Chapter 2
Chapter 2 — अध्ययन नोट्स
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धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा-जमुनी बनावट
व्याख्याधार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा-जमुनी बनावट
आठवीं से अठारहवीं सदी के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में धार्मिक विश्वासों और आचरणों में गहरा परिवर्तन और समन्वय देखने को मिला। इस काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि साहित्य और मूर्तिकला दोनों में विभिन्न देवी-देवताओं की उपासना और उनकी विविध अभिव्यक्तियाँ देखने को मिलीं। विष्णु, शिव, देवी आदि देवताओं की आराधना न केवल जारी रही बल्कि और अधिक विस्तृत हुई। इतिहासकार इस विकास को दो मुख्य प्रक्रियाओं से जोड़ते हैं। पहली प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की थी, जो पौराणिक ग्रंथों के संकलन और संरक्षण के माध्यम से हुई। ये ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में थे, जो वैदिक विद्या से अनभिज्ञ स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी स्वीकार्य थे। दूसरी प्रक्रिया में स्थानीय स्त्री, शूद्र और अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं को ब्राह्मणों द्वारा स्वीकार कर उन्हें नया रूप दिया गया। इस प्रकार उपमहाद्वीप में अनेक धार्मिक विचारधाराएँ “महान” संस्कृत-पौराणिक परंपरा और “लघु” लोकपरंपराओं के बीच निरंतर संवाद का परिणाम थीं। उदाहरण के लिए, पुरी के जगन्नाथ को विष्णु के एक स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया गया, जहाँ स्थानीय जनजाति के विशेषज्ञ लकड़ी से उनकी प्रतिमा बनाते थे। इसी प्रकार देवी की उपासना भी स्थानीय देवियों को पौराणिक परंपरा में देवी के स्वरूपों जैसे लक्ष्मी या पार्वती के रूप में स्वीकार कर विस्तारित हुई। हालांकि विभिन्न धार्मिक पद्धतियों के बीच भेद और संघर्ष भी थे, जैसे वैदिक परंपरा के समर्थकों और तांत्रिक पूजा पद्धति के अनुयायियों के बीच, फिर भी इनका समग्र प्रभाव उपमहाद्वीप की धार्मिक विविधता और सहिष्णुता को दर्शाता है। इस काल में वैदिक देवताओं की भूमिका गौण हो गई, जबकि विष्णु, शिव और देवी की महत्ता बढ़ी। भक्ति परंपरा इसी संदर्भ में विकसित हुई, जहाँ भक्तजन अपने इष्टदेव की आराधना प्रेमभाव से करते थे।
- आठवीं से अठारहवीं सदी में धार्मिक विश्वासों में गहरा समन्वय और विस्तार हुआ।
- ब्राह्मणीय पौराणिक परंपरा और स्थानीय लोकपरंपराओं के बीच संवाद हुआ।
- जगन्नाथ को विष्णु के स्वरूप के रूप में स्वीकार किया गया।
- देवी की उपासना में तांत्रिक पद्धति का प्रभाव और स्थानीय देवियों का समावेश हुआ।
- वैदिक देवताओं की भूमिका गौण हुई, विष्णु, शिव और देवी की महत्ता बढ़ी।
- धार्मिक भेदों के बावजूद सहिष्णुता और विविधता बनी रही।
- 📌 महान परंपरा: समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों द्वारा पालन की जाने वाली संस्कृत-पौराणिक धार्मिक परंपरा।
- 📌 लघु परंपरा: स्थानीय और क्षेत्रीय धार्मिक आस्थाएँ जो महान परंपरा से भिन्न होती हैं।
- 📌 तांत्रिक पूजा: एक धार्मिक पद्धति जिसमें वर्ग और वर्ण के भेद की अवहेलना होती है।
उपासना की कविताएँ
व्याख्याउपासना की कविताएँ
प्रारंभिक भक्ति परंपरा छठी शताब्दी के आसपास तमिलनाडु में अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों के नेतृत्व में विकसित हुई। ये संत कवि अपने ईष्ट की स्तुति में भजन गाते हुए विभिन्न स्थानों की यात्रा करते थे। उनकी कविताएँ क्षेत्रीय भाषाओं में थीं और आम जनता के बीच लोकप्रिय हुईं। भक्ति परंपरा ने सामाजिक विविधता को स्वीकार किया, जिसमें ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और अस्पृश्य जाति के लोग शामिल थे। अलवारों की रचनाओं को तमिल वेद के समान महत्व दिया गया। स्त्रियों की उपस्थिति भी इस परंपरा की विशिष्टता थी, जैसे अंडाल और करइक्काल अम्मइयार। अंडाल ने विष्णु के प्रति प्रेमभावना को गीतों में व्यक्त किया, जबकि करइक्काल अम्मइयार ने कठोर तपस्या की। भक्ति साहित्य का संकलन दसवीं शताब्दी तक नलयिरादिव्यप्रबंधम् और तवरम जैसे ग्रंथों में किया गया। इस काल में भक्ति परंपरा ने जाति व्यवस्था और ब्राह्मण प्रभुत्व की आलोचना भी की। इसके अतिरिक्त, राज्य और भक्ति परंपरा के बीच घनिष्ठ संबंध विकसित हुए, जहाँ चोल सम्राटों ने विष्णु और शिव के मंदिरों का निर्माण कर भक्ति को समर्थन दिया। नयनार और अलवार संतों की मूर्तियाँ मंदिरों में स्थापित की गईं और भक्तों द्वारा पूजा की गई। इस प्रकार भक्ति परंपरा ने धार्मिक आस्था को जनसामान्य तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- अलवार और नयनार संतों ने क्षेत्रीय भाषाओं में भक्ति गीतों की रचना की।
- भक्ति परंपरा ने सामाजिक विविधता और स्त्रियों को स्वीकार किया।
- भक्ति साहित्य का संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् और तवरम में हुआ।
- जाति प्रथा और ब्राह्मण प्रभुत्व की आलोचना हुई।
- चोल राजाओं ने भक्ति परंपरा और मंदिर निर्माण को समर्थन दिया।
- संतों की मूर्तियाँ मंदिरों में स्थापित की गईं।
- 📌 अलवार: तमिलनाडु के विष्णु भक्त संत।
- 📌 नयनार: तमिलनाडु के शिव भक्त संत।
- 📌 नलयिरादिव्यप्रबंधम्: अलवारों की चार हजार पावन रचनाओं का संकलन।
राज्य के साथ संबंध
व्याख्याराज्य के साथ संबंध
तमिल क्षेत्र में छठी से नवीं शताब्दी के दौरान पल्लव और पांड्य राज्यों का उद्भव हुआ। इस क्षेत्र में बौद्ध और जैन धर्म भी मौजूद थे, जिन्हें व्यापारी और शिल्पी वर्ग का समर्थन प्राप्त था, लेकिन राजकीय संरक्षण सीमित था। तमिल भक्ति रचनाओं में बौद्ध और जैन
अभ्यास प्रश्न — Chapter 2
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.अवधारणा 10 – परौती (ञ) पाठ के अनुसार "परौती" शब्द से क्या तात्पर्य है
उत्तर:
वह जमीन जिस पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती है
Q2.अवधारणा 9 - चांदी का बहाव (झ) एशिया में भारी मात्रा में चांदी कैसे आई?
उत्तर:
भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं के लिए किए जाने वाले भुगतान के द्वारा
Q3.अवधारणा 8 - अबुल फजल की आइन ए अकबरी (ज) आईन ए अकबरी को किस रूप में संकलित किया गया था?
उत्तर:
उपर्युक्त सभी
Q4.अवधारणा 7 - चांदी का बहाव (छ) इटली मुसाफिर जोवानी कारैरी कब भारत से होकर गुजरा था?
उत्तर:
1690
Q5.अवधारणा 6 - भू राजस्व प्रणाली (च) भू राजस्व के इंतजाम का पहला चरण क्या था?
उत्तर:
कर निर्धारण
Q6.अवधारणा 5 - जमींदार (ड़) जमींदारों की व्यक्तिगत जमीन को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
मिल्कियत
Q7.अवधारणा 4 - जंगल और कबीले (घ) समसामयिक रचनाएं जंगल में रहने वालों के लिए कौन सा शब्द प्रयोग करती हैं?
उत्तर:
जंगली
Q8.अवधारणा 3 - कृषि समाज में महिलाएं (ग) पाठ के अनुसार कृषि में महिलाओं का क्या योगदान था?
उत्तर:
महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती थीं
Bharatiya Itihas ke kuchh Vishay-II के सभी 4 अध्याय
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