Chapter 1
Chapter 1 — अध्ययन नोट्स
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भारतीय संगीत का सामान्य परिचय
व्याख्याभारतीय संगीत का सामान्य परिचय
भारतीय संगीत भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है, जो मानव जीवन के हर पहलू में गहराई से जुड़ा हुआ है। संगीत को कलाओं के दो मुख्य वर्गों में बांटा गया है—ललित कलाएँ और अन्य उपयोगी कलाएँ। ललित कलाओं में संगीत, काव्य, चित्रकला, मूर्तिकला और स्थापत्य कला शामिल हैं, जिनमें संगीत को श्रेष्ठतम माना गया है। संगीत वह कला है जिसमें स्वर (ध्वनि के विभिन्न ऊँचाई वाले तत्व) और लय (ताल या समयबद्धता) के माध्यम से भावों की अभिव्यक्ति की जाती है। संगीत में तीन प्रमुख अंग होते हैं—गायन (गीत), वादन (वाद्य यंत्रों द्वारा धुन बजाना), और नृत्य (ताल और धुन के साथ भावों की अभिव्यक्ति)। "गीत, वाद्य तथा नृत्य त्रय संगीतमुच्यते" इस श्लोक के अनुसार संगीत का समग्र स्वरूप इन तीनों का संयोजन है। स्वर और लय के साथ भाषा, कविता या पद का समन्वय संगीत को एक अनूठा आकर्षण प्रदान करता है। भारतीय संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह भावनाओं, संस्कारों और आध्यात्मिकता को व्यक्त करने का माध्यम भी है। यह मनुष्य को एक-दूसरे से जोड़ता है और मनोवैज्ञानिक रूप से चित्त को एकाग्र तथा संतुलित करता है। संगीत का प्रभाव जीव-जंतु और पेड़-पौधों तक पर पड़ता है। इस प्रकार संगीत एक ऐसी कला है जो जीवन के हर क्षेत्र में उपस्थित है और मानव जीवन को समृद्ध बनाती है।
- संगीत ललित कलाओं में श्रेष्ठतम कला है।
- संगीत के तीन अंग हैं: गायन, वादन, और नृत्य।
- स्वर और लय संगीत के मूल तत्व हैं।
- संगीत भावों, संस्कारों और आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति है।
- संगीत मनोवैज्ञानिक रूप से चित्त को संतुलित करता है।
- संगीत मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
- 📌 स्वर: संगीत की मूल इकाई, ध्वनि के विभिन्न ऊँचाई वाले तत्व।
- 📌 लय: समयबद्धता या ताल, जो संगीत को गति प्रदान करता है।
- 📌 गायन: गीत या स्वर द्वारा संगीत की अभिव्यक्ति।
शास्त्रीय संगीत
व्याख्याशास्त्रीय संगीत
शास्त्रीय संगीत वह संगीत है जो शास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार निर्मित होता है। यह संगीत ध्वनि प्रधान होता है, जिसमें स्वर के उतार-चढ़ाव और गति का संतुलित प्रयोग किया जाता है। आदिकाल से लेकर वर्तमान तक विभिन्न सांगीतिक प्रयोगों का मंथन कर उन्हें निश्चित रूप दिया गया है, जिससे शास्त्रीय संगीत का विकास हुआ। शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख पद्धतियाँ हैं—हिंदुस्तानी संगीत (उत्तर भारत) और कर्नाटक संगीत (दक्षिण भारत)। दोनों पद्धतियों का आधार श्रुति (स्वरों की सूक्ष्मता) है, लेकिन स्वर, राग, ताल, भाषा और प्रस्तुति शैली में भिन्नता होती है। हिंदुस्तानी संगीत में खयाल, ध्रुपद, धमार, तराना आदि विधाएँ प्रचलित हैं, जबकि कर्नाटक संगीत में रागम्-तानम्-पल्लवी, वर्णम्, जावलि, तिल्लाना आदि विधाएँ शामिल हैं। शास्त्रीय संगीत का विकास वैदिक काल से शुरू होकर मध्यकाल और आधुनिक काल तक निरंतर होता रहा है। ऋग्वेद मंत्रों को गेय बनाकर सामवेद का संकलन भी इसी संगीत परंपरा का हिस्सा है। शास्त्रीय संगीत में गायन, वादन और नृत्य की अनेक शैलियाँ शामिल हैं, जो नियमबद्ध और सैद्धांतिक विश्लेषण के आधार पर विकसित हुई हैं। यह संगीत परंपरागत होते हुए भी समय के अनुसार नूतन आकर्षणों से युक्त रहता है।
- शास्त्रीय संगीत शास्त्रों में वर्णित नियमों पर आधारित होता है।
- मुख्य दो पद्धतियाँ: हिंदुस्तानी (उत्तर भारत) और कर्नाटक (दक्षिण भारत)।
- हिंदुस्तानी संगीत में खयाल, ध्रुपद, धमार, तराना प्रमुख हैं।
- कर्नाटक संगीत में रागम्-तानम्-पल्लवी, वर्णम्, जावलि, तिल्लाना प्रमुख हैं।
- शास्त्रीय संगीत का विकास वैदिक काल से आधुनिक काल तक होता रहा।
- संगीत की प्रस्तुति में गायन, वादन, और नृत्य शामिल हैं।
- 📌 शास्त्रीय संगीत: नियमबद्ध संगीत प्रणाली जो शास्त्रों पर आधारित हो।
- 📌 राग: स्वर समूह जो विशिष्ट भाव उत्पन्न करता है।
- 📌 ताल: संगीत की लयबद्धता।
उपशास्त्रीय संगीत
व्याख्याउपशास्त्रीय संगीत
उपशास्त्रीय संगीत वे गेय विधाएँ हैं जिनमें शास्त्रीय संगीत के कठोर नियमों की अपेक्षा रस, भाव और रंजकता को अधिक महत्व दिया जाता है। इसमें शब्दों के भावों को स्वर के अलंकरणों जैसे कण, मींड, मुक्ती, बोल-बनाव आदि के माध्यम से सुंदरता से प्रस्तुत किया जात
अभ्यास प्रश्न — Chapter 1
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.संगीत रत्नाकर के अनुसार ‘संगीत’ की परिभाषा बताइए।
उत्तर:
संगीत रत्नाकर के अनुसार संगीत वह कला है जिसमें स्वर, ताल और लय के माध्यम से मन को आनंदित किया जाता है। यह कला मनुष्य के भावों को व्यक्त करने का माध्यम है।
व्याख्या:
संगीत रत्नाकर में संगीत की परिभाषा स्वर, ताल और लय के संयोजन से मन को आनंदित करने वाली कला के रूप में दी गई है।
Q2.कर्नाटक संगीत पद्धति में प्रचलित विधाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
कर्नाटक संगीत पद्धति में मुख्यतः ध्रुपद, खयाल, वादन, भजन, कीर्तन, और भक्ति गीत जैसी विधाएँ प्रचलित हैं।
व्याख्या:
कर्नाटक संगीत में ये विधाएँ पारंपरिक रूप से प्रचलित हैं और इनके माध्यम से संगीत की विविधता और गहराई व्यक्त होती है।
Q3.हिंदुस्तानी संगीत पद्धति की प्रचलित विधाएँ बताइए।
उत्तर:
हिंदुस्तानी संगीत पद्धति की प्रचलित विधाएँ हैं: ध्रुपद, खयाल, ठुमरी, टप्पा, दादरा, भजन, कीर्तन, और ग़ज़ल।
व्याख्या:
ये विधाएँ हिंदुस्तानी संगीत की विविधता को दर्शाती हैं और प्रत्येक की अपनी विशिष्ट शैली और महत्व है।
Q4.उपशास्त्रीय संगीत की गायन शैली टप्पा की रचनाओं में अधिकांशतः किन भाषाओं के शब्दों का प्रयोग होता है?
उत्तर:
टप्पा की रचनाओं में अधिकांशतः ब्रज भाषा, पंजाबी, और अवधी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग होता है।
व्याख्या:
टप्पा शैली की रचनाएँ इन भाषाओं में होती हैं क्योंकि यह शैली मुख्यतः उत्तरी भारत के क्षेत्रों में प्रचलित है जहाँ ये भाषाएँ बोली जाती हैं।
Q5.दक्षिण भारत के पाँच राज्यों में प्रचलित किन्हीं पाँच लोकगीतों के नाम बताइए।
उत्तर:
दक्षिण भारत के पाँच राज्यों में प्रचलित लोकगीतों के नाम हैं: 1. तमिलनाडु - करकली 2. कर्नाटक - येल्लमेली 3. आंध्र प्रदेश - बोम्मलाट्टू 4. केरल - थिरुवाथिरा 5. तेलंगाना - पल्ला गीत
व्याख्या:
प्रत्येक राज्य की अपनी विशिष्ट लोकगीत शैली होती है जो उनकी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।
Q6.लोक संगीत का मूल उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
लोक संगीत का मूल उद्देश्य समाज के जीवन, परंपराओं, रीति-रिवाजों, और भावनाओं को संगीत के माध्यम से व्यक्त करना तथा मनोरंजन और सामाजिक एकता को बढ़ावा देना है।
व्याख्या:
लोक संगीत समाज की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करता है और लोगों के बीच भावनात्मक संबंध स्थापित करता है।
Q7.टुमरी के प्रचलित प्रमुख दो रूप कौन-से हैं?
उत्तर:
टुमरी के प्रचलित प्रमुख दो रूप हैं: 1. पुरानी टुमरी 2. नई टुमरी
व्याख्या:
पुरानी टुमरी में पारंपरिक लोक शैली अधिक होती है जबकि नई टुमरी में शास्त्रीय संगीत के तत्व अधिक होते हैं।
Q8.दक्षिण भारतीय लोक संगीत की प्रमुख तालें कौन-सी हैं?
उत्तर:
दक्षिण भारतीय लोक संगीत की प्रमुख तालें हैं: 1. आदि ताल 2. त्रिताल 3. खंडताल 4. झप ताल 5. रूपक ताल
व्याख्या:
ये तालें दक्षिण भारतीय संगीत में लयबद्धता और तालबद्धता के लिए उपयोग की जाती हैं।
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Sangeet · Class 11