Sanskritकक्षा 9सन्धिहिंदी

सन्धि | Class 9 Sanskrit Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 6 मिनट का पठन

सन्धि – this guide gives you a concise, exam-ready overview of सन्धि from Class 9 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

2. व्यञ्जन (हल्) सन्धि

व्यञ्जन सन्धि वह वर्ण परिवर्तन है जो व्यञ्जन वर्णों के समीप आने पर होता है। जब दो व्यञ्जन वर्ण बिना व्यवधान के मिलते हैं या व्यञ्जन के पश्चात् स्वर आता है, तो व्यञ्जन के स्वरूप में परिवर्तन होता है जिससे उच्चारण सरल और प्रवाही बनता है। व्यञ्जन सन्धि के कई प्रकार हैं:

(i) श्चुत्व (स्तो: श्चुना श्चु:): 'स्' या 'त' वर्ग के व्यञ्जनों का 'श्' या 'च' वर्ग के साथ योग होने पर 'स्' का 'श्' और 'त' वर्ग का 'च' वर्ग में परिवर्तन होता है। उदाहरण: मनस् + चलति = मनश्चलति।

(ii) ष्टुत्व (ष्टुना ष्टु:): 'स्' या 'त' वर्ग का 'ष्' या 'ट' वर्ग के साथ योग होने पर 'स्' का 'ष्' और 'त' वर्ग का 'ट' वर्ग हो जाता है। उदाहरण: रामस् + षष्ठः = रामषष्ठः।

(iii) जश्त्व (झलां जशोऽन्ते): पद के अंत में स्थित झल् के स्थान पर जश् हो जाता है। जैसे वाक् + ईशः = वागीशः।

(iv) चत्व (खरि च): वर्गों के द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ वर्ग के बाद प्रथम या द्वितीय वर्ग या श, ष, स आने पर पहले वर्ग का प्रथम वर्ग हो जाता है। उदाहरण: सद् + कार: = सत्कार:।

(v) अनुस्वार (मोऽनुस्वार:): पद के अंत में 'म्' हो और उसके बाद व्यञ्जन आए तो 'म्' का अनुस्वार (ं) हो जाता है। उदाहरण: हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे।

(vi) परसवर्ण (अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण:): अनुस्वार के बाद वर्गीय व्यञ्जन आने पर अनुस्वार के स्थान पर आगे वाले वर्ण का पञ्चम वर्ण आता है। उदाहरण: सं + कल्प: = सड्कल्प:।

(vii) लत्व (तोर्लि): 'त' वर्ग के बाद 'ल्' आने पर 'त' वर्ग के वर्ण 'ल्' हो जाते हैं। उदाहरण: तत् + लीन: = तल्लीन:।

(viii) छत्व (शाश्छोऽटि): 'श्' के पूर्व पदानत में वर्ग का प्रथम, द्वितीय, तृतीय या चतुर्थ वर्ण या र्, ल्, व्, ह् हो तो 'श्' का स्थान 'छ्' हो जाता है। उदाहरण: एतत् + शोभनम् = एतच्छोभनम्।

(ix) 'च्' का आगम (छै च): यदि ह्रस्व स्वर के पश्चात् 'छ्' आए तो 'छ्' के पूर्व 'च्' का आगम होता है। उदाहरण: तरु + छाया = तरुच्छाया।

(x) 'र' का लोप तथा पूर्व स्वर का दीर्घ होना (रो रि): यदि 'र' के बाद 'र' हो तो पहले 'र' का लोप हो जाता है तथा पूर्व स्वर दीर्घ हो जाता है। उदाहरण: स्वर + राज्यम् = स्वाराज्यम्।

(xi) न् का ण् होना: ऋ, र या ष् के पश्चात् 'न' आने पर 'न' 'ण' हो जाता है। उदाहरण: कृष्ण।

व्यञ्जन सन्धि के ये नियम संस्कृत भाषा के व्याकरण में वर्णों के सही मेल और उच्चारण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

🧪 Activity: अभ्यासकार्यम् में व्यञ्जन सन्धि के नियमों पर आधारित प्रश्न जैसे सन्धि विच्छेद, सन्धिपद निर्माण आदि दिए गए हैं।

🔗 Connection: व्यञ्जन सन्धि के बाद विसर्ग सन्धि के नियमों का अध्ययन किया जाएगा, जो विसर्ग के पश्चात् वर्णों के परिवर्तन को समझाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्र. 1. अधोलिखितेषु समुचितं सन्धिपदं चित्वा लिखत— यथा— चन्द्र + उदय: = चन्द्रोदय:/ चन्द्रौदय: / चन्द्रुदय: उत्तरम्— चन्द्रोदय: i) मातृ + ऋणम् = मातर्णम् / मातृणम् / मातृणम् - ... ii) यदि + अपि = यद्यपि / यद्यपि / यद्यापि - ... iii) मत + ऐक्यम् = मतेक्यम् / मतैक्यम् / मत्येकम् - ... iv) भानु + उदय: = भान्वुदय: / भानुदय: / भानूदय: - ... v) भौ + उक: = भावक: / भाविक: / भावुक: - ... vi) विष्णो + इह = विष्णुविह / विष्णुवेह / विष्णोह - ... vii) सर्वे + अत्र = सर्वे अत्र / सर्वेऽत्र / सर्व अत्र - ... viii) गज्जा + इव = गज्ज्गैव / गज्ज्गोव / गज्ज्गेव - ...

i) मातृ + ऋणम् = मातर्णम् (यण सन्धि) मातृ के 'ऋ' स्वर के स्थान पर 'र्' हो जाता है और ऋणम् जुड़कर मातर्णम् बनता है।

ii) यदि + अपि = यद्यपि (तत्पुरुष सन्धि) यदि के 'इ' स्वर के स्थान पर 'य' जुड़कर यद्यपि बनता है।

iii) मत + ऐक्यम् = मतैक्यम् (वृद्धि सन्धि) मत् के 'अ' और ऐक्यम् के 'ऐ' मिलकर 'ऐ' दीर्घ स्वर बनता है।

iv) भानु + उदय: = भानूदय: (दीर्घ सन्धि) भानु के 'अ' और उदय: के 'उ' मिलकर 'ऊ' दीर्घ स्वर बनता है।

v) भौ + उक: = भावुक: (गुण सन्धि) भौ के 'औ' और उक: के 'उ' मिलकर 'आ' दीर्घ स्वर बनता है।

प्र. 2. अधोलिखितेषु सन्धिविच्छेदं रूपं पूर्यित्वा सन्धे: नाम अपि लिखत— यथा— अन्वेषणम् अनु + एषणम् - यण सन्धि— i) तवैव = ... + एव = ... ii) नदीव = नदी + ... = ... iii) केऽपि = ... + अपि = ... iv) अत्याचार: = अति + ... = ... v) शयनम् = ... + अनम् = ... vi) यथोचितम् = यथा + ... = ...

i) तवैव = तत् + एव = तत् + एव = तवैव (विसर्ग सन्धि)

ii) नदीव = नदी + एव = नदी + एव = नदीव (संधि विछेद)

iii) केऽपि = कः + अपि = कः + अपि = केऽपि (अग्रह सन्धि)

iv) अत्याचार: = अति + आचार: = अति + आचार: = अत्याचार: (दीर्घ सन्धि)

v) शयनम् = शय + अनम् = शय + अनम् = शयनम् (संधि विछेद)

vi) यथोचितम् = यथा + उचितम् = यथा + उचितम् = यथोचितम् (संधि)

प्र. 3. यत्र प्रकृति भाव - सन्धि: अस्ति तत्पदं ( √ ) इति चिह्नेन चिह्नीकुरुत यत्र च नास्ति तत्पदं ( × ) इति चिह्नेन चिह्नीकुरुत— i) नदी एते ( ) ii) वृक्षे अपि ( ) iii) मुनी एतौ ( ) iv) साधू उपरि गच्छत: ( ) v) सखी एषा ( ) vi) मुनी इच्छत: ( ) vii) सभायाम् कवी आगतौ ( ) viii) नदी इयं वहति ( )

i) नदी एते (√) - 'नदी' + 'एते' में यण सन्धि है। ii) वृक्षे अपि (√) - 'वृक्षे' + 'अपि' में सन्धि है। iii) मुनी एतौ (×) - 'मुनी' + 'एतौ' में सन्धि नहीं है। iv) साधू उपरि गच्छत: (√) - 'उपरि' + 'गच्छत:' में सन्धि है। v) सखी एषा (×) - 'सखी' + 'एषा' में सन्धि नहीं है। vi) मुनी इच्छत: (√) - 'मुनी' + 'इच्छत:' में सन्धि है। vii) सभायाम् कवी आगतौ (√) - 'सभायाम्' + 'कवी' में सन्धि है। viii) नदी इयं वहति (×) - 'नदी' + 'इयं' में सन्धि नहीं है।

प्र. 4. अधोलिखितवाक्येषु स्थूलपदेषु सन्धिविच्छेदं कृत्वा लिखत— i) कवीन्द्र: अद्य नवीनां कवितां श्रावयति। ii) कंस: सर्वेषु अत्याचारम् करोति स्म। iii) गङ्गा गङ्गति यो ब्रूयात् योजनानां शतैरपि स: पापेभ्य: विमुच्यते। iv) यथा राम: पठति तथैव श्याम: पठति। v) वानरा: सर्वत्र वृक्षेऽपि कूर्दन्ति।

i) कवीन्द्र: अद्य नवीनां कवितां श्रावयति। सन्धिविच्छेद: कवीन्द्र: = कवी + इन्द्र: (समास) अद्य = अद्य नवीनां = नवीन + आं कवितां = कविता + आं श्रावयति = श्रावयति

ii) कंस: सर्वेषु अत्याचारम् करोति स्म। कंस: = कंस + : (विसर्ग) सर्वेषु = सर्व + एषु अत्याचारम् = अति + आचारम् करोति = करोति स्म = स्म

iii) गङ्गा गङ्गति यो ब्रूयात् योजनानां शतैरपि स: पापेभ्य: विमुच्यते। गङ्गा = गङ्गा गङ्गति = गङ्ग + अति यो = यो ब्रूयात् = ब्रूयात् योजनानां = योजना + अनां शतैरपि = शत + ऐरपि स: = स + : पापेभ्य: = पाप + एभ

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