेदनाओं को समझाया गया है।
- कथा न्याय, सत्य और मानवीय भावनाओं पर आधारित है।
- निर्धन व्यक्ति ने परिश्रम से पुत्र को महाविद्यालय में प्रवेश दिलाया।
- रात्रि में चोरी हुई और आरक्षी पर आरोप लगा।
- न्यायाधीश ने प्रमाण के बिना भी न्याय करने की युक्ति अपनाई।
- कथा में न्याय की प्रक्रिया और सत्य की महत्ता दर्शाई गई है।
- 📌 न्यायाधीश: न्याय देने वाला अधिकारी
- 📌 आरक्षी: सैनिक या रक्षक
- 📌 प्रमाण: न्याय के लिए आवश्यक साक्ष्य
शब्दार्थाः
व्याख्याशब्दार्थाः
इस खंड में अध्याय में प्रयुक्त महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दों के अर्थ, पर्यायवाची और उनके हिंदी तथा अंग्रेजी अनुवाद दिए गए हैं। यह शब्दार्थ छात्रों को पाठ की गहन समझ प्रदान करते हैं और भाषा के ज्ञान को बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए, 'भूरि' का अर्थ है पर्याप्त या अत्यधिक, 'उपार्जितवान्' का अर्थ है कमाया हुआ, 'निवसन्' का अर्थ है रहते हुए, 'प्रसूते' का अर्थ है फैले हुए, 'विजने प्रदेशे' का अर्थ है एकान्त प्रदेश में, 'शुभावहा' का अर्थ है कल्याणकारी, 'गृही' का अर्थ है गृहस्थ, 'दैवगति:' का अर्थ है भाग्य की लीला, 'पलायित:' का अर्थ है भाग गया, 'प्रबुद्ध:' का अर्थ है जागृत, 'त्वरितम्' का अर्थ है शीघ्रगामी, आदि। इन शब्दों का सही अर्थ जानना संस्कृत भाषा के अध्ययन में अत्यंत आवश्यक है। यह खंड छात्रों को शब्दों के पर्याय और उनके प्रयोग से परिचित कराता है जिससे वे पाठ को बेहतर ढंग से समझ सकें। **Table on page 3 (17×4)** | भूरि | - पर्याप्तम् | - अत्यधिक | - Plenty | | --- | --- | --- | --- | | उपार्जितवान् | - अर्जितवान् | - कमाया | - Earned | | निवसन् | - वासं कुर्वन् | - रहते हुए | - While residing | | प्रसूते | - विस्तृते | - फैले हुए | - Spreaded | | विजने प्रदेशे | - एकान्तप्रदेशे | - एकान्त प्रदेश में | - In a desolate place | | शुभावहा | - कल्याणप्रदा | - कल्याणकारी | - Charitable | | गृही | - गृहस्वामी | - गृहस्थ | - House holder | | दैवगति: | - भाग्यस्थिति: | - भाग्य की लीला | - Destiny | | पलायित: | - वेगेन निर्गत:/पलायनमकरोत् | - भाग गया, चला गया | - Ran away | | प्रबुद्ध: | - जागृत: | - जागा हुआ | - Awakened | | त्वरितम् | - शीघ्रम् | - शीघ्रगामी | - Swift | | प्रस्थित: | - गत: | - चला गया | - Went | | अर्थकाश्यैन | - धनस्य अभावेन | - धनाभाव के कारण | - Scarcity of money | | पदातिरेव | - पादाभ्याम् एव | - पैदल ही | - On foot | | पुंस: | - पुरुषस्य | - मनुष्य का | - Human's | | निहिताम् | - स्थापिताम् | - रखी हुई | - Placed/kept | | अन्वधावत् | - अन्वगच्छत्, अनु+अधावत् | - पीछे-पीछे गया | - He/she followed | **Table on page 4 (18×7)** | क्रोशितुम् | - | चीत्कर्तुम् | - | ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने | - | Shouting | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | तारस्वरेण | - | उच्चस्वरेण | - | ऊँची आवाज़ में | - | Loudly | | अभर्त्सयन् | - | भर्त्सनाम् अकुर्वन् | - | भला-बुरा कहा | - | They criticized | | प्रख्याप्य | - | स्थाप्य | - | स्थापित करके | - | Establishing | | चौर्याभियोगे | - | चौरकर्मणि, चौर्यदोषारोपे | - | चोरी के आरोप में | - | On an allegation of stealing | | नीतवान् | - | अनयत् | - | ले गया | - | (He) took | | अवगत्य | - | ज्ञात्वा | - | जानकर | - | Knowing | | दोषभाजनम् | - | दोषपात्रम् | - | दोषी | - | Culprit | | उपस्थातुम् | - | समक्षमायातुम् | - | उपस्थित होने के लिए | - | To be presented | | आरक्षिणम् | - | सैनिकम् (रक्षक-पुरुषम्) | - | सैनिक को | - | To guard | | आदिष्टवान् | - | आज्ञां दत्तवान् | - | आज्ञा दी | - | (He) ordered | | स्थापितवन्तौ | - | न्यस्तवन्तौ | - | रखा | - | Kept | | तत्रव्य: | - | तत्र भव: | - | वहाँ का | - | Of that place | | न्यवेदयत | - | प्रार्थयत | - | प्रार्थना की | - | (He/she) requested | | क्रोशाद्वयान्तराले | - | द्वयोः क्रोशयोः मध्ये | - | दो कोस के मध्य | - | At the distance of around two miles | | आदिश्यताम् | - | आदेशः दीयताम् | - | आज्ञा दीजिए | - | Order | | उपेत्व | - | समीपं गत्वा | - | पास जाकर | - | Going near | | काष्ठपटले | - | काष्ठस्य पटले | - | लकड़ी के तख्ते पर | - | On a wooden board | **Table on page 5 (3×4)** | निहितम् | - स्थापितम् | - रखा गया | - Kept | | --- | --- | --- | --- | | पटाच्छादितम् | - वस्त्रेणावृतम् | - कपड़े से ढका हुआ | - Covered by cloth | | वहन्तौ | - धारयन्तौ | - धारण करते हुए, **Table on page 5 (16×4)** | कृशकाय: | - दुर्बलं शरीरम् | - कमज़ोर शरीरवाला | - Lean body | | भारवत: | - भारवाहिन: | - भारवाही | - Of heavy built | | भारवेदनया | - भारपीडया | - भार की पीड़ा से | - By the pain of the load | | क्रन्दनम् | - रोदनम् | - रोने को | - Weeping | | निशाम्य | - श्रुत्वा, आकण्य | - सुन करके | - Listening | | मुदित: | - प्रसन्न: | - प्रसन्न | - Happy | | भुङ्गश्व | - भोगं कुरु | - भोगो | - Meet the nemesis | | चत्वरे | - शृङ्गाटके/चतुष्पथे | - चौराहे पर | - At square | | लप्यसे | - प्राप्यसे | - प्राप्त करोगे | - You will get | | प्रावारकम् | - आच्छादनवस्त्रम् | - ऊपर ओढ़ा हुआ वस्त्र | - Covering cloth | | अपसार्य | - अपवार्य | - दूर करके | - Removing | | अभिवाद्य | - अभिवादनं कृत्वा | - अभिवादन करके | - Saluting | | अध्वनि | - मार्ग | - रास्ते में | - On the way | | यदुक्तम् | - यत् कथितम् | - जो कहा गया | - Whatever was said | | वारित: | - निवारित: | - रोका गया | - Stopped | | मुक्तवान् | - अत्यजत् | - छोड़ दिया | - Released | | समालम्ब्य | - आश्रयं गृहीत्वा | - सहारा लेकर | - Taking recourse | **Table on page 7 (4×4)** | ल्यप् | क्त | क्तवतु | तुमुन् | | --- | --- | --- | --- | | ………………… | ………………… | ………………… | ………………… | | ………………… | ………………… | ………………… | ………………… | | ………………… | ………………… | ………………… | ………………… |
- महत्वपूर्ण संस्कृत शब्दों के अर्थ और पर्याय दिए गए हैं।
- शब्दों के हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद भी प्रस्तुत हैं।
- शब्दार्थ से पाठ की समझ में वृद्धि होती है।
- शब्दों के सही प्रयोग के लिए यह खंड आवश्यक है।
- 📌 पर्यायवाची: समान अर्थ वाले शब्द
- 📌 शब्दार्थ: शब्द का अर्थ
- 📌 संस्कृत शब्द: मूल शब्द जो पाठ में प्रयुक्त हैं
क्रिया रूप और विभक्ति
व्याख्याक्रिया रूप और विभक्ति
इस खंड में संस्कृत भाषा की क्रियाओं के भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल के रूपों का विस्तृत अध्ययन किया गया है। साथ ही विभक्तियों का भी वर्णन है जो संस्कृत व्याकरण की महत्वपूर्ण विशेषता है। क्रिया रूपों से यह समझा जाता है कि क्रिया किस काल में और किस
अभ्यास प्रश्न — Chapter 7
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. एकपदेन उत्तरं लिखत- (क) कीदृशे प्रदेशे पदयात्रा न सुखावहा? (ख) अतिथि: केन प्रबुद्ध:? (ग) कृशकाय: क: आसीत्? (घ) न्यायाधीश: कस्मै कारागारदण्डम् आदिष्टवान्? (ङ) कं निकषा मृतशरीरम् आसीत्?
उत्तर:
1. (क) वह प्रदेश जहाँ पदयात्रा सुखद नहीं होती, वह कठिन और असुविधाजनक क्षेत्र होता है। (ख) अतिथि को चौर के पादध्वनि से प्रबुद्ध किया गया। (ग) कृशकाय व्यक्ति वह था जो न्यायाधीश के आदेशानुसार कारागार दण्ड भुगत रहा था। (घ) न्यायाधीश ने उस व्यक्ति को कारागार दण्ड दिया जो चोरी के आरोप में था। (ङ) मृतशरीर निकषा में था जो न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पाठ के अनुसार एक शब्द या वाक्य में दिया गया है। प्रश्न (क) में पदयात्रा के लिए असुविधाजनक प्रदेश का उल्लेख है। प्रश्न (ख) में अतिथि के जागने का कारण चौर की पादध्वनि है। प्रश्न (ग) में कृशकाय व्यक्ति का परिचय दिया गया है। प्रश्न (घ) में न्यायाधीश द्वारा दण्डित व्यक्ति का उल्लेख है। प्रश्न (ङ) में मृतशरीर की स्थिति बताई गई है।
Q2.2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत- (क) निर्धन: जन: कथं वित्तम् उपार्जितवान्? (ख) जन: किमर्थ पदाति: गच्छति? (ग) प्रसूते निशान्धकारे स किम् अचिन्तयत्? (घ) वस्तुत: चौर: क: आसीत्? (ङ) जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी किमुक्तवान्? (च) मतिवैभवशालिन: दुष्कराणि कार्याणि कथं साधयन्ति?
उत्तर:
2. (क) निर्धन: जन: परिश्रम्य वित्तम् उपार्जितवान्। (ख) जन: पदाति: गच्छति कारणं न्यायालयं गन्तुं। (ग) प्रसूते निशान्धकारे स मृतशरीरस्य विषयं चिन्तयत्। (घ) वस्तुत: चौर: वह व्यक्ति आसीत् जो चोरी कृत्य में लिप्त था। (ङ) जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी न्यायाधीशं सूचितवान्। (च) मतिवैभवशालिन: बुद्धि और चातुर्येन दुष्कराणि कार्याणि सरलतया साधयन्ति।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का उत्तर संस्कृत में दिया गया है। निर्धन व्यक्ति ने परिश्रम से धन कमाया। जन न्यायालय जाने के लिए पदयात्रा करता है। प्रसूता निशान्धकारे मृतशरीर के विषय में सोचता है। चोर वह व्यक्ति है जो चोरी करता है। जन के क्रन्दन को देखकर आरक्षी ने न्यायाधीश को सूचित किया। बुद्धिमान व्यक्ति दुष्कर कार्यों को भी सरलता से पूरा करते हैं।
Q3.3. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत- (क) पुत्रं द्रष्टुं स: प्रस्थित:। (ख) करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्। (ग) चौरस्य पादध्वनिना अतिथि: प्रबुद्ध:। (घ) न्यायाधीश: बंकिमचन्द्र: आसीत्। (ङ) स भारवेदनया क्रन्दति स्म। (च) उभौ शवं चत्वरे स्थापितवन्तौ।
उत्तर:
3. (क) पुत्रं द्रष्टुं स: कः प्रस्थित:? (ख) करुणापरो गृही तस्मै किम् आश्रयं प्रायच्छत्? (ग) चौरस्य पादध्वनिना अतिथि: कथं प्रबुद्ध:? (घ) न्यायाधीश: बंकिमचन्द्र: कः आसीत्? (ङ) स भारवेदनया कथं क्रन्दति स्म? (च) उभौ शवं चत्वरे कथं स्थापितवन्तौ?
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्य में रेखांकित पद के आधार पर प्रश्न बनाए गए हैं। उदाहरण के लिए, (क) में पुत्रं द्रष्टुं स: प्रस्थित: से प्रश्न है कि वह कौन था जो पुत्र को देखने गया। इसी प्रकार अन्य वाक्यों से संबंधित प्रश्न बनाए गए हैं।
Q4.4. यथानिर्देशमुत्तरत— (क) ‘आदेश’ प्राप्य उभौ अचलताम्’ अत्र किं कर्तृपदम्? (ख) ‘एतेन आरक्षिणा अर्ध्वनि यदुक्तं तत् वर्णयामि’–अत्र ‘मार्गे’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्? (ग) ‘करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्’– अत्र ‘तस्मै’ इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्? (घ) ‘ततोऽस्मौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्’ अस्मिन् वाक्ये किं क्रियापदम्? (ङ) ‘दुष्कराण्यपि कर्माणि’– अत्र विशेष्यपदं किम्?
उत्तर:
4. (क) कर्तृपदम् 'उभौ'। (ख) 'मार्गे' पदात् अर्थ: 'मार्गे' अर्थात् 'मार्गे' (पथ में)। (ग) 'तस्मै' सर्वनामपदं 'गृही' क्रियापदम् प्रयुक्तम्। (घ) क्रियापदम् 'आदिष्टवान्'। (ङ) विशेष्यपदं 'कर्माणि'।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न में वाक्य के भागों का व्याकरणिक विश्लेषण किया गया है। (क) में कर्तृपद की पहचान, (ख) में 'मार्गे' शब्द का अर्थ, (ग) में सर्वनाम पद का उपयोग, (घ) में क्रियापद की पहचान, तथा (ङ) में विशेष्य पद की पहचान की गई है।
Q5.5. सन्धि/सन्धिविच्छेदं च कुरुत— (क) पदातिरेव - …………………… + …………………… (ख) निशान्धकारे - …………………… + …………………… (ग) अभि + आगतम् - …………………… …………………… (घ) भोजन + अन्ते - …………………… …………………… (ङ) चौरोऽयम् - …………………… + …………………… (च) गृह + अभ्यन्तरे - …………………… + …………………… (छ) लीलयैव - …………………… + …………………… (ज) यदुक्तम् - …………………… + …………………… (झ) प्रबुद्धः + अतिथिः: - …………………… ……………………
उत्तर:
5. (क) पद + अतिरेव (ख) निशान्ध + कारे (ग) अभि + आगतम् (घ) भोजन + अन्ते (ङ) चौर + अयम् (च) गृह + अभ्यन्तरे (छ) लील + यैव (ज) यत् + उक्तम् (झ) प्रबुद्धः + अतिथिः
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द को उसके मूल अवयवों में विभाजित किया गया है। उदाहरण के लिए, पदातिरेव = पद + अतिरेव, निशान्धकारे = निशान्ध + कारे, आदि। यह सन्धि विच्छेद अभ्यास है जो संस्कृत व्याकरण का महत्वपूर्ण भाग है।
Q6.6. अधोलिखितानि पदानि भिन्न-भिन्नप्रत्ययान्तानि सन्ति। तानि पृथक् कृत्वा निर्दिष्टानां प्रत्ययानामधः लिखत— परिश्रम्य, उपार्जितवान्, दापयितुम्, प्रस्थितः, द्रष्टुम्, विहाय, पृष्टवान्, प्रविष्टः, आदाय, क्रोशितुम्, नियुक्तः, नीतवान्, निर्णेतुम्, आदिष्टवान्, समागत्य, मुदितः। | ल्यप् | क्त | क्तवतु | तुमुन् | | --- | --- | --- | --- | | ………………… | ………………… | ………………… | ………………… | | ………………… | ………………… | ………………… | ………………… | | ………………… | ………………… | ………………… | ………………… |
उत्तर:
6. ल्यप् प्रत्ययान्ति: परिश्रम्य, विहाय, आदाय, समागत्य क्त प्रत्ययान्ति: उपार्जितवान्, पृष्टवान्, नियुक्तः, मुदितः क्तवतु प्रत्ययान्ति: द्रष्टुम्, क्रोशितुम्, निर्णेतुम्, आदिष्टवान् तुमुन् प्रत्ययान्ति: दापयितुम्, प्रविष्टः, नीतवान् (नोट: प्रत्यय वर्गीकरण व्याकरण के अनुसार किया गया है।)
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द को उसके प्रत्यय के आधार पर चार स्तंभों में वर्गीकृत किया गया है। ल्यप् प्रत्यय से बने शब्द क्रिया विशेषण होते हैं, क्त प्रत्यय से भूतकालीन क्रिया विशेषण, क्तवतु प्रत्यय से क्रिया विशेषण और तुमुन् प्रत्यय से क्रिया हेतु प्रयुक्त शब्द होते हैं।
Q7.7. (अ) अधोलिखितानि वाक्यानि बहुवचने परिवर्तयत- (क) स बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवान्। (ख) चौर: ग्रामे नियुक्त: राजपुरुष: आसीत्। (ग) कश्चन चौर: गृहाभ्यन्तरं प्रविष्ट:। (घ) अन्येद्य: तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्तौ। (आ) कोष्ठकेषु दत्तेषु पदेषु यथानिर्दिष्टां विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूर्यत- (क) स: ... निष्क्रम्य बहिरगच्छत्। (गृहशब्दे पंचमी) (ख) गृहस्थ: ... आश्रयं प्रायच्छत्। (अतिथिशब्दे चतुर्थी) (ग) तौ ... प्रति प्रस्थितौ। (न्यायाधिकारिन् शब्दे द्वितीया) (घ) ... चौयाभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे। (इदम् शब्दे सप्तमी) (ङ) चौरस्य ... प्रबुद्ध: अतिथि:। (पादध्वनिशब्दे तृतीया)
उत्तर:
7. (अ) बहुवचन रूपांतरण- (क) ते बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुम् निश्चयं कृतवन्तः। (ख) चोराः ग्रामे नियुक्ताः राजपुरुषाः आसन्। (ग) कश्चन चोरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः। (यह वाक्य बहुवचन में भी समान रहता है क्योंकि कश्चन एकवचन है) (घ) अन्ये तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्तः। (आ) रिक्तस्थान पूर्ति- (क) स: गृहात् निष्क्रम्य बहिरगच्छत्। (ख) गृहस्थ: अतिथिषु आश्रयं प्रायच्छत्। (ग) तौ न्यायाधिकारिणो प्रति प्रस्थितौ। (घ) इदं चौयाभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे। (ङ) चौरस्य पादध्वनिशब्दे प्रबुद्ध: अतिथि:।
व्याख्या:
प्रश्न (अ) में वाक्यों को बहुवचन में परिवर्तित किया गया है। प्रश्न (आ) में रिक्त स्थानों में उचित विभक्ति रूपों को भरना है। उदाहरण स्वरूप, गृहशब्दे पंचमी विभक्ति में 'गृहात्' प्रयुक्त हुआ है। अतिथिशब्दे चतुर्थी में 'अतिथिषु' आदि।
Q8.न्यायाधीश बंकिमचन्द्र द्वारा दिया गया निर्णय किस प्रकार का था?
उत्तर:
बिना प्रमाण के न्याय करने की युक्ति
व्याख्या:
न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने प्रमाण के अभाव में भी न्याय करने के लिए बुद्धिमत्ता और युक्ति का प्रयोग किया, जिससे न्याय संभव हो सका।