Chapter 7
Chapter 7 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 7 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
नैकेनापि समं गता वसुमती
व्याख्यानैकेनापि समं गता वसुमती
यह पाठ बल्लाल सेन द्वारा रचित 'भोजप्रबन्ध' के 'भोजराजस्य राज्यप्राप्तिप्रबन्ध' अंश का संक्षिप्त एवं सम्पादित रूप है। इसमें मनुष्य के मन में जब लोभ उत्पन्न होता है, तब वह निष्ठुर होकर घृणित कार्य करने से नहीं हिचकिचाता, यह विचार प्रस्तुत किया गया है। कथा के अनुसार, भोज के चाचा मुज्ज द्वारा भोज को मारने का षड्यन्त्र रचा जाता है। परन्तु भोज उस समय मुज्ज को एक संदेश देते हैं, जिसमें मांन्धाता, रावण आदि के उदाहरणों के माध्यम से संसार की नश्वरता को दर्शाया गया है। इस श्लोक को पढ़कर न केवल भोज का वध करने वाला मुज्ज का मन परिवर्तित होता है, बल्कि उसे वैराग्य भी आ जाता है। वह अपने भतीजे के वध से दुखी होकर प्रायश्चित्त स्वरूप अग्नि में प्रवेश करना चाहता है। लेकिन वत्सराज और बुद्धिसागर की योजना से भोज को पुनः जीवित घोषित किया जाता है। मांन्धाता च महीपति: यह श्लोक संस्कृत साहित्य की अमूल्य निधि के रूप में प्रसिद्ध हो गया है। इस पाठ में मुख्यतः लोभ, वैराग्य, और जीवन-मरण की अनित्य प्रकृति को दर्शाया गया है। भोजराज की कहानी के माध्यम से यह बताया गया है कि लोभ और द्वेष मनुष्य को घृणित कार्यों के लिए प्रेरित करते हैं, परन्तु ज्ञान और विवेक से मनुष्य का मन परिवर्तन संभव है।
- पाठ 'भोजप्रबन्ध' के 'भोजराजस्य राज्यप्राप्तिप्रबन्ध' अंश का संक्षिप्त रूप है।
- लोभ मनुष्य को निष्ठुर और घृणित कार्य करने पर मजबूर करता है।
- मुज्ज ने भोज को मारने का षड्यन्त्र रचा था।
- भोज ने मुज्ज को संसार की नश्वरता का संदेश दिया।
- मुज्ज का मन परिवर्तित होकर उसे वैराग्य आया।
- भोज को वत्सराज और बुद्धिसागर की योजना से पुनः जीवित घोषित किया गया।
- 📌 भोजप्रबन्ध: बल्लाल सेन द्वारा रचित संस्कृत काव्य का एक भाग।
- 📌 लोभ: अत्यधिक इच्छा या लालच।
- 📌 वैराग्य: सांसारिक वस्तुओं से विरक्ति।
धाराराज्ये सिन्धुल-संज्ञो राजा चिरं प्रजा: पर्यपालयत्
व्याख्याधाराराज्ये सिन्धुल-संज्ञो राजा चिरं प्रजा: पर्यपालयत्
इस भाग में धाराराज्य के राजा सिन्धुल का परिचय दिया गया है, जो लंबे समय तक अपनी प्रजा की रक्षा करता रहा। उसकी वृद्धावस्था में उसका पुत्र भोज जन्मा। जब भोज पाँच वर्ष का था, तब राजा ने अपनी वृद्धावस्था को देखकर मुख्यामात्य को बुलाकर अपने छोटे भाई मुज्ज के विषय में विचार किया। राजा ने सोचा कि यदि वह राज्य अपने पुत्र को सौंपे तो लोकों में अपवाद होगा, परन्तु यदि मुज्ज को राज्य दिया और वह अपने लालच से पुत्र भोज को मार डाले, तो राज्य व्यर्थ हो जाएगा। इस कारण राजा ने राज्य मुज्ज को सौंप दिया और भोज को अपने संरक्षण से मुक्त कर दिया। इसके बाद मुज्ज ने मुख्यामात्य बुद्धिसागर को व्यापार मुद्रा से दूर कर दिया और उसकी जगह किसी अन्य को नियुक्त किया। एक बार सभा में एक ज्योति:शास्त्र में पारंगत ब्राह्मण आया और राजा से कहा कि लोग उसे सर्वज्ञ मानते हैं और वह कुछ भी पूछ सकता है। इस संवाद से मुज्ज ने भोज की जन्मपत्रिका मांगने का आदेश दिया। ब्राह्मण ने भोज की जन्मपत्रिका बनाई, जिसमें भोज के विषय में भविष्यवाणी की गई। मुज्ज ने यह भविष्यवाणी सुनकर विच्छायावदन (कान्तिहीन मुखवाला) हो गया, अर्थात् उसका चेहरा फीका पड़ गया। राजा ने ब्राह्मण को भेजकर कहा कि यदि भोज राज्य की लक्ष्मी को भोगेगा तो वह जीवित नहीं रहेगा। इस प्रकार की परिस्थिति में राजा ने वत्सराज को बुलाकर भोज को मारने का आदेश दिया। वत्सराज ने भोज को रथ में बैठाकर वन में ले जाकर मारने की योजना बनाई, परन्तु भोज ने वत्सराज को संसार की नश्वरता का संदेश दिया, जिससे वत्सराज ने उसे नहीं मारा और घर में सुरक्षित रखा।
- राजा सिन्धुल ने अपनी वृद्धावस्था में राज्य का प्रश्न सोचा।
- राज्य पुत्र भोज को देने में लोकापवाद का भय था।
- राज्य मुज्ज को दिया गया और भोज को मुक्त किया गया।
- मुज्ज ने मुख्यामात्य बुद्धिसागर को हटाया।
- भोज की जन्मपत्रिका बनाई गई और भविष्यवाणी की गई।
- भोज को मारने के लिए वत्सराज को आदेश दिया गया।
- 📌 धाराराज्य: एक काल्पनिक या ऐतिहासिक राज्य।
- 📌 सिन्धुल: धाराराज्य का राजा।
- 📌 मुख्यामात्य: मुख्य मंत्री।
भोजस्य जन्मपत्रिका विधेहि
व्याख्याभोजस्य जन्मपत्रिका विधेहि
इस खंड में मुज्ज द्वारा भोज की जन्मपत्रिका मांगने और उसके परिणाम का वर्णन है। ब्राह्मण ने भोज की जन्मपत्रिका बनाई, जिसमें लिखा था कि भोजराज को पञ्चावर्ष, सप्तमास, दिनत्रय (पाँच वर्ष, सात महीने, तीन दिन) का जीवन मिलेगा। यह भविष्यवाणी सुनकर मुज्ज का चे
अभ्यास प्रश्न — Chapter 7
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. एकपदेन उत्तरं ददत - (क) आर्यभुवि शाटीत: का विराजते? (ख) उषसि हल्दीचाटी कीदृशीं शोभां दधाति? (ग) सनय: तनय: क: अस्ति? (घ) के नीलेन पक्षेण खम् आहसन्ति? (ङ) वरभुव: सुषमा कथं सम्भासते? (च) तम:सहचरी का कथिता? (छ) प्रतापनृपते: अस्त्रधारा कतिधा अभवत्?
उत्तर:
1. एकपदेन उत्तरं ददत - (क) आर्यभुवि शाटीत: का विराजते? — शाटीत: आर्यभुवि वीरता और पराक्रम से विराजते हैं। (ख) उषसि हल्दीचाटी कीदृशीं शोभां दधाति? — उषसि हल्दीघाटी को स्वर्णिम और गौरवशाली शोभा प्रदान करती है। (ग) सनय: तनय: क: अस्ति? — सनय: तनय: महाराणा प्रताप के पुत्र हैं। (घ) के नीलेन पक्षेण खम् आहसन्ति? — नीलेन पक्षेण खम् आहसन्ति वे वीर योद्धा हैं जो युद्धभूमि में शौर्य दिखाते हैं। (ङ) वरभुव: सुषमा कथं सम्भासते? — वरभुव: सुषमा अत्यंत सुंदर और आकर्षक रूप से सम्भासते हैं। (च) तम:सहचरी का कथिता? — तम:सहचरी अन्धकार की संगिनी है, जो अज्ञान और अंधविश्वास का प्रतीक है। (छ) प्रतापनृपते: अस्त्रधारा कतिधा अभवत्? — प्रतापनृपते: की अस्त्रधारा प्रबल और तीव्र थी, जो युद्ध में उनकी शक्ति और साहस को दर्शाती है।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पाठ के अनुसार संक्षिप्त और स्पष्ट रूप में दिया गया है, जो पाठ के भाव और अर्थ के अनुरूप है।
Q2.2. पूर्णवाक्येन उत्तरत- (क) मूर्तिमती हल्दीघाटी कथम् आटीकते? (ख) कदा हल्दीघाटी मतिमाननीयां शोभां दधाति? (ग) पिकालिगीति: किमिव मातु: पूजनं करोति? (घ) कथं क्वणन्त: सुशुका: विलसन्ति? (ङ) हल्दीघाटी केषां स्थली अस्ति? (च) वरभुव: अत्युदारा सुषमा कीदृशी भासते? (छ) प्रकृति: केषां पञ्चपदार्थानामुपचारेण पूजनं करोति?
उत्तर:
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत- (क) मूर्तिमती हल्दीघाटी वीरता और पराक्रम से पूर्ण है। (ख) हल्दीघाटी तब मतिमाननीयां शोभां दधाति जब सूर्य की किरणें वहां पड़ती हैं। (ग) पिकालिगीति: मातु: पूजनं श्रद्धा और सम्मान के साथ करती है। (घ) क्वणन्त: सुशुका: उल्लास और आनंद से विलसन्ति। (ङ) हल्दीघाटी राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र की स्थली है। (च) वरभुव: अत्युदारा सुषमा अत्यंत सुंदर और उदार रूप में भासते हैं। (छ) प्रकृति: वीरों के पञ्चपदार्थों के उपचारेण पूजनं करती है, जैसे शस्त्र, वस्त्र, आहार, वाहन और निवास।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पूर्ण वाक्य में दिया गया है, जो पाठ की समझ को दर्शाता है।
Q3.3. अधोलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत- (क) मूर्तिमती हल्दीघाटी जयति। (ख) या उषसि शोभां दधाति। (ग) तरुणां तति: कदम्बकृतमर्मरम् आतनोति। (घ) निर्जनवने कुररी मातेव रोदिति। (ङ) मातु: पञ्चोपचारं पूजनं करोति। (च) अस्त्रधारा शतधा अभवत्। (छ) असुत: अपि प्रियतमा स्थली।
उत्तर:
3. प्रश्ननिर्माण- (क) मूर्तिमती हल्दीघाटी किम् जयति? (ख) या कः शोभां दधाति? (ग) तरुणां तति: कस्य कृतमर्मरम् आतनोति? (घ) निर्जनवने कः कुररी मातेव रोदिति? (ङ) मातु: किम् पूजनं करोति? (च) अस्त्रधारा कथं अभवत्? (छ) असुत: कः अपि प्रियतमा स्थली?
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्य में रेखांकित पदों को प्रश्न के रूप में परिवर्तित किया गया है, जिससे प्रश्न निर्माण की प्रक्रिया स्पष्ट होती है।
Q4.4. अधोलिखितपदेषु सन्धिं सन्धिच्छेदं वा कुरुत- (क) स्वाधीनतार्यभुवि (ख) दधाति + उषसि (ग) ततिस्तरुणाम् (घ) निजर्नवने + अथ (ङ) सुशुका विलसन्ति (च) तदनु
उत्तर:
4. सन्धि विच्छेद- (क) स्वाधीनता + आर्यभुवि (ख) दधाति + उषसि (ग) तति + तरुणाम् (घ) निर्जनवने + अथ (ङ) सुशुका + विलसन्ति (च) तत् + अनु
व्याख्या:
प्रत्येक पद में सन्धि को पहचान कर उसे दो भागों में विभाजित किया गया है।
Q5.5. अधोलिखितपदेषु प्रकृतिं प्रत्ययं च पृथक् कुरुत- (क) तति: (ख) भासमाना (ग) विहिता (घ) प्रतापी (ङ) हसन्त: (च) शिखी (छ) प्रणीतम्
उत्तर:
5. प्रकृति और प्रत्यय पृथक्करण- (क) तति: — त + ति: (प्रकृति: त, प्रत्यय: ति:) (ख) भासमाना — भास + माना (ग) विहिता — वि + हिता (घ) प्रतापी — प्र + तापी (ङ) हसन्त: — हस + अन्त: (च) शिखी — शि + खी (छ) प्रणीतम् — प्र + नीतम्
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द को उसके मूल रूप (प्रकृति) और प्रत्यय में विभाजित किया गया है।
Q6.6. अध: प्रदत्तं श्लोकं मञ्जूषाप्रदत्तपदै: रिक्तस्थानानि पूरथित्वा पुन: लिखत- प्रत्यहम्, मन्दमन्दं, मरन्दं, वहति, शोभां, काञ्चन। प्राची यदा हसति हे प्रिय ... वायुर्यदा ... नन्दनजं...। या ... किल तदा मतिमाननीयां ...दधात्युषसि ...काञ्चनीयाम्।।
उत्तर:
6. पूर्ण श्लोक पूर्ति- प्राची यदा हसति हे प्रिय मन्दमन्दं, वायुर्यदा वहति नन्दनजं मरन्दं। या किल तदा मतिमाननीयां दधात्युषसि शोभां काञ्चनीयाम्।।
व्याख्या:
रिक्त स्थानों में दिए गए शब्दों को श्लोक के अनुसार सही स्थान पर भरकर श्लोक को पूर्ण किया गया है।
Q7.7. विशेषणानि विशेष्याणि च योजयित्वा पुन: लिखत- (क) सुशोचि: तनय: (ख) पारतन्त्र्या: सुशुका: (ग) प्रतापी शाटी (घ) क्वणन्त: अस्मधारा (ङ) शतधा कातरा: (च) नीलेन खद्योत्पक्ति: (छ) अमला पक्षनिवहेन
उत्तर:
7. विशेषण और विशेष्य योजित रूप- (क) सुशोचि: तनय: — सुशोचि: तनय: (दुखी पुत्र) (ख) पारतन्त्र्या: सुशुका: — पारतन्त्र्या: सुशुका: (स्वतंत्रता की पक्षी) (ग) प्रतापी शाटी — प्रतापी शाटी (शक्ति से भरी शाटी) (घ) क्वणन्त: अस्मधारा — क्वणन्त: अस्मधारा (गाते हुए झरने) (ङ) शतधा कातरा: — शतधा कातरा: (सैकड़ों तलवारें) (च) नीलेन खद्योत्पक्ति: — नीलेन खद्योत्पक्ति: (नीले रंग की खद्योत्पत्ति) (छ) अमला पक्षनिवहेन — अमला पक्षनिवहेन (शुद्ध पक्षनिवाह)
व्याख्या:
विशेषण और विशेष्य को सही रूप में जोड़कर वाक्यांश बनाए गए हैं।
Q8.8. अधोलिखितानां पदानां व्याकरणानुसारं पदपरिचय: दीयताम्- स्वाधीनता, माननीयाम्, सन्त:, तम:, सम्भासते, स्थली, माता
उत्तर:
8. पदपरिचय- (क) स्वाधीनता — स्त्रीलिंग, एकवचन, प्रथमा विभक्ति, संज्ञा (ख) माननीयाम् — स्त्रीलिंग, एकवचन, द्वितीया विभक्ति, विशेषण (ग) सन्त: — पुल्लिंग, बहुवचन, प्रथमा विभक्ति, क्रियाविशेषण (घ) तम: — पुल्लिंग, एकवचन, द्वितीया विभक्ति, सर्वनाम (ङ) सम्भासते — क्रिया, वर्तमान काल, मध्यम पुरुष, एकवचन (च) स्थली — स्त्रीलिंग, एकवचन, प्रथमा विभक्ति, संज्ञा (छ) माता — स्त्रीलिंग, एकवचन, प्रथमा विभक्ति, संज्ञा
व्याख्या:
प्रत्येक पद का व्याकरणानुसार लिंग, वचन, विभक्ति, पदवर्ग आदि परिचय दिया गया है।