Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
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सन्धि
परिभाषासन्धि
संस्कृत व्याकरण में 'सन्धि' शब्द का अर्थ है वर्ण विकार, अर्थात् वर्णों के मेल से उत्पन्न होने वाला परिवर्तन। यह परिवर्तन दो पदों या एक पद के दो वर्णों के बीच बिना किसी व्यवधान के समीपता में होता है। जब दो शब्द या एक शब्द के दो वर्ण एक-दूसरे के समीप आते हैं, तो उच्चारण को सरल बनाने के लिए उनमें परिवर्तन होता है, जिसे सन्धि कहते हैं। उदाहरण के लिए, 'विद्या' + 'आलय:' मिलकर 'विद्यालय:' बन जाता है, जहाँ 'आ' + 'आ' मिलकर एक दीर्घ 'आ' हो जाता है। सन्धि के मुख्य तीन प्रकार होते हैं: स्वर सन्धि (अच् सन्धि), व्यञ्जन सन्धि (हल् सन्धि), और विसर्ग सन्धि। प्रत्येक प्रकार के अंतर्गत विभिन्न नियम और उपविभाग होते हैं जो वर्णों के मेल को नियंत्रित करते हैं। सन्धि का अध्ययन संस्कृत भाषा के व्याकरण में अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शब्दों के सही उच्चारण और लेखन के लिए आवश्यक है।
- सन्धि का अर्थ है वर्णों का मेल होकर परिवर्तन होना।
- यह परिवर्तन दो पदों या एक पद के दो वर्णों के बीच होता है।
- सन्धि के तीन मुख्य प्रकार हैं: स्वर सन्धि, व्यञ्जन सन्धि, और विसर्ग सन्धि।
- सन्धि से उच्चारण सरल और प्रवाही बनता है।
- सन्धि नियम संस्कृत व्याकरण की आधारशिला हैं।
- 📌 सन्धि: वर्णों के मेल से उत्पन्न परिवर्तन
- 📌 अच् सन्धि: स्वर वर्णों की सन्धि
- 📌 हल् सन्धि: व्यञ्जन वर्णों की सन्धि
1. स्वर (अच्) सन्धि
व्याख्या1. स्वर (अच्) सन्धि
स्वर सन्धि वह वर्ण विकार है जो दो स्वर वर्णों की अत्यंत समीपता के कारण होता है। जब दो स्वर एक-दूसरे के समीप आते हैं, तो उच्चारण को सरल बनाने के लिए उनमें परिवर्तन होता है। स्वर सन्धि के पाँच मुख्य प्रकार होते हैं: दीर्घ सन्धि, गुण सन्धि, वृद्धि सन्धि, यण् सन्धि, और अयादि सन्धि। (i) दीर्घ सन्धि (अक: सवर्ण दीर्घ:): यदि हृस्व या दीर्घ अ, इ, उ तथा ऋ स्वर के पश्चात् हृस्व या दीर्घ अ, इ, उ या ऋ स्वर आएँ तो दोनों मिलकर क्रमश: आ, ई, ऊ तथा ऋ हो जाते हैं। उदाहरण: पुस्तक + आलय: = पुस्तकालय:। (ii) गुण सन्धि (आद् गुण:): यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'इ' या 'ई' आए तो दोनों के स्थान पर 'ए' हो जाता है। इसी प्रकार 'अ' या 'आ' के बाद 'उ' या 'ऊ' आए तो 'ओ' हो जाता है। 'अ' या 'आ' के बाद 'ऋ' आए तो 'अर्' हो जाता है। उदाहरण: उप + इन्द्र: = उपेन्द्र:। (iii) वृद्धि सन्धि (वृद्धिरेचि): यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'ए' या 'ऐ' आए तो 'ऐ' हो जाता है। यदि 'अ' या 'आ' के बाद 'ओ' या 'औ' आए तो 'औ' हो जाता है। उदाहरण: मम + एव = ममैव। (iv) यण् सन्धि (इको यणचि): यदि इ, उ, ऋ, लृ के बाद कोई असमान स्वर आए तो इ को य्, उ को व्, ऋ को र्, तथा लृ को ल् आदेश हो जाता है। उदाहरण: यदि + अपि = यद्यपि। (v) अयादि सन्धि (एचोऽयवायावः): जब ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई स्वर आए तो 'ए' को अय, 'ऐ' को आय, 'ओ' को अव्, तथा 'औ' को आव् आदेश हो जाता है। उदाहरण: ने + अनम् = नयनम्। इसके अतिरिक्त प्रकृतिभाव और पररूप सन्धि जैसे नियम भी स्वर सन्धि में आते हैं जो विशेष परिस्थितियों में सन्धि को रोकते या बदलते हैं। स्वर सन्धि के नियमों को समझना संस्कृत भाषा के सही उच्चारण और लेखन के लिए आवश्यक है। **Table on page 2 (11×3)** | दैत्य + अरिः | = | दैत्यारिः: | | --- | --- | --- | | च + अपि | = | चापि | | विद्या + अर्थी | = | विद्यार्थी | | गिरि + इन्द्र | = | गिरीन्द्र: | | कपि + ईशः | = | कपीशः: | | मही + ईशः | = | महीशः: | | नदी + ईशः | = | नदीशः: | | लक्ष्मी + ईश्वरः | = | लक्ष्मीश्वर: | | सु + उक्ति: | = | सूक्ति: | | भानु + उदयः | = | भानूदयः: | | पितृ + ऋणम् | = | पितृणम् | **Table on page 2 (7×3)** | अ/आ + इ/ई | = | ए | | --- | --- | --- | | उप + इन्द्र: | = | उपेन्द्र: | | देव + इन्द्र: | = | देवेन्द्र: | | गण + ईशः | = | गणेशः: | | महा + ईशः | = | महेशः: | | नर + ईशः | = | नरेशः: | | सुर + ईशः | = | सुरेशः: |
- स्वर सन्धि दो स्वर वर्णों के समीप आने पर होती है।
- दीर्घ सन्धि में समान स्वरों का दीर्घ स्वर बनता है।
- गुण सन्धि में 'अ' या 'आ' के बाद 'इ', 'ई', 'उ', 'ऊ' स्वर गुण रूप में बदलते हैं।
- वृद्धि सन्धि में 'अ' या 'आ' के बाद 'ए', 'ऐ', 'ओ', 'औ' स्वर वृद्धि रूप में बदलते हैं।
- यण् सन्धि में इ, उ, ऋ, लृ के बाद असमान स्वर आने पर यण् आदेश होता है।
- अयादि सन्धि में ए, ऐ, ओ, औ के बाद स्वर आने पर विशेष परिवर्तन होते हैं।
- 📌 दीर्घ सन्धि: समान स्वरों का दीर्घ स्वर बनना
- 📌 गुण सन्धि: 'अ' या 'आ' के बाद 'इ', 'ई', 'उ', 'ऊ' का 'ए', 'ओ' में परिवर्तन
- 📌 वृद्धि सन्धि: 'अ' या 'आ' के बाद 'ए', 'ऐ', 'ओ', 'औ' का 'ऐ', 'औ' में परिवर्तन
प्रकृतिभाव एवं पररूप सन्धि
अवधारणाप्रकृतिभाव एवं पररूप सन्धि
प्रकृतिभाव का अर्थ है सन्धि नियम लागू होने के बावजूद वर्णों में कोई परिवर्तन न होना, अर्थात् वर्णों को उनकी मूल प्रकृति में ही बनाए रखना। यह तब होता है जब कोई वर्ण प्लुत (दीर्घ) या प्रगृह्य (विशेष द्विवचन रूप) हो। उदाहरण के लिए, कवी + इच्छत: में कवी
अभ्यास प्रश्न — Chapter 3
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.प्र. 1. अधोलिखितेषु समुचितं सन्धिपदं चित्वा लिखत— यथा— चन्द्र + उदय: = चन्द्रोदय:/ चन्द्रौदय: / चन्द्रुदय: उत्तरम्— चन्द्रोदय: i) मातृ + ऋणम् = मातर्णम् / मातृणम् / मातृणम् - ... ii) यदि + अपि = यद्यपि / यद्यपि / यद्यापि - ... iii) मत + ऐक्यम् = मतेक्यम् / मतैक्यम् / मत्येकम् - ... iv) भानु + उदय: = भान्वुदय: / भानुदय: / भानूदय: - ... v) भौ + उक: = भावक: / भाविक: / भावुक: - ... vi) विष्णो + इह = विष्णुविह / विष्णुवेह / विष्णोह - ... vii) सर्वे + अत्र = सर्वे अत्र / सर्वेऽत्र / सर्व अत्र - ... viii) गज्जा + इव = गज्ज्गैव / गज्ज्गोव / गज्ज्गेव - ...
उत्तर:
i) मातृ + ऋणम् = मातर्णम् (यण सन्धि) मातृ के 'ऋ' स्वर के स्थान पर 'र्' हो जाता है और ऋणम् जुड़कर मातर्णम् बनता है। ii) यदि + अपि = यद्यपि (तत्पुरुष सन्धि) यदि के 'इ' स्वर के स्थान पर 'य' जुड़कर यद्यपि बनता है। iii) मत + ऐक्यम् = मतैक्यम् (वृद्धि सन्धि) मत् के 'अ' और ऐक्यम् के 'ऐ' मिलकर 'ऐ' दीर्घ स्वर बनता है। iv) भानु + उदय: = भानूदय: (दीर्घ सन्धि) भानु के 'अ' और उदय: के 'उ' मिलकर 'ऊ' दीर्घ स्वर बनता है। v) भौ + उक: = भावुक: (गुण सन्धि) भौ के 'औ' और उक: के 'उ' मिलकर 'आ' दीर्घ स्वर बनता है। vi) विष्णो + इह = विष्णुविह (यण सन्धि) विष्णो के 'ओ' और इह के 'इ' मिलकर 'उ' स्वर बनता है। vii) सर्वे + अत्र = सर्वेऽत्र (अग्रह सन्धि) सर्वे और अत्र के बीच 'ऽ' लगाकर सर्वेऽत्र बनता है। viii) गज्जा + इव = गज्ज्गैव (यण सन्धि) गज्जा के 'अ' और इव के 'इ' मिलकर 'ऐ' स्वर बनता है।
व्याख्या:
प्रत्येक युग्म में सन्धि के नियमों के अनुसार स्वर या व्यंजन परिवर्तन होता है। उदाहरण स्वरूप यण सन्धि में 'इ' या 'ई' के स्थान पर 'य' जुड़ता है, दीर्घ सन्धि में दो स्वर मिलकर दीर्घ स्वर बनाते हैं, गुण सन्धि में स्वर गुणाकार होता है, आदि। उपर्युक्त उदाहरणों में इन नियमों का पालन करते हुए सही सन्धिपद बनाए गए हैं।
Q2.प्र. 2. अधोलिखितेषु सन्धिविच्छेदं रूपं पूर्यित्वा सन्धे: नाम अपि लिखत— यथा— अन्वेषणम् अनु + एषणम् - यण सन्धि— i) तवैव = ... + एव = ... ii) नदीव = नदी + ... = ... iii) केऽपि = ... + अपि = ... iv) अत्याचार: = अति + ... = ... v) शयनम् = ... + अनम् = ... vi) यथोचितम् = यथा + ... = ...
उत्तर:
i) तवैव = तत् + एव = तत् + एव = तवैव (विसर्ग सन्धि) ii) नदीव = नदी + एव = नदी + एव = नदीव (संधि विछेद) iii) केऽपि = कः + अपि = कः + अपि = केऽपि (अग्रह सन्धि) iv) अत्याचार: = अति + आचार: = अति + आचार: = अत्याचार: (दीर्घ सन्धि) v) शयनम् = शय + अनम् = शय + अनम् = शयनम् (संधि विछेद) vi) यथोचितम् = यथा + उचितम् = यथा + उचितम् = यथोचितम् (संधि)
व्याख्या:
सन्धिविच्छेद में पदों को उनके मूल रूप में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक सन्धि के प्रकार के अनुसार मूल पदों को अलग किया जाता है। उदाहरण के लिए, यण सन्धि में स्वर परिवर्तन होता है, अग्रह सन्धि में अपसर्ग चिह्न (ऽ) आता है, दीर्घ सन्धि में दो स्वर मिलकर दीर्घ स्वर बनाते हैं।
Q3.प्र. 3. यत्र प्रकृति भाव - सन्धि: अस्ति तत्पदं ( √ ) इति चिह्नेन चिह्नीकुरुत यत्र च नास्ति तत्पदं ( × ) इति चिह्नेन चिह्नीकुरुत— i) नदी एते ( ) ii) वृक्षे अपि ( ) iii) मुनी एतौ ( ) iv) साधू उपरि गच्छत: ( ) v) सखी एषा ( ) vi) मुनी इच्छत: ( ) vii) सभायाम् कवी आगतौ ( ) viii) नदी इयं वहति ( )
उत्तर:
i) नदी एते (√) - 'नदी' + 'एते' में यण सन्धि है। ii) वृक्षे अपि (√) - 'वृक्षे' + 'अपि' में सन्धि है। iii) मुनी एतौ (×) - 'मुनी' + 'एतौ' में सन्धि नहीं है। iv) साधू उपरि गच्छत: (√) - 'उपरि' + 'गच्छत:' में सन्धि है। v) सखी एषा (×) - 'सखी' + 'एषा' में सन्धि नहीं है। vi) मुनी इच्छत: (√) - 'मुनी' + 'इच्छत:' में सन्धि है। vii) सभायाम् कवी आगतौ (√) - 'सभायाम्' + 'कवी' में सन्धि है। viii) नदी इयं वहति (×) - 'नदी' + 'इयं' में सन्धि नहीं है।
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्य में दो शब्दों के बीच सन्धि के नियमों के अनुसार परिवर्तन होता है या नहीं, इसका निर्धारण किया गया है। यदि स्वर या व्यंजन परिवर्तन होता है तो (√) और यदि नहीं होता तो (×) चिह्न लगाया गया है।
Q4.प्र. 4. अधोलिखितवाक्येषु स्थूलपदेषु सन्धिविच्छेदं कृत्वा लिखत— i) कवीन्द्र: अद्य नवीनां कवितां श्रावयति। ii) कंस: सर्वेषु अत्याचारम् करोति स्म। iii) गङ्गा गङ्गति यो ब्रूयात् योजनानां शतैरपि स: पापेभ्य: विमुच्यते। iv) यथा राम: पठति तथैव श्याम: पठति। v) वानरा: सर्वत्र वृक्षेऽपि कूर्दन्ति।
उत्तर:
i) कवीन्द्र: अद्य नवीनां कवितां श्रावयति। सन्धिविच्छेद: कवीन्द्र: = कवी + इन्द्र: (समास) अद्य = अद्य नवीनां = नवीन + आं कवितां = कविता + आं श्रावयति = श्रावयति ii) कंस: सर्वेषु अत्याचारम् करोति स्म। कंस: = कंस + : (विसर्ग) सर्वेषु = सर्व + एषु अत्याचारम् = अति + आचारम् करोति = करोति स्म = स्म iii) गङ्गा गङ्गति यो ब्रूयात् योजनानां शतैरपि स: पापेभ्य: विमुच्यते। गङ्गा = गङ्गा गङ्गति = गङ्ग + अति यो = यो ब्रूयात् = ब्रूयात् योजनानां = योजना + अनां शतैरपि = शत + ऐरपि स: = स + : पापेभ्य: = पाप + एभ्य: विमुच्यते = वि + मुच्यते iv) यथा राम: पठति तथैव श्याम: पठति। यथा = यथा राम: = राम + : पठति = पठति तथैव = तथा + एव श्याम: = श्याम + : पठति = पठति v) वानरा: सर्वत्र वृक्षेऽपि कूर्दन्ति। वानरा: = वानर + : सर्वत्र = सर्व + त्र वृक्षेऽपि = वृक्षे + अपि कूर्दन्ति = कूर्दन्ति
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्य में स्थूलपदों को उनके मूल पदों में विभाजित किया गया है। सन्धि के नियमों के अनुसार शब्दों के बीच के परिवर्तन को समझकर विभाजन किया गया है। उदाहरण स्वरूप, विसर्ग, यण, दीर्घ, गुण आदि सन्धि प्रकारों के अनुसार शब्दों को अलग किया गया है।
Q5.i) दिगम्बरः — …………… + अम्बरः (दिक् / दिग्) ii) मच्छिरः — मत् + …………… (छिरः / शिरः) iii) जगदीशः — …………… + ईशः (जगत् / जगद्) iv) अयं गच्छति — …………… + गच्छति (अयं / अयम्) v) नीरोगः — …………… + रोगः (निर् / नीर्) vi) तल्लीनः — तत् + …………… ( लिनः / लीनः)
उत्तर:
i) दिगम्बरः = दिग् + अम्बरः सन्धिविच्छेद: दिग् + अम्बरः ii) मच्छिरः = मत् + छिरः सन्धिविच्छेद: मत् + छिरः iii) जगदीशः = जगत् + ईशः सन्धिविच्छेद: जगत् + ईशः iv) अयं गच्छति = अयम् + गच्छति सन्धिविच्छेद: अयम् + गच्छति v) नीरोगः = निर् + रोगः सन्धिविच्छेद: निर् + रोगः vi) तल्लीनः = तत् + लीनः सन्धिविच्छेद: तत् + लीनः
व्याख्या:
सन्धिविच्छेद में शब्दों को उनके मूल रूपों में विभाजित किया जाता है। i) दिगम्बरः = दिग् + अम्बरः, जहाँ 'दिग्' और 'अम्बरः' मिलकर 'दिगम्बरः' बनता है। ii) मच्छिरः = मत् + छिरः, 'मत्' और 'छिरः' मिलकर 'मच्छिरः' बनता है। iii) जगदीशः = जगत् + ईशः, 'जगत्' और 'ईशः' मिलकर 'जगदीशः' बनता है। iv) अयं गच्छति = अयम् + गच्छति, 'अयम्' और 'गच्छति' मिलकर 'अयं गच्छति' बनता है। v) नीरोगः = निर् + रोगः, 'निर्' और 'रोगः' मिलकर 'नीरोगः' बनता है। vi) तल्लीनः = तत् + लीनः, 'तत्' और 'लीनः' मिलकर 'तल्लीनः' बनता है।
Q6.i) सत् + जनः — सज्जनः / सत्जनः …………… ii) तत् + श्रुत्वा — तच्चुत्वा / तच्चुत्वा …………… iii) विद्वान् + लिखति — विद्वांल्लिखति / विद्वांल्लिखति …………… iv) सम् + कल्पः — सम्कल्पः / सड्कल्पः …………… v) उत् + लेखः — उल्लेखः / उल्लेखः ……………
उत्तर:
i) सत् + जनः = सज्जनः सन्धि: सत् + जनः = सज्जनः (द्विगु सन्धि) ii) तत् + श्रुत्वा = तच्चुत्वा सन्धि: तत् + श्रुत्वा = तच्चुत्वा (तत्पुरुष सन्धि) iii) विद्वान् + लिखति = विद्वांल्लिखति सन्धि: विद्वान् + लिखति = विद्वांल्लिखति (समास सन्धि) iv) सम् + कल्पः = सम्कल्पः सन्धि: सम् + कल्पः = सम्कल्पः (वृद्धि सन्धि) v) उत् + लेखः = उल्लेखः सन्धि: उत् + लेखः = उल्लेखः (वृद्धि सन्धि)
व्याख्या:
सन्धिपदों का निर्माण करते समय मूल शब्दों को मिलाकर सही सन्धि रूप बनाना होता है। सन्धि नियमों के अनुसार: - सत् + जनः = सज्जनः (द्विगु सन्धि) - तत् + श्रुत्वा = तच्चुत्वा - विद्वान् + लिखति = विद्वांल्लिखति - सम् + कल्पः = सम्कल्पः - उत् + लेखः = उल्लेखः
Q7.i) सर्वे जगच्छिवानि कार्याणि कुर्वन्तु। ………………………… ii) यत्पाठे उत् + लिखितम् तत् सर्वे पठत। ………………………… iii) नीरोगः जनः सुखी भवति। ………………………… iv) कोकिलः पं + चमे स्वरे गायति। ………………………… v) सः तरुच्छायायाम् पठति। ………………………… vi) मानी मानम् + न त्यजति। …………………………
उत्तर:
i) सर्वे जगच्छिवानि कार्याणि कुर्वन्तु। सन्धिविच्छेद: सर्वे जगत् + शिवानि कार्याणि कुर्वन्तु। ii) यत्पाठे उत् + लिखितम् तत् सर्वे पठत। सन्धिविच्छेद: यत् + पाठे + उत् + लिखितम् तत् सर्वे पठत। iii) नीरोगः जनः सुखी भवति। सन्धिविच्छेद: निः + रोगः जनः सुखी भवति। iv) कोकिलः पं + चमे स्वरे गायति। सन्धिविच्छेद: कोकिलः पङ् + चमे स्वरे गायति। v) सः तरुच्छायायाम् पठति। सन्धिविच्छेद: सः तरु + छायायाम् पठति। vi) मानी मानम् + न त्यजति। सन्धिविच्छेद: मानी मानम् + न त्यजति।
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्य में स्थूलपदों को यथापेक्ष सन्धि या सन्धिविच्छेद करके लिखा गया है। - i) जगच्छिवानि = जगत् + शिवानि - ii) यत्पाठे उत् + लिखितम् - iii) नीरोगः = निः + रोगः - iv) पं + चमे = पङ् + चमे - v) तरुच्छायायाम् = तरु + छायायाम् - vi) मानम् + न यहाँ सन्धि और सन्धिविच्छेद के नियमों का प्रयोग किया गया है।
Q8.प्र. 1. समुचितं सन्धिपदं चित्वा लिखत— i) इतः + ततः — इतस्ततः / इतश्ततः ……………………………… ii) दुः + कर्म — दुश्कर्म / दुष्कर्म ……………………………… iii) शिवः + अवदत् — शिवावदत् / शिवोऽवदत् …………………… iv) मुनिः + आगच्छति — मुनिरागच्छति / मुनिरगच्छित ……………… v) मनः + रथः — मनरथः / मनोरथः ……………………………… vi) छात्रः + अयम् — छात्रोऽयम् / छात्रायम् ………………………… vii) प्रथमः + नाम — प्रथमो नाम / प्रथमोऽनाम ………………………… viii) कपि + चलति — कपिच्चलति / कपिश्चलति …………………………
उत्तर:
i) इतः + ततः = इतस्ततः (सन्धि: स्वर + स्वर = दीर्घ सन्धि) ii) दुः + कर्म = दुश्कर्म (सन्धि: ह् + क् = क् पूर्वक् सन्धि) iii) शिवः + अवदत् = शिवोऽवदत् (सन्धि: ह् + अ = ओऽ स्वर सन्धि) iv) मुनिः + आगच्छति = मुनिरागच्छति (सन्धि: ह् + आ = र् पूर्वक् सन्धि) v) मनः + रथः = मनोरथः (सन्धि: ह् + र् = र् पूर्वक् सन्धि) vi) छात्रः + अयम् = छात्रोऽयम् (सन्धि: ह् + अ = ओऽ स्वर सन्धि) vii) प्रथमः + नाम = प्रथमो नाम (सन्धि: ह् + न = म् पूर्वक् सन्धि) viii) कपि + चलति = कपिच्चलति (सन्धि: इ + च् = इच्च सन्धि)
व्याख्या:
सन्धि नियमों के अनुसार, स्वर-संयोग में दीर्घ सन्धि होती है, व्यंजन-संयोग में पूर्ववर्ती व्यंजन के अनुसार सन्धि होती है। - इतः + ततः में 'अ' + 'अ' = 'आ' दीर्घ सन्धि, अतः इतस्ततः। - दुः + कर्म में 'ः' + 'क' = 'क' पूर्वक् सन्धि, अतः दुश्कर्म। - शिवः + अवदत् में 'ः' + 'अ' = 'ओऽ' स्वर सन्धि, अतः शिवोऽवदत्। - मुनिः + आगच्छति में 'ः' + 'आ' = 'र' पूर्वक् सन्धि, अतः मुनिरागच्छति। - मनः + रथः में 'ः' + 'र' = 'र' पूर्वक् सन्धि, अतः मनोरथः। - छात्रः + अयम् में 'ः' + 'अ' = 'ओऽ' स्वर सन्धि, अतः छात्रोऽयम्। - प्रथमः + नाम में 'ः' + 'न' = 'म' पूर्वक् सन्धि, अतः प्रथमो नाम। - कपि + चलति में 'इ' + 'च' = 'इच्च' सन्धि, अतः कपिच्चलति।