Historyकक्षा 12धर्म और सांस्कृतिक ग्रंथ (लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक)हिंदी

धर्म और सांस्कृतिक ग्रंथ (लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक) का इतिहास

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 2 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

धर्म और सांस्कृतिक ग्रंथ (लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक) का इतिहास

धर्म और सांस्कृतिक ग्रंथ (लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक) भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण अध्याय हैं। इस काल में धार्मिक विश्वासों और ग्रंथों ने सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया।

धार्मिक विश्वासों का गंगा-जमुनी स्वरूप

आठवीं से अठारहवीं सदी के दौरान भारतीय धार्मिक विश्वासों में गहरा समन्वय हुआ। इस काल में विष्णु, शिव, और देवी की उपासना व्यापक रूप से फैली। ब्राह्मणीय विचारधारा ने पौराणिक ग्रंथों के माध्यम से धार्मिक ज्ञान का प्रचार किया। साथ ही, लोकपरंपराओं और स्थानीय देवी-देवताओं को भी मुख्यधारा में शामिल किया गया। उदाहरण के लिए, पुरी के जगन्नाथ को विष्णु का स्वरूप माना गया, जहाँ स्थानीय जनजाति के कलाकार उनकी मूर्तियाँ बनाते थे। इस तरह, धार्मिक आस्था ने विभिन्न सामाजिक वर्गों को जोड़ने का काम किया।

ब्राह्मणीय और लोकपरंपराओं का संवाद

इस काल की एक खास विशेषता थी ब्राह्मणीय संस्कृत-पौराणिक परंपरा और लोकपरंपराओं के बीच संवाद। ब्राह्मणों ने स्थानीय देवी-देवताओं को वैदिक देवताओं के रूप में स्वीकार कर उन्हें नया रूप दिया। इससे धार्मिक विविधता और सहिष्णुता बढ़ी।

विशेषताब्राह्मणीय परंपरालोकपरंपरा
भाषासंस्कृतस्थानीय भाषाएँ
देवताविष्णु, शिव, देवीस्थानीय देवी-देवता
पूजा पद्धतिवैदिक, पौराणिकतांत्रिक, लोक अनुष्ठान

इस तालिका से स्पष्ट होता है कि दोनों परंपराओं ने मिलकर धार्मिक जीवन को समृद्ध किया।

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धार्मिक ग्रंथों का संकलन और संरक्षण

ब्राह्मणों ने पौराणिक ग्रंथों का संकलन किया जो सरल संस्कृत छंदों में थे। ये ग्रंथ न केवल ब्राह्मणों के लिए, बल्कि स्त्रियों और शूद्रों के लिए भी स्वीकार्य थे। इससे धार्मिक ज्ञान का प्रसार हुआ। ग्रंथों में विष्णु, शिव, देवी की कथाएँ और भक्ति गीत शामिल थे। इस प्रकार, ग्रंथों ने धार्मिक आस्था और सामाजिक जीवन में स्थिरता लाई।

भक्ति परंपरा का विकास

इस काल में भक्ति परंपरा का विकास हुआ, जिसमें भक्तजन अपने इष्टदेव की प्रेमपूर्वक आराधना करते थे। भक्ति आंदोलन ने सामाजिक भेदभाव को कम किया और सभी वर्गों को धार्मिक जीवन में शामिल किया। भक्त कवियों ने लोकभाषाओं में भक्ति गीत रचे, जिससे आम जनता तक धार्मिक संदेश पहुँचा। भक्ति ने विष्णु, शिव और देवी की महत्ता को और बढ़ाया।

धार्मिक विविधता और सहिष्णुता

आठवीं से अठारहवीं सदी तक धार्मिक पद्धतियों में भेद और संघर्ष भी थे, जैसे वैदिक परंपरा और तांत्रिक पूजा के बीच। फिर भी, यह काल धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक बना। विभिन्न धार्मिक विश्वासों ने एक-दूसरे के साथ संवाद किया और उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध किया। इस काल में वैदिक देवताओं की भूमिका गौण हो गई, जबकि विष्णु, शिव और देवी की महत्ता बढ़ी।

स्थानीय देवी-देवताओं का पौराणिक स्वरूप में समावेश

स्थानीय देवी-देवताओं को पौराणिक परंपरा में देवी के रूपों जैसे लक्ष्मी, पार्वती के रूप में स्वीकार किया गया। इससे धार्मिक आस्था का विस्तार हुआ। उदाहरण के लिए, पुरी के जगन्नाथ को विष्णु का स्वरूप माना गया। स्थानीय कलाकार लकड़ी से उनकी प्रतिमा बनाते थे। इस प्रकार, धार्मिक ग्रंथ और मूर्तिकला दोनों ने स्थानीय और पौराणिक परंपराओं को जोड़ा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धर्म और सांस्कृतिक ग्रंथ (लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक) में प्रमुख देवता कौन थे?

इस काल में विष्णु, शिव और देवी प्रमुख देवता थे जिनकी उपासना व्यापक रूप से की जाती थी।

भक्ति परंपरा का इस काल में क्या महत्व था?

भक्ति परंपरा ने सभी सामाजिक वर्गों को धार्मिक जीवन में शामिल किया और प्रेमभाव से आराधना को बढ़ावा दिया।

ब्राह्मणीय और लोकपरंपराओं के बीच संवाद कैसे हुआ?

ब्राह्मणों ने स्थानीय देवी-देवताओं को पौराणिक परंपरा में शामिल किया जिससे धार्मिक सहिष्णुता बढ़ी।

पुस्तकों और ग्रंथों का इस काल में क्या योगदान था?

पौराणिक ग्रंथों का संकलन और संरक्षण हुआ, जिससे धार्मिक ज्ञान का प्रसार आसान हुआ।

स्थानीय देवी-देवताओं को पौराणिक परंपरा में कैसे स्वीकार किया गया?

स्थानीय देवताओं को देवी के रूपों जैसे लक्ष्मी, पार्वती के रूप में स्वीकार कर उनकी उपासना का विस्तार किया गया।

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