Chapter 2
Chapter 2 — अध्ययन नोट्स
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परिचय
व्याख्यापरिचय
भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना का अध्ययन जनसांख्यिकी के माध्यम से किया जाता है। जनसांख्यिकी वह विज्ञान है जो जनसंख्या की संख्या, वितरण, संरचना और परिवर्तन का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है। यह समाजशास्त्र का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है क्योंकि जनसंख्या किसी भी समाज की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है। भारत की जनसंख्या विविधताओं से भरी हुई है, जिसमें विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति के लोग शामिल हैं। जनसंख्या की संवृद्धि, आयु संरचना, लैंगिक अनुपात, साक्षरता दर, ग्रामीण-नगरीय वितरण आदि विषयों का अध्ययन भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना को समझने में मदद करता है। इस अध्याय में हम भारत की जनसंख्या के विभिन्न पहलुओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे, जिससे समाज की जटिलताओं और विकास की दिशा को समझा जा सके।
- जनसांख्यिकी जनसंख्या का वैज्ञानिक अध्ययन है।
- भारतीय समाज की जनसंख्या विविधताओं से भरी है।
- जनसंख्या की संरचना सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रभावित करती है।
- जनसंख्या के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन समाजशास्त्र का महत्वपूर्ण भाग है।
- 📌 जनसांख्यिकी: जनसंख्या की संख्या, वितरण, संरचना और परिवर्तन का वैज्ञानिक अध्ययन।
- 📌 जनसंख्या संरचना: किसी समाज में जनसंख्या के विभिन्न वर्गों का अनुपात।
जनसंख्या की संवृद्धि और उसके पैटर्न
व्याख्याजनसंख्या की संवृद्धि और उसके पैटर्न
भारत की जनसंख्या संवृद्धि का इतिहास 20वीं और 21वीं शताब्दी में विभिन्न चरणों से गुजरा है। 1901 से 2011 तक भारत की जनसंख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्रारंभिक दशकों में संवृद्धि दर धीमी थी, लेकिन 1951 के बाद जनसंख्या वृद्धि की दर में तेजी आई। 1901 में भारत की कुल जनसंख्या 238 लाख थी, जो 2011 में बढ़कर 1210 लाख हो गई। संवृद्धि दर में उतार-चढ़ाव भी देखे गए हैं, जैसे 1921 में जनसंख्या में गिरावट आई, जो मुख्यतः महामारी और अकाल के कारण था। 1961 से 1981 तक संवृद्धि दर उच्चतम स्तर पर रही, जिसके कारण जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई। इसके बाद संवृद्धि दर में धीरे-धीरे कमी आई है। यह संवृद्धि पैटर्न सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन नीतियों के प्रभाव को दर्शाता है। जनसंख्या वृद्धि के कारण संसाधनों पर दबाव बढ़ता है, जिससे विकास की चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं। **Table on page 9 (16 rows × 5 cols)** | सारणी 1: भारत की जनसंख्या और 20वीं एवं 21वीं शताब्दी में इसकी संवृद्धि | | | | | | --- | --- | --- | --- | --- | | | | | | | | वर्ष | कुल जनसंख्या (लाखों में) | औसत वार्षिक संवृद्धि दर (%) | दशकीय संवृद्धि दर (%) | | | 1901 | 238 | - | - | | | 1911 | 252 | 0.56 | 5.8 | | | 1921 | 251 | -0.03 | -0.3 | | | 1931 | 279 | 1.04 | 11.0 | | | 1941 | 319 | 1.33 | 14.2 | | | 1951 | 361 | 1.25 | 13.3 | | | 1961 | 439 | 1.96 | 21.6 | | | 1971 | 548 | 2.22 | 24.8 | | | 1981 | 683 | 2.20 | 24.7 | | | 1991 | 846 | 2.14 | 23.9 | | | 2001 | 1028 | 1.95 | 21.5 | | | 2011 | 1210 | 1.63 | 17.7 | | | वेबसाइट : https://ayush.gov.in | | | | | **Table on page 20 (3 rows × 2 cols)** | क्या बदलती हुई आयु संरचना भारत को 'जनसांख्यिकीय लाभांश' प्रदान कर रही है? | बॉक्स 2.3 | | --- | --- | | जनसंख्या की आयु संरचना से जनसांख्यिकीय लाभ या 'लाभांश' इस तथ्य के कारण मिल सकता है कि भारत इस समय विश्व भर में सबसे युवा देशों में से एक है (और आगे भी कुछ समय के लिए रहेगा)। वर्ष 2011 में भारत की जनसंख्या का एक-तिहाई भाग 15 वर्ष की आयु से नीचे था। वर्ष 2020 में भारतीयों की औसत उम्र सिर्फ 29 साल रही जबकि चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका में औसत आयु 37 वर्ष, पश्चिमी यूरोप में 45 वर्ष और जापान में 48 वर्ष रही। इसका अर्थ यह होगा कि भारत के पास काफ़ी बड़ा और बढ़ता हुआ श्रमिक बल होगा जो संवृद्धि तथा समृद्धि की दृष्टि से अप्रत्याशित लाभ प्रदान कर सकेगा। | | | 'जनसांख्यिकीय लाभांश' जनसंख्या में काम न करने वाले पराश्रित लोगों की तुलना में कार्यशील यानी कमाने वाले लोगों के अनुपात में वृद्धि के फलस्वरूप प्राप्त होता है। आयु की दृष्टि से, कार्यशील जनसंख्या मोटे तौर पर 15 से 64 वर्ष तक की आयु की होती है। कार्यशील आयु वर्ग स्वयं अपना भरण-पोषण तो करता ही है साथ ही उसे अपने आयु वर्ग से बाहर के आयु वर्ग (यानी बच्चों और वृद्धों) को भी सहारा देना होता है जो स्वयं काम नहीं कर सकते हैं और इसलिए पराश्रित होते हैं। जनसांख्यिकीय संक्रमण आयु संरचना में होने वाले परिवर्तन 'पराश्रितता-अनुपात' को यानी जनसंख्या के अनर्जक (न कमाने वाले) आयु वर्ग और अर्जक यानी कार्यशील आयु वर्ग के बीच के अनुपात को कम कर देते हैं जिससे संवृद्धि होने की संभावना उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इस संभावना को वास्तविक संवृद्धि में तभी बदला जा सकता है जब कार्यशील आयु वर्ग में शिक्षा और रोज़गार के स्तरों में भी तदनुरूप वृद्धि होती जाए। यदि श्रमिक बल में शामिल नए लोग शिक्षित नहीं होंगे तो उनकी उत्पादकता नीची रहेगी। यदि वे बेरोजगार रहते हैं तो वे बिल्कुल भी नहीं कमा सकेंगे और कमाने वालों के बजाय पराश्रितों की श्रेणी में शामिल हो जाएँगे। अतः इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आयु संरचना में परिवर्तन आने से लाभ प्राप्त हो जाएँगे जब तक कि योजनाबद्ध विकास के जरिए उनका ठीक से उपयोग नहीं किया जाए। वास्तविक समस्या तो पराश्रितता अनुपात की परिभाषा को लेकर है। यह प्रत्यय कार्यशील व गैर-कार्यशील आयु वर्गों के अनुपात पर आधारित होता है, न कि रोज़गारी हैसियत पर। मूल बात यह है कि कार्यशील आयु वर्ग का व्यक्ति बेरोजगार भी हो सकता है। कार्यशील आयु वर्ग और बेरोजगार वर्ग के बीच का अंतर बेरोजगारी व अपूर्णरोजगारी की स्थिति पर निर्भर है। बेरोजगारी या अपूर्णरोजगारी श्रमिक बल के एक भाग को उत्पादक कार्य से बाहर रखती है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि क्यों कुछ देश जनसांख्यिकीय लाभांश का फ़ायदा उठा सकते हैं जबकि कुछ और देश ऐसा नहीं कर पाते। | |
- 1901 से 2011 तक भारत की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि।
- 1921 में जनसंख्या में गिरावट महामारी और अकाल के कारण।
- 1961-1981 तक संवृद्धि दर उच्चतम स्तर पर।
- संवृद्धि दर में बाद में कमी आई।
- जनसंख्या वृद्धि सामाजिक-आर्थिक नीतियों से प्रभावित।
- 📌 संवृद्धि दर: किसी अवधि में जनसंख्या की वृद्धि की दर।
- 📌 दशकीय संवृद्धि दर: दस वर्षों में जनसंख्या वृद्धि का प्रतिशत।
जनसंख्या की आयु संरचना
व्याख्याजनसंख्या की आयु संरचना
आयु संरचना से तात्पर्य है किसी समाज में विभिन्न आयु वर्गों के लोगों का अनुपात। यह संरचना आर्थिक और सामाजिक विकास को प्रभावित करती है क्योंकि विभिन्न आयु वर्गों की आवश्यकताएँ और योगदान अलग-अलग होते हैं। भारत की आयु संरचना में 0-14 वर्ष के बच्चों का प्
अभ्यास प्रश्न — Chapter 2
15 विस्तृत उत्तर सहित अभ्यास प्रश्न
Q1.जनसांख्यिकी क्या है और यह भारतीय समाज के अध्ययन में क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर:
जनसांख्यिकी वह विज्ञान है जो जनसंख्या की संख्या, वितरण, संरचना और परिवर्तन का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है। यह भारतीय समाज के अध्ययन में महत्वपूर्ण है क्योंकि जनसंख्या सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, भारत की विविध जनसंख्या समाज की जटिलताओं को समझने में मदद करती है।
व्याख्या:
जनसांख्यिकी का अर्थ है जनसंख्या का वैज्ञानिक अध्ययन। यह समाजशास्त्र का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है क्योंकि जनसंख्या की संरचना और परिवर्तन सामाजिक विकास को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, भारत में विभिन्न जाति, धर्म और भाषाएँ जनसंख्या की विविधता को दर्शाती हैं।
Q2.भारत की जनसंख्या संवृद्धि का इतिहास 1901 से 2011 तक कैसा रहा? मुख्य चरणों का उल्लेख करें।
उत्तर:
भारत की जनसंख्या संवृद्धि 1901 से 2011 तक विभिन्न चरणों से गुजरी। प्रारंभ में संवृद्धि दर धीमी थी, 1921 में महामारी और अकाल के कारण जनसंख्या में गिरावट आई। 1961 से 1981 तक संवृद्धि दर उच्चतम स्तर पर रही। बाद में संवृद्धि दर में धीरे-धीरे कमी आई। उदाहरण के लिए, 1901 में जनसंख्या 238 लाख थी जो 2011 में 1210 लाख हो गई।
व्याख्या:
1901 से 2011 तक भारत की जनसंख्या में वृद्धि हुई, लेकिन संवृद्धि दर में उतार-चढ़ाव भी देखे गए। 1921 में जनसंख्या में गिरावट महामारी और अकाल के कारण थी। 1961-1981 के बीच संवृद्धि दर अधिक थी, जिसके बाद यह कम हुई।
Q3.भारत की कुल जनसंख्या और औसत वार्षिक संवृद्धि दर के संबंध में निम्न सारणी को ध्यान से पढ़ें: वर्ष: 1901, कुल जनसंख्या: 238 लाख, औसत वार्षिक संवृद्धि दर: - वर्ष: 1961, कुल जनसंख्या: 439 लाख, औसत वार्षिक संवृद्धि दर: 1.96% वर्ष: 2011, कुल जनसंख्या: 1210 लाख, औसत वार्षिक संवृद्धि दर: 1.63% इन आंकड़ों के आधार पर यह बताएं कि 1961 से 2011 तक जनसंख्या वृद्धि की दर में क्या परिवर्तन आया और इसके कारण क्या हो सकते हैं?
उत्तर:
1961 से 2011 तक संवृद्धि दर कम हुई क्योंकि परिवार नियोजन नीतियाँ प्रभावी रहीं।
व्याख्या:
1961 में औसत वार्षिक संवृद्धि दर 1.96% थी जो 2011 में घटकर 1.63% हो गई। यह कमी परिवार नियोजन, स्वास्थ्य सुधार और सामाजिक जागरूकता के कारण हुई। इससे जनसंख्या वृद्धि की दर धीमी हुई।
Q4.जनसंख्या की आयु संरचना से 'जनसांख्यिकीय लाभांश' क्या है? इसे उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
जनसांख्यिकीय लाभांश वह स्थिति है जब कार्यशील आयु वर्ग (15-64 वर्ष) की संख्या पराश्रित आयु वर्ग की तुलना में अधिक होती है, जिससे आर्थिक विकास की संभावना बढ़ती है। उदाहरण के लिए, भारत में 2011 में एक-तिहाई जनसंख्या 15 वर्ष से कम आयु की थी, जिससे श्रमिक बल बढ़ा और विकास के अवसर बढ़े।
व्याख्या:
जनसांख्यिकीय लाभांश तब होता है जब कार्यशील आयु वर्ग की संख्या अधिक होती है और वे आर्थिक गतिविधियों में योगदान देते हैं। भारत में युवा जनसंख्या की अधिकता इसे लाभांश प्रदान करती है।
Q5.भारत की आयु संरचना में 1961 से 2026 तक 0-14 वर्ष, 15-59 वर्ष और 60 वर्ष से अधिक आयु वर्गों के प्रतिशत में क्या परिवर्तन आया है? निम्न सारणी के आधार पर समझाइए: वर्ष 1961: 0-14 वर्ष=41%, 15-59 वर्ष=53%, 60+ वर्ष=6% वर्ष 2011: 0-14 वर्ष=29%, 15-59 वर्ष=63%, 60+ वर्ष=8% वर्ष 2026 (अनुमानित): 0-14 वर्ष=23%, 15-59 वर्ष=64%, 60+ वर्ष=12%
उत्तर:
0-14 वर्ष घटा, 15-59 वर्ष और 60+ वर्ष बढ़े।
व्याख्या:
सारणी के अनुसार, 0-14 वर्ष का प्रतिशत 41% से घटकर 2026 में 23% हो गया है, जबकि 15-59 वर्ष का प्रतिशत 53% से बढ़कर 64% और 60+ वर्ष का प्रतिशत 6% से बढ़कर 12% हो गया है। यह आयु संरचना में बदलाव दर्शाता है।
Q6.भारत में स्त्री-पुरुष अनुपात क्या दर्शाता है और 1901 से 2011 तक इसके मुख्य रुझान क्या रहे?
उत्तर:
स्त्री-पुरुष अनुपात प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या को दर्शाता है। भारत में 1901 से 2011 तक यह अनुपात गिरता रहा है, हालांकि कुछ दशकों में सुधार भी हुआ। बाल स्त्री-पुरुष अनुपात में गिरावट अधिक चिंताजनक है, जो सामाजिक पूर्वाग्रह और कन्या भ्रूण हत्या को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, 1901 में अनुपात 972 था जो 2011 में 943 हो गया।
व्याख्या:
स्त्री-पुरुष अनुपात समाज की लैंगिक संरचना का सूचक है। भारत में इस अनुपात में गिरावट और बाल अनुपात में कमी सामाजिक समस्याओं का संकेत है।
Q7.भारत में 1901 से 2011 तक स्त्री-पुरुष अनुपात और बाल स्त्री-पुरुष अनुपात के परिवर्तनों को निम्न सारणी से समझें: वर्ष 1901: स्त्री-पुरुष अनुपात=972, बाल अनुपात नहीं दिया वर्ष 1961: स्त्री-पुरुष अनुपात=941, बाल अनुपात=976 वर्ष 2011: स्त्री-पुरुष अनुपात=943, बाल अनुपात=919 इन आंकड़ों से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
उत्तर:
स्त्री-पुरुष अनुपात में सुधार हुआ है, लेकिन बाल अनुपात में गिरावट आई है।
व्याख्या:
सारणी के अनुसार, 1961 से 2011 तक स्त्री-पुरुष अनुपात में थोड़ा सुधार हुआ (941 से 943), लेकिन बाल स्त्री-पुरुष अनुपात में गिरावट आई (976 से 919), जो कन्या भ्रूण हत्या और सामाजिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है।
Q8.साक्षरता दर क्या है और भारत में 1951 से 2011 तक साक्षरता दर में क्या परिवर्तन आया है?
उत्तर:
साक्षरता दर उस प्रतिशत को दर्शाती है जो 7 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में पढ़ने-लिखने में सक्षम हैं। भारत में 1951 में कुल साक्षरता दर 18.3% थी जो 2011 में बढ़कर 73% हो गई। पुरुषों की साक्षरता दर महिलाओं से अधिक रही, लेकिन महिलाओं की साक्षरता में भी सुधार हुआ। उदाहरण के लिए, 1951 में महिलाओं की साक्षरता 8.9% थी जो 2011 में 64.6% हो गई।
व्याख्या:
साक्षरता दर सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण सूचक है। भारत में पिछले दशकों में साक्षरता दर में वृद्धि हुई है, विशेषकर महिलाओं की साक्षरता में।